20130629

दर्शकों को एंटरटेन करना मुख्य मकसद : श्रूति हसन


श्रूति हसन दक्षिण फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान स्थापित कर चुकी हैं. वे बेहतरीन अभिनय के साथ साथ अपनी गायिकी को लेकर भी हमेशा गंभीर रही हैं और पार्श्व गायन में हमेशा योगदान करती रही हैं. हिंदी फिल्मों में इन दिनों वे लगातार नजर आ रही हैं. इस बार वह प्रेम कहानी में दर्शकों के सामने होंगी.

श्रूति, आाप हिंदी सिनेमा में भी लगातार नजर आ रहंी हैं और दक्षिण भी आपने फिल्में करना कायम रखा है.तो कोई खास योजना बना रखी है. क्या कभी पूरी तरह बॉलीवुड शिफ्ट होने का ख्याल आया है?
बिल्कुल नहीं, आइ लव साउथ. हां, मगर मैं बॉलीवुड की फिल्मों में काम करना इसलिए पसंद करती हूं क्योंकि यह भी अलग दुनिया है. यहां ग्लैमर है. लोगों तक आपकी पहुंच ज्यादा है. आप अपने तरीके से यहां की जिंदगी जी सकते हो. फिल्में दर्शकों को पसंद आती है तो अपने फैन तक पहुंचने का जरिया है बॉलीवुड . लेकिन मैं दक्षिण कभी नहीं छोड़ूंगी.

 दक्षिण सिनेमा इंडस्ट्री में और बॉलीवुड में आपको क्या विभिन्नताएं नजर आती हैं?
मेरे लिए फिल्मों में काम करने का मतलब उसकी भाषा से नहीं है. ईस्ट हो या वेस्ट हो या नॉर्थ या साउथ. विभिन्नता फिल्म इंडस्ट्री में नहीं होती. बल्कि मुझे लगता है कि हर फिल्म एक दूसरे से अलग होती है. हर फिल्म का सेटअप एक दूसरे से अलग होता है. हर प्रोडक् शन हाउस की फिल्म एक दूसरे से अलग होती है. हर फिल्म मेकर का अप्रोच अलग होता है. तो मैं मानती हूं कि डिफरेंस तो फिल्म के बदलते ही आ जाते हैं. ऐसे में स्टेट उतना मायने नहीं रखता.

गों का मानना है कि साउथ फिल्म इंडस्ट्री के लोग अधिक प्रोफेशनल होते हैं. इस बात में कितनी सच्चाई है?
जैसा कि मैंने कहा कि बांबे हो या तेलुगु इंडस्ट्री हो या फिर तमिल. फिल्मों की सोच, फिल्मों में काम करने का तरीका, उसके प्रोडक् शन हाउस पर निर्भर करता है. और मुझे लगता है कि साउथ में लोगों की दुनिया पूरी तरह से सिर्फ सिनेमा नहीं है. इसलिए वे लोग अपना काम जल्द से जल्द पूरा करते हैं ताकि वे बाकी काम में भी वक्त दें. अब आप इस प्रोफेशनलिज्म का नाम दे सकती हैं.लेकिन हकीकत में हर सिनेमा इंडस्ट्री में प्रोफेशनल अन प्रोफेशनल लोग होते ही हैं.
आप किसी हिंदी फिल्म में लगभगं दो सालों के बाद  नजर आ रही हैं, तो इस दौरान क्या किसी फिल्म का आॅफर नहीं मिला या फिर आपने किन्हीं कारणों की वजह से वे फिल्में नहीं की.
एग्जैक्टली, मुझे फिल्में मिल रही थीं. लेकिन जिस तरह की स्क्रिप्ट आ रही थी. मुझे पसंद नहीं आ रही थी.इसके अलावा इन दो सालों में साउथ में मेरे कई कमिटमेंट्स थे, जिन्हें मुझे पूरा करना था.

श्रूति, आपका पूरा परिवार हिंदी सिनेमा से जुड़ा रहा है. तो आपके फिल्मों के चुनाव में उनकी क्या भूमिका रहती है?
सच कहूं तो बिल्कुल नहीं. मेरे माता पिता की दखल या उनका रोल तब तक ज्यादा था जब मैं ग्रोइंग एज में थी.  लेकिन अब मैं अपने डिसीजन खुद लेती हूं.  मैं अब पूरी तरह से इंडिपेंडेंट हो चुकी हूं और इंडिपेंडेंट रूप से ही अपनी फिल्मों का चुनाव करती हूं. मुझे पता है कि मैं क्या अच्छा काम कर सकती हूं क्या नहीं. सो, मैं खुद अपने किरदारों का चुनाव करती हूं.

आप रम्मैया वस्तावैसा  इस फिल्म में इंडियन लुक में हैं तो कितना अलग रहा आपका अनुभव
मैंने साउथ में काफी इंडियन लुक किया है. वहां की फिल्मों में तो मुझे लगता है कि ज्यादा इंडियन लुक को तवज्जो देते हैं. ये यूं ही यहां की मीडिया में बात फैलाई जा रही है कि मैं पहली बार इंडियन लुक में नजर आ रही हूं. जबकि हकीकत यही है कि मैंने पहले भी ऐसे कई लुक में काम किया.

गिरीश कुमार की यह पहली फिल्म है वह तो न्यू कमर हैं. तो ऐसे में जबकि आप इस फिल्म की अभिनेत्री हैं तो आप पर अधिक जिम्मेदारी है फिल्म को सफल कराने को लेकर?
मुझे लगता है कि एक फिल्म की पूरी जिम्मेदारी उसके निर्देशक की होती है. उसके कैसे कैरेक्टर्स होते हैं. उन्हें किस तरह प्रेजेंट करना है. यह सब देखना उनका मामला है. हमारी जिम्मेदारी बतौर कलाकार बस इतनी ही होती है कि हम एक् श्न और कट के बीच में 100 पर्सेंट अपनी मेहनत दिखा पायें. तो वही मेरी जिम्मेदारी है. और गिरीश न्यूकमर हैं. लेकिन पहली फिल्म में तो हर कोई अधिक मेहनत करता है तो मुझे लगता है कि दर्शक पसंद करेंगे उन्हें. जहां तक बात है फिल्मों के सफल होने की तो वह मेरी जिम्मेदारी नहीं. इसके बारे में निर्माता सोचें. मैं क्यों.
गिरीश फिल्म के निर्माता के बेटे हैं तो कहीं आपको अपने किरदार को लेकर यह बात महसूस हुई कि फिल्म में गिरीश को फोकस करने की कोशिश की जायेगी?
जी मुझे कहीं भी ऐसा नहीं लगा. सच कहूं तो रम्मैया वस्तावैया की पूरी कहानी ही मेरे किरदार सोना के इर्द गिर्द घूमती है. गिरीश का जो कैरेक्टर है. वह एनआरआइ का है. गिरीश भारत आते हैं और फिर सोना से मिलते हैं और उसी की दुनिया में चले जाते हैं. मुझे लगता है कि मैं सेंट्रल कैरेक्टर में हूं. मैं फिल्म में सिंपल सी लड़की का किरदार निभा रही हूं. सिंपल सी दुनिया की लड़की सोना से गिरीश मिलते हैं.

बतौर निर्देशक प्रभुदेवा के साथ आपका अनुभव कैसा रहा?
बतौर निर्देशक प्रभुदेवा बेहतरीन निर्देशक हैं. उन्हें अपने किरदारों के बारे में पता होता है कि उसकी क्या खूबियां हैं और उसका इस्तेमाल वह किस तरह से उनकी खूबियों के साथ साथ कैरेक्टर की खूबियों को जोड़ते हैं.

आप म्यूजिक कंपोजर भी हैं. सिंगर भी हैं और एक्टर भी तो किसमें ज्यादा मजा आता है?
मुझे लोगों को एंटरटेन करने में ज्यादा मजा आता है.फिर चाहे वह डांस हो, संगीत हो या एक्टिंग हो. मैं एंटरटेनमेंट फैमिली से हूं तो मुझे खुशी मिलती है कि मैं लोगों को एंटरटेन करूं.

फिल्म का शीर्षक रम्मैया वस्तवैया है तो यह किस तरह कहानी को सार्थक करता है?
फिल्म में हीरो का नाम राम है. तो इसलिए इस फिल्म का नाम रम्मैया वस्तावैया रखा गया है. सिंपल.

पापा कमल हसन की फिल्मों में अभिनय करने के बारे में कभी नहीं सोचा?
बात पापा की स्क्रिप्ट की नहीं है. जो पापा बनाते हैं. वह मुझे दर्शक के रूप में पसंद है. लेकिन स्क्रिप्ट चुनते वक्त मैं खुद की सुनती हूं. जो कर पाऊंगी हमेशा वही चुनूंगी.

20130514

किरदार का होमवर्क



इन दिनों फिल्म औरंगजेब के प्रोमोशन के लिए पूरी टीम गुड़गांव में जा रही है. वजह यह कि फिल्म की कहानी गुड़गांव की पृष्ठभूमि पर आधारित है. खबर है कि अुर्जन कपूर जो कि फिल्म में लीड किरदार निभा रहे हैं. वे इस फिल्म के किरदार में डूबने के लिए गुड़गांव का रहनसहन अपनायेंगे. दरअसल, किसी भी फिल्म के किरदार को निभाने के लिए किसी भी कलाकार के लिए यह बेहद अहम होता है कि वे जब भी किसी किरदार को निभाये तो उसमें ढलने की पूरी कोशिश करे. लेकिन यह सब फिल्म के किरदार को निभाने से पहले किया जाना चाहिए. चूंकि यही किसी भी कलाकार का होम वर्क होता है. किसी दौर में संजीव कुमार को जब सत्यजीत रे जैसे निर्देशक की तरफ से फिल्म शतरंज के खिलाड़ी में काम करने का मौका मिला तो संजीव इस बात से नर्वस थे कि वे सत्यजीत रे की फिल्म में काम करने जा रहे हैं और उस वक्त तक उन्होंने सत्यजीत रे की कोई फिल्म देखी ही नहीं थी. सो, उन्होंने मुंबई से दूर लगभग 2 महीने का लंबा ब्रेक लिया और पुणे के फिल्म इंस्टीटयूट गये. जहां पीके नायर ने उन्हें फिल्म आर्काइव की मदद से सत्यजीत रे की कई फिल्में दिखायीं. फिल्म देखने के बाद संजीव कुमार भी सत्यजीत रे की शैली से अवगत हुए और फिर उन्होंने शतरंज के खिलाड़ी में बेहतरीन परफॉरमेंस दिया. दरअसल, यही हकीकत है कि किसी फिल्म के किरदार को निभाते वक्त अगर वाकई कलाकार फिल्म के निर्देशक की पहले बनी फिल्में देख लें और खुद होमवर्क करें तो निश्चित तौर पर उनकी फिल्मों के किरदार में निखार आता है. किसी दौर में कलाकार एक साथ एक ही फिल्म पर काम करते थे. सो, उनके पास वक्त होता था. वह एक फिल्म पर पूरा ध्यान देते थे. आज के दौर में रणबीर कपूर, आमिर खान और ऋतिक रोशन अपने किरदारों पर ध्यान देते हैं.

20130513

जज्बात वही आशिकी नयी

urmila kori
1990 में आयी महेश भट्ट निर्देशित रोमांटिक फिल्म ‘आशिकी’ अपने समय की सफल फिल्मों में से एक है. लगभग 23 साल बाद भट्ट कैंप एक बार फिर प्यार के उसी जज्बात को नये अंदाज में ‘आशिकी टू’ से परदे पर परिभाषित करने जा रहा है. आदित्य रॉय कपूर और र्शद्धा कपूर इस फिल्म में मुख्य भूमिका में हैं. इन सितारों का कहना है कि ‘आशिकी टू’ पुरानी ‘आशिकी’ से काफी अलग है. जैसे पीढ.ी में बदलाव आया है वैसे ही फिल्म की कहानी में भी कई परिवर्तन आये हैं. दोनों में कोई समानता है तो वह है खास प्रेम कहानी. आदित्य रॉय कपूर और र्शद्धा कपूर से इस फिल्म और उनके कैरियर पर हुई बातचीत के प्रमुख अंश


राहुल रॉय और अनु अग्रवाल अभिनीत फिल्म ‘आशिकी’ को उसके गीत-संगीत की वजह से खास पहचान मिली थी. ‘आशिकी टू-’ का संगीत भी सभी को लुभा रहा है. कुणाल बताते हैं कि ‘आशिकी टू’ पुरानी ‘आशिकी’ की न तो रीमेक है, न ही सीक्वल. फिर भी दोनों में एक समानता है. इनका संगीत और अलग तरह की प्रेम कहानी. इसी समानता के कारण इस फिल्म का नाम ‘आशिकी टू’ है. 

यह फिल्म आपको कैसे मिली? 

आदित्य रॉय कपूर : भट्ट कैंप से ऑडिशन के लिए फोन आया. मैंने ऑडिशन दिया और मुझे यह फिल्म मिल गयी. मैं बहुत खुश हूं कि अपने कैरियर की सोलो लीड में मैं एक रोमांटिक फिल्म का हिस्सा हूं. 

र्शद्धा कपूर : मुझे यह फिल्म मोहित सूरी ने ऑफर की थी. हम पहले भी किसी और फिल्म के लिएमिल चुके थे, लेकिन वह फिल्म किसी कारणवश नहीं बन पायी. मोहित ने मुझे बताया था कि उन्होंने मुझे इस फिल्म में इस वजह से लिया, क्योंकि जब वह मेरे घर मुझसे मिलने आये थे, तब मैंने कोई मेकअप नहीं किया था. बालों का जूड.ा बनाया हुआ था. चश्मा पहना हुआ था. ‘आशिकी टू’ की लड.की का किरदार भी एक सिंपल-सी लड.की का ही है. मेरी सिंपलिसिटी उन्हें भा गयी और उन्होंने मुझे यह फिल्म ऑफर कर दी. 

क्या आपने पहले वाली ‘आशिकी’ देखी है और क्या उससे कोई रिफरेंस प्वाइंट भी लिया है? 

आदित्य रॉय कपूर : मैने जब वह फिल्म देखी थी तब मैं 6-7 साल का था, लेकिन यह फिल्म साइन करने के बाद मैंने वह फिल्म नहीं देखी, क्योंकि मैं ‘आशिकी’ से प्रभावित होकर यह फिल्म नहीं करना चाहता था. 

र्शद्धा कपूर : मैं जब 2 साल की थी तब मैंने वह फिल्म देखी थी, लेकिन यह फिल्म ‘आशिकी’ का रीमेक नहीं है, न ही सीक्वल है. यह बात मोहित ने मुझे पहले ही क्लीयर कर दी थी. इसलिए मुझे दोबारा ‘आशिकी’ देखने की जरूरत महसूस नहीं हुई. 

फिल्म के प्रोमो से यह अमिताभ बच्चन और जया बान की फिल्म ‘अभिमान’ की कहानी नजर आ रही है. जहां दो सिंगर्स कपल के बीच उनका इगो आ जाता है. 

आदित्य रॉय कपूर : यह फिल्म ‘अभिमान’ की तरह है या नहीं, मैं नहीं जानता क्योंकि मैंने वह फिल्म देखी ही नहीं है. मैंने पुरानी फिल्में ज्यादा नहीं देखी है इसलिए आपको नहीं बता पाऊंगा. 

र्शद्धा कपूर : नहीं, इस फिल्म की कहानी उस तरह की नहीं है. वह अलग तरह की फिल्म है. यह बहुत ही सिचुएशनल फिल्म है. 

अपने किरदार के लिएआपको किस तरह की तैयारी करनी पड.ी? 

आदित्य रॉय कपूर : अब तक मैंने ‘गुजारिश’,‘लंदन ड्रीम्स’ और ‘एक्शन रीप्ले’ जैसी फिल्में की हैं, जहां मैं सपोर्टिंग एक्टर था लेकिन इस बार मैं सेंटर ऑफ अट्रैक्शन सेट पर था. इसलिए शुरुआत में थोड.ा मुश्किल लगता था लेकिन मोहित ने सब मैनेज कर लिया. उसने मुझे कठपुतली नहीं बनाया. वैसे, मैंने अपनी आवाज, बॉडी लैग्वेज सब पर काम किया. बाल भी कटवाने पडे.. मुझे गिटार बजाना आता है इसलिए इसकी मुझे खास तैयारी नहीं करनी पड.ी. 

र्शद्धा कपूर : इस फिल्म में मैं महाराष्ट्रियन लड.की के किरदार में हूं. अपनी मां की तरफ से मैं महाराष्ट्रियन ही हूं, इसलिए मुझे किरदार के लिए अपनी बॉडी लैग्वेज या बोलचाल पर ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड.ी. 

क्या आप हमेशा से अभिनय को ही कैरियर बनाना चाहते थे?

आदित्य रॉय कपूर : जब मैं वीजे था, तब मैंने कैरियर के बारे में सोचा ही नहीं था. मैं मजे के लिए वह काम करता था. फिर मुझे यह सब अच्छा लगने लगा तो मैंने महसूस किया कि मैं यह करूंगा. 

र्शद्धा कपूर : जैसा की सभी जानते हैं कि मेरे पिता शक्ति कपूर फिल्मों के चरित्र अनिभेता हैं. बचपन में मां के साथ मैं उनकी फिल्मों के सेट पर जाने लगी थी. फिल्मों की शूटिंग के दौरान जब हीरो पापा को मारता था, तो मैं रोने लगती थी. एक दिन मम्मी ने मुझे समझाया कि पापा एक्टर हैं और वह जो कुछ भी कर रहे हैं, वो एक्टिंग हैं. उसी दिन मैंने इस शब्द से खुद को जोड. लिया. 

आपके लिए प्यार की परिभाषा क्या है ? 

आदित्य रॉय कपूर : मुझे अब तक यह हुआ नहीं है. जब मैं सातवीं क्लास में था, तब प्यार हुआ था. मैं उससे शादी भी करना चाहता था. मुझे लगता है कि प्यार एक जुनून है, एक पागलपन है. रिलेशनशिप के मायने हर दिन बदलते जा रहे हैं. जब प्यार में पड.ूंगा तो शायद इसे समझ सकूंगा. तभी आपको बता पाऊंगा. 

र्शद्धा कपूर : लव मेरे लिए पागलपन का दूसरा नाम है. प्यार में आपको एक दूसरे के लिए पागल होना चाहिए. तभी मेरे लिएआप प्यार में हैं, वरना नहीं हैं. 

अपने पार्टनर में आप क्या खूबी चाहते हैं? 

आदित्य रॉय कपूर : उसके बाल घुंघराले हों, दांत चमकीले हों. शायद लुक पर मैं नहीं बोल पाऊंगा. हां नेचर में यह जरूर चाहूंगा कि उसमें एक साई हो और वह खुद पर विश्‍वास करती हो. हमेशा अपने दिल की सुनती हो. 

र्शद्धा कपूर : मेरे पार्टनर को एंडवेचर्स होना ही होगा. जैसे उसे खाना पसंद हो, घूमना पसंद हो, फिल्में देखना पसंद हो. ट्रैकिंग पर जाना अच्छा लगता हो. आलसी लड.के मुझे पसंद नहीं हैं. 

को-एक्टर के तौर पर आप एक दूसरे को कैसा पाते हैं? 

आदित्य रॉय कपूर : र्शद्धा बहुत ही प्रतिभाशाली लड.की है. घमंड बिल्कुल भी नहीं है. वह टीमवर्क को जानती है. उसे पता है कि एक्टिंग भी टीम वर्क का ही नतीजा है. 

र्शद्धा कपूर : आदित्य वंडरफुल कोस्टार है, जो आपको शूटिंग के दौरान एकदम सहज कर देता है. आपको पूरा स्पेस देता है.

इस फिल्म में बोल्ड सीन करते हुए आप दोनों कितने सहज थे? क्या आप मानते हैं कि ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री के लिए ऑफ स्क्रीन केमिस्ट्री भी जरूरी होती है? 

आदित्य रॉय कपूर : फिल्म में उतने बोल्ड सीन नहीं हैं, जितना आप सोच रहे हैं. यह एक साफ सुथरी फिल्म है. हां, ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री के लिएऑफ स्क्रीन दोस्ती होनी जरूरी है. वरना आप सेट पर पहले दिन गये और हाय मैं आदित्य हूं बोलकर किसिंग सीन सहजता से नहीं कर पायेंगे. फिल्म की शूटिंग से पहले हमने वर्कशॉप किया था, जहां हम अच्छे दोस्त बन गये थे. 

र्शद्धा कपूर : ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री के लिए कलाकारों के बीच में सहजता का होना जरूरी है. वह दोस्ती से ही हो सकती है. आदित्य बहुत अच्छे और सहज इंसान हैं. आपसे जल्द ही उनकी दोस्ती हो जायेगी.राहुल रॉय और अनु अग्रवाल अभिनीत फिल्म ‘आशिकी’ को उसके गीत-संगीत की वजह से खास पहचान मिली थी. ‘आशिकी टू-’ का संगीत भी सभी को लुभा रहा है. कुणाल बताते हैं कि ‘आशिकी टू’ पुरानी ‘आशिकी’ की न तो रीमेक है, न ही सीक्वल. फिर भी दोनों में एक समानता है. इनका संगीत और अलग तरह की प्रेम कहानी. इसी समानता के कारण इस फिल्म का नाम ‘आशिकी टू’ है. 

यह फिल्म आपको कैसे मिली? 

आदित्य रॉय कपूर : भट्ट कैंप से ऑडिशन के लिए फोन आया. मैंने ऑडिशन दिया और मुझे यह फिल्म मिल गयी. मैं बहुत खुश हूं कि अपने कैरियर की सोलो लीड में मैं एक रोमांटिक फिल्म का हिस्सा हूं. 

र्शद्धा कपूर : मुझे यह फिल्म मोहित सूरी ने ऑफर की थी. हम पहले भी किसी और फिल्म के लिएमिल चुके थे, लेकिन वह फिल्म किसी कारणवश नहीं बन पायी. मोहित ने मुझे बताया था कि उन्होंने मुझे इस फिल्म में इस वजह से लिया, क्योंकि जब वह मेरे घर मुझसे मिलने आये थे, तब मैंने कोई मेकअप नहीं किया था. बालों का जूड.ा बनाया हुआ था. चश्मा पहना हुआ था. ‘आशिकी टू’ की लड.की का किरदार भी एक सिंपल-सी लड.की का ही है. मेरी सिंपलिसिटी उन्हें भा गयी और उन्होंने मुझे यह फिल्म ऑफर कर दी. 

क्या आपने पहले वाली ‘आशिकी’ देखी है और क्या उससे कोई रिफरेंस प्वाइंट भी लिया है? 

आदित्य रॉय कपूर : मैने जब वह फिल्म देखी थी तब मैं 6-7 साल का था, लेकिन यह फिल्म साइन करने के बाद मैंने वह फिल्म नहीं देखी, क्योंकि मैं ‘आशिकी’ से प्रभावित होकर यह फिल्म नहीं करना चाहता था. 

र्शद्धा कपूर : मैं जब 2 साल की थी तब मैंने वह फिल्म देखी थी, लेकिन यह फिल्म ‘आशिकी’ का रीमेक नहीं है, न ही सीक्वल है. यह बात मोहित ने मुझे पहले ही क्लीयर कर दी थी. इसलिए मुझे दोबारा ‘आशिकी’ देखने की जरूरत महसूस नहीं हुई. 

फिल्म के प्रोमो से यह अमिताभ बच्चन और जया बान की फिल्म ‘अभिमान’ की कहानी नजर आ रही है. जहां दो सिंगर्स कपल के बीच उनका इगो आ जाता है. 

आदित्य रॉय कपूर : यह फिल्म ‘अभिमान’ की तरह है या नहीं, मैं नहीं जानता क्योंकि मैंने वह फिल्म देखी ही नहीं है. मैंने पुरानी फिल्में ज्यादा नहीं देखी है इसलिए आपको नहीं बता पाऊंगा. 

र्शद्धा कपूर : नहीं, इस फिल्म की कहानी उस तरह की नहीं है. वह अलग तरह की फिल्म है. यह बहुत ही सिचुएशनल फिल्म है. 

अपने किरदार के लिएआपको किस तरह की तैयारी करनी पड.ी? 

आदित्य रॉय कपूर : अब तक मैंने ‘गुजारिश’,‘लंदन ड्रीम्स’ और ‘एक्शन रीप्ले’ जैसी फिल्में की हैं, जहां मैं सपोर्टिंग एक्टर था लेकिन इस बार मैं सेंटर ऑफ अट्रैक्शन सेट पर था. इसलिए शुरुआत में थोड.ा मुश्किल लगता था लेकिन मोहित ने सब मैनेज कर लिया. उसने मुझे कठपुतली नहीं बनाया. वैसे, मैंने अपनी आवाज, बॉडी लैग्वेज सब पर काम किया. बाल भी कटवाने पडे.. मुझे गिटार बजाना आता है इसलिए इसकी मुझे खास तैयारी नहीं करनी पड.ी. 

र्शद्धा कपूर : इस फिल्म में मैं महाराष्ट्रियन लड.की के किरदार में हूं. अपनी मां की तरफ से मैं महाराष्ट्रियन ही हूं, इसलिए मुझे किरदार के लिए अपनी बॉडी लैग्वेज या बोलचाल पर ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड.ी. 

क्या आप हमेशा से अभिनय को ही कैरियर बनाना चाहते थे?

आदित्य रॉय कपूर : जब मैं वीजे था, तब मैंने कैरियर के बारे में सोचा ही नहीं था. मैं मजे के लिए वह काम करता था. फिर मुझे यह सब अच्छा लगने लगा तो मैंने महसूस किया कि मैं यह करूंगा. 

र्शद्धा कपूर : जैसा की सभी जानते हैं कि मेरे पिता शक्ति कपूर फिल्मों के चरित्र अनिभेता हैं. बचपन में मां के साथ मैं उनकी फिल्मों के सेट पर जाने लगी थी. फिल्मों की शूटिंग के दौरान जब हीरो पापा को मारता था, तो मैं रोने लगती थी. एक दिन मम्मी ने मुझे समझाया कि पापा एक्टर हैं और वह जो कुछ भी कर रहे हैं, वो एक्टिंग हैं. उसी दिन मैंने इस शब्द से खुद को जोड. लिया. 

आपके लिए प्यार की परिभाषा क्या है ? 

आदित्य रॉय कपूर : मुझे अब तक यह हुआ नहीं है. जब मैं सातवीं क्लास में था, तब प्यार हुआ था. मैं उससे शादी भी करना चाहता था. मुझे लगता है कि प्यार एक जुनून है, एक पागलपन है. रिलेशनशिप के मायने हर दिन बदलते जा रहे हैं. जब प्यार में पड.ूंगा तो शायद इसे समझ सकूंगा. तभी आपको बता पाऊंगा. 

र्शद्धा कपूर : लव मेरे लिए पागलपन का दूसरा नाम है. प्यार में आपको एक दूसरे के लिए पागल होना चाहिए. तभी मेरे लिएआप प्यार में हैं, वरना नहीं हैं. 

अपने पार्टनर में आप क्या खूबी चाहते हैं? 

आदित्य रॉय कपूर : उसके बाल घुंघराले हों, दांत चमकीले हों. शायद लुक पर मैं नहीं बोल पाऊंगा. हां नेचर में यह जरूर चाहूंगा कि उसमें एक साई हो और वह खुद पर विश्‍वास करती हो. हमेशा अपने दिल की सुनती हो. 

र्शद्धा कपूर : मेरे पार्टनर को एंडवेचर्स होना ही होगा. जैसे उसे खाना पसंद हो, घूमना पसंद हो, फिल्में देखना पसंद हो. ट्रैकिंग पर जाना अच्छा लगता हो. आलसी लड.के मुझे पसंद नहीं हैं. 

को-एक्टर के तौर पर आप एक दूसरे को कैसा पाते हैं? 

आदित्य रॉय कपूर : र्शद्धा बहुत ही प्रतिभाशाली लड.की है. घमंड बिल्कुल भी नहीं है. वह टीमवर्क को जानती है. उसे पता है कि एक्टिंग भी टीम वर्क का ही नतीजा है. 

र्शद्धा कपूर : आदित्य वंडरफुल कोस्टार है, जो आपको शूटिंग के दौरान एकदम सहज कर देता है. आपको पूरा स्पेस देता है.

इस फिल्म में बोल्ड सीन करते हुए आप दोनों कितने सहज थे? क्या आप मानते हैं कि ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री के लिए ऑफ स्क्रीन केमिस्ट्री भी जरूरी होती है? 

आदित्य रॉय कपूर : फिल्म में उतने बोल्ड सीन नहीं हैं, जितना आप सोच रहे हैं. यह एक साफ सुथरी फिल्म है. हां, ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री के लिएऑफ स्क्रीन दोस्ती होनी जरूरी है. वरना आप सेट पर पहले दिन गये और हाय मैं आदित्य हूं बोलकर किसिंग सीन सहजता से नहीं कर पायेंगे. फिल्म की शूटिंग से पहले हमने वर्कशॉप किया था, जहां हम अच्छे दोस्त बन गये थे. 

र्शद्धा कपूर : ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री के लिए कलाकारों के बीच में सहजता का होना जरूरी है. वह दोस्ती से ही हो सकती है. आदित्य बहुत अच्छे और सहज इंसान हैं. आपसे जल्द ही उनकी दोस्ती हो जायेगी.

गैंग्स ने बदल दी जिंदगी : हुमा

हुमा ने अपनी पहली ही फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से दर्शकों के दिलों में अपनी अलग जगह बना ली. फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में उन्होंने जिस तरह ठेठ बिहारी लड.की का किरदार निभाया, फिर ‘लव शव ते चिकन खुराना’ में वे पंजाबी बन कर लोगों के सामने आयीं और अब फिल्म ‘एक थी डायन’ में वह एक अलग ही रूप में दर्शकों के सामने होंगी. बेहद बातूनी हुमा हमेशा की तरह बेहद रोचक तरीके से सारे सवालों का जवाब देती गयीं. बातचीत हुमा से.. 

हुमा, ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में एकदम बिंदास किरदार फिर ‘लव शव..’ में पंजाबी कुड.ी का किरदार, तो इस बार कहां डायनों के बीच आ फंसी आप?

अरे, मैं फंसी बिल्कुल नहीं हूं. मैं यहां भी आपको बिंदास ही नजर आऊंगी. पहले आप फिल्म तो देखिए. इस फिल्म में भी मैं अपने स्वभाव के मुताबिक ही किरदार निभा रही हूं. खूब मस्ती करती हूं. नाचती गाती हूं. इमरान जो कि फिल्म में जादूगर हैं, मैं उनकी गर्लफ्रेंड का किरदार निभा रही हूं. 

इस फिल्म को करने की खास वजह क्या रही?

‘एक थी डायन’ जैसी फिल्म को आप न कह ही नहीं सकते. मेरा तो इस फिल्म के लिए बाकायदा ऑडिशन हुआ था. विशाल जी ने मेरी फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ देखी थी. उनको मेरा काम अच्छा लगा था. उन्होंने मुझे बुलाया. दो दिन ऑडिशन चला. फिर कहानी सुनायी गयी. स्क्रिप्ट दी गयी और मुझे लग रहा था कि मुझे इस फिल्म का हिस्सा होना ही है, क्योंकि जिस तरह से ये कहानी लिखी गयी है, जितने टर्न एंड ट्विस्ट हैं फिल्म में, वो बिल्कुल अलग असर छोड.ते हैं. फिल्म के सारे कैरेक्टर अच्छे हैं. इससे पहले मैंने ऐसे जॉनर में काम नहीं किया था. मेरे पास कभी ऐसा ऑफर आया भी नहीं था, लेकिन मैं ऐसे किरदार करना जरूर चाहती थी. विशाल भारद्वाज के साथ किसी ऐसी फिल्म में काम करना एक नयी अभिनेत्री के लिए बड.ी बात है. मेरे लिए तो यह बेवकूफी ही होती अगर मैं फिल्म को न कहती.

फिल्म के निर्देशक तो कत्रन अय्यर हैं, लेकिन सभी केवल विशाल की ही बातें कर रहे हैं. निर्देशक के बारे में तो थोड.ी जानकारी दें? कैसा रहा उनके साथ का अनुभव?

ये उनकी पहली फिल्म है, लेकिन वे कमाल के निर्देशक हैं. आपको फिल्म देखने के बाद कहीं भी नहीं लगेगा कि यह उनकी पहली फिल्म है. उन्होंने किस तरह एक अनयूजअल-सी कास्टिंग सोची और फिल्म के किरदार में हर किरदार को कितनी महत्ता से दिखाया है, उसे गढ.ा है, इसका एहसास आपको फिल्म देख कर ही होगा. कत्रन सर काफी समय से इंडस्ट्री से जुडे. रहे हैं. उन्होंने काफी काम किया है. इसलिए, इस फिल्म में वे सारे अनुभव का इस्तेमाल कर रहे हैं. साथ ही फिल्म के कलाकार कल्कि, कोंकणा, इमरान सभी के साथ काम करके बहुत मजा आया.

हुमा, अब इंडस्ट्री का रवैया आपकी तरफ किस तरह बदला है. क्या अब लोग आपको पहले से अधिक तवज्जो देने लगे हैं?

ईमानदारी से कहूं तो मैंने बहुत स्ट्रगल नहीं किया है. मुझे बहुत प्यार मिला है. मैंने कभी महसूस नहीं किया कि आउटसाइडर हूं. बाहर से आयी हूं. हां, मगर ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ मेरे लिए लकी साबित हुई. इस फिल्म ने मुझे बदला है. 

हां,यह जरूर है कि इंडस्ट्री में मेरा कोई गॉड फादर नहीं रहा. लेकिन ‘गैंग्स’ की वजह से लोगों ने मुझे अच्छे रोल देने शुरू कर दिये और शुरुआती दिनों में ही इतने अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिलता है, तो इससे बड.ी खुशकिस्मती और क्या होगी. आप कह सकती हैं कि ‘गैंग्स’ मेरे लिए टर्निंग प्वाइंट रहा. इस फिल्म से मैंने बहुत सीखा है. आज जो हूं, इसी की वजह से हूं.हुमा ने अपनी पहली ही फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से दर्शकों के दिलों में अपनी अलग जगह बना ली. फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में उन्होंने जिस तरह ठेठ बिहारी लड.की का किरदार निभाया, फिर ‘लव शव ते चिकन खुराना’ में वे पंजाबी बन कर लोगों के सामने आयीं और अब फिल्म ‘एक थी डायन’ में वह एक अलग ही रूप में दर्शकों के सामने होंगी. बेहद बातूनी हुमा हमेशा की तरह बेहद रोचक तरीके से सारे सवालों का जवाब देती गयीं. बातचीत हुमा से.. 

हुमा, ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में एकदम बिंदास किरदार फिर ‘लव शव..’ में पंजाबी कुड.ी का किरदार, तो इस बार कहां डायनों के बीच आ फंसी आप?

अरे, मैं फंसी बिल्कुल नहीं हूं. मैं यहां भी आपको बिंदास ही नजर आऊंगी. पहले आप फिल्म तो देखिए. इस फिल्म में भी मैं अपने स्वभाव के मुताबिक ही किरदार निभा रही हूं. खूब मस्ती करती हूं. नाचती गाती हूं. इमरान जो कि फिल्म में जादूगर हैं, मैं उनकी गर्लफ्रेंड का किरदार निभा रही हूं. 

इस फिल्म को करने की खास वजह क्या रही?

‘एक थी डायन’ जैसी फिल्म को आप न कह ही नहीं सकते. मेरा तो इस फिल्म के लिए बाकायदा ऑडिशन हुआ था. विशाल जी ने मेरी फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ देखी थी. उनको मेरा काम अच्छा लगा था. उन्होंने मुझे बुलाया. दो दिन ऑडिशन चला. फिर कहानी सुनायी गयी. स्क्रिप्ट दी गयी और मुझे लग रहा था कि मुझे इस फिल्म का हिस्सा होना ही है, क्योंकि जिस तरह से ये कहानी लिखी गयी है, जितने टर्न एंड ट्विस्ट हैं फिल्म में, वो बिल्कुल अलग असर छोड.ते हैं. फिल्म के सारे कैरेक्टर अच्छे हैं. इससे पहले मैंने ऐसे जॉनर में काम नहीं किया था. मेरे पास कभी ऐसा ऑफर आया भी नहीं था, लेकिन मैं ऐसे किरदार करना जरूर चाहती थी. विशाल भारद्वाज के साथ किसी ऐसी फिल्म में काम करना एक नयी अभिनेत्री के लिए बड.ी बात है. मेरे लिए तो यह बेवकूफी ही होती अगर मैं फिल्म को न कहती.

फिल्म के निर्देशक तो कत्रन अय्यर हैं, लेकिन सभी केवल विशाल की ही बातें कर रहे हैं. निर्देशक के बारे में तो थोड.ी जानकारी दें? कैसा रहा उनके साथ का अनुभव?

ये उनकी पहली फिल्म है, लेकिन वे कमाल के निर्देशक हैं. आपको फिल्म देखने के बाद कहीं भी नहीं लगेगा कि यह उनकी पहली फिल्म है. उन्होंने किस तरह एक अनयूजअल-सी कास्टिंग सोची और फिल्म के किरदार में हर किरदार को कितनी महत्ता से दिखाया है, उसे गढ.ा है, इसका एहसास आपको फिल्म देख कर ही होगा. कत्रन सर काफी समय से इंडस्ट्री से जुडे. रहे हैं. उन्होंने काफी काम किया है. इसलिए, इस फिल्म में वे सारे अनुभव का इस्तेमाल कर रहे हैं. साथ ही फिल्म के कलाकार कल्कि, कोंकणा, इमरान सभी के साथ काम करके बहुत मजा आया.

हुमा, अब इंडस्ट्री का रवैया आपकी तरफ किस तरह बदला है. क्या अब लोग आपको पहले से अधिक तवज्जो देने लगे हैं?

ईमानदारी से कहूं तो मैंने बहुत स्ट्रगल नहीं किया है. मुझे बहुत प्यार मिला है. मैंने कभी महसूस नहीं किया कि आउटसाइडर हूं. बाहर से आयी हूं. हां, मगर ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ मेरे लिए लकी साबित हुई. इस फिल्म ने मुझे बदला है. 

हां,यह जरूर है कि इंडस्ट्री में मेरा कोई गॉड फादर नहीं रहा. लेकिन ‘गैंग्स’ की वजह से लोगों ने मुझे अच्छे रोल देने शुरू कर दिये और शुरुआती दिनों में ही इतने अच्छे निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिलता है, तो इससे बड.ी खुशकिस्मती और क्या होगी. आप कह सकती हैं कि ‘गैंग्स’ मेरे लिए टर्निंग प्वाइंट रहा. इस फिल्म से मैंने बहुत सीखा है. आज जो हूं, इसी की वजह से हूं.

आयटम गर्ल की सीमा रेखा



 फिल्म शूटआउट एट वडाला के एक आयटम गीत लैला तेरी ले लेगी तू लिख के लेले नामक गाने ने इन दिनों धूम मचा रखी है. फिल्म में सनी लियोने को आयटम गर्ल के रूप में प्रस्तुत करने की खास वजह यह है कि इन दिनों सनी लोकप्रिय हैं और लोकप्रिय किन कारणों से यह जगजाहिर है. सनी ने कुछ दिनों पहले महेश भट्ट की फिल्म जिस्म 2 से अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत की है. और इसके बाद वह एकता कपूर की रागिनी एमएमएस 2 में काम कर रही हैं. इसके अलावा सनी को जो बाकी फिल्में मिल रही हैं, उन सभी में वे कमोवेश एक ही चीजें कर रही हैं. इस आयटम नंबर में भी सनी को जान बूझ कर ऐसे सारे मूव्स दिये गये हैं, जो दर्शकों को उत्तेजित करें. दरअसल, सनी लियोने शायद इस बात से वाकिफ नहीं कि यहां भी वे उसी रूप में प्रस्तुत की जा रही हैं. जैसी उनकी छवि है. कोई भी निर्देशक उनकी लोकप्रियता को ही भुनाने की कोशिश कर रहे हैं. जबकि जब आप व्यक्तिगत रूप से सनी से बात करें तो आप महसूस करेंगे कि सनी काफी आत्मविश्वासी लड़की हैं. वे भी बेहतरीन किरदार कर सकती हैं. अगर उन्हें मौके मिले तो. लेकिन हिंदी सिनेमा इंडस्ट्री का तो यह चलन है कि वे आयटम गर्ल को आयटम गर्ल के रूप में ही प्रस्तुत करती हैं. यहां आयटम गर्ल सिर्फ आयटम ही कर सकती हैं. हां, मगर अभिनेत्रियां चाहें तो वह आयटम भी कर सकती हैं और लीड किरदार भी. जबकि पुराने दौर में हेलेन जैसी अभिनेत्रियां सिर्फ कैब्रे के लिए फिल्मों में नहीं होती थीं. बिंदू , शशिकला जैसी अभिनेत्रियां फिल्मों की अहम हिस्सा होती थीं.लेकिन अब दौर बदल गया है. आयटम गर्ल बनी अभिनेत्रियां अपने फिल्मों के आयटम गीतों में कोई सीमा न रखती हों. लेकिन वह लगातार अगर सिर्फ इसी तरह खुद को प्रस्तुत करती रहीं तो फिल्मों में उनकी सीमा जरूर सीमित रह जायेगी.

बदतमीज दिल रणबीर का



इन दिनों रणबीर कपूर की फिल्म ये जवानी है दीवानी का नया गीत दिल बदतमीज दर्शकों को बेहद पसंद आ रहा है. विशेष कर युवाओं को यह गीत बेहद लुभा रहा है. इस गाने में रणबीर कपूर जिस मस्ती के मूड में नजर आ रहे हैं. और जिस मस्ती से उन्होंने अपने सारे डांसिंग मूव्स किये हैं. वह आपके मूड को भी रिफ्रेश कर देता है. दरअसल, रणबीर उन कलाकारों में से एक हैं, जो अपने काम को गंभीरता से लेते हैं लेकिन खुद को नहीं. रणबीर कपूर खानदान के चिराग हैं. लेकिन उनमें कपूर खानदान वाला रयिशी व्यवहार बिल्कुल नहीं है. उनकी मां नीतू सिंह ने एक बार अपनी बातचीत में कहा था कि रणबीर को पार्टी या डांस पसंद नहीं है और वह बेहद शर्मिले हैं. लेकिन रणबीर को पिछले जितने भी पब्लिक अपीयरेंसेज में देखा है. वे अपनी मां के इस कथन से उलट ही नजर आये. किसी भी अवार्ड समारोह में जब वह स्टेज पर होते हैं तो उनकी हरकतें दर्शकों को हंसाती हैं. हाल ही में एक अवार्ड समारोह में जिस तरह रणबीर अनुराग की धोती पकड़ कर, उनके पीठ पर सवार हो गये थे.यह दर्शाता है कि वे कितने खुशमिजाज आदमी है. बर्फी फिल्म की सफलता के बाद भी हुई सक्सेस पार्टी में सुबह चार बजे तक नाचते रहे थे. करीना कपूर की शादी में भी उन्होंने खास कार्यक्रम डांस गाने का ही रखवाया था. आमतौर पर भी जब वह मीडिया के सामने आते हैं तो अपने अलग अलग एक्सप्रेशन और शरारतों से सबका दिल जीत लेते हैं. कपूर खानदान जैसे परिवार से निकला यह शख्स दिल से वाकई खुशमिजाजी है और हंसमुख है. स्पष्ट है कि रणबीर खुद पर परिवार के उसूल हावी नहीं होने देते. वे लड़कियों से फ्लर्ट भी करते हैं तो शान से. रणबीर बेहतरीन कलाकार हैं. और सुपरस्टार भी. लेकिन आम जिंदगी में वह मस्तमौला हैं और हर किसी तरह ही मस्ती में सराबोर रहना चाहते हैं.

तन्हाई में निकला चांद तन्हाई में ही ढल गया



चांद तन्हा है और आसमां तन्हा, दिल मिला है कहां कहां तन्हा..गजल की यही दो पंक्तियां इसे गढ़नेवाले के दर्द को साफ साफ बयां कर रहे हैं. बूझ गयी आस...छुप गया तारा...उनके लिखे एक एक शब्द दरअसल, उनकी जिंदगी के अफसानों को बयां करते हैं. उनके पास दौलत थी. शोहरत थी. चांद से उनका खास नाता था. शायद इसलिए चूंकि वह खुद चांद सी सुंदर थीं जो रातों में भी जगमगाती थीं और दूसरों के घरों को भी रोशन करती थी. ये और बात है कि उनके खुद के जीवन में कभी रोशनी ने एक बार भी झांकने की कोशिश नहीं की. फिल्मों के भारी कॉस्टयूम उस वक्त पहनना शुरू कर दिया, जब उन्हें खुद कपड़ें पहनने का सहुर भी न था.देखते देखते वह हिंदी सिनेमा की मीना बन गयी. हां, उस मीना पत्थर की तरह ही. चमकदार, खूबसूरत, शक्ल और सुरत भी ऐसी जैसे कुदरत ने खुद उन्हें फुर्सत से गढ़ा हो. फिल्म पाकीजा का गीत चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो दरअसल, मीना कुमारी की जिंदगी के ही एक हिस्से को दर्शाता है. किस्मत तो ऐसी कि रुपहले परदे पर उनकी वजह से फिल्मों ने खूब धन बटोरा. लेकिन असल जिंदगी में उनके पास तन्हाई के सिवा कुछ न था. जिस वक्त उनके हाथों में लेमन चुस होना चाहिए था और दुल्हन सी सजी गुड़ियां वाले खिलौने होने चाहिए थे. उस वक्त वह फिल्मों में कैमरे के सामने आ गयीं. अपने रंगमिजाज पिता अली बख्श की वजह से उन्हें मजबूरन केवल चार साल की उम्र से ही फिल्मों में प्रवेश करना पड़ा. बस फिर क्या था. एक बार जो परिवार को सोने की चिड़िया मिली. फिर वह चिड़िया उड़ती गयी, लेकिन सोना मिला परिवार को. फिल्म लेदरफेस में पहली बार मीना कुमारी ने बेबी मीना के नाम से बाल कलाकार के रूप में काम किया था. फिल्म बैजू बावरा ने उन्होंने पहली बार फिल्मी दुनिया में कदम रखा. इससे पहले वह माहजबीं बानो के नाम से जानी जाती थीं. लेकिन विजय भट्ट ने महजबीं को मीना कुमारी बना दिया. ये मीना फिल्मी दुनिया में खूब चमकी. खूबसूरत होने के साथ साथ अभिनय में उनका कोई सानी नहीं था. फिल्म पाकीजा, साहेब बीवी और गुलाम जैसी फिल्में उनके करियर की माइलस्टोन फिल्में साबित हुई. दिल एक मंदिर, नूरजहां, बहारों की मंजिल, मेरे अपने जैसी फिल्में उनके जीवन की महत्वपूर्ण फिल्में रहीं. फिल्मों से इतर मीना कुमारी का व्यक्तित्व बेहद प्रभावशाली था. मीना ने भले ही अपनी जिंदगी में बहुत गम देखे. लेकिन वे दूसरों की जिंदगी में हमेशा खुशियां भरने की कोशिश किया करती थीं. उन्होंने ही सबसे पहली बार बलराज साहनी को कहा था कि वह बेहतरीन अभिनेता हैं और उन्हें यूं साइड किरदार करके अपनी प्रतिभा का दुरोपयोग नहीं करना चाहिए. बलराज साहनी ने स्वयं इस बात की चर्चा अपनी आत्मकथा में की है. धर्मेंद्र भी फिल्मों में मीना कुमारी की वजह से ही आये. नरगिस मीना कुमारी के बेहद करीब थी. जब नरगिस काम पर जाती थीं तो वे मीना कुमारी के पास अपने बच्चों को छोड़ कर जाया करती थी. मीना नरगिस के बच्चों का ख्याल एक मासी की तरह रखती. तब्बसुम भी बताती हैं कि मीना कुमारी बेहद नेक दिल की बंदी थीं. उनसे किसी और का दर्द देखा नहीं जाता था. वे पैसों की लालसा नहीं रखती थीं. उनकी जिंदगी में जो रिक्त स्थान था. उसे सिर्फ प्यार से भरा जा सकता था. लेकिन सिर्फ वहीं न भर पाने की वजह से वे हमेशा तन्हाई में जीती रहीं. मीना कुमारी और निर्देशक कमाल अमरोही ने किसी दौर में निकाह किया. कमाल उस वक्त मीना के प्यार में पागल थे. लेकिन बाद में धीरे धीरे मीना कमाल के लिए भी केवल सोने की चिड़िया बन कर रह गयीं. चूंकि मीना कमाल की जिन फिल्मों में होतीं. वे फिल्में कामयाब होतीं. बाकी फिल्में नहीं. सो, कमाल ने मीना का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. ये बातें मीना को खलती थीं. लेकिन वह बेबस थी. मजबूर थीं. लोगों का मानना है कि पाकीजा फिल्म के निर्माण में उस वक्त 17 साल का समय लगा था. और इसकी वजह से ही मीना और कमाल दूर हुए . कमाल से अलग होने के बाद मीना ने धर्मेंद्र व प्रदीप कुमार में एक साथी की तलाश की. लेकिन वे यहां भी नाकामयाब रहीं. उस दौर में अशोक कुमार होमियोपैथी का इलाज करते थे. मीना के वे अच्छे दोस्त थे. उन्हें यह बर्दाश्त नहीं होता था. सो, वे मीना कुमारी को कई बार होमियोपैथी की दवाई दिया करते थे. लेकिन मीना जिंदगी से निराश हो चुकी थी. उनके जीवन का एकमात्र साथी शराब ही बन कर रह गया. उन्होंने बाद के दौर में फिल्मों के सेट पर भी शराब पीनी शुरू कर दी थी.  मीना ने एक नायिका के रूप में हर तरह के किरदार निभाये. और उनकी अदाकारी का यह जादू था कि लोग उस दौर में केवल मीना के नाम से फिल्में देखने चले आते थे. उस दौर के पोस्टर्स में खासतौर से मीना कुमारी की तसवीरों को केंद्र में रख कर पोस्टर्स बनाये जाते थे. ताकि ज्यादा से ज्यादा दर्शक आ सकें. मीना कुमारी एक बार महाबलेश्वर से लौट रही थीं. उस वक्त एक दुर्घटना की शिकार हो गयी थीं. उस वक्त मीना कुमारी की उंगली कट गयी थी. लेकिन उन्होंने परदे पर यह कभी जाहिर नहीं होने दिया. उन्होंने लगभग हर फिल्म में इस अंदाज में दुपट्टा पकड़ा कि उनकी वह कटी उंगली कभी नजर ही नहीं आयी. मीना कुमारी की आंखें बचपन में काफी छोटी थी. तो उनके परिवार वाले उन्हें पहले चीनी कह कर बुलाते थे. इस बात से मीना काफी चिढ़ जाया करती थी. मीना को कमाल प्यार से मंजू कह कर बुलाया करते थे. और इसलिए मीना को अपना यह नाम काफी प्रिय था.  मीना को बचपन से ही शेरो शायरी का भी शौक था. सो, वह जब शायर बनती तो खुद को नाज बना लेती थीं. उन्होंने एक दौर में कई गजल व नगमें लिखें और उन्हें खुद आवाज भी दी. आज भी आप यू टयूब पर उनकी आवाज में सुन सकते हैं. अपने फिल्मों की किरदारों की वजह से फिल्म इंडस्ट्री ने उन्हें ट्रेजेडी क्वीन माना. दरअसल, उनकी वास्तविक जिंदगी भी हमेशा ट्रेजेडी से भी भरी रही. मीना कुमारी की जिंदगी का सफर कुछ ऐसा ही रहा, कि चांद कुछ इस तरह तन्हाई में निकला और तन्हाई में ही ढल गया. तमाम बातों के बावजूद उनकी मदहोश कर देनेवाली सशक्त अभिनय का हिंदी सिनेमा जगत हमेशा कायल रहेगा.  जब वह फिल्मों में रोती थी तो परदे के इधर बैठे दर्शक भी रो उठते थे. लेकिन फिर इस दुनिया ने कभी मीना के जीवन के दर्द को समझने की कोशिश नहीं की. वह अकेली जीती रहींं और अकेली ही तन्हाईयों से जूझ कर इस दुनिया से विदाई ले ली. वर्ष 1972 में पाकीजा रिलीज हुई और उसी वर्ष मीना ने दुनिया को अलविदा कह दिया.