इस बार मामी फिल्मोत्सव ने एक अनोखी पहल की थी. देश विदेश की तमाम भाषाओं की बेहतरीन फिल्मों के साथ साथ भारतीय वे फिल्में भी शामिल की गयीं, जिन्होंने भारतीय सिनेमा की नींव रखी थी. जिस दौर में वे फिल्में बनी थी. हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर मुंबई फिल्मोत्सव की तरफ से यह बेहतरीन श्रद्धांजलि था. जाहिर सी बात है कि आज के जेनरेशन के लोगों ने सिर्फ उनके बारे में सुन रखा है. ऐसे में मामी फिल्मोत्सव जो कि युवाओं में सबसे अधिक लोकप्रिय है. फिल्म के विद्यार्थियों में सबसे अधिक लोकप्रिय है. यह एक बेहतरीन माध्यम बना, उन तक उस दौर की फिल्में पहुंचाने के लिए, जिन्हें हमने सिर्फ किताबों में पढ़ा है. भारत की पहली फिल्म राजा हरिशचंद्र. दादा साहेब फाल्के द्वारा निर्देशित-निर्मित. वाकई भारत की पहली फीचर फिल्म बनाने का क्या जुनून क्या जोश रहा होगा फाल्के में. आज जब इस फिल्म को बने और भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरे होने जा रहे हैं. आज से 100 साल बनी यह फिल्म देखने का अदभुत रोमांच रहा. तकनीक की कमी होने के बावजूद , सिर्फ अपनी सोच से कैसे बन सकती है फिल्म. फाल्के की यह सोच प्रेरणा देती है. और उनकी यह प्रेरणा हमेशा प्रासंगिक रहेगी. भले ही 100 साल बाद आज जब हम फाल्के की फिल्में देखें तो हमें उसमें वह बातें नजर न आयें. वह ग्रामर नजर न आये. लेकिन इसके बावजूद फाल्के की सोच हमेशा प्रासंगिक रहेगी. फाल्के किस तरह अपनी एडिटिंग को लेकर काफी चर्चित रहे. किस तरह उन्होंने पूरे भारत में प्रोजेक्ट्र से घूम घूम कर दर्शकों तक फिल्में पहुंचायी. लोगों को फिल्में दिखाने की कला सिखायी. फाल्के के पथ पर चलते हुए बाबुराव पेंटर, हिमांशु राय, सेव दादा जैसी शख्सियत ने किन मुसीबतों का सामना करते हुए फिल्मों का निर्माण किया होगा और फिर किस तरह लोगों तक पहुंचाया होगा. यह सब बेहद रोचक सफर की तरह रहा होगा. न सिर्फ राजा हरिशचंद्र, उस दौर की लगभग सारी क्लासिक फिल्में मामी में शामिल हुई थीं और वर्तमान के दर्शकों में उन्हें लेकर अलग ही रुचि-रोमांच था. इसके साथ ही इस बार भारतीय फिल्मों में शाहिद, फिल्मीस्तान, मुंबईचा राजा, शिप आॅफ थेसस, कल्पना, मिस लवली, जहानु बरुआ द्वारा निर्देशित बांधो जैसी बेहतरीन फिल्में दिखाई गयी. जिनमें मिस लवली और कल्पना को कई अंतरराष्टÑीय फिल्मोत्सव में भी सराहा जा चुका है. इससे स्पष्ट है कि इन 10 सालंो में भारत में भी कई श्रेष्ठतम फिल्में बनी हैं.
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20121106
मामी फिल्मोत्सव में क्लासिक फिल्में
इस बार मामी फिल्मोत्सव ने एक अनोखी पहल की थी. देश विदेश की तमाम भाषाओं की बेहतरीन फिल्मों के साथ साथ भारतीय वे फिल्में भी शामिल की गयीं, जिन्होंने भारतीय सिनेमा की नींव रखी थी. जिस दौर में वे फिल्में बनी थी. हिंदी सिनेमा के 100 साल पूरे होने पर मुंबई फिल्मोत्सव की तरफ से यह बेहतरीन श्रद्धांजलि था. जाहिर सी बात है कि आज के जेनरेशन के लोगों ने सिर्फ उनके बारे में सुन रखा है. ऐसे में मामी फिल्मोत्सव जो कि युवाओं में सबसे अधिक लोकप्रिय है. फिल्म के विद्यार्थियों में सबसे अधिक लोकप्रिय है. यह एक बेहतरीन माध्यम बना, उन तक उस दौर की फिल्में पहुंचाने के लिए, जिन्हें हमने सिर्फ किताबों में पढ़ा है. भारत की पहली फिल्म राजा हरिशचंद्र. दादा साहेब फाल्के द्वारा निर्देशित-निर्मित. वाकई भारत की पहली फीचर फिल्म बनाने का क्या जुनून क्या जोश रहा होगा फाल्के में. आज जब इस फिल्म को बने और भारतीय सिनेमा के 100 साल पूरे होने जा रहे हैं. आज से 100 साल बनी यह फिल्म देखने का अदभुत रोमांच रहा. तकनीक की कमी होने के बावजूद , सिर्फ अपनी सोच से कैसे बन सकती है फिल्म. फाल्के की यह सोच प्रेरणा देती है. और उनकी यह प्रेरणा हमेशा प्रासंगिक रहेगी. भले ही 100 साल बाद आज जब हम फाल्के की फिल्में देखें तो हमें उसमें वह बातें नजर न आयें. वह ग्रामर नजर न आये. लेकिन इसके बावजूद फाल्के की सोच हमेशा प्रासंगिक रहेगी. फाल्के किस तरह अपनी एडिटिंग को लेकर काफी चर्चित रहे. किस तरह उन्होंने पूरे भारत में प्रोजेक्ट्र से घूम घूम कर दर्शकों तक फिल्में पहुंचायी. लोगों को फिल्में दिखाने की कला सिखायी. फाल्के के पथ पर चलते हुए बाबुराव पेंटर, हिमांशु राय, सेव दादा जैसी शख्सियत ने किन मुसीबतों का सामना करते हुए फिल्मों का निर्माण किया होगा और फिर किस तरह लोगों तक पहुंचाया होगा. यह सब बेहद रोचक सफर की तरह रहा होगा. न सिर्फ राजा हरिशचंद्र, उस दौर की लगभग सारी क्लासिक फिल्में मामी में शामिल हुई थीं और वर्तमान के दर्शकों में उन्हें लेकर अलग ही रुचि-रोमांच था. इसके साथ ही इस बार भारतीय फिल्मों में शाहिद, फिल्मीस्तान, मुंबईचा राजा, शिप आॅफ थेसस, कल्पना, मिस लवली, जहानु बरुआ द्वारा निर्देशित बांधो जैसी बेहतरीन फिल्में दिखाई गयी. जिनमें मिस लवली और कल्पना को कई अंतरराष्टÑीय फिल्मोत्सव में भी सराहा जा चुका है. इससे स्पष्ट है कि इन 10 सालंो में भारत में भी कई श्रेष्ठतम फिल्में बनी हैं.
पेंटिंग से निकले बोलते किरदार
जब हम किसी कला प्रदर्शनी में जाते हैं तो वहां स्थित पेंटिंग की खूबसूरती और उसे रचनेवाले चित्रकार की तारीफों के पूल बांधते हैं. लेकिन शायद ही हम में से किसी ने भी कभी यह कल्पना भी की होगी कि चित्रकार जिन पेंटिंग को किसी प्रदर्शनी का हिस्सा बनाता है. दरअसल, वह कई बुरी पेंटिंग के बाद बार बार अभ्यास के बाद उभर कर सामने आती है. लेकिन उस बुरी पेंटिंग को जिसे कागज का टुकड़ा समझ कर बार बार चित्रकार फेंक देते हैं. उनमें भी जान होती होगी. वे भी सोचते होंगे कि आखिर उनका क्या दोष है. जो उन्हें यूं अधूरा या बुरा कह कर हटा दिया गया. ये सारी बातें वाकई किसी काल्पनिक दुनिया की सैर कराती हैं. लेकिन इसी काल्पनिक दुनिया से बिल्कुल अलग एक दुनिया की कल्पना करना और फिर उसे एक फिल्म का रूप देना अदभुत है.इस बार मामी फिल्मोत्सव में शामिल हुई फिल्म द पेंटिंग हर तरह से एक अदभुत और अनोखी फिल्म थी. यह एक ऐनिमेशन फिल्म है. लेकिन इस फिल्म के सारे किरदार एक पेंटिंग के किरदार हैं, जो अपने चित्रकार की खोज में निकले हैं कि आखिर उन्होंने उन्हें क्यों अधूरा छोड़ दिया. अंत में जब पेंटिंग से ही निकली एक किरदार चित्रकार से मिलती है और फिर एक खोज पर निकलती है. चित्रकार उससे पूछता है कि अब तुम कहां जा रही हो तो वह बताती है कि अब वह यह तलाशने जा रही है कि आखिर इस चित्रकार को किसने बनाया. जिस तरह किसी लेखक के शब्द अगर प्रभावशाली हो तो उन्हें भी आवाज आ जाती है. ठीक इसी तरह इस फिल्म में दर्शाने की कोशिश की गयी है, जब एक चित्रकार किसी भी पेंटिंग की परिकल्पना कर अपनी कूची से किसी कैनवॉस पर किसी भी रंग से कुछ भी रचने की कोशिश करता है. उसी वक्त वे जीवंत हो जाते हैं. उनमें जान आ जाती है. वाकई फ्रेंच के निर्देशक जीन फ्रांसिस ने इस फिल्म के विषय से ही साबित कर दिया है कि सोच को व्यक्ति चाहे तो किसी भी सीमा तक ले जा सकता है. हिंदी फिल्मों में शायद ही एनिमेशन फिल्में बनाते वक्त निर्देशक इस तरह के थीम सोच पायें. हिंदी सिनेमा के निर्देशकों को ऐसी फिल्मों से सीख लेनी चाहिए. ये फिल्में अपने थीम में ही इतनी प्रबल होती है कि दर्शक ऐसी फिल्में देख कर वाहवाही ही देते हैं. वाकई, यह हकीकत है कि अच्छी फिल्म का प्रभाव दुनिया के किसी भी कोने में किसी भी व्यक्ति पर हो सकता है. द पेंटिंग जैसी फिल्में प्रेरणा है. निर्देशकों के लिए. उनकी कल्पना की सोच के लिए. ऐसी फिल्में नयी सोच और नयी दिशा दिखाती है.
द शो मस्ट गो आॅन
21 अक्तूबर को मशहूर निर्देशक यश चोपड़ा का और 25अक्तूबर को कॉमेडी सरताज जसपाल भट्टी का निधन हो गया. उनकी मृत्यु के बाद इसी शुक्रवार उनकी फिल्म पॉवर कट रिलीज हुई और खुद जसपाल भट्टी के परिवारवालों ने फिल्म की स्क्रिनिंग का खास आयोजन किया, जिसमें पंजाब के लगभग सभी चर्चित चेहरे नजर आये. सभी ने अपने दोस्त जसपाल भट्टी को श्रद्धांजलि देते हुए फिल्म की तारीफ की. जसपाल भट्टी के बेटे ह्वील चेयर पर बैठ कर ही थियेटर में आये लेकिन आये. पत् नी की आंखें नम थीं. लेकिन उन्हें गर्व था कि उनके पति की आखिरी फिल्म को दर्शकों का प्यार मिल रहा है. कुछ इसी तरह यश चोपड़ा की पत् नी पामेला चोपड़ा भी अपने पति की अंतिम फिल्म जब तक हैं जान के लिए भव्य प्रीमियर का आयोजन करने जा रही हैं. गौरतलब है कि पिछले कई सालों से यशराज ने फिल्मों के प्रीमियर की परंपरा समाप्त कर दी थी. लेकिन इस बार पामेला चोपड़ा ने तय किया है कि वे अपने पति की आखिरी फिल्म का जश्न मनायेंगी. शोक नहीं. क्योंकि यश भी जिंदगी को जिंदादिली से मनाने में यकीन रखते थे. पामेला ने दोनों बेटों को जिम्मेदारी दे भी दी है. दरअसल, हकीकत भी यही है कि सिनेमा एक ऐसी निरंतर क्रिया है. जो कभी थमती नहीं. राजकपूर ने फिल्म मेरा नाम जोकर में वाकई सर्कस के जोकर के रूप में यह दर्शाया था कि किस तरह ये दुनिया किसी के जाने के बाद थमती नहीं. या उसे थाम कर नहीं रखा जा सकता. जो शो है. उसे चलना ही होगा. स्पष्ट है कि न तो पामेला और न ही जसपाल भट्टी की पत् नी फिलवक्त किसी भी जश्न की स्थिति में हैं. लेकिन इसके बावजूद वे अपने अपने पति को इस माध्यम से प्यार समर्पित करने की कोशिश कर रही हैं. इतने सालों तक अपने पति के साथ रहते हुए आखिर वे भी इस सिनेमा की रीत को समझ चुकी हैं. वे जानती हैं कि चाहे कुछ भी हो जाये द शो मस्ट गो आॅन. राजकपूर ने मेरा नाम जोकर में जोकर राजू के बहाने वाकई बहुत मार्मिक बात दिखाई है. यह जिंदगी सर्कस ही है. अपने पिता की मृत्यु के बावजूद वह लोगों को हंसा रहा है. ठीक उसी तरह जैसे पामेला और जसपाल की पत् नी निभा रही हैं. खुद यश चोपड़ा ने बताया था कि कैसे श्रीदेवी अपने पिता की अंत्येष्टि से तुरंत आकर शूटिंग की थी. परेश रावल की मां का भी सरदार फिल्म के वक्त देहांत हो गया था. लेकिन उन्हें शूटिंग जारी रखनी पड़ी थी. दरअसल, वास्तविकता यही है कि एक कलाकार दुखी होते हुए भी खुशी का मुखौटा पहन कर ही सही लेकिन अपना काम पूरा करता है.
अभिनेत्रियों की नयी प्रेरणा स्ट्रीप
रानी मुखर्जी ने अभी हाल ही में अय्या के दौरान दिये अपने इंटरव्यू में चीख चीख कर कहा कि वे हॉलीवुड की अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप की बहुत बड़ी फैन हैं और वे उनसे प्रेरणा लेती हैं कि अगर वे 60 की उम्र में भी काम करना जारी रखती हैं तो बॉलीवुड में भी अभिनेत्रियों को लंबे समय तक काम जारी रखना चाहिए. कुछ ऐसी ही बात अभिनेत्री उर्मिला मांतोडकर का भी कहना है. उर्मिला कहती हैं कि बॉलीवुड में अगर कोई अभिनेत्री एक दो सालों तक नजर नहीं आती और फिर वापसी करती हैं तो इसे उस अभिनेत्री का कमबैक माना जाने लगता है. लेकिन हॉलीवुड में क्या मेरिल स्ट्रीप को कोई यह कह सकता है कि वह कमबैक कर रही हैं. नेहा धूपिया ने भी हाल ही में दिये एक इंटरव्यू में स्वीकारा है कि मेरिल स्ट्रीप ही उनकी प्रेरणा है. इन तमाम अभिनेत्रियों की इन दिनों एक ही प्रेरणा हैं वे हैं मेरिल स्ट्रीप. इससे साफतौर पर यह स्पष्ट होता है कि हिंदी सिनेमा की अभिनेत्रियों के मन में इस बात को लेकर भड़ास है कि उन्हें बेहद कम समय के लिए हिंदी फिल्मों में काम करने का मौका मिलता है और फिर उम्र ढलने के साथ ही उनके करियर पर विराम लग जाता है. जबकि विदेशों में न सिर्फ बुजुर्ग और प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों को ध्यान में रख कर कहानियां लिखी जाती हैं बल्कि उसे भव्य तरीके से फिल्माया भी जाता है. दरअसल, उन तमाम अभिनेत्रियों के लिए मेरिल जैसी कोई भी अदाकारा प्रेरणा सिर्फ इसलिए नहीं कि मेरिल वाकई में बेहतरीन कलाकार हैं बल्कि इसलिए है कि उम्रदराज होने के बावजूद उन्हें काम मिल रहे हैं और वे सक्रिय हैं. बॉलीवुड में ऐसा नहीं होता है. यहां हर चार साल के बाद एक फ्रेश चेहरे की तलाश होती है. जबकि नायकों में 20 सालों से वही चेहरे बार बार दोहराये जा रहे हैं. ऐसे में वे अभिनेत्रियां जो वाकई किसी दौर में स्टार स्टेट्स देख चुकी हैं. उन्हें परेशानी होना स्वभाविक है. किसी दौर में खूबसूरत अभिनेत्रियों में से एक मानी जानेवाली मनीषा की हाल ही में भूत फिल्म आयी. लेकिन दर्शकों को उस फिल्म में खास रुचि नहीं थी. कमबैक फिल्मों पर गौर करें तो केवल श्रीदेवी की ही फिल्म को सराहना मिली. वरना, माधुरी दीक्षित की आजा नच ले भी नाकामयाब रही थी. इससे स्पष्ट है कि अभिनेत्रियों को भी उनके लॉयल फैन नहीं मिलते. आज भी लोग माधुरी के अभिनय से अधिक उनकी मुस्कान और मनीषा के अभिनय से अधिक उनकी खूबसूरती की चर्चा करते हैं. लोगों को प्रीति के डिंपल पसंद हैं. लेकिन अब उनकी फिल्में नहीं.
यश के कुछ अधूरे सपने
हिंदी सिनेमा के किंग आॅफ रोमांस यश चोपड़ा ने 21 अक्तूबर को दुनिया से अलविदा कह दिया. लेकिन अपनी अंतिम विदाई पर उन्हें अपने दर्शकों का भरपूर प्यार मिला. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा कम ही होता है कि आम दर्शक अभिनेताओं के साथ साथ निर्देशकों से भी कनेक्ट हो पायें. लेकिन यश चोपड़ा आम दर्शकों के दिलों तक पहुंचनेवाले निर्देशकों में से एक थे. शायद इसलिए क्योंकि उनकी ही फिल्मों ने प्यार की कई परिभाषाएं सिखायीं. शायद यही वजह भी थी कि मीडिया से बहुत कम मुखातिब होनेवाले यश चोपड़ा की अंतिम विदाई पर उनके ुपार्थिव शरीर के दर्शन के लिए आम दर्शकों को नहीं रोका गया. जिस यशराज स्टूडियो को उन्होंने अपनी मेहनत से सींचा. उसी यशराज स्टूडियो में उनके पार्थिव शरीर को भी रखा गया. और उसी स्टूडियो में. स्टूडियो नंबर 4. जहां एक महीने पहले 27 सितंबर को शाहरुख खान ने अलग अंदाज में यश चोपड़ा के जन्मदिन का जश्न मनाया.यह स्टूडियो हिंदी सिनेमा जगत में ऐतिहासिक माना जायेगा. यश चोपड़ा फिल्मों में जीते थे. फिल्मों के लिए जीते थे. लेकिन अपने जन्मदिन पर ही उन्होंने घोषणा की थी कि जब तक हैं जान उनकी निर्देशित आखिरी फिल्म होगी. चूंकि अब वह चाहते थे कि वे अपनी पत् नी के साथ वक्त गुजारें. दरअसल, शायद ईश्वर ने उन्हें कहीं से यह संकेत दिया था कि वाकई जब तक हैं जान उनकी आखिरी फिल्म होगी. यश साहब अपने जन्मदिन के अवसर पर स्टेज पर जब शाहरुख के साथ बात कर रहे थे. तो नीचे आगे की पंक्ति में ही उनकी पत् नी पामेला चोपड़ा बैठी थीं. वे यश चोपड़ा की बातें सुन कर बार बार मुस्कुरा रहा थीं. शायद उन्हें खुशी थी कि अब उन्हें अपने पति के साथ कुछ वक्त गुजारने का मौका मिलेगा. लेकिन यश साहब का यह सपना अधूरा रह गया. निस्संदेह उन्होंने अपने जीवन में वे तमाम ख्वाहिशें पूरी कीं. जो वे करना चाहते थे. वे फिल्में ही बनाना चाहते थे. सो, उन्होंने बनायी. लेकिन कुछ सपने जो अधूरे रहे. वे जब तक हैं जान के एक गाने की शूटिंग करने स्वीजरलैंड जाना चाहते थे. लेकिन वे जा नहीं पाये. वे अभी और नये युवा तकनीशियन को काम करते देखना चाहते थे. यशराज में. यशराज की और उन्नति देखना चाहते थे. उन्होंने फिल्मों के दृष्टिकोण से तो लगभग सारी ख्वाहिशें पूरी कीं. शाहरुख खान यश चोपड़ा द्वारा दिया गया सबसे बहुमूल्य तोहफा है बॉलीवुड को.हिंदी सिनेमा ने एक बुजुर्ग को खोया है. एक कल्पनाशील शख्सियत जिसकी हिंदी सिनेमा को जरूरत थीं.
20121022
जीत का जश्न है चिटगांव : बेदव्रत
दिल्ली यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएशन के दौरान महसूस किया कि कई लोगों को चिट्टगांव के स्वतंत्रता सेनानी सूर्य सेन के बारे में जानकारी नहीं है. यहां तक कि केबीसी में पूछे गये सवाल पर भी किसी ने इसका जवाब नहीं दिया. उस वक्त बेदाब्राता पेन के जेहन में आया कि स्वाधीनता संग्राम की एक ऐसी कहानी जहां 50 बच्चों ने मिल कर अंगरेजों को खदेर दिया था. इनकी कहानी परदे पर कही जानी ही चाहिए और उनकी इसी कोशिश को उन्होंने फिल्म चिट्टगांव का रूप दिया. चिट्ट्रगांग को न सिर्फ दर्शकों से बल्कि क्रिटिक व कई अंतरराष्टÑीय फिल्मोत्सवों में भी काफी सराहना मिल रही है. पेश है फिल्म के निर्देशक बेदव्रत पेन से हुई बातचीत के मुख्य अंश
बेदव्रत को शुरू से ही परफॉर्मिंग आर्ट्स में दिलचस्पी थी. लेकिन पढ़ाई में होनहार होने के कारण उन्होंने साइंस का क्षेत्र चुना और नासा गये. वहां 15 सालों के कार्यकाल के दौरान तकनीकों को बदलते और आविष्कारों को होते देखा. उस वक्त महसूस किया कि यह जरूरी है कि वे इस तकनीक का और अपने अंदर के टैलेंट्स का इस्तेमाल सही तरीके से करे. सो, वे फिल्म मेकिंग में आये और शुरुआत भी एक बेहद संवेदनशील और इतिहास की महत्वपूर्ण घटना के साथ की.
चिट्ट्रगांग की कहानी में ऐसी कौन सी खास बातें थी. जिसने आपको इस छोटे से गांव पर फिल्म बनाने की प्रेरणा दी?
मैं कोलकाता से हूं और शुरुआती दौर से ही मुझे ऐतिहासिक विषयों में रुचि रही है. मैं चिट्टगांव का इतिहास जानता था और मैं हमेशा यहां की कहानियां सुनता रहता था. सूर्य सेन जैसे आम आदमी ने किस तरह 50 बच्चों की मदद से एक आंदोलन फैलाया. और वे कामयाब भी रहे. मुझे इसी बात से प्रेरणा मिली. आप खुद गौर करें तो इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में भी चिट्टगांव पर ऐसा कुछ खास अध्याय या जानकारी या बहुत अधिक व्याख्या नहीं है. जबकि यहां के लोगों का भी योगदान स्वाधीनता संग्राम में अहम रहा है. अब तक जब भी किसी स्वतंत्रता संग्राम की कहानी दिखाई गयी है. उनमें प्राय: सभी नायक की मौत हो जाती है. फिर चाहे वह मंगल पांडे हो, झांसी की रानी हो या फिर भगत सिंह की कहानी हो. यही कारण है कि मैंने इस विषय को चुना .चूंकि िचट्ट्रगांग जीत की कहानी है. एक ऐसी विक्टरी की कहानी है. जहां आम लोगों ने मिल कर अपनी मेहनत से किस तरह से एकता के साथ अंगरेजों को खदेर दिया. मेरे फिल्म का किरदार झुंकू जो कि केवल पढ़ाई में होनहार था. किस तरह स्वाधीनता के लिए वह बंदूक उठाता है और लड़ता है. इसका जिक्र कहीं भी नहीं मिला करता था. यहां तक कि केबीसी में जब इस पर सवाल किया गया था. कि 1930 में आमी लीड का रिडर कौन था चिट्टगांव में. उस वक्त भी किसी ने इसका जवाब नहीं दिया था. मैं उस वक्त दिल्ली में था और मेरे हिस्ट्री के प्रोफेसर ने भी इसका जवाब नहीं दिया था. उन्हें खास जानकारी नहीं थी. मुझे लगा कि यह बेहद जरूरी है कि ऐसी किसी कहानी को दर्शकों के सामने लाया जाये और यही से मैंने फिल्म की नींव रखीं.
लेकिन कोई भी पीरियड फिल्म बनाना न सिर्फ स्क्रिप्ट के लिहाज से बल्कि बजट के लिहाज से भी बहुत कठिन होता है.
फिर कैसे लिया निर्णय. और प्राय: ऐसी फिल्मों को निर्माता नहीं मिलते और आपकी तो यह पहली शुरुआत थी. तो आपने किस तरह संभावनाएं पैदा की.
जी हां, आपने बिल्कुल सही कहा. शुरुआती दौर में जब मैं यह फिल्म बना रहा था. तब सारे पैसे मेरे खुद के लगे. मैं उस वक्त किसी निर्माता के पास नहीं गया. बजट वाकई बहुत ज्यादा था. लेकिन सबकुछ मैंने खुद से मैनेज किया. हां, लेकिन फिल्म बनने के बाद जब अनुराग कश्यप को मैंने दिखाया तो उन्होंने मेरी फिल्म को सपोर्ट किया, और बाद में बाकी निर्माता भी जुटे. वरना, मैं हर दिन पेन ड्राइव में अपनी फिल्म लेकर घूम ही रहा था. चूंकि कोई भी इस पीरियड फिल्म में हाथ लगाने को तैयार नहीं था.
ऐसे विषयों पर गंभीर शोध और समझ की जरूरत होती है. आपने किस किस माध्यम से शोध किये? साथ ही लोकेशन को तलाशने में कितनी मुश्किलें आयीं.
पीरियड फिल्म बनानी थी और वह भी फिल्म में 1930 का चिट्टगांव नजर आना चाहिए,लेकिन अब चिट्टगांव पूरी तरह बदल चुका है. ऐसे में अगर हम वर्तमान के चिट्टगांव को दर्शाने लगते तो कहानी में कोई वास्तविकता नहीं रहती. सो, हमारे सामने एक बड़ी जिम्मेदारी यह थी कि हमें कोई ऐसा स्थान चाहिए था. जो भूगोल के दृष्टिकोण और कलाकृति में चिट्टगांव की तरह ही दिखे. इस लिहाज से हमें लाटागुड़ी नामक जगह मिली. वही एक गांव दिखा. उस गांव का नाम भी चिट्टगांव था. और वह मेरी कहानी की मुताबिक बिल्कुल फिट बैठ रहे थे. सो, हमने तय किया कि हम यही शूट करेंगे. आपको विश्वास नहीं होगा. फिल्म की कहानी में जिस तरह का आर्किटेक्चर है. वह हूबहू वास्तविक चिट्टगांव से मेल खाता है. यहां तक कि हमने जिस तरह के पेड़ पौधे दिखाये हैं. वह भी उस दौर के हैं. हमने फिल्म की शूटिंग भी 1910 में बने स्कूल में किया है. और इससे उस दौर का माहौल अच्छे तरीके से तैयार हुआ है. हालांकि उस दौर में इतना फाइन कॉटन के कपड़े नहीं मिलते थे. लेकिन हमने अपने किरदारों को फाइन कॉटन कपड़ों में दिखाया है. उस दौर के जो जहाज हुआ करते थे. वैसे जहाज आज मिल पाना संभव नहीं है. सो, वहां भी थोड़ी कमी रह गयी है. साथ ही हमने जो यूरोपियन क्लब फिल्म में दिखाया है. वह जितना बड़ा है. उतना विशाल क्लब नहीं है. लेकिन उसे दिखाना जरूरी इसलिए था, क्योंकि परदे पर फिर वह खास नजर नहीं आ पाता. पीरियड फिल्में बनाने में ये सारी परेशानी आती है कि आप हर छोटी से छोटी चीज को भी उस दौर के अनुसार तैयार करना पड़ता है. िक्रयेट करना पड़ता है. किरदारों के हेयर स्टाइल को लेकर भी हमने काफी बारीकी बरतने की कोशिश की है. उस दौर में किस तरह के हथियार इस्तेमाल होते थे. बाजार में किस तरह के सामान मिलते थे. इन सभी चीजों का ख्याल रखा है. लेकिन माहौल और आर्किटेक्चर के दृष्टिकोण से 1930 का चिट्टगांव ने हमने पूरी तरह दिखाया है. न सिर्फ आर्ट के रूप से बल्कि उस दौर में जो जो घटनाएं हुई हैं. किस तरह हुई हैं. सब दिखाने की कोशिश की गयी है. जहां तक बात है शोध कि तो...चिट्टगांव के आंदोलन के बारे में इतिहास के किताबों में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं दी गयी है. वहां आंदोलन का तो जिक्र है. लेकिन किरदारों के बारे में जिक्र नहीं है कि किरदार किस तरह के थे. किस तरह वे बोलते थे. व्यवहार कैसा था. चूंकि मेरी फिल्म डॉक्यूमेंट्री नहीं थी. सो, यह मेरे लिए बेहद जरूरी था कि मैं किरदारों को दिलचस्प बनाऊं. सो, उस लिहाज से मुझे मुख्य काम अपनी स्क्रिप्टिंग में सारे किरदारों की कहानी व उनके कैरेक्टर स्केच को गढ़ने में हुई. साथ ही हमने फिल्म में सारे बच्चों को नाटागुड़ी से ही चुना है. ताकि हम 1930 का फील दे पायें. मैंने अपनी इस स्क्रिप्ट के लगभग 36 ड्राफ्ट्स बनाये. ताकि मैं अपनी पूरी कहानी के साथ न्यायसंगत कर पाऊं.
चिट्टगांव जैसी फिल्में आज के दौर में कितनी प्रासंगिक हैं?
मुझे लगता है कि ऐसी फिल्में हिंदी में कम बनती हैं. लेकिन इसके दर्शक हैं. हमें अपने इतिहास को जानने में बेहद दिलचस्पी शुरू से रही है. लेकिन िफल्में कम बनती हैं. चूंकि पीरियड फिल्में बनाने में न सिर्फ स्क्रिप्ट बल्कि बजट भी बहुत ज्यादा होना चाहिए. सो, निर्माता ऐसी फिल्मों पर खर्च नहीं करते. दूसरी बात है कि हिंदी सिनेमा में केवळ गिने चुने स्वतंत्रता संग्राम के नायकों की कहानी बार बार दोहरायी जाती है. ऐसा नहीं होना चाहिए. फिल्में ही मेरे ख्याल से सबसे अच्छा हिस्ट्री लेशन बन सकती है. फिल्मों के माध्यम से ही ऐसे अनकहे नायकों की कहानी भी परदे पर आनी चाहिए.
आशुतोष ग्वारिकर की फिल्म खेले हम जी जान से की कहानी भी चिट्टगांव की कहानी से बहुत मेल खाती थी. विषय भी एक था. लेकिन इसके बावजूद आपकी फिल्म को खेले हम जी जान से अधिक पसंद किया गया. क्या कारण हो सकते हैं इसके? क्या क्या खूबियां रहीं चिट्टगांव की?
सबसे खास यह कि हमने जो किरदार में कलाकारों का चयन किया. वह फिल्म की कहानी के साथ न्याय करता है. हम चाहते तो हम भी विज्ञापन से कुछ लड़कों को ले लेते. लेकिन फिर किरदार के साथ न्याय नहीं हो पाता. नवाजुद्दीन सिद्दिकी, मनोज बाजपेयी मेरी फिल्मों की रीढ़ हैं. नवाज से जब मैं एनएसडी में मिला था तो उनसे मिलते ही कहा था कि वे मेरी फिल्म का हिस्सा होंगे. मनोज को जब मैंने एक फिल्म के सेट पर जाकर कहानी सुनायी तो उन्होंने तुरंत हां, कह दी थी. इससे स्पष्ट था कि कहानी में कुछ तो बात है. दूसरी बात हमने फिल्म में उस दौर की कहानी को पूरी तन्मयता और वास्तविकता से परोसने की कोशिश की है. शायद यही वजह रही कि कई वाक्या जो वाकई हुए हैं उन्हें सतही तौर पर न दिखा कर उसे हमने गंभीरता से दिखाया है. सपाट न दिखा कर उसे खास बनाने की कोशिश की. शायद यही वजह रही कि दर्शकों को फिल्म ने अपील किया है. हालांकि आशुतोष जब इस विषय पर फिल्म बना रहे थे. मैंने उनसे आग्रह किया था कि वह इस पर फिल्म न बनाये, क्योंकि उनके पास तो कई विकल्प हैं. लेकिन मैं इस कहानी को लेकर बहुत ज्यादा पैशिनेट था. लेकिन जवाब में मुझे आशुतोष ने कहा कि इसमें कोई परेशानी नहीं कि एक विषय पर दो फिल्में बने. और बाद में फिर उन्होंने फिल्म बनायी. मेरी ख्वाहिश थी कि मेरी फिल्म खेले हम जी जान से पहले रिलीज हो. सिर्फ इसलिए क्योंकि मेरा इस विषय पर टेक भी बिल्कुल अलग था. मैं अपने महत्वपूर्ण किरदार झूनकू रॉय और उसके स्वतंत्रता के लिए उठाये गये कदम. एक आम लड़के से स्वतंत्रता सेनानी में तब्दील होना और फिर किस तरह देश के लिए आंदोलन का हिस्सा बनना , झूनकू रॉय के किरदार को भी मैं उसी अहमियत से दर्शाना चाहता था. जबकि खेले हम जी जान की कहानी मास्टर दा के देहांत पर ही खत्म हो जाती है. लेकिन मुझे अपनी कहानी में स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों की जीत को दिखाना था.
एक्टिंग की लर्निंग पीरियड की स्टूडेंट हूं : आलिया भट्ट
पापा की अपनी प्रोडक् शन कंपनी है. स्थापित भी सफल भी. फिर भी इन्होंने पापा की उंगली पकड़ कर नहीं बल्कि अपने हुनर के बलबूते आगे बढ़ने की कोशिश की. जानकारी मिली कि करन जौहर स्कूल गोइंग टीनएज पर फिल्म बनाने जा रहे हैं. और पहुंच गयीं आॅडिशन के लिए. आॅडिशन में करन ने हरी झंडी दिखायी. लेकिन एक शर्त रखी. शर्त थी कि वजन कम करना होगा. कुछ महीनों बाद जब वह करन के सामने अपने नये अवतार में हाजिर हुईं. करन आश्चर्यचकित थे. लेकिन अब उन्हें देख कर दर्शक भी चकित हैं. बात हो रही है महेश भट्ट की बेटी आलिया भट्ट की, जो अपने अभिनय करियर की पहली शुरुआत फिल्म स्टूडेंट आॅफ द ईयर से कर रही हैं. प्रोमोज और फिल्मों के गाने में आलिया का आत्मविश्वास साफ झलक रहा है. कैसे भट्ट कैंप की बेटी बिना भट्ट कैंप के सहारे अपनी नयी शुरुआत कर रही हैं. आलिया भट्ट से जानने की कोशिश की
आलिया फिलवक्त महज19 साल की हैं. लेकिन फिल्म स्टूडेंट आॅफ द ईयर में वे न अभिनय में केवल आत्मविश्वासी नजर आ रही हैं. बल्कि वे डांस भी बेहतरीन कर रही हैं. करन जौहर के आॅफिस में परदे के पीछे वाली आलिया से मुलाकात हुईं. बेहद ही सौम्य सी मासूम सी दिखनेवाली आलिया अपनी फिल्म को लेकर बहुत उत्साहित हैं. उन्हें विश्वास है कि दर्शकों को उनकी यह फिल्म पसंद आयेगी. बातचीत आलिया से.
भट्ट कैंप की बेटी करन जौहर की फिल्म से शुरुआत कर रही हैं?
मुझे पता था कि मेरे सामने सबसे पहले यही सवाल आनेवाले हैं. जी हां, मैं हमेशा से चाहती थी कि मैं हीरोइन बनूं और आप कह सकते हैं कि इसकी सबसे खास वजह मेरा फिल्मी परिवार ही है. मैं फिल्में बनते देख कर ही बड़ी हुई हूं. लेकिन एक बात मैंने भी तय कर रखी थी कि पापा की फिल्मों से लांचिंग नहीं करूंगी, चूंकि मुझे लगता है कि जितना मुझे करन सर के साथ सीखने का मौका मिला है. उतना मैं पापा के साथ जुड़ कर नहीं सीख पाती. दूसरी बात है शायद मुझे मेरे होम प्रोडक् शन में इतना पैंपरड किया जाता कि मैं कुछ खास कर ही नहीं पाती. सो, मैंने भट्ट कैंप से बाहर से शुरुआत की.
कहीं इसकी वजह यह तो नहीं कि महेश भट्ट जिस स्टाइल की फिल्में बनाते हैं. आप उसमें सहज नहीं.
अभी फिलवक्त मैं बहुतछोटी हूं और ये सब तय कर पाना मेरे लिए बेहद मुश्किल है कि क्या स्टाइल की फिल्में होती हैं. हां, लेकिन मैंने यह तो सोच रखी थी कि मैं अपनी उम्रवाला ही कोई किरदार करूंगी.
करन ने पहला मौका दिया.
कैसे मिला ये मौका. भट्ट साहब की बेटी होने के नाते निश्चित तौर पर आपको
परेशानियां कम झेलनी पड़ी होगी?
आपको ऐसा लगता है. लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है. मैंने इस फिल्म के लिए बहुत मेहनत की है. बाकियों की तरह ही मुझे भी आॅडिशन देने पड़े. करन सर फिल्म बनानेवाले हैं. यह जानकारी मिली मुझे तो मैं स्कूल से ही सीधे वहां आॅडिशन के लिए पहुंच गयी थी. इसके बाद करन सर ने मुझसे कहा कि मैं अपना वजन घटाऊं. फिर उन्होंने ही मुझे डायटीशियन दिया. मैं मानती हूं कि करन सर मेरे मेंटर हैं. दूसरी बात यह है कि मैं बचपन से इस इंडस्ट्री को देखती आ रही हूं. मैं जानती हूं कि यहां आपको भट्ट सरनेम की वजह से मौके मिल सकते हैं. लेकिन टैलेंट तो खुद ही साबित करना होता है. आज इंडस्ट्री में सरनेम मैटर ही नहीं करता. मेरे को स्टार सिद्धार्थ तो फिल्मी खानदान से है ही नहीं. लेकिन उनमें टैलेंट है तो उन्हें भी मौका मिला न. तो मैं नहीं मानती कि भट्ट सरनेम ही मेरे लिए जैकपॉट है.
तो आलिया फिर ये भी बताएं कि एक इंडस्ट्री के स्थापित निर्देशक निर्माता की बेटी होने के नुकसान क्या क्या है?
मुझे तो लगता है कि नुकसान ही ज्यादा है. चूंकि आप हमेशा मेरी काबिलियत पर शक करोगे. लोगों को यही लगेगा कि अरे उसने काम नहीं किया. भट्ट साहब की बेटी है तो काम मिल रहा है. जबकि सच यह है कि हमें भी उतनी ही मेहनत करनी पड़ती है. क्योंकि हम पर तो जिम्मेदारियां भी हैं. अगर कोई गलत स्टेप लिया तो बस जगहंसाई शुरू.
आलिया अभी बॉलीवुड में नयी हैं तो किस तरह का बर्ताव है इंडस्ट्री के बाकी लोगों का आपसे.
मुझे बेहद खुशी है कि लोग मुझे नोटिस कर रहे हैं. एक दिन मैं कार में थी. ट्रैफिक में. सामने होर्डिंग में मेरे पोस्टर लगे थे. और कोई दूसरे कार में दो लड़कियां आपस में बातचीत कर रही थीं कि आलिया बेहद क्यूट है. और फ्रेश चेहरा लग रहा है. लगता है चलेगी. बतौर नयी अभिनेत्री मुझे पहली बार बेहद खुशी हुई कि अब लोग मेरी भी चर्चा कर रहे हैं. तो लोगों को मुझमें गुंजाईश नजर आ रही है. रही बात इंडस्ट्री के लोगों की तो सभी सीनियर का बेहद सपोर्ट मिल रहा है. सलमान खान, शाहरुख खान, काजोल सभी जिन्हें मैंअपना आइडिल मानती थी. सभी को मुझसे उम्मीदें हैं. हाल ही में अमित अंकल के बर्थ डे पार्टी में गयी थी. वहां भी जिन्होंने मुझसे मुलाकात की. सभी ने मुझे शुभकामनाएं दीं.माधुरी जी से मिल कर मुझे खासतौर से अच्छा लगा क्योंकि उन्हें मुझे कई चीजें समझायी. एक बड़ी बहन की तरह. उन्होंने मेरा डांस पसंद किया.
डांस की बात छिड़ी है तो हम जानना चाहेंगे कि फिल्म में आप बहुत कांफिडेंट लग रही हैं डांस को लेकर. आपने
डांस की कोई खास ट्रेनिंग ली है?
जी हां, मुझे हमेशा से डांसिंग का शौक रहा है और मैंने क्लासिकल डांस की ट्रेनिंग ली है. मैं डांस को बेहद एंजॉय करती हूं.
पापा महेश भट्ट से किस तरह के टिप्स मिले हैं?
उन्होंने बस मुझे इतनी ही राय दी है कि फिल्म एक बिजनेस है और तुम्हें हर तरीके से इस रेस का घोड़ा बनना होगा. वैसे मैं उत्साहित हूं कि फिल्म रिलीज के बाद उनके क्या कमेंट्स आते हैं.
आपके को स्टार वरुण धवन और सिद्धार्थ के बारे में बताएं
इन दिनों को मैं अपना सीनियर मानती हूं क्योंकि वरुण और सिद्धार्थ ने पहले करन सर के साथ माइ नेम इज खान में अस्टिट किया है तो वे फिल्म मेकिंग से बेहद वाकिफ थे. दोनों ने ही मेरा बहुत ख्याल भी रखा. दोनों बेहतरीन एक्टर हैं.
फिल्म में आपका किरदार क्या है. और कहानी किस तरह की है. आप खुद कितना किरदार से जुड़ाव महसूस कर पायी हैं. क्या आपके स्कूल डेज की कुछ यादें इस फिल्म के माध्यम से तरोताजा हुईं.
स्टूडेंट आॅफ द ईयर तीन दोस्तों की कहानी है. तीनों अच्छे दोस्त हैं. लेकिन उनकी जिंदगी में जब एक प्रतियोगिता होती है और सबकुछ बदल जाता है. ये फिल्म युवाओं को बेहद पसंद आयेगी. मैं इसमें सान्या सिंघानिया का किरदार निभा रही हूं. और जहां तक बात है यादों की तो बिल्कुल. अभी भी मैं स्कूल में ही हूं और स्कूल में हम जिस तरह की मस्ती करते हैं. फिल्म में वैसी मस्तियां हैं तो मैं बहुत हद तक रिलेट कर पायी हूं.
कॉलेज व स्कूल पर पहले भी फिल्में बनती रही हैं. आपकी पसंदीदा फिल्में?
मुझे आज भी कुछ कुछ होता है बेहद पसंद है. मैंने इसे कम से कम 60 बार देखी होगी. यही वजह थी कि जब मुझे करन सर के साथ काम करने का मौका मिला तो मैं बेहद खुश थी. मुझे लगता है कि अब तक की वह बेस्ट फिल्म है दोस्ती पर. इसके अलावा मुझे खिलाड़ी फिल्म भी बेहद पसंद है.
आपकी पहली फिल्म है तो रेफरेंस के तौर पर करन ने क्या क्या टिप्स दिये थे.
उन्होंने बस यही कहा था कि जिस तरह तुम वास्तविक जिंदगी में कूल रहती हो और मासूम हो. वैसे ही रहना. कोई एक्टिंग करने की जरूरत ही नहीं.
फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बनने से पहले और अब हिस्सा बनने के बाद कितना अंतर महसूस कर रही हैं.
पहले सिर्फ शूटिंग देखा करती थी और अब जब काम कर रही हूं तो लगता है कि वाकई कितनी मेहनत करनी पड़ती है. एक एक शॉट को ओके करने के लिए निर्देशक कलाकार सभी कितनी मेहनत करते हैं. यह सब बिल्कुल नया है. साथ ही कभी बहुत ग्लैमरस तरीके से नहीं रही मैं और अभी प्रोमोशनल इवेंट्स का हिस्सा बनना. मीडिया के सामने आकर उनसे बातचीत करना. उनके हर सवालों का जवाब देना टफ तो है. लेकिन अच्छा फेज है. लर्निंग पीरियड है मेरा. लंबा सफर तय करना है.
आपको कभी स्टूडेंट आॅफ द ईयर बनने का मौका मिला है? वास्तविक जिंदगी में
नहीं, हां, लेकिन मैं कल्चर एक्टिविटिज में हमेशा भाग जरूर लेती रहती हूं. वैसे मैं पढ़ाई में बहुत अच्छी नहीं.
हमने सुना आप फिल्म टू स्टेट्स में भी मुख्य भूमिका में होंगी?
नो कमेंट्स.
आपकी नजर में स्टूडेंट आॅफ द ईयर बनने के लिए किसी स्टूडेंट में क्या क्या क्वालिटी होनी चाहिए.
मेरी समझ से सबसे पहले एक अच्छा स्टूडेंट वही होता है जो ईमानदार हो और अनुशासित हो और खुद प्रतियोगिता जीतने के लिए दूसरों को हराने की कोशिश न करे.
आप खुद को किस तरह का स्टूडेंट मानती हैं.
फिलवक्त मैं एक्टिंग की लर्निंग क्लास की अमैच्योर स्टूडेंट हूं.
एक्स्ट्रा शॉट
आलिया की पहली शुरुआत फिल्म संघर्ष से हुई थी. इस फिल्म में आलिया ने बाल कलाकार की भूमिका निभाई थी. उन्होंने प्रीति जिंटा का बचपन का किरदार निभाया था.
आलिया ने स्टूडेंट आॅफ द ईयर में मुख्य भूमिका निभाने के लिए उन्होंने लगभग तीन महीने में 16 किलो वजन घटाया. आलिया को रणबीर कपूर बेहद पसंद हैं और वे रणबीर के साथ काम करना चाहती हैं
आलिया ने भरतनाटयम के साथ साथ शामक डाबर से डांस सीखा है.
फिल्म के एक गीत राधा...में आलिया के बेहतरीन लुक को देख कर उन्हें इंटरनेशनल ग्लैमर मैग्जीन के कवर पर आने का मौका मिला है.
लगभग 500 लड़कियों के आॅडिशन में आलिया का चुनाव हुआ.
अभिनेत्रियों में उन्हें करीना, दीपिका और काजोल बेहतरीन एक्ट्रेस लगती हैं. माधुरी उनकी आदर्श हैं
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