20121106

शशि का पृथ्वी थियेटर


 
कुछ दिनों पहले लीजेंड अभिनेता शशि कपूर के बेटे व पृथ्वी थियेटर के प्रमुख कुणाल कपूर ने बताया कि शशि कपूर अमूमन कम बातें करते हैं. लेकिन हाल ही में जब उन्होंने अपने पोते रणबीर कपूर की फिल्म रॉकस्टार देखी तो उन्होंने कहा कि दिस ब्वॉय इज रियली गुड, फिल्म देखते वक्त वह यह नहीं समझ पाये थे कि वे जिसकी तारीफ कर रहे हैं. वे उनके ही खानदान का चिराग है. कुणाल बताते हैं कि रणबीर हर क्रिसमस पर शशि से मिलने जरूर आते हैं. लेकिन अब शशि की याददाश्त बहुत नहीं. इसलिए वे चीजों को बहुत ज्यादा याद नहीं रख पाते. इसके बावजूद शशि आज भी पृथ्वी थियेटर में हर शाम आते हैं. शशि किसी दौर में चार्मिंग हीरो के रूप में लोकप्रिय थे. दीवार में अगर विजय को शशि के रूप में रवि वर्मा का साथ न मिला होता तो शायद ही दीवार हिंदी सिनेमा में मील की दीवार मानी गयी होती. शशि एक जमाने में अपने अभिनय के लिए विशेष वर्ग में खासतौर से लोकप्रिय थे. लेकिन बाद में जाकर जब वे जेनिफर के संपर्क में आये. तब से उनकी रुचि थियेटर में और बढ़ गयी और आज आलम यह है कि पृथ्वी थियेटर से इस तरह भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं कि वे फिल्मी जगत के लोगों के संपर्क में भले न रहें. लेकिन हर शाम उन्हें पृथ्वी थियेटर जाकर सुकून मिलता है. वे वहां एक कोने में बैठ कर पृथ्वी थियेटर आनेवाले लोगों को सिर्फ निहारते हैं. लेकिन उनकी खामोश आंखों में आज भी एक बात की तसल्ली है कि पृथ्वी आज भी लोगों में प्रासंगिक है. दो तीन दिनों पहले पृथ्वी थियेटर फेस्टिवल की शुरुआत हुई और इस मौके पर थियेटर से जुड़े कई लोकप्रिय सितारें आये. जो फिल्मों में भी सक्रिय हैं. लेकिन लोग चौंके तब जब अचानक कपूर खानदान की बेटी करीना अपने पति सैफ के साथ वहां पहुंचीं.अपने दादा शशि के साथ काफी वक्त भी बिताया. यह शशि के समर्पण का ही नतीजा है कि आज भी सुपरसितारें भी जब पृथ्वी की गलियारों में प्रवेश करते हैं. वे आम लोगोंं की तरह बर्ताव करते हैं. वे वहां स्थित कैफेटेरिया में बैठ कर रगड़ा पैटिज, कोक व कई खाने का लुत्फ उठाते हैं. एक दूसरे के साथ बैठ कर वहीं छोटी छोटी कुर्सियों में बैठ कर कुछ देर सुकून के बिताते हैं. अनिल कपूर को प्राय: यहां देखा जा सकता है. आज भी पृथ्वी थियेटर के नियम किसी के लिए नहीं बदले. आज भी यहां शो शुरुआत होने के बाद किसी को भी अंदर जाने की इजाजत नहीं होती. एक सुपरस्टार अभिनेता के लिए उसके बुढ़ापे में यह समृद्धि मिलना भी उसे संपूर्ण व संतुष्ट बनाता है.

एक सुपरस्टार बेटे के मन की टिस



कुछ दिनों पहले शाहरुख खान ने अपने पिता के जन्मदिन पर उनकी एक तसवीर टिष्ट्वटर पर अपलोड की थी. और साथ ही लिखा था. कि जन्नत में आप जहां भी हैं. खुश रहें. सलामत रहें. शाहरुख भी अपने पिता के काफी करीबी थे, लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें अपने पिता का साथ लंबी उम्र तक नहीं मिला था. जब वे 14 साल के थे. तभी उन्होंने अपने पिता को खो दिया था. शाहरुख की अपलोड की गयी उस तसवीर और उसमें लिखे शब्द ही बयां करते हैं कि शाहरुख आज अपने पिता को कितना मिस करते होंगे. इस बार जन्मदिन पर जब उनसे उनके घर मन्नत में मुलाकात हुई तो उनसे मैंने यह सवाल पूछा कि क्या उनके पिता ने उन्हें कभी किसी जन्मदिन पर ऐसी कोई चिट्ठी तोहफे के रूप में दी थी. जो उनके लिए काफी इमोशनल रही हो. यह प्रश्न सुन कर शाहरुख भावुक हो उठे थे. उन्होंने बताया कि उस दौर में वे या उनके पिता कभी इस तरह की चीजों पर ध्यान नहीं देते थे. खुद उनके पास केवल अपने पिता की दो तसवीरें हैं और कुछेक तो उन्होंने खुद इंटरनेट से इकट्ठी की है. साथ ही शाहरुख ने ये बताया कि जब उनके पिता कैंसर से पीड़ित थे. वे बात नहीं कर पाते थे. तो वे एक डायरी रखते थे और उसमें सारी बातें लिखते थे. जैसे कैसे हो...शाहरुख और उनकी बहन शहनाज दोनों को ही. वे दो किताबें आज भी शाहरुख के पास हैं. शाहरुख के चेहरे पर स्पष्ट रूप से यह बात झलक रही थी कि उन्हें कितना अफसोस है कि वे अपने पिता की किसी चीज को धरोहर के रूप में सहेज नहीं पाये हैं. यहां तक कि तसवीरें भी नहीं. दरअसल, हकीकत यही है कि जिस वक्त शाहरुख से उनके पिता का साथ छीना वे शायद ही इस बात से वाकिफ होंगे कि वे खुद इतने बड़े सुपरस्टार बनेंगे और दुनिया उनकी चीजें सहेजेगीं. खुद शाहरुख आम परिवार से थे और प्राय: हम आम मध्यवर्गीय परिवार में ऐसी चीजों को खास तवज्जो नहीं दी जाती है. हम रुटीन वर्क में ही खुद को इतने व्यस्त रखते हैं कि बाकी चीजों का ख्याल नहीं कर पाते. हमारा ध्यान कभी इस ओर नहीं जाता कि हमारे परिवार के सदस्य बड़े बुुजुर्ग भी दरअसल, हमारे धरोहर हैं और उनसे जुड़ी चीजें हमें सहेज कर रखने के लिए उनका डॉक्यूमेंटेशन करना ही चाहिए. फिर चाहे वह वीडियो के रूप में या तसवीरों के रूप में. जरूरी नहीं कि केवल खास शख्सियतों को ही यह हक है. अमिताभ बच्चन ने अपने पिता हरिवंश राय बच्चन की किताबों और उनसे जुड़ी तसवीरों को यादों में संजों रखा है.

गूंगे फाल्के का बोलता सिनेमा

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अगर उस वक्त दादा साहेब फाल्के ने लंदन फिल्म उद्योग के फिल्मकारों की बात सुन कर लंदन में रह कर ही फिल्में बनाना शुरू कर देते तो शायद ही भारतीय सिनेमा जगत का जन्म संभव हो पाता. अगर उस वक्त दादा साहेब ने अपने दोस्तों की बात मान ली होती और फिल्में बनाने की धून छोड़ दी होती तो शायद ही भारत में सिनेमा का विगुल बजता. दोस्त उन्हें पागल बुलाते थे और यही नहीं उनके दोस्तों ने तो उन्हें थाणे के पागलखाने में भर्ती भी करवा दिया था. लेकिन अगर वे उसी वक्त अपने पागलपन को छोड़ देते. तो शायद आज हिंदी सिनेमा अपने 100 साल में प्रवेश नहीं कर पाता. अगर उस वक्त दादा साहेब फाल्के ने भी अपनी जमापूंजी को यह सोच कर फिल्मों के लिए निवेश न किया होता कि उन्हें अपने परिवार का निर्वाह करना है तो वे भारतीय सिनेमा के जनक नहीं कहलाते. दादा साहेब फाल्के ने कदम कदम पर चुनौतियां लीं तो भारतीय सिनेमा के ताकत बने. वरना, शायद ही भारत में मूविंग फिल्मों की शुरुआत हो पाती. दरअसल, दादा साहेब फाल्के जैसे जुनूनी व्यक्ति में ही एक फिल्मकार का जन्म हो सकता था. सिनेमा की सोच रखनेवाले ही किसी व्यक्ति को चाय की प्याली के हैंडल में भी कैमरा एंगल नजर आ सकता है. सिनेमा के प्रति समर्पित व्यक्ति ही मटर के पौधे के विकास को भी सिनेमा का रूप दे सकता है. दादा साहेब फाल्के को भले ही मूल प्रेरणा लंदन में देखी गयी फिल्म द लाइफ आॅफ क्राइस्ट से मिली हो. लेकिन उन्होंने उस प्रेरणा में अपनी मौलिकता और सोच से एक समझ दी और भारत में फिल्मों की शुरुआत की. फिल्म उस वक्त मूलत: विदेशी उपक्रम था. साथ ही न तो किसी के पास फिल्म बनाने के अनिवार्य तकनीक उपलब्ध थे न ही उपकरण. लेकिन इसके बावजूद फाल्के ने अपनी सूझबूझ से वह कर दिखाया, जो आज एक बड़ी इंडस्ट्री का रूप है.  दादा साहेब फाल्के  उर्फ धुंधीराज गोविंद फाल्के को बचपन से ही कला से लगाव हो चुका था. यही वजह ती कि उन्होंने शिक्षा के लिए जेजे आटर््स स्कूल से कला का प्रशिक्षएण हासिल किया. फोटोग्राफी के शौक ने यही जन्म लिया. एक मंझे फोटोग्राफर की तरह न सिर्फ उन्हें शिक्षा ली. बल्कि उन्होंने अपना स्टूडियो भी शुरू किया. दरअसल, दादा साहेब फाल्के के व्यक्तित्व की एक खासियत रही. उन्होंने हमेशा जो भी चीजें सीखीं. उसका प्रयोगात्मक रूप से इस्तेमाल करना भी शुरू किया. केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि वे अपनी शिक्षा को व्यवहारिक रूप से भी प्रयोग करने लगे थे. यही वजह थी वे सन 1909 में जर्मनी भी गये. रहां उन्होंने आधुनिक मशीनों की तकनीक और संचालन के बारे में जाना. वही उनकी मुलाकात मशहूर चित्रकार राजा रवि वर्मा से हुई थी. रवि भारतीय देवताओं की पेंटिंग बनाया करते थे. और उसी वक्त से फाल्के को भी देवी देवताओं की पेंटिंग में रुचि हो गयी थी. फिर कुछ दिनों बाद लाइफ आॅफ क्राइस्ट देखने का मौका मिला. और फाल्के के अंदर का फिल्मकार जाग उठा. उन्होंने तय किया कि वे भारत जाकर वैसी ही फिल्म बनायेंगे. लेकिन सिनेमा की समझ उतनी नहीं थी.  जुनून इस कदर सवार था कि घर परिवार सबकुछ भूल कर अपनी जमाराशि, इंश्योरेंस सबकुछ गिरवी रख कर सिनेमा सीखने गये. तो, पहले लंदन जाकर वहां फिल्में बनाने का तरीका देखा. सीखा. समझा. फिर भारत लौटे. लेकिन संघर्ष यहां समाप्त नहीं हुई थी. किसी भी काम की पहली नींव रखना कितना मुश्किल था. यह अनुमान था. फाल्के को. लेकिन वे लगे रहे. दोस्त संपाक सेसिल हेपवोर्थ ने थोड़ी मदद की और भारत में आ गया कैमरा. तय किया कि राजा हरिशचंद्र पर ही फिल्म बनायेंगे. लेकिन सिर्फ कैमरे से तो फिल्म बनना संभव नहीं था. पूरी टीम चाहिए थे. लेकिन सिनेमा की पढ़ाई तो केवल फाल्के ने की थी. बाकी लोगों ने तो नहीं. वे तो जानते भी नहीं थे. क्या है सिनेमा. फिर कैसे समझायें. लेकिन फाल्के ने भी हिम्मत नहीं हारी. एक विज्ञापन निकाला. कलाकारों की खोज के लिए. लेकिन मुसीबत खत्म कहां होनेवाली थी. लोग अभिनय का मतलब सिर्फ थियेटर समझते थे. सिनेमा में अभिनय व थियेटर में अभिनय में अंतर भला वे कैसे समझ सकते थे. बमुश्किल थियेटर  के कलाकारों को ही फिल्म के लिए राजी किया. लेकिन उस समय महिलाएं और अभिनय दूर दूर तक ताल्लुक नहीं था. महिलाओं के किरदार भी पुरुष किया करते थे. लेकिन फाल्के की इच्छा थी कि वे महिला से ही अभिनय करायें. उन्होंने खोज जारी रखी. लेकिन नाकामयाब रहे. तो मजबूरन उन्होंने सांलुके नामक पुरुष से रानी तारामती का किरदार निभवाया. लेकिन संघर्ष का साथ अभी छूटा नहीं था. लगातार काम व शोध करने की वजह से फाल्के की आंखें कमजोर हो गयी थीं. अपना घर गिरवी रख कर उन्हें दूसरे छोटे से मकान में जाना पड़ा. लेकिन इन पूरे संघर्ष में उन्हें उनकी पत् नी का साथ मिला. जिन्होंने फाल्के का हौंसला बरकरार रखा. फाल्के अपनी फिल्म में स्वयं ही कला निर्देशक, दृश्यकार, कैमरामैन, संपादक, कॉस्टयूम डिजाइनर, मेकअप आर्टिस्ट, पेंटर और डिस्ट्रीब्यूटर बने. अंतत: पहली फिल्म बनी 3 मई 1913 में फाल्के व पूरे भारत का सपना पूरा हुआ. राजा हरिश्चंद्र भारत की पहली फिल्म बन कर तैयार हुई. लेकिन फाल्के ने अपनी यात्रा यही समाप्त नहीं की. वे लगातार फिल्में बनाते रहे.  लंका दहन, श्री कृष्ण जन्म, कालिया मरदान, सेदु बंधन, गंगावर्तनमोहनी भस्मासुर और सत्यवान   सावित्री का भी निर्माण करते रहे. दरअसल, दादा साहेब फाल्के का योगदान न केवल फिल्मों के जनक के रूप में ही नहीं बल्कि कई पौराणिक व धार्मिक कथाओं जिन्हें आम दर्शक वाकिफ भी नहीं थे. उन्हें सिनेमा के माध्यम से आमजन तक पहुंचाने के लिए याद किया जाता रहेगा. उन्होंने फिल्में बनाने की परंपरा केवल सोच तक सीमित नहीं रखी. उन्होंने तकनीकी रूप से भी इस बात को समझा कि फिल्मों के लिए स्टूडियो की जरूरत होगी. उन्होंने फिल्म स्टूडियो भी स्थापित करने का फैसला लिया. उस वक्त नासिक स्टूडियो  में भवन, पुस्तकालय,चिड़ियाखाना के साथ कलाकारों व तकनीशियनो के लिए विश्रामघर की भी व्यवस्था की थी. उन्होंने खुद एडिटिंग का पूरा सेटअप भी लगवाया. उन दिनों यहां वे रात दिन फिल्मों की शूटिंग करते थे. यह फाल्के की ही पहल का नतीजा था कि धीरे धीरे बुद्धिजीवी,शिक्षित व्यक्ति और आम लोगों ने भी फिल्मों में भविष्य को खोचा. रोजगार के अवसर तलाश्े. फाल्के की सफलता से प्रभावित होकर कई लोग इस इंडस्ट्री का हिस्सा बनने लगे. भले ही सिनेमा में बाद के दौर में कई आविष्कार हुए, आज भी हर दिन नये आविष्कार हो रहे हैं. लेकिन फाल्के ने उस वक्त पहल की, जब सिनेमा को उदासीनता और निंदा की दृष्टि से देखा जाता था. उस वक्त फाल्के ने अपना पूरा जीवन इसे समर्पित कर दिया. लेकिन वक्त की विडंबना रही कि जब धीरे धीरे सिनेमा को आवाज मिली तो उस वक्त फाल्के गूंगे हो गये. मसलन वर्ष 1913 से 1920 तक तो फाल्के ने अपने तरीके की कई प्रयोगात्मक फिल्में बनायी. लेकिन 1920 में बोलती फिल्मों का दौर शुरू हुआ. इस नयी तकनीक से फाल्के ने खुद को अपरिचित समझा और उन्होंने फिल्मों के निर्माण से अलविदा कर दिया. वाकई, कैसा रहा होगा वह लम्हा फाल्के के लिए. जिस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन सिनेमा को समर्पित कर दिया. उसी सिनेमा ने आवाज मिलते ही सिनेमा के जनक से ही उसकी आवाज छीन ली. गंगावतरण नामक पहली बोलती फिल्म बनाने का प्रयास फाल्के ने किया. लेकिन वे असफल रहे. संघर्षशील फाल्क के अंतिम दिन नासिक में बीते.
अनुप्रिया अनंत

धर्मसंकट में फंसी एक पत् नी एक दोस्त



इन दिनों यश चोपड़ा की फिल्म जब तक है जान का प्रमोशन जोरों से हो रहा है. इस फिल्म के प्रीमियर के लिए बकायदा एक खास थियेटर भी बनाया जा रहा है यशराज में. पामेला की इच्छा है कि वे अपने पति की आखिरी फिल्म को एक सेलिब्रेशन का रूप दें. तैयारियों जोरों पर है. लेकिन इसी बीच अजय देवगन की फिल्म सन आॅफ सरदार और यशराज के बीच हो रहे विवाद की वजह से तनाव का आलम है. अजय देवगन फिल्म्स ने जहां अपनी तरफ से यशराज को कंप्टीशन एक्ट के तहत नोटिस भेजने का दावा किया है, वही यशराज ने साफ इनकार किया है कि हमें कोई नोटिस नहीं आया है. अजय देवगन फिल्म्स के वक्ता का कहना है कि नोटिस यश चोपड़ा के निधन से पहले भेजा गया था और अजय का किसी को व्यक्तिगत रूप से चोट पहुंचाने का कोई ईरादा नहीं. इन तमाम झंझावातों के बीच फंसी हैं काजोल. चूंकि काजोल एक तरफ अजय की पत् नी हैं तो दूसरी तरफ यशराज और शाहरुख से हमेशा काजोल के करीबी रिश्ते रहे हैं. यहां तक कि यश चोपड़ा के जूहू बंगले से काजोल का घर भी बिल्कुल सटा ही स्थित है.दरअसल, काजोल ने अजय से शादी करने के बाद से ही अपने रिश्तों को बहुत अलग तरीके से निभाया है. शायद ही हिंदी सिनेमा में ऐसी कोई अभिनेत्री होगी जो इतने सही तरीके से अपने रिश्तों को संजो कर चल पायी हो. काजोल अपने रिश्ते बखूबी निभाना जानती हैं. वे जानती हैं कि रिश्तों बनाना आसान है लेकिन उन्हें निभाना पानी से पानी पर पानी लिखना है. शुरुआती दौर से ही अजय अंर्तमुखी रहे हैं.वे इंडस्ट्री में कम लोगों से घूलते मिलते हैं. शाहरुख से उनकी कभी नहीं बनी. लेकिन दूसरी तरफ काजोल पर उन्होंने कभी रोक नहीं लगायी या शायद काजोल ने भी अपनी सूझ बूझ से अपने पति के ठीक विपरीत इंडस्ट्री में सबसे रिश्ते बरकरार रखे हैं. वे आज भी शाहरुख को अपना बेस्ट फ्रेंड मानती हैं. लेकिन इस बार काजोल के लिए अग्निपरीक्षा का समय है. चूंकि अब से पहले ऐसी परिस्थिति कभी नहीं आयी थी.इस बार यशराज भी अपनी फिल्म को अपने पिता की आखिरी फिल्म मान कर काफी भावनात्मक है और अजय भी अपनी फिल्म सन आॅफ सरदार को लेकर काफी गंभीर. हालांकि अजय की फिल्म कॉमेडी फिल्म है और यशराज की रोमांटिक है. लेकिन दोनों ही फिल्में तनाव की वजह से अपना फ्लेवर खो कर सिर्फ तनाव और विवादस्पद फिल्में बनती जा रही हैं. ऐसे में काजोल इस धर्मसंकट से कैसे पार लगाती है. यह उनके लिए कठिन निर्णय होगा.

किंग आॅफ रोमांस का 47वां बसंत



आज के दौर के किंग आॅफ रोमांस शाहरुख खान आज 47 वें बसंत में प्रवेश कर रहे हैं.  वास्तविकता में शाहरुख खान के जन्मदिन में बसंत शब्द का इस्तेमाल न सिर्फ प्रासंगिक है. बल्कि उचित भी है. चूंकि शाहरुख ही किंग आॅफ रोमांस हैं और रुमानी जीवन में, रुमानी लोगों की जिंदगी में बसंत महीने का खास महत्व है. इस लिहाज से शाहरुख के साथ बसंत की उपाधि फिट बैठती है.  इसी महीने उनकी बहुचर्चित व बहुप्रतिक्षित फिल्म जब तक हैं जान रिलीज हो रही है. यह फिल्म उसी निर्देशक की फिल्म है, जिन्होंने शाहरुख खान को किंग आॅफ रोमांस की उपाधि दिलायी. यश चोपड़ा. हाल ही में जब तक हैं जान फिल्म से संबंधित एक कार्यक्रम में जब शाहरुख से पूछा गया कि वे आज भी हिंदी सिनेमा के किंग आॅफ रोमांस माने जाते हैं और वे किसी तरह सिनेमा में रोमांस को जिंदा रखना चाहेंगे तो उनका जवाब था कि वे हिंदी सिनेमा के किंग आॅफ रोमांस शम्मी कपूर, राजेश खन्ना को मानते हैं. खुद को नहीं. दरअसल, हकीकत भी यही है कि पिछले कई सालों से हिंदी सिनेमा में रोमांस पर लगातार फिल्में बनती तो आ रही हैं. लेकिन जो रुमानियत, प्रेम को परदे पर उतारने और निभाने में शम्मी कपूर, राजेश खन्ना या देव आनंद साहब माहिर थे. वे रुमानियत आज खो चुकी है. शाहरुख खान भी लंबे अरसे के बाद रोमांटिक फिल्म में नजर आ रहे हैं. जबकि शाहरुख यह अच्छी तरह जानते हैं कि वे प्रेम की परिभाषाओं को परदे पर उतारने में माहिर रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद वे धाराप्रवाह में बह कर वे फिल्में करने लगे. जिसमें वे फिट हैं ही नहीं. वे रा. वन में बड़ी बड़ी बिल्डिंग में सुपरमैन की तरह करतब दिखाने लगे. जबकि दर्शक आज भी उन्हें सरसो के खेत में या स्वीजरलैंड की गलियों में प्रेम गीत गाते देखना चाहते हैं. वे डॉन बन कर अपनी प्रेमिका को जंगली बिल्ली कह कर पुकारने लगे. जबकि लोग उन्हें आज भी क...क किरण और आइ लव यू सिमरन कहते हुए सुनना चाहते हैं. वे डॉन की परिभाषा देने में व्यस्त हो गये थे. जबकि लोग आज भी उनसे दिल तो पागल है, कुछ कुछ होता के राहुल की तरह प्यार और दोस्ती की परिभाषा देते हुए सुनना चाहते हैं. यह सच है कि हर एक्टर को हर तरह की फिल्में करनी चाहिए. लेकिन यह भी सच है कि शाहरुख ने प्रेम विधा में भी विभिन्नता दी है तो फिर उन्हें वैसी ही फिल्में करती रहनी चाहिए. आज भी शाहरुख को जेम्स बांड बनने इच्छा है. जबकि लोग उन्हें राज के रूप में ही देखना चाहते हैं. संभवत: शाहरुख इस बात को समझ पायें.

बेटी, बहू, मां -ऐश्वर्य



आज ऐश्वर्य राय बच्चन का जन्मदिन है. मां बनने के बाद यह ऐश्वर्य का पहला जन्मदिन है. ऐश्वर्य उन शीर्ष अभिनेत्रियों में से एक हैं, जिनके साथ आज भी अच्छे निर्देशक काम करना चाहते हैं. हालांकि पिछले एक साल से उन्होंने अपना पूरा समय अपनी बेटी आराध्या की परवरिश को दिया. और अब भी उनकी वापसी कब होगी. यह तय नहीं. ऐश्वर्य पिछले लंबे समय से सिल्वर स्क्रीन से दूर हैं. लेकिन इसके बावजूद उन्हें इस बात से कोई मलाल नहीं. उनके चेहरे से स्पष्ट रूप से यह बात झलकती है कि वे अपने मातृत्व जीवन को कितना एंजॉय कर रही हैं. खुद जया बच्चन यह स्वीकारती हैं कि कई बार विदेशों में टूर के दौरान जब वे ऐश से कहती हैं कि वे बेबी को उनके पास छोड़ कर अपना काम पूरा कर लें. लेकिन ऐश एक पल के लिए भी बेटी आराध्या को खुद से दूर नहीं करतीं. प्रेगनेंसी के बाद बढ़े वजन को लेकर बार बार मीडिया में उनका मजाक बनाया जाता रहा. लेकिन यह ऐश्वर्य का आत्मविश्वास ही था कि वे सारी आलोचनाओं को सहते हुए भी अपनी मां की ममता के सागर में डूबी रहीं. यही नहीं वे गर्व से बताती आयीं कि वह एक औरत भी हैं और अगर ये सारी चीजें उनके साथ हो रही हैं. यह एक औरत के जीवन का हिस्सा है. दरअसल, ऐश्वर्य एक अच्छी मां बन पायी हैं, क्योंकि वह एक अच्छी बेटी भी हैं. शुरुआती दौर से लेकर अब तक वे अपने मां और पापा का खास ख्याल रखती आयी हैं. उनके अपने पेरेंट्स के प्रति इसी प्यार और अपनत्व के भाव को देख कर ही सलमान खान भी कभी ऐश्वर्य से बेइतहां प्यार कर बैठे थे. चूंकि सलमान भी अपने माता पिता को बेहद प्यार करते हैं. तो उन्हें लगा कि ऐश उनके परिवार का ख्याल उसी तरह रखेगी. जैसे वह अपने माता पिता का रखती है. यह हकीकत भी है कि बच्चन परिवार की बहू बनने के बाद ऐश्वर्य ने एक बहू के रूप में घर की सारी जिम्मेदारियां निभाई हैं. खुद अमिताभ बताते हैं कि वे घर में पूजा पाठ से लेकर प्रत्येक व्यक्ति की हर जरूरतों का ख्याल रखती हैं.  अभिषेक ऐश के इस बात के मुरीद हैं कि वे घर पर उनके माता पिता का सबसे अधिक ख्याल रखती हैं. ऐश्वर्य वर्तमान में काम न करते हुए भी मोस्ट डिजायरबल अभिनेत्रियों में से एक है. और घर पर भी वे सबको समृद्ध मनाती हैं. एक महिला के लिए इससे अधिक उपलब्धि और क्या होगी कि वह जहां भी है शीर्ष पर है. बहू के रूप में. बेटी के रूप में. मां के रूप में. और साथ ही साथ लोकप्रिय अभिनेत्री व सफल अभिनेत्री के रूप में भी.

मामी फिल्मोत्सव में क्लासिक फिल्में


  इस बार मामी फिल्मोत्सव ने एक अनोखी पहल की थी. देश विदेश की तमाम भाषाओं की बेहतरीन फिल्मों के साथ साथ भारतीय वे फिल्में भी शामिल की गयीं, जिन्होंने भारतीय सिनेमा की नींव रखी थी. जिस दौर में वे फिल्में बनी थी. हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर मुंबई फिल्मोत्सव की तरफ से यह बेहतरीन श्रद्धांजलि था. जाहिर सी बात है कि आज के जेनरेशन के लोगों ने सिर्फ उनके बारे में सुन रखा है. ऐसे में मामी फिल्मोत्सव जो कि युवाओं में सबसे अधिक लोकप्रिय है. फिल्म के विद्यार्थियों में सबसे अधिक लोकप्रिय है. यह एक बेहतरीन माध्यम बना, उन तक उस दौर की फिल्में पहुंचाने के लिए, जिन्हें हमने सिर्फ किताबों में पढ़ा है. भारत की पहली फिल्म राजा हरिशचंद्र. दादा साहेब फाल्के द्वारा निर्देशित-निर्मित. वाकई भारत की पहली फीचर फिल्म बनाने का क्या जुनून क्या जोश रहा होगा फाल्के में. आज जब इस फिल्म को बने और भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरे होने जा रहे हैं. आज से 100 साल बनी यह फिल्म देखने का अदभुत रोमांच रहा. तकनीक की कमी होने के बावजूद , सिर्फ अपनी सोच से कैसे बन सकती है फिल्म. फाल्के की यह सोच प्रेरणा देती है. और उनकी यह प्रेरणा हमेशा प्रासंगिक रहेगी. भले ही 100 साल बाद आज जब हम फाल्के की फिल्में देखें तो हमें उसमें वह बातें नजर न आयें. वह ग्रामर नजर न आये. लेकिन इसके बावजूद फाल्के की सोच हमेशा प्रासंगिक रहेगी.  फाल्के किस तरह अपनी एडिटिंग को लेकर काफी चर्चित रहे. किस तरह उन्होंने पूरे भारत में प्रोजेक्ट्र से घूम घूम कर दर्शकों तक फिल्में पहुंचायी. लोगों को फिल्में दिखाने की कला सिखायी. फाल्के के पथ पर चलते हुए बाबुराव पेंटर, हिमांशु राय, सेव दादा जैसी शख्सियत ने किन मुसीबतों का सामना करते हुए फिल्मों का निर्माण किया होगा और फिर किस तरह लोगों तक पहुंचाया होगा. यह सब बेहद रोचक सफर की तरह रहा होगा. न सिर्फ राजा हरिशचंद्र, उस दौर की लगभग सारी क्लासिक फिल्में मामी में शामिल हुई थीं और वर्तमान के दर्शकों में उन्हें लेकर अलग ही रुचि-रोमांच था. इसके साथ ही इस बार भारतीय फिल्मों में शाहिद, फिल्मीस्तान, मुंबईचा राजा, शिप आॅफ थेसस, कल्पना, मिस लवली, जहानु बरुआ द्वारा निर्देशित बांधो जैसी बेहतरीन फिल्में दिखाई गयी. जिनमें मिस लवली और कल्पना को कई अंतरराष्टÑीय फिल्मोत्सव में भी सराहा जा चुका है. इससे स्पष्ट है कि इन 10 सालंो में भारत में भी कई श्रेष्ठतम फिल्में बनी हैं.