20141216

लकी हूं कि अच्छे निर्देशकों के साथ काम कर रही हूं : अनुष्का

 फिल्म पीके से जुड़ने की खास वजह क्या रही.
राजू हिरानी. सिर्फ और सिर्फ राजू हिरानी. मेरा मानना है कि हम राजकुमार हिरानी को परफेक् शनिष्ट इसलिए मानते हैं क्योंकि वह मीडियोकर फिल्में नहीं बनाते हैं. और मैं भी गुड सिनेमा के साथ ही अपना नाम जोड़ना चाहती हूं. तो मेरे लिए यह खास मौका था. जब मैं उनके साथ काम करूं. और इस फिल्म के साथ जुड़ने से एक बड़ी खुशी यह भी मिली जब मुझे राजकुमार हिरानी ने कहा कि वह मुझे मेरी फिल्म में कास्ट करना चाहते हैं , क्योंकि उनकी पत् नी हमेशा उनसे शिकायत करती हैं कि वह अपनी फिल्मों में महिलाओं का किरदार खास नहीं रखते. तो उन्होंने कहा कि पीके से मैं अपनी पत् नी को खुश करने की कोशिश कर रहा हूं. तो यह सुन कर तो मैं और ज्यादा ही खुश हो गयी. इससे स्पष्ट है कि इस फिल्म में निश्चित तौर पर अच्छा किरदार होगा ही. राजू हिरानी के साथ जब आप फिल्म कर रहे होते हैं तो आप सिर्फ फिल्म नहीं कर रहे होते आप बियोंड द फिल्म करते हैं.राजू हिरानी की फिल्म देख कर आपको यह नहीं लगता कि आप फिल्म देख रहे हो. आप जुड़ जाते हो उससे. लगता है कि आपके साथ घटित हो रहा है. रोना भी आता है हंसी भी आती है. और दुर्भाग्यवश राजू हिरानी जैसे निर्देशक हमारे देश में कम हैं. राजू खुद अपनी फिल्मों के ब्रांड हैं. राजू हिरानी की फिल्मों की खासियत है कि हम उसके डायलॉग, उसके सीन रिकॉल कर सकते हैं.ऐसी कितनी हिंदी फिल्में होती हैं. यही वजह है कि वह जीवंत तरीके से इसे प्रस्तुत करते हैं.
अनुष्का आपको इंडस्ट्री में आये 5 साल हुए हैं. ऐसे में जब पीके जैसी फिल्म आॅफर होती है तो नर्वस होती हैं आप?
हां, शुरू होने से पहले तो नर्वसनेस होती ही है कि कर पाऊंगी की नहीं और मुझे लगता है हर एक्टर नर्वस होता ही होगा. मन में डाउट्स होते हैं. पहली फिल्म के पहले भी आये थे और अब भी होता है. लेकिन जब फिल्म शुरू हो जाती है. रीडिंग शुरू हो जाती है तो आप अपने कैरेक्टर को समझने लग जाते हो. आप कहीं पर भी हो. आपके दिमाग में वह कैरेक्टर चलता रहता है. आप उसको प्रीपेयर करने लगते हैं. और फिर आपके लिए काम करना आसान हो जाता है.
इन पांच सालों में आपने काफी कम फिल्में की हैं. जाहिर सी बात है आपके पास आॅफर आते रहे होंगे. तो न कहना कितना मुश्किल होता है और कम फिल्में करने की वजह?
दरअसल, न कहना मेरे लिए मुश्किल नहीं होता है. क्योंकि मेरे मन में क्लैरिटी रहती है कि मैंने उन्हें न क्यों कहा. मेरे मन में लेकिन कोई रिग्रेट नहीं रहता. क्योंकि मुझे पता है कि मैं किस वजह से फिल्म को न कहा है. मैंने तय किया है कि मैं हमेशा अलग तरह की फिल्में करूंगी. ऐसी फिल्में जिसमें मेरे करने के लिए कुछ हो. तो अभी मेरे पास वक्त है. अभी मैं उस पोजिशन में हूं कि फिल्मों का चयन सोच समझ कर करूं.सो, मुझे दिक्कत नहीं होती. मैं जब भी करूंगी मैं सब्शडटानशियल काम करूंगी. जो फिल्में मैंने की हैं. सभी अलग अलग तरह की फिल्में हैं. बांबे वेल्वेट, दिल धड़कने दो जैसी फिल्में कर रही हूं और सभी बिल्कुल अलग अलग तरह के निर्देशकों के साथ. सबका सिनेमा अलग अलग तरीके का है. मैं लकी मानती हूं कि मैं ऐसी फिल्में कर पा रही हूं. लेकिन इसके लिए मुझे धैर्य रखना पड़ा है. क्योंकि कई लोग आपको कहने लगते हैं कि आप यंग हो लेकिन ज्यादा फिल्में नहीं कर रहे. एकबारगी आपको भी टेंशन होने लगती हैं. लेकिन फिर भी मैंने धैर्य से काम लिया है.
ऐसे वक्त में जब आप अपना धैर्य खोती हैं तो आपको मजबूत कौन बनाता है.
मेरे भाई से मुझे काफी सपोर्ट करता है. वह मेरा सपोर्ट सिस्टम है. वह हमेशा समझाता है कि यह रियलिटी नहीं है. सिनेमा में बहुत इल्लुयजन है. इस पर ध्यान मत दो. फिर जब वह समझाता है तो मंै भी समझने लगती हूं कि रियलिटी क्या है.साथ ही मैं खुद को स्ट्रांग मानती हूं, मैं लोगों से दूर रहती हूं. मेरी अपनी प्राइवेट लाइफ है. मैं पर्सनल लाइफ के बारे में बात नहीं कर पाती हूं. मैं ज्यादा पीआर नहीं करतीं तो इन चीजों से मैं ज्यादा परेशान नहीं होती. मैं लोगों के बातों पर ध्यान नहीं देती. मैं ज्यादा साबित करने की कोशिश नहीं करती हूं. क्योंकि मेरा मानना है कि आपका काम ही आखिरकार बोलता है. मैं किसी का इगो सैटिसफाइ करने के लिए अपना रिस्पेक्ट नहीं खो सकती.
फिल्मों के प्रोडक् शन में आने की खास वजह क्या रही?
मैं चाहती हूं कि अच्छी फिल्में बना पाऊं. मैं जिस तरह की फिल्में देखती हूं. मुझे लगता है कि ऐसी फिल्में हमारे यहां भी बनतीं. जैसे क्वीन बनीं, कहानी बनी. ऐसी कई फिल्में देख कर लगता है कि ऐसी फिल्में काश मैं बना पाऊं. और मुझे लगता है कि कोई मेरे नाम पर अच्छी फिल्म बना रहा है तो मैं उसको सपोर्ट करना चाहती हूं. वैसे मैं क्रियेटिव प्रोडयूसर बनना ही पसंद करती हूं, क्योंकि मैं मानती हूं कि मैं क्रियेटिव हूं. अभिनय तो करने के लिए ही यहां आयी थी. सो, जो मिल रहा है मौका. मैं बहुत खुश हूं कि मैं एक साथ सिनेमा के लिए अच्छे काम कर रही हूं. एनएच 10 जब आप देखेंगी तो आप देखेंगी कि ऐसी फिल्में कितनी कठिन होती हैं बनाने में. सो, आप देखें कि मैं किस तरह से काम करती हूं.

डीडीएलजे देखा तो जाना सनम...दर्शक भी दीवाने होते है ं सनम


दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे को हिंदी सिनेमा में एक रामराज्य माना जाये तो अतिश्योक्ति न होगी. यह फिल्म भले ही आज से कई सालों पहले रिलीज हुई हो. लेकिन आज भी ये सिने प्रेमियो और आम लोगों के सबसे करीब हैं. दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे ने अपने किस कदर लोगों को प्रभावित किया है, इस बात का अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि मुंबई के मराठा मंदिर में अब तक यह फिल्म प्रदर्शित हो रही है. वह भी हाउसफुल. और 12 दिसंबर को फिल्म 1000वें हफ्ते में प्रवेश कर जायेगी. पेश है प्रेम व पारिवारिक मिसाल बन चुकी इस फिल्म से जुड़े कुछ दिलचस्प पहलुओं पर अनुप्रिया व उर्मिला की रिपोर्ट

एक दर्शक की दीवानगी किसे कहते हैं, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण आप तभी लगा सकते हैं, जब आप स्वयं मुंबई के मराठा मंदिर में एक दर्शक के रूप में मौजूद हों. उस दौर में जब मल्टीप्लेक्स के सॉफिशटिकेटेडे दर्शक नहीं हुआ करते थे.उस वक्त की रिलीज हुई फिल्म  इस दौर में भी यह फिल्म जबकि मल्टीप्लेक्स वाले सॉफिशटिकेटेड दर्शकों वाले दौर में भी फं्रर्ट सीट और हर डायलॉग पर सिटियां बजाने वाले दर्शकों के बीच देखी जा रही है. आज के बुद्धिजीवी समीक्षकों व दर्शकों को भले ही दिलवाले...एक औसतन फिल्म माने. कितने बुद्धिजीवियों ने इसे प्रेमियों को उकसाने व प्रेम विवाह को बढ़ावा देने के इल्जाम लगाये हो. लेकिन हकीकत यह है कि इस फिल्म ने आम लोगों को ही नहीं सिने प्रेमियों को भी प्रभावित किया. हिंदी फिल्मों में इस फिल्म के बाद जितनी प्रेम कहानियां बनीं लगभग सभी प्रेमियों में दर्शकों ने राज और सिमर को तलाशा. कई प्रेम कहानियां इससे ही प्रेरित हुई. हर प्रेम कहानी इस फिल्म की झलक दिखी. हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया के निर्देशक शशांक खेतान यह स्वीकारते हैं कि उन्होंने दिलवाले से प्रेरित होकर ही अपनी कहानी गढ़ी. फिल्म का संवाद बड़े बड़े शहरों में छोटी छोटी बातें होती रहती हैं...आम आशिकों के दिल की जुबां बनीं. फिल्म का अंतिम दृश्य जब राज और सिमरन भाग रहे हैं. वह ट्रेन वाले दृश्य सिने प्रेमियों के लिए स्थापित तसवीर बनी. न जाने कितने सिने प्रेमियो ने इस अंदाज में अपने घर में लगे फ्रेम सजाये हैं.यह इस फिल्म का ही जादू है, जिसने तुझे देखा तो ये जाना सनम गीत को लव एंथम में बदल दिया. लोग दो प्रेमियों की दुआएं लेते और कहते एकदम राज सिमरन सी जोड़ी है. कई गांवों में लोगों ने कबूतरों को दाना देना शुरू किया. मेहंदी पर सेहरा सजा के रखना गीत न हो तो दुल्हन अपनी शादी को पूरी नहीं समझती.  यह फिल्म केवल एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि एक परिवार, एक बेटी के सरोकार, एक पिता व पुत्री के रिश्ते व पारिवारिक रिश्तों की समझ पर आधारित महत्वपूर्ण फिल्म थी और शायद यही वजह है कि आज  भी यह प्रासंगिक है और आगे भी रहेगी.
बॉक्स में
 1. गौरतलब है कि यह फिल्म सबसे पहले सैफ अली खान को आॅफर हुई थी. लेकिन सैफ अली खान ने आॅफर ठुकराया तो यह आॅफर फिर शाहरुख को दिया गया.
2. सैफ अली के अलावा आदित्य ने जब फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी थी तो उनके दिमाग में था कि वे किसी हॉलीवुड के एक्टर को कास्ट करेंगे. उनके जेहन में उस वक्त टॉम क्रूज का भी नाम आया था.
3. इस फिल्म के दौरान करन जौहर, काजोल और शाहरुख खान पक्के दोस्त बने और उनकी फिल्म कुछ कुछ होता है की नींव भी इसी फिल्म के दौरान पड़ी थी.
4. यह फिल्म यश चोपड़ा के बैनर यशराज बैनर के 25 साल पूरे होने के शुभ अवसर पर प्रदर्शित हुई थी. यश चोपड़ा मानते थे कि उनकी पहली फिल्म दाग से लेकर दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे में उन्होंने अपने सपने को जिया. और इस सपने को जीते जीते उन्हें 25 साल हुए.
5. दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे का शीर्षक आदित्य चोपड़ा को अनुपम खेरे की पत् नी व अभिनेत्री किरण खेर ने सुझाया था.
6. यश चोपड़ा को पहली बार फिल्म कभी कभी की शूटिंग के दौरान यह एहसास हुआ था कि उनके बेटे आदित्य चोपड़ा को फिल्मों में कितनी दिलचस्पी है. चूंकि फिल्म की शूटिंग के दौरान हर वक्त व्यूफाइनडर से कुछ न कुछ देखा करते थे और शशि कपूर व अमिताभ उन्हें छोटा डायरेक्टर बुलाते थे और यह भी कहा करते थे कि डायरेक्टर बनने पर हमें याद रखना. बाद में आदित्य ने एक दिन शबाना और जावेद अख्तर को 6 साल की उम्र में एक कहानी सुनायी जिसे सुन कर दोनों ने ऐलान कर दिया था कि आदित्य निर्देशक ही बनेंगे.
मेरे लिए लांचिंग पैड : शाहरुख खान
भले ही मैंने दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे से पहले कई फिल्मों में काम कर लिया था. लेकिन मेरे लिए यह फिल्म लांचिंग पैड की तरह थी. जैसे सलमान की मैंने प्यार किया और आमिर की कयामत से कयामत थी. मैंने 15 फिल्में कर ली थी उस वक्त तक़ . लेकिन जो संतुष्टि इस फिल्म से मुझे मिली थी. वह एक एक्टर की भूख को शांत करनेवाली थी. लोग आदित्य चोपड़ा को नजदीक से नहीं जानते. कई लोगों ने उन्हें देखा नहीं है. लेकिन मैं बस यही कहूंगा कि राज बिल्कुल आदित्य की तरह है. उतना ही रोमांटिक, उतना ही फनी और उतना ही अपने परिवार को प्यार करने वाला. इस फिल्म की एक और खासियत यह थी कि इससे पहले तक फिल्मंो में लड़के लड़कियों को भगाते हुए दिखाया जाता था. लेकिन इस फिल्म के बाद से वे परिवार को महत्व देने लगे. मुझे याद है शुरुआत में  इस फिल्म के बारे में सिर्फ सलमान ने कहा था कि फिल्म मैंने प्यार किया से अच्छा बिजनेस करेगी.
फेवरिट गीत : मेरे ख्वाबों में जो आये...
मैं सिमरन बिल्कुल नहीं : काजोल
मुझे आज भी आश्चर्य होता है कि कैसे मैंने मजाक मजाक में सिमरन का किरदार निभा दिया. मैं लेकिन उसकी तरह बिल्कुल नहीं थी. लेकिन वह आदित्य चोपड़ा ही थे. जिन्होंने मुझे सिमरन बनाया. मुझसे ज्यादा आदि सिमरन को जानते थे. फेवरिट गीत : फिल्म का मेरा पसंदीदा गीत तुझे देखा तो जाना सनम है. मुझे लगता है कि मेरे लिए प्यार क्या है. इसे ध्यान में रख कर वह गीत लिखा गया था.
फेवरिट सीन : जब मैं अमरीश पुरी जी से अंतिम दृश्य में राज के साथ जाने की इजाजत मांगती हूं.
टिपिकल मां का किरदार नहीं था : फरीदा जलाल
इस फिल्म में मुझे मां का जो किरदार मिला था. वह आमतौर पर हीरोइन की मां वाला किरदार नहीं था. मुझे इसमें अपने बाल जबरन सफेद नहीं करने पड़े थे. मैं सिमरन की दोस्त जैसी थी. इससे पहले शायद फिल्मों में मां और बेटी के रिश्ते में प्यार को लेकर इतनी सहजता कम दिखाई गयी थी. तो यह फिल्म एक बेटी और मां के रिश्ते को भी अलग तरीके से स्थापित करती है. फिल्म में कई परत हैं. जो आपको आकर्षित करते हैं.
ँजंगली घोड़ा था वह : परमजीत
फिल्म में  जिस घोड़े पर मैं सवार था वह जंगली घोड़ा था. लेकिन वह मेरा पहला शॉट था फिल्म का तो. मैं खुद को साबित करना चाहता था. सो, मैं अपने बेस्ट देने की कोशिश करता रहा. घोड़ा चूंकि जंगली था तो डर तो लग ही रहा था. चूंकि घोड़ा एक खेत से दूसरे खेत चले जा रहा था.जब वह घोड़ा थमा तब जाकर सांस में सांस आयी.

मेरी जिंदगी का बेस्ट शॉट था वह : अनुष्का

मेरा पहला शॉट फिल्म रब ने बना दी जोड़ी का था. मुझे सुरी यानी शाहरुख के साथ एंट्री करना था. दरवाजे से. मैंने शादी का जोड़ा पहना हुआ था. वह मेरी जिंदगी का पहला शॉट था. थोड़ी थोड़ी डरी सी तो थी, क्योंकि सभी बड़े लोग थे. फिल्म में ऐसा सीन था कि मैं सुरी को जानती नहीं हूं. लेकिन उनके घर में मैं पत् नी बन कर आ गयी हूं.और मैं नर्वस थी फिल्म में भी. और रियल लाइफ में भी, क्योंकि उस दिन मैं पहली बार शाहरुख खान से मिली थी. उन्होंने बेहद प्यार से मुझसे बातें की थीं और फिर मेरी सारी नर्वसेनेस खत्म हो गयी थी. इससे पहले हमारी मुलाकात नहीं हुई थी. लेकिन मैं कहना चाहंूगी कि मैंने वह शॉट बेहद अच्छे तरीके से दिया था और मुझे खुशी है कि आज उस फिल्म की वजह से मैं यहां हूं. खुशी है कि मुझे आदित्य ने भी कहा था कि मैंने पहला शॉट ही पूरे कांफिडेंस से कहा है

अहम यह है कि आप जो सोच कर चले थे बना पाये या नहीं : राजू हिरानी



राजू हिरानी...निर्देशकों में राजकुमार हिरानी ही वह शख्स हैं, जिनसे आम दर्शक भी खुद को जोड़ पाते हैं और सुपरस्टार्स भी. आप कह सकते हैं कि राजू दोनों के बीच अपनी कहानियों के माध्यम से एक सेतु का काम करते हैं. उनकी फिल्में देख कर दर्शक रोते भी हैं और हंसते भी हैं, लेकिन साथ ही साथ उनकी फिल्मों के लेकर वह घर भी जाते हैं. मुन्नाभाई, सर्किट, फुंगसुक वांगडूं, चतुर रामलिंगम जैसे किरदार अब भी दर्शकों की जेहन में दर्ज हैं. इस बार वह दर्शकों के सामने पीके लेकर आ रहे हैं. पेश है राजू हिरानी से अनुप्रिया व उर्मिला की हुई बातचीत के मुख्य अंश
फिल्म पीके का आइडिया कैसे आया?
पीके में हम क्या दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, यह तो आपको फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा, हां, मगर यह जरूर बताना चाहूंगा कि फिल्म का आइडिया 3 इडियट्स के खत्म होने के बाद ही मेरे और फिल्म के लेखक अभिजात के दिमाग में आयी थी. हमलोग बोरिवली पार्क में घूम रहे थे. आइडिया वही से आया. लेकिन बीच को पकते पकते वक्त लगता है. सो, इतने साल लग गये.
राजू, आपकी फिल्में कई सालों के बाद आती है. जाहिर है, उन सालों में कई बदलाव भी आ जाते हैं. लेकिन फिर भी आपकी फिल्में प्रासंगिक होती हैं. तो कैसे निर्णय लेते हैं कि इसी आइडिया पर काम होना चाहिए?
नहीं, मुझे ये नहीं लगता कि इतने सालों में बिल्कुल से दौर बदल जाता है. लेकिन लकली मेरी यह जो फिल्म है पीके. यह यूनिवर्सल फिल्म है. इस फिल्म में लिखने में ज्यादा वक्त लगा. चूंकि विषय वैसा था. मेरे साथ यह डर नहीं रहता किसी स्क्रिप्ट को चुनने में की, वह प्रासंगिक रहेगा या नहीं. चुनौती यह होती है कि आप जिस विषय को लेकर चले हैं, आप उससे बोर न हों. आप जो सोच कर चले थे.वह बना पाये हैं या नहीं. आप उससे न भटकें. क्या होता है कि एक निर्देशक जब किसी फिल्म को अधिक वक्त देता है, तो आपने जो लिखा है, आप उससे बोर होने लगते हो. जो लिखा है. उसमें कई ड्राफ्ट्स होते हैं. फिर उसको आप शूट कर रहे होते हो.आप उस एक्टर के साथ रिहर्सल होता है. मैं खुद एडिटर हूं तो फिर उसे मैं दस दस बार देखता हूं. फिर मिक्सिंग होता है, तो इस पूरे क्रम में आप फिल्म को कई बार देख चुके होते हो. फिल्म का एक एक शॉट 1000 बार देखने के बाद कभी कभी आप बोर होने लगते हैं. मैं भी कभी कभी सोचता हूं कि बहुत देर नहीं करनी चाहिए एक ही स्क्रिप्ट को लेकर. सीमित समय में बना लेनी चाहिए. लेकिन हमारी दिक्कत यह है कि हम कुंआ खोदते रहते हैं. जब तक पूरी तरह से पानी न निकल आये. खुद को संतुष्ट करना भी कठिन होता है.
आपकी फिल्मों में संदेश जरूर होता है. जबकि आमतौर पर यह अवधारणा बन चुकी है कि तीन घंटे में ज्ञान बांटने की जरूरत नहीं. तो इस पर आपकी क्या सोच है?
मेरा मानना है कि वेराइटी में ही मजा है. मुझे लगता है कि हर शुक्रवार का अपना मजा है. हर शुक्रवार अलग अलग तरह की फिल्में आये. यह वक्त तो नये फिल्मकारों और नयी कहानियों का दौर है और सबसे अच्छा दौर है. तो हर तरह की फिल्में आये. मेरे साथ भी यह जरूरी नहीं कि मैं हर बार मेसेज ही दूं. लेकिन हां, मैं वैसी फिल्में बनाने की कोशिश करता हूं जिसमें मैं खुद बहुत यकीन करता हूं. जैसे एजुकेशन सिस्टम को लेकर, जैसे हमारे देश में जिस तरह से एजुकेशन की प्रक्रिया को समझा जा रहा है. वह बहुत गलत है.हम फोर्स कर रहे हैं बच्चों को कि वे इंजीनियर ही बने, डॉक्टर ही बने, क्योंकि मैं खुद उस दौर से गुजरा था. मैं चाटर्ड अकाउंटेंट नहीं बनना चाहता था. लेकिन मुझे एग्जाम देना पड़ा. मेरे मार्क्स खराब आते थे. लेकिन जब मैं फिल्म इंस्टीटयूट गया तो मुझे अचानक से एहसास हुआ कि वहां मुझे स्कॉलरशीप मिल रही है. तब मुझे समझ आया कि मुझे ये चीजें मजा दे रही थीं. अब हो सकता है कि किसी को मेडिसीन मजा दे...तो मेरा बस 3 इडियट्स के माध्यम से यही कहना था कि वही करो जो आपको मजा दे. पढ़ने के लिए रटो मत..समझने के लिए पढ़ो. कुछ इसी तरह मुझे गांधीजी में बहुत ज्यादा विश्वास था. मैंने जब गांधी देखी थी तो मैं यही सोचता था कि ऐसा भी कोई आदमी हो सकता है क्या, जिसने तय किया कि मैं बिना लड़े, बिना हिंसा के आजादी लूंगा.उनकी सोच इतनी विचित्र थी.तो मुझे लगा कि इस पर कुछ करना चाहिए. बस तो वही बात है. हो सकता है कि कल सिर्फ हम भी केवल एंटरटेन करने के लिए ही फिल्म बनायें. हां, मगर मैं एंटरटेनमेंट के नाम पर कुछ भी नहीं परोसूंगा. यह तय है.
आपकी फिल्मों से आम दर्शक भी जुड़ते हैं और सुपरस्टार्स भी. बॉलीवुड के नये से लेकर स्थापित कलाकार हर किसी की तमन्ना है कि वह राजू हिरानी के साथ काम करें? आपकी राय में आपकी फिल्मों की ऐसी क्या खास बात है, जो उन्हें आकर्षित करती है?
मुझे लगता है, आप दिल से फिल्म बनाओगे तो दिल तक पहुंचेगी. आप क्लिनिकली फिल्म बनाओगे तो कहीं नहीं पहुंचेगी. हमारी कोशिश होती है कि जो हमारी फिल्म है, हमने जो जिंदगी में देखा है.उसी को निकालो. लोगों को दिखाओ. मेरा मानना है कि मैं सबसे पहले एक आॅडियंस हूं. अगर मुझे वह फिल्म अच्छी लगती है. तो औरों को भी लगेगी. अगर हम भी यह सोचने लगे कि चलो ये यूथ को अच्छा लगेगा, चलो ये बुजुर्गों को अच्छा लगेगा, यह बात अगर आप सोच लें. तो समझ लें कि आप अपने विषय के साथ ईमानदार नहीं हैं. दूसरी यह बात है कि मैं दूसरों को कहानी बहुत सुनाता हूं. फिर उनकी राय लेता हूं. देखता हूं कि वह कौन सा प्वाइंट है, जिस पर ज्यादा लोग प्वाइंट कर रहे हैं तो उस पर दोबारा भी काम करता हूं फिर.
आपको क्या चीजें प्रभावित करती हैं?
मुझे फिलॉसफी पढ़ना बहुत अच्छा लगता है. मैं फिक् शन नहीं पढ़ता. मैं मोटी मोटी किताबें नहीं पढ़ सकता. मुझे पुरानी चीजें पढ़ना अच्छा लगता है.हरिशंकर, रेणु पढ़ लेता हूं तो अभी भी मजा आता है. लेकिन लंबी लंबी कहानियां मैं नहीं पढ़ सकता. जिंदगी से संबंधित चीजें पसंद हैं तो उन्हें ही फिल्मों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करता हूं.

jehan में सिनेमा

 हाल ही में दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे के १००० हफ्ते पूरे हुए हैं।  और इस अवसर पर यशराज स्टूडियो में एक खास कार्यक्रम  का आयोजन किया गया था।  फिल्म में राज और सिमरन का किरदार निभा चुके शाहरुख़ खान और काजोल वहां मौजूद थे और मीडिया से अपनी पुरानी यादों को साँझा कर रहे थे।  इस दौरान शाहरुख़ ने अपने करियर की कई महत्वपूर्ण बातें भी साँझा की।  जो शाहरुख़ से मिल चुके हैं।  वे इस बात से वाकिफ होंगे कि शाहरुख़ भले ही इंटरव्यू कम देते हैं।  लेकिन जब वह बातचीत करते हैं तो अपनी यादों की दुनिया से कई लम्हों से रूबरू कराते हैं और यही उनकी खूबी है। उस दिन भी उन्होंने बताया कि वह इस फिल्म से जुड़ने से पहले कभी इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि वह किसी रोमांटिक फिल्म का हिस्सा बन सकते हैं। लेकिन फिल्म करण अर्जुन फिल्म की शूटिंग के दौरान एक फैन ने आकर उनसे कहा था कि अब मार  काट वाली नहीं किसी अच्छी फिल्म  में काम करो। जिस वक़्त फैन उनसे बातें कर रही थी।  वहां आदित्य चोपड़ा मौजूद थे और उसी वक़्त उन्होंने शाहरुख़ को यह फिल्म ऑफर की थी।  इसी दौरान शाहरुख़ ने एक और बात साँझा की।  आदित्य ने अपनी पहली फिल्म में किरदार का नाम राज इसलिए रखा था, क्योंकि वह राज कपूर के बहुत बड़े फैन हैं। फिल्म में शाहरुख़ जो वाद्य यंत्र बजा रहे हैं।  उसे फिल्म में शामिल करने के भी यही कारण थे, क्योंकि वह राज कपूर साहब का पसंदीदा वाधय यंत्र है और उनकी अधिकतर फिल्मों में उसी यंत्र का इस्तेमाल संगीत के लिए किया गया है।( राज कपूर साहब की १४ दिसंबर को पुण्य तिथि थी) ।  वे आज होते तो ९० वां बसंत देख रहे होते।  निस्संदेह वह कई रूपों में कई निर्देशकों की प्रेरणा रहे हैं।वह अपनी फिल्मों में  संगीत को लेकर अलग सोच रखते थे।  निश्चिततौर पर वर्तमान में कई निर्देशकों से वह स्वयं भी प्रभावित होते।  राजू हिरानी उनमे से एक हैं।  सिनेमा का तिलिस्म ऐसा ही है, जो न होकर भी जिन्दा हैं।  जेहन में।  यही सिनेमा है 

आयटम और अभिनेत्री

आमिर खान ने सत्यमेव जयते के एक एपिसोड में महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाया था. फिल्मों में महिलाओं को आयटम के रूप में परोसना? कहां तक उचित है? वाकई एक महत्वपूर्ण विषय है. इन दिनों सोनी टीवी के बॉक्स क्रिकेट लीग के एक प्रोमो को देखें तो एक अभिनेत्री एक प्लेयर को रिझाती है और उसे आउट कर देती है. और फिर अपने जैकेट के जीप को ऊपर कर लेती है. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म एक् शन जैक् शन में फिल्म की किरदार मरीना से जिस तरह से अंग प्रदर्शन कराया गया है. निश्चित तौर पर निर्देशक के जेहन में यही बात होगी कि इसी बहाने वे कुछ दर्शकों को आकर्षित कर सकेंगे. लगातार इस मुद्दे पर जो बातें हो रही हैं कि क्या फिल्में व टीवी पर महिलाओं को आयटम की तरह परोसना बंद किया जाना चाहिए तो वाकई जरूरत है कि मेकर्स भी सतर्क हों. और साथ ही साथ अभिनेत्रियों को भी इस बात के लिए विरोध करना चाहिए. कंगना रनौत ने कहा है कि उनकी कोशिश होगी कि अब वह अश्लील आयटम सांग नहीं करेंगी. हां, मगर इस मुद्दे से कलाकारों के किरदार को नहीं आंकना चाहिए. मसलन फिल्म में अगर कोई अभिनेत्री सिल्क का किरदार निभा रही है तो जाहिर है, वह उसी किरदार में होंगी. हां, मगर बेमतलब आयटम के रूप में प्रस्तुत होना भी उतना ही गलत है. जितना इसके मेकर्स. छोटा परदे की पहुंच आम बच्चों तक है. ऐसे में ये उत्तेजित करनेवाले वाले प्रोमोज पर भी प्रतिबंध लगना ही चाहिए. आमतौर पर आदर्श बहू के रूप में  नजर आनेवाली छोटे परदे की अभिनेत्रियां क्यों ऐसे प्रोमोज में आने से परहेज नहीं करतीं. यह एक अहम मुद्दा है. खुशी है कि आमिर जैसे सुपरस्टार ने इस पर बहस तो शुरू की है और एक पहल तो की है. वरना, अभिनेत्रियां यूं ही आयटम रूप के रूप में प्रस्तुत होती रहेंगी और इन्हें इस बात से कोई फर्क भी नहीं पड़ेगा.

गुलजार का प्लूटो प्यार

 पिछले दिनों संगीत निर्देशक शांतनु मोइत्रा, स्वानंद किरकिरे और श्रेया घोषाल ने एक साहित्य महोत्सव में म्यूजिकल इवनिंग के दौरान शांतनु मोइत्रा द्वारा लिखी किताब जो उन्होंने फिल्म परिणीता को समर्पित किया है. तीनों ही कलाकार अलग अलग अंदाज व प्रतिभा के धनी हैं और तीनों को साथ में देखना सुखद अनुभव रहा. इसी दौरान शांतनु मोइत्रा ने अपनी किताब के सबसे अंतिम लेकिन सबसे महत्वपूर्ण अध्याय की बातें लोगों के शेयर की कि उनका गुलजार साहब से एक अलग ही रिश्ता है.इन दोनों का रिश्ता खास इसलिए है, क्योंकि शांतनु को भी एस्ट्रोनॉमी में दिलचस्पी है और गुलजार साहब भी इस विषय पर खास जानकारी रखते हैं. शांतनु ने बताया कि एक दिन गुलजार साहब ने शांतनु को घर पर बुलाया और अपना दुख जाहिर किया. उन्हें दुख था कि नौ ग्रहों का हिस्सा माना जानेवाला प्लूटो अब प्लैनेट का हिस्सा नहीं रह जायेगा. शांतनु और गुलजार के बीच उस दिन सिर्फ प्लूटो पर ही बातें हुईं. शांतनु बताते हैं कि उस दिन जिस तरह गुलजार साहब प्लूटो के बारे में बातें कर रहे थे,ऐसा लग रहा था कि उनके परिवार का कोई बच्चा उनसे अलग होने वाला है. गुलजार साहब के बारे में मेरे लिए यह नयी जानकारी थी. लेकिन अब मैं इस बात का अनुमान लगा सकती हूं कि क्या वजह है कि गुलजार साहब शायर, कवि होते हुए भी जब किसी गीत में अपने शब्द डालते हैं तो उसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी क्यों होता है. अगली बार छै छप्पा छई सुनें...चांद पर लिखे उनके तमाम गीतों को सुनें और महसूस करें कि उसमें वैज्ञानिक गहराई भी छुपी है. गुलजार साहब हमेशा कहते हैं, जहां संगीत खत्म हो वहां शब्द शुरू होते हैं और जहां शब्द वहां संगीत. गुलजार साहब के इस प्लूटो प्यार के बारे में जानने के बाद उनका एक और व्यक्तित्व सामने आया.