शनिवार की शाम मुंबई के हिंदी सिनेमा के चाहनेवालों के लिए खास रही. खास इस लिहाज से कि उनके प्रिय सितारें उस दिन सड़क पर थे. टोलियों में. लेकिन ये सितारें खुद नहीं, बल्कि उनके स्ट्रीट पर बने पोस्टर्स सड़क पर थे और हिंदी सिनेमा के प्रेमी टोलियों में बांद्रा इलाके में घूम रहे थे. हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे होने के अवसर पर बॉलीवुड आर्ट प्रोजेक्ट द्वारा यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें चित्रकारों की एक टोली जिन्होंने घूम घूम कर मुंबई की दीवारों पर हिंदी सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों व हिंदी सिनेमा के बेहतरीन किरदारों की पेंटिंग बनाई है. सभी इस मार्च का हिस्सा थे. हिंदी सिनेमा के इन कलाकारों की पेंटिंग बनाने के लिए इस प्रोजेक्ट के तहत बिल्कुल आम स्थानों की तलाश की गयी थी. बांद्रा इलाके में जहां एक तरफ मोगेंबो की तसवीर थी तो दूसरी तरफ दीवार के अमिताभ बच्चन की. और जिस तरह चित्रकार रंजीत दाहिया और टोनी पीटर ने ये सारी रचनाएं बनाई है. वह लाजवाब हैं. ये सभी तसवीरें बोलती नजर आती हैं. हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर जश्न मनाने का यह भी अनोखा तरीका था और जिसे मीडिया से भी जरूर सहयोग मिलना चाहिए थे. पिछले 1 साल से लगातार चित्रकार इन पेंट्ंिग्स को पूरा करने में जुटे हुए थे. अपनी लगन से उन्होंने इसे पूरा भी किया. और अब मार्च के माध्यम से वे लोगों के बीच भी पहुंचे. इस प्रोजेक्ट की सबसे पहले शुरुआत फिल्म अनारकली की पेंटिंग से शुरू की गयी थी.यह पहली बार था. जब दीवार पर दीवार नजर आयी,चूंकि इससे पहले तक दीवारों पर फिल्मों के सिर्फ पोस्टर लगाये जाते थे. लेकिन रंजीत व टोनी ने इसे अपनी कल्पनाशीलता से एक अलग ही रूप दिया जो कि काबिलेतारीफ है. हिंदी सिनेमा को समर्पित यह अंदाज भी वाकई बेहद निराला है.
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20130513
दीवार पर बॉलीवुड
शनिवार की शाम मुंबई के हिंदी सिनेमा के चाहनेवालों के लिए खास रही. खास इस लिहाज से कि उनके प्रिय सितारें उस दिन सड़क पर थे. टोलियों में. लेकिन ये सितारें खुद नहीं, बल्कि उनके स्ट्रीट पर बने पोस्टर्स सड़क पर थे और हिंदी सिनेमा के प्रेमी टोलियों में बांद्रा इलाके में घूम रहे थे. हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे होने के अवसर पर बॉलीवुड आर्ट प्रोजेक्ट द्वारा यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें चित्रकारों की एक टोली जिन्होंने घूम घूम कर मुंबई की दीवारों पर हिंदी सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों व हिंदी सिनेमा के बेहतरीन किरदारों की पेंटिंग बनाई है. सभी इस मार्च का हिस्सा थे. हिंदी सिनेमा के इन कलाकारों की पेंटिंग बनाने के लिए इस प्रोजेक्ट के तहत बिल्कुल आम स्थानों की तलाश की गयी थी. बांद्रा इलाके में जहां एक तरफ मोगेंबो की तसवीर थी तो दूसरी तरफ दीवार के अमिताभ बच्चन की. और जिस तरह चित्रकार रंजीत दाहिया और टोनी पीटर ने ये सारी रचनाएं बनाई है. वह लाजवाब हैं. ये सभी तसवीरें बोलती नजर आती हैं. हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर जश्न मनाने का यह भी अनोखा तरीका था और जिसे मीडिया से भी जरूर सहयोग मिलना चाहिए थे. पिछले 1 साल से लगातार चित्रकार इन पेंट्ंिग्स को पूरा करने में जुटे हुए थे. अपनी लगन से उन्होंने इसे पूरा भी किया. और अब मार्च के माध्यम से वे लोगों के बीच भी पहुंचे. इस प्रोजेक्ट की सबसे पहले शुरुआत फिल्म अनारकली की पेंटिंग से शुरू की गयी थी.यह पहली बार था. जब दीवार पर दीवार नजर आयी,चूंकि इससे पहले तक दीवारों पर फिल्मों के सिर्फ पोस्टर लगाये जाते थे. लेकिन रंजीत व टोनी ने इसे अपनी कल्पनाशीलता से एक अलग ही रूप दिया जो कि काबिलेतारीफ है. हिंदी सिनेमा को समर्पित यह अंदाज भी वाकई बेहद निराला है.
परदे से इतर खलनायकों की जिंदगी
शक्ति कपूर की बेटी श्रद्धा कपूर जल्द ही आशिकी 2 में फिर से नजर आयेंगी. इससे पहले वे लव का द एंड, तीन पत्ती में भी नजर आ चुकी हैं. हाल ही में उन्होंने अपनी बातचीत में कहा कि जब वे स्कूल में थीं, तब उनके दोस्त उन्हें बेहद चिढ़ाते थे. सभी उनसे कहते थे कि तुम्हारे पापा बलात्कारी हैं, गंदे हैं. गुंडे हैं. यह सब सुन कर श्रद्धा को बहुत बुरा लगता था.चूंकि उस वक्त श्रद्धा भी यह बात नहीं समझ पाती थीं कि उनके पापा अभिनय कर रहे हैं. वे घर पर आकर बहुत रोया करती थी. और अपनी मां से इस बात की शिकायत करती थी. लेकिन अब जाकर उन्हें एहसास होता है कि वे कितनी गलत थी. कुछ इसी तरह प्राण साहब की बेटी ने भी अपनी बातचीत में इस बात का जिक्र किया था कि उनके दोस्त भी उन्हें इसी तरह तंग करते हैं. सभी उनके घर आने से डरते थे. वे प्राण से बहुत डरते थे. आशुतोष राणा की बहन ने तो आशुतोष राणा से बातचीत ही करना बंद कर दिया था. जब उन्होंने दुश्मन और संघर्ष में घिनौना, अत्याचारी का किरदार निभाया था. दरअसल, हकीकत यही है कि सिनेमा हमारी जिंदगी पर इस कदर हावी है कि हम फिल्मों के किरदारों को वास्तविक जिंदगी में भी वही समझने लगते हैं. ऐसे में किसी भी कलाकार के लिए जिन्होंने खलनायकों की भूमिका निभाई है. उनकी वास्तविक दुनिया पर भी उनका अभिनय भारी पड़ता है. प्रेम चोपड़ा को ही एक बार किसी थियेटर के बाहर किसी दर्शक ने आकर थप्पड़ जड़ दिया था.कुछ ऐसी ही कहानी प्राण साहब की भी थी. दरअसल, गुजरे जमाने के खलनायक अपनी अदाकारी में वह जान डालते भी थे, जिससे लोग थरर्रा जाते थे. याद करें वह मोंगेबो के अमरीश पुरी. लेकिन वर्तमान में वैसे किरदार न तो गढ़े जा रहे हैं और न ही खलनायकों की फिल्मों में अहम भूमिका रह गयी है.
आम जीवन पर हावी बॉलीवुड
एक सांसद को अखिलेश यादव की पार्टी से सिर्फ इसलिए बेदखल कर दिया गया, क्योंकि उन्होंने भाजपा सांसद और अभिनेत्री हेमा मालिनी पर कुछ कमेंट कर दिया था. उन्होंने हेमा मालिनी के गालों की तूलना सड़कों से कर दी थी. अखिलेश यादव ने महसूस किया कि यह बहुत औंछा कमेंट है और किसी भी सांसद को यह शोभा नहीं देता कि वह दूसरे सांसद पर इस तरह का कमेंट करें. अभी कुछ दिनों पहले जया बच्चन ने भी राज्यसभा के अध्यक्ष से इस बात की शिकायत की थी, चूंकि सभा के दौरान किसी सांसद ने अपने कैमरे से उतनी तसवीरें निकालने की कोशिश की थी. साथ ही वे लगातार जया बच्चन को निहारते जा रहे थे. हेमा मालिनी ने इस संदर्भ में अपनी प्रतिक्रिया देते हुए इतना ही कहा कि किसी दौर में लालू प्रसाद यादव ने भी हेमा मालिनी के गालों और बिहार के सड़कों की तूलना एक साथ की थी. हेमा मालिनी को इस बात का अफसोस है कि आखिर क्यों हर मुद्दे को चुटीला और दिलचस्प बनाने के लिए लोग बॉलीवुड का ही इस्तेमाल करते हैं. दरअसल, हकीकत यही है कि हिंदी सिनेमा आम जीवन पर इस कदर हावी है कि उसकी छवि हमें हर जगह देखने को मिलती है. फिर चाहे वह एक पान की दुकान हो या फिर बड़े बड़े मॉल. यह हिंदी फिल्म हस्तियों का ही प्रभाव है कि साहित्यिक कार्यक्रमों में किसी साहित्य जगत से जुड़े व्यक्ति नहीं, बल्कि फिल्मी हस्तियों को ही बुलाया जाता है. एक पान दुकान की ब्रांडिंग से लेकर बड़े बड़े प्रोडक्ट की एंडॉरसमेंट करने के लिए फिल्मी हस्तियों का ही बोलबाला है. आम जिंदगी में भी हमारी कोशिश होती है कि हम उस अभिनेत्री की तरह खूबसूरत नजर आयें, उस एक्टर की तरह हमारी बॉडी हो. दरअसल, यही सच्चाई है कि राजनीति भी इससे अछूती नहीं. बॉलीवुड की हस्तियों का चार्म हमेशा बरकरार रहेगा.
श्याम सुंदर सशक्त स्मिता
लोग जब उनके काली कलुठी कह कर चिढ़ाते तो वह सबको यही कहा करती कि ये काला रंग ही उनके लिए सफलता की सीढ़ी है. वे जो कुछ भी हैं. इस काले रंग की वजह से ही. उनका मानना था शायद अगर वह गोरी चिट्टी रहतीं तो जिस तरह के किरदार उन्होंने निभाया वह नहीं निभा पातीं. वे अपने श्याम रंंग को अपनी बाधा नहीं, बल्कि वरदान मानती थीं. उन्हें नाच गानेवाले किरदार पसंद नहीं थे. जब उन्हें अमिताभ बच्चन के साथ बारिश में फिल्माया गीत आज रपटÞ... जायें फिल्माना था. वे काफी नर्वस थीं. दरअसल, स्मिता पाटील जैसी अभिनेत्रियां वाकई अभिनय शब्द को परिभाषित करती हैं. स्मिता जैसी समर्पित अदाकाराओं की वजह से ही हिंदी सिनेमा समृद्ध हुआ. स्मिता ने जिस तरह के किरदारों को निभाया है. उन्होंने दरअसल, अभिनय को पूरी तरह से जिया है. यह उनके अभिनय का ही कमाल था कि लोगों ने कभी उनके रंग या सामान्य से चेहरे पर ध्यान ही नहीं दिया. वे अभिनय करतीं तो लोगों की नजर उनके अभिनय से ही नहीं हटती थी. वे कला की प्रेमी थीं और सिनेमा के साथ साथ थियेटर से हमेशा जुड़ी रहीं. श्याम बेनेगल की खोज स्मिता ने फिल्मों में प्रवेश चरणदास चोर से किया था. अपनी पहली ही फिल्म से उन्होंने साबित कर दिया था कि सशक्त अभिनय के लिए कई फिल्में करने की जरूरत नहीं. अगर आप वाकई अभिनेत्री हैं तो आपके कैमरे के पहले टेक से ही यह बात दर्शकों तक पहुंच जायेगी और हुआ भी ऐसा ही. चरणदासचोर के बाद लगातार स्मिता को समांतार फिल्मों के किरदार मिलते गये. स्मिता को भी कभी ग्लैमरस कहलाने, सौंर्द्य की देवी कहलाने में कोई दिलचस्पी नहीं रही. उनके करीबी दोस्त बताते हैं कि वे फिल्म के निर्माताओं से कभी मेहताना के लिए बात भी नहीं करती थीं. उन्हें शोहरत का मोह नहीं था. बल्कि वे कलाकार के रूप में ही विख्यात होना चाहती थीं. शायद यही वजह है कि बाद के दौर में कमर्शियल फिल्में करने के बावजूद वे पैरलल सिनेमा की सबसे पसंदीदा अभिनेत्री में से एक रहीं. निशांत, भूमिका, मंडी, मंथन फिल्में स्मिता के करियर के लिए ही नहीं, बल्कि श्याम बेनेगल के करियर की भी सबसे महत्वपूर्ण और श्रेष्ठ फिल्में रहीं. साथ ही हिंदी सिनेमा के इतिहास में भी ये सारी फिल्में स्मरणीय बन गयीं. फिल्म मंथन हिंदी फिल्म की कालजयी फिल्म बनी. गुजरात के दूध व्यापारियों पर आधारित इस फिल्म का निर्माण वहां के किसानों द्वारा जमा की गयी राशि से हुआ था. फिल्म को सफल कराने में मुख्य योगदान स्मिता का ही रहा था. एक गांव की महिला का किरदार उन्होंने इस फिल्म में बिल्कुल वास्तविकता के साथ निभाया था. चूंकि इस फिल्म में जिस तरह के मुद्दे उठाये गये थे और स्मिता ने जिस अंदाज में इसमें अभिनय किया था. वह उल्लेखनीय था. अभिनेता नाना पाटेकर को फिल्मों में लाने का श्रेय भी स्मिता को ही जाता है. उन्होंने ही अपनी जिद से नाना को थियेटर से सिनेमा की तरफ रुख करने को कहा, क्योंकि स्मिता ने उनके कई नाटक देखे थे और उन्हें विश्वास था कि नाना पाटेकर बेहतरीन अभिनेता हैं. पुणे में जन्मी स्मिता का पहला सामना कैमरे से एक टीवी समाचार वाचक के रूप में हुआ था. वे हमेशा से विद्रोही रहीं. बचपन में भी उन्हें चुप रहना पसंद नहीं था. वे गलत बातों पर हमेशा अपनी आवाज उठाती थीं. उन्हें स्कूल में लोग टॉम ब्वॉय कह कर ही बुलाते थे. स्मिता को उनके योगदान के लिए दो बार राष्टÑीय पुरस्कारों से नवाजा गया. वे पदमश्री भी रहीं. वर्ष 1977 स्मिता के करियर का सबसे अहम वर्ष रहा. चूंकि इसी वर्ष भूमिका और मंथन दोनों फिल्में आयीं. और इन दोनों ही फिल्मों में स्मिता ने दो अलग अलग किरदार निभाये थे. बकौल श्याम बेनेगल स्मिता जब बिंदी लगाती थी. तो ऐसा गलता था कि चांद काली रात में भी चांदनी बिखेर रहा है. हर फिल्म में वह कुछ अलग करने की कोशिश किया करती थीं. फिल्म भूमिका की सफलता के बाद स्मिता कलात्मक फिल्मों की शीर्ष अभिनेत्री बन गयीं. महेश भट्ट के शब्दों में स्मिता जैसी अभिनेत्री न कभी हुई न होगी. वह जिस तरह अपने हर किरदार को जीती थी. और कैसे वह अपने किरदारों की तैयारी करती थी. यह हमेशा रहस्यमय ही रहेगा. चूंकि स्मिता सेट पर आने के साथ बहुत मस्ती किया करती थी. होमवर्क करनेवालों में से वह नहीं थी. लेकिन कैमरा आॅन होते ही स्मिता बेहद सशक्त और सतर्क हो जाती थी. स्मिता ने इस दुनिया को महज 31 वर्ष में अलविदा कह दिया था. लेकिन उन्होंने कम समय में ही अपनी जो पहचान स्थापित की और जिस तरह की भूमिकाएं निभायी. आज भी वे स्मरणीय हैं. उन्होंने कम वक्त में ही सिनेमा की पूरी सदी को जी लिया और सिनेमा को अमर कर दिया. आज के दौर के दर्शक भी स्मिता पाटिल की फिल्मों से वाकिफ हैं. चूंकि पुराने दौर के लोगों ने उनका इतना गुणगान किया है कि वर्तमान दौर के दर्शक भी उनकी फिल्में देखना पसंद करते हैं. फिल्म चक्र में स्मिता ने झुग्गी झोपड़ी में रहनेवाली महिला के किरदार को रुपहले परदे पर जीवंत कर दिया था. स्मिता अपनी निजी जिंदगी में बेहद सामान्य सी रहनेवाली लड़की थीं. वे अजनबियों से बात नहीं करती थी. लेकिन जिनसे वह घुलमिल जातीं. वे उनके दोस्त बन जाते. उन्हें निजी तौर पर भड़कीले कपड़े पहनना पसंद नहीं था. स्मिता अपनी सोच में बोल्ड थीं. उनके लिए बोल्डनेस का मतलब उनका अंग प्रदर्शन नहीं था. वे अंग प्रदर्शन करती थीं. लेकिन लिहज के साथ. उनका मानना था कि अगर अंग प्रदर्शन से फिल्मों में काम मिल जाता तो हर लड़की हीरोइन होती. स्मिता अंग प्रदर्शन को गलत नहीं मानती थीं. अगर स्क्रिप्ट की जरूरत हो और वे कोई ऐसा किरदार निभा रही हैं, जहां उन्हें अपने किरदार को स्थापित ही अंग प्रदर्शन से करना हो तो वह इसे जायज मानती थीं. शायद यही वजह थी कि वे उस दौर में काफी विवादित अभिनेत्री भी रहीं. खासतौर से राज बब्बर के प्रेम प्रसंग के कारण उनका नाम सबसे ज्यादा मीडिया में बदनाम हुआ. अमिताभ के शब्दों में स्मिता के पास जबरदस्त सिक्स सेंस था. वे जो घटनाएं होनेवाली होती थीं. उनका अनुमान स्मिता को पहले ही हो जाया करता था. अमिताभ बताते हैं कि जब फिल्म कुली के दौरान उनका बहुत बड़ा एक्सीडेंट हुआ था. स्मिता ने एक्सीडेंट से एक दिन पहले अमिताभ को फोन करके पूछा था कि तुम ठीक तो हो न. मुझे ऐसा लगा कि तुम्हारे साथ कुछ बुरा होनेवाला है और अगले ही दिन अमिताभ दुघर्टना ग्रसित हुए. स्मिता को अपने बारे में भी यह अंदेशा होता था कि वह बहुत लंबी उम्र नहीं जी पायेंगी औैर शायद इसलिए उन्होंने अपने जीवन के सारे निर्णय बहुत ज्यादा दिमाग से नहीं दिल से लिये. वह अफसोस नहीं किया करती थीं. स्मिता नहीं हैं. लेकिन उनकी फिल्में अर्थ, मंथन, अमृत, अर्धसत्य, आक्रोश, आखिर क्यों, आनंद और आनंद, मंडी, निशांत जैसी फिल्में हमेशा उनकी यादें ताजा करती रहेंगी. स्मिता आज भी कई अभिनेत्रियों की प्रेरणा हैं. लेकिन उन-सा बनने की जुररत आज तक किसी अभिनेत्री ने नहीं किया है. खुद शबाना आजिमी, जया बच्चन स्मिता की फैन हैं.
अनुप्रिया अनंत
भावनाओं से गढ़ी फिल्म जैरी मैग्वॉयर : मिलन लुथरिया निर्देशक
मैं टॉम क्रूज की फिल्मों का हमेशा से दीवाना रहा. मैं उनके एक् शन करने के अंदाज से हमेशा प्रेरणा लेता था और शायद इसलिए मुझे स्टाइलिश फिल्में बनाने में मजा आता है. अगर किसी एक फिल्म का नाम लेना हो तो मैं टॉम क्रूज की फिल्म जैरी मैग्वॉयर का नाम लूंगा. चूंकि यह फिल्म ऐसी थी, जिसमें टॉम क्रूज का अंदाज उनकी बाकी फिल्मों से बिल्कुल अलग था. वे जिस तरह से इस फिल्म में संवाद अदायगी करते हैं. वह बेहद अलग थी. यह फिल्म स्पोटर््स एजेंट लीग स्टीनबर्ग पर बनी थी और टॉम ने इस फिल्म में एक साथ रोमांटिक, कॉमेडी, ड्रामा और स्पोर्ट्स हर जॉनर को बखूबी निभाया था. इस फिल्म की खूबसूरती थी कि इस फिल्म में जिंदगी के छोटे छोटे मोंमेंट्स को भी खूबसूरती से दर्शाया गया है. फिल्म में एक दृश्य में फिल्म की नायिका जो कि अपना घर बदल रही होती है और जब वह घर से बाहर आती है उसने डार्क ग्लासेज पहन रखा होता है. टॉम उसका ग्लास उतारते हैं और देखते हैं कि वह रो रही है, इस सीन को फिल्म में बखूबी दर्शाया गया है. तो मुझे लगता है कि फिल्म मेकिंग का मतलब है कि आप अपनी फिल्म में इस तरह के मोमेंट्स दिखायें जो आपकी अपनी जिंदगी का हिस्सा हो. इस फिल्म में जिस तरह दर्शक फिल्म के कलाकारों से और मोमेंट से कनेक्ट हो पाते हैं. वही इस फिल्म की खासियत है. मुझे अपनी फिल्मों में भावना को एक खास हिस्सा बनाना अच्छा लगता है. क्योंकि ह्मुन इमोशन ही दर्शकों को फिल्म से जोड़ पाते हैं. टॉम की इस फिल्म की यह खासियत थी. इसके अलावा मुझे वैसी फिल्में आकर्षित करती हैं, जिनके किरदार बहुत इनकरेजिंग हों. जो आम जिंदगी से प्रभावित हों. शायद इन्हीं फिल्मों और किरदारों को देख देख कर मैं द डर्टी पिक्चर्स जैसी भावनात्मक कहानी वाली फिल्म बना पाया. वन्स अपन जैसी फिल्में मैं टॉम क्रूज की फिल्में देख कर ही बना पाया हूं. सो, मैं मानता हूं कि ऐसी फिल्मों का आपके विजन पर बहुत असर होता है. अनुप्रिया
स्वतंत्र फिल्म के दर्शक
एक तरफ बॉलीवुड में लगातार कमर्शियल फिल्में बन रही हैं. एक हफ्ते में तीन तीन फिल्में रिलीज हो रही हैं. ऐसी ही भीड़ में कुछ ऐसी भी फिल्में रिलीज हो रही हैं, जो अलग सोच और विजन के साथ बन रही हैं. मुख्य रूप से पीवीआर डायरेक्टर्स रेअर के बैनर तले कई स्वतंत्र बैनर की फिल्मों को रिलीज करने का मौका दिया जा रहा है. हाल ही में फिल्मीस्तान को राष्टÑीय पुरस्कार मिला. इस फिल्म के निर्देशक नीतिन कक्कर इस बात से खुश तो हैं. लेकिन वे इस बात पर अफसोस भी जताते हैं कि कई लोगों को पता ही नहीं है कि उनकी फिल्म है कौन सी? दरअसल, हिंदी सिनेमा की भीड़ में इन फिल्मों ने अपनी जगह बना ली है. आज ही लेसनस इन फॉरगेटिंग द फिल्म रिलीज हो रही है. इस फिल्म को कई समारोह में सराहना मिली. लेकिन दर्शकों को इसके बारे में खास जानकारी नहीं. कुछ इसी तरह की फिल्म सेल्योलाइड मैन भी है. पीके नायर पर आधारित यह फिल्म भी बेहतरीन फिल्म है. लेकिन दर्शकों तक इसकी पहुंच नहीं है. पिछले साल मामी फिल्मोत्सव में शीप आॅफ थेसस की धूम रही, लेकिन दर्शकों तक यह फिल्म नहीं पहुंच पायी है. इस दौर में जहां प्रोडयूसर और कमर्शियल प्रोडयूसर होना इतना अनिवार्य है. ऐसे दौर में भी कई ऐसे निर्देशक हैं, जो फिल्मों के बॉक्स आॅफिस रिपोर्ट की परवाह किये बगैर फिल्में बना रहे हैं और अपनी मेहनत से उसे कई फिल्म समारोह तक भी पहुंचाते हैं. धीरे धीरे जब इन्हें माउथ पब्लिसिटी मिलती है. तब जाकर कहीं ये फिल्में रिलीज हो पाती हैं. फिल्मीस्तान के निर्देशक नीतिन बताते हैं कि अब भी बॉलीवुड में उन्हीं फिल्मों को रिलीज करने में आसानी होती है, जिनमें स्टार्स हैं. लीक से हटकर बननेवाली फिल्मों को खरीददार नहीं मिलते. लेकिन जब वे फिल्में दर्शकों तक पहुंचती है और वे उसे पसंद करते हैं तो धीरे धीरे लोग उसमें रुचि जगाते हैं.
काली जहरीली रात की डायन
अनुप्रिया अनंत
फिल्म : एक थी डायन
कलाकार : कोंकणा सेन शर्मा, इमरान हाशमी, हुमा कुरैशी, कल्की कोचलिन
निर्देशक : कानन अय्यर
रेटिंग : 3 स्टार
अगर आप यह फिल्म देखने जा रहे हैं. विशेष कर महिला दर्शकों से अपील हैं कि अपने बालों में चोटियां बना कर न जायें. चूंकि फिल्म के नायक इमरान हाशमी उर्फ बोबो को लड़कियों की चोटियां पसंद नहीं. और वे जहां भी इन्हें देखते हैं. काटने के लिए दौड़ पड़ते हैं. बोबो ऐसा जानबूझ कर नहीं करता और न ही बोबो पागल है. बोबो ऐसा इसलिए करता है, क्योंकि एक किताब में लिखा है कि चुड़ैल की ताकत उसकी चोटी में गुंथी होती है.बोबो अभी बच्चा है. जब उसके हाथ एक ऐसी किताब लग जाती है, िजससे उसे जानकारी मिलती है कि डायन होती है और वे अपने काले जादू से सबको नाश कर देती है. विशेष कर उसे बच्चे से बेहद प्यार होता है. ये बात बोबो के जेहन में घर कर जाती है. यह किताब बोबो की जिंदगी किस कदर उलट फेर कर देता है. एक थी डायन की यही कहानी है. कानन अय्यर की फिल्म एक थी डायन हाल के समय की बेहतरीन हॉरर फिल्म है. एक थी डायन में निर्देशक ने एक बात स्पष्ट करने की कोशिश की है कि काला जादू व शैतानी ताकत करनेवाली सिर्फ महिलाएं नहीं होतीं, पुरुष भी होते हैं. जो पिशाच कहलाते हैं. इस कदम से निर्देशक ने खुद को पूरी तरह सुरक्षित रखने की कोशिश की है, ताकि उन पर महिलाओं को डायन कहने के आरोप न लगें. बहरहाल, बात फिल्म की कहानी की...फिल्म की कहानी के बारे में दर्शक न जाने तो बेहतर. चूंकि इस फिल्म के कुछ राज ही फिल्म की यूएसपी हैं. फिल्म की कहानी बोबो के बचपन की दुनिया और बोबो की युवा दुनिया पर आधारित है. बोबो की इस दुनिया में तीन औरतें हैं. लेकिन कौन है सच्चा कौन है झूठा. इसका पता लगा पाना बोबो के हाथ में नहीं है. बोबो जादूगर है. लेकिन वह काला जादू नहीं करता. वह आम दुनिया का आदमी नहीं. लेकिन वह आम लोगों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता.
बॉलीवुड में लंबे समय के बाद किसी हॉरर फिल्म ने आकर्षित किया है. कानन अय्यर की फिल्म एक थी डायन हर लिहाज से आमतौर पर हिंदी में बननेवाली हॉरर फिल्मों से जुदा है. इस फिल्म में न तो किसी हवेली की कहानी और न ही किसी हांटेड की कहानी दिखाई गयी है. फिल्म सीधे तौर पर काले जादू और शैतानी ताकत को हासिल करने की चाहत रखनेवाले पिशाच की कहानी के इर्द गिर्द घूमती है. इस फिल्म को आप पूरी तरह तभी एंजॉय कर पायेंगे. अगर आप इस फिल्म की कहानी न ही जानें और ही फिल्म पर िलखे गये किसी भी रिव्यू को पढ़ कर फिल्म के राज जाने. वरना, आपका मजा किरकिरा हो सकता है. हालांकि निर्देशक कानन अय्यर ने इस बात का पूरा ख्याल रखा है कि किस तरह दर्शकों को वह बांधे रख सकें. अपनी कहानी और काला जादू व शैतानी शक्तियों की ताकत दिखाने के लिए उन्होंने जो रास्ता चुना है. वह आपको सीधे जह्नुम तक ले जाता है. निर्देशक आपको लंबे समय तक इस असमंझ में छोड़ देता है कि वाकई यह कोई काला जादू है या फिर इंसानी दिमाग की फितरत. इस फिल्म की खासियत है कि फिल्म के सभी कलाकारों का चुनाव उनकी पर्सनैलिटी के आधार पर किया गया है. चूंकि इन सभी कलाकारों की वास्तविक पर्सनैलिटी फिल्म के किरदारों की पर्सनैलिटी से मेल खाती है. अगर आप इमरान हाशमी के फैन हैं तो आपको इस फिल्म में उनकी बेहतरीन एक्टिंग देखने को मिलेगी. साथ ही कोंकणा सेन अपने अदभुत अभिनय से सबको चकित करती हंै. हुमा कुरैशी ने बेहतरीन काम किया है. कल्की को और स्पेस दिया जाना चाहिए था. इस फिल्म के संगीत ने फिल्म की कहानी को पूरी तरह सपोर्ट किया है और लंबे अरसे के बाद किसी हॉरर फिल्म के गाने आपको इतने पसंद आयेंगे. गीतकार गुलजार ने बेहतरीन गीत लिखे हैं. फिल्म का यारम गाना लंबे समय तक याद रहनेवाले गानों में से एक होगा. हो सकता है कि क्लाइमेक्स आपको थोड़ा निराश करें. लेकिन यह सच है कि फिल्म के किरदार आपको डराने में कामयाब रहेंगे. फिल्म में जबरन बिल्डिंग को हिलाने या काले कपड़े में घूमनेवाली किसी औरत जैसी घिसी पीटी चीजें नहीं दिखाई गयी हैं. विशाल भारद्वाज और एकता कपूर के संयुक्त प्रयास से बॉलीवुड में एक अच्छी हॉरर फिल्म बनी.
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