20120802

छोड़ जायेंगे ये जहां तन्हा


सुप्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी का जन्मदिवस 1 अगस्त को मनाया गया. हिंदी सिनेमा में ऐसी अभिनेत्रियों की संख्या कम हैं. जिन्हें उनके चले जाने के बाद भी लोग शिद्दत से याद करते हैं. कायदे से मीना कुमारी पर 1 अगस्त को उनके जन्मदिन के अवसर पर लिखा जाना चाहिए था. लेकिन मैंने आज का दिन इसलिए चुना, क्योंकि मैं मीना कुमारी की वर्तमान में उनके जन्मदिन और उनकी प्रासंगिकता को देख कर इस पर विचार व्यक्त करना चाहती थी. और उम्मीद के अनुसार मुङो मीना कुमारी की प्रासंगिकता और आज भी बरकरार उनकी लोकप्रियता का प्रमाण मिला. मुंबई के सांताक्रूज स्टेशन से बिल्कुल नजदीक में मीना कुमारी के प्रशंसकों ने मीना कुमारी का शानदार तरीके से जन्मदिन मनाया. इस मौके पर मीना कुमारी द्वारा लिखे गये गजल को सुनाया गया. विशेष कर चांद तन्हा है आसमां तन्हा गजल को श्रोताओं ने बेहद पसंद किया. दरअसल, इस गजल में मीना कुमारी की पूरी जिंदगी का हाले बयां सुनाई देता है. एक एक शब्द उनकी जिंदगी की परतें खोलते हैं. हर पंक्ति में उन्होंने तन्हा तन्हा शब्द का इस्तेमाल किया है.ठीक अपनी जिंदगी की तरह. यह सच है कि मीना कुमारी ने कम जिंदगी जी और वाकई सिमटा सिमटा सा उनका मुकाम भी रहा. लेकिन मीना ने अपनी जिंदगी में कई लोगों की मदद की. इनमें अभिनेत्री नरगिस भी हैं. नरगिस जब शूटिंग पर जाती थीं तो वे अपने बच्चों को मीना की देख रेख में ही छोड़ जाती थीं. वहीदा बताती हैं कि किस तरह मीना ने उन्हें अभिनय में गाइड किया. बलराज साहनी ने अपनी आत्मकथा में जिक्र किया है कि एकमात्र मीना कुमारी ही अभिनेत्री थीं, उस दौर में जिन्होंने बलराज से आकर उनके कान में कहा था कि वे बेहतरीन अभिनेता बन सकते हैं. दरअसल, मीना इस दुनिया में दूसरों को खुशियां देने आयी थी. और इस दुनिया से तन्हा जाने के लिए ही.

20120730

मर्यादापुरुषोतम नायक की छवि


कुछ दिनों पहले निर्देशक अनुराग बसु से बातचीत हो रही थी. बातों बातों में शाइनी अहूजा की बात छिड़ी. बतौर अभिनेता शाईनी को अनुराग ने ही अपनी फिल्म गैंगस्टर से लांच किया था. फिर उन्हें लाइफ इन मेट्रो में भी मौका दिया.वास्तविक जिंदगी में बनी अपनी नकारात्मक छवि के कारण इन दिनों बॉलीवुड में मौके नहीं मिल रहे हैं. अनुराग को इस बात का दुख था कि एक अच्छे अभिनेता को काम नहीं मिल रहे हैं. दरअसल, शाईनी बेहतरीन होते हुए भी अब फिल्मों में एक नायक के रूप में खुद को साबित कर पाने की स्थिति में नहीं हैं. चूंकि भारत में विशेष कर हिंदी सिनेमा के दर्शक अपने फिल्मों के नायक में भी पुरुषोत्तम श्री राम को तलाशते हैं.वे जिस तरह से उन्हें परदे पर देखते हैं. वे चाहते हैं और भारत की आधी आबादी यही सोचती भी है कि फिल्मों में सकारात्मक दिखने और इंसाफ न्याय के लिए लड़नेवाला उनका नायक वास्तविक जिंदगी में भी ऐसा ही होगा. यही वजह है कि अगर इसके विपरीत उन्हें वास्तविक जिंदगी में अपने नायक की नकारात्मक छवि देखने को मिलती है तो वे जिस तरह नायक को पलकों पर बिठाते हैं पलक झपकाते ही उन्हें उतार भी देते हैं. यही वजह है कि अभिनेता अभिनेत्री कभी अपनी गलत छवि लोगों के सामने प्रस्तुत नहीं करना चाहते. विवेक ओबरॉय दो फिल्मों के बाद ही कामयाब हो गये थे. लेकिन उनपर स्टारडम का भूत चढ़ गया था. वे अपने सीनियर के साथ भी बदतमीजी-मारपीट करते थे. आज आलम यह है कि उन्हें न तो मीडिया पसंद करती है न ही दर्शक . एक नायक की परदे से इतर वास्तविक छवि ही होती है कि वह मरने के बाद भी वे उसी रूप में याद किये जाते हैं. दिलीप साहब व कई लीजेंडरी आज सक्रिय नहीं. लेकिन जब भी उनकी बात होती है तो इज्जत से सभी का नाम लिया जाता है. चूंकि अंतत: सम्मान ही  आपकी   सबसे अहम पूंजी होती है.

और भूत बंगला बना काका का आशीर्वाद


राजेश खन्ना की मृत्यु के बाद कयास लगाये जा रहे हैं कि उनकी बेटियां उनके बंगले आशीर्वाद को राजेश खन्ना म्यूजियम में बदल देंगी. फिलवक्त कुछ तय नहीं है.  कुछ दिनों पहले राजेश ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि मेरी बेटियां सुखी संपन्न हैं. उन्हें मेरे बंगले या प्रॉपर्टी की जरूरत नहीं. लेकिन यह उन पर निर्भर करता है कि वे इसका क्या करती हैं. लेकिन मेरे लिए आशीर्वाद धरोहर है और रहेगा. शायद राजेश की बेटियां अपने पिता की इस धरोहर को सहेज कर रखें. चूंकि पिता की धरोहर को सहेज कर रखना उनके औलाद की ही जिम्मेदारी है. आशीर्वाद हमेशा ही हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार के महल के रूप में याद किया जायेगा. फिल्म हाथी मेरे साथी की साइंिनंग अमाउंट से ही राजेश खन्ना ने यह बंगला खरीदा था. जिस वक्त फिल्म रिलीज हुई थी. उस वक्त  काका चेन्नई में थे. काका ने फोन पर अपने साथी अभिनेता रुपेश कुमार से पूछा कि फिल्म कैसी चल रही है. रुपेश ने उन्हें बताया कि काका धमाल हो रहा है. समझ लीजिए ऊपर आका नीचे काका. उस वक्त से इस खुशखबरी के बाद काका ने रुपेश कुमार को कार गिफ्ट कर दी थी.यह बंगला कभी भूत बंगला माना जाता था. इस बंगले के कोई खरीददार नहीं मिल रहे थे. उस वक्त जुबली कुमार राजेंद्र कुमार ने इस घर को खरीदने की हिम्मत जुटायी.डिंपल नाम रखा बंगले का.इस बंगले में रहते हुए ही राजेंद्र जुबली स्टार बनें. लेकिन भूत बंगले की बात उनके जेहन में भी थी. सो, उन्होंने पाली हिल में घर खरीदते ही इसे राजेश को बेंच दिया. राजेश मानते थे कि जिस तरह राजेंद्र को इस बंगले से कामयाबी मिली. उन्हें भी मिलेगी और ऐसा हुआ भी. पहले सुपरस्टार का जन्म हुआ काका के आशीर्वाद थे. अंतिम दिनों में भी आशीर्वाद की छत पर ही आकर काका ने अपने प्रशंसकों का अभिवादन किया था.

20120726

वुमनिया ब्रिगेड











फिल्म कॉकटेल की डायना पेंटी ने दीपिका पादुकोण से अधिक लोकप्रियता हासिल की. फिल्म बर्फी में प्रियंका चोपड़ा के साथ साथ इलेना को भी कहानी में खास जगह मिली है. स्नेहा खानवेलकर का संगीत धूम मचा रहा है तो गीता शिंदे और बेला सेहगल अपनी अलग सोच की फिल्मों के साथ तैयार हैं. विकी डोनर हिट हुई तो शूजीत ने इस सफलता का सेहरा अपनी महिला लेखिका जूही चतुव्रेदी के सिर पर बांधा. फिल्म शांघाई में जितनी सोच दिबाकर की थी. उतनी  ही मेहनत और एंगल कहानी में उर्मि जुवेकर ने भी दिया है. स्पष्ट तौर पर नजर आ रहा है कि बॉलीवुड में अब महिलाओं की एक नयी फौज तैयार हो रही है और यह फौज कुछ लीक से हट कर करने में यकीन कर रही है. सितारों की इस दुनिया में ये महिलाएं अलग तरीके से अपनी पहचान स्थापित कर रही हैं और लोगों द्वारा इनकी सराहना हो रही है. फिर चाहे वह अभिनय के क्षेत्र में हो, संगीत के क्षेत्र में या फिर लेखन या निर्देशन के क्षेत्र में.बॉलीवुड की इस नयी महिला ब्रिगेड पर अनुप्रिया अनंत की रिपोर्ट


अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा अभी भी मानती हैं कि बॉलीवुड इंडस्ट्री पर हमेशा पुरुष वर्ग हावी रहेगा. यह बहुत हद तक सही भी है. चूंकि पिछले कई सालों से इस इंडस्ट्री में जितनी जल्दी पहचान स्थापित करने में पुरुष कामयाब होते हैं. उतनी जल्दी लड़कियां नहीं और अगर लड़कियां पहचान स्थापित कर भी लेती हैं तो उनको लेकर कई तरह की बातें बनाई जाती हैं. ऐसे में कुछेक महिलाएं ही होती हैं जो अपनी पहचान स्थापित कर लेती हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों से यह दौर बदल रहा है. विशेष कर वर्ष 2012 की बात करें तो हर क्षेत्र में महिलाएं एक अलग ही रूप प्रस्तुत कर रही हैं. बिल्कुल आम दिखनेवाली महिला या बिल्कुल अपरिचित महिला अचानक अपने काम से लोकप्रिय हो जा रही हैं. प्रियंका चोपड़ा, दीपिका पादुकोण की श्रेणी में आकर डायना लोगों को चौंकाती हैं तो संगीत पर पुरुषाधिकार को ठेंगा दिखाती स्नेहा खानवलकर सबको दरकिनार कर आगे बढ़ती हैं. जब बुद्धिजीवी होने की बात आती है तो दिबाकर के साथ साथ उनकी लेखिका उर्मि का भी नाम आता है. यह साफ तौर पर तसवीर खींचती है कि अब बॉलीवुड में नये दौर में अलग तरीके से महिलाएं प्रतिनिधित्व कर रही हैं. ग्लैमर, फिल्मी खानदान न होने के बावजूद वे लगातार अपनी पहचान स्थापित कर रही हैं. ऐसा नहीं है कि महिलाएं पहले से सभी क्षेत्रों में सक्रिय नहीं हैं. लेकिन इस वर्ष अचानक से कई महिलाओं को उनके अनछुए क्रेडिट भी मिल रहे हैं. जिसकी वह हकदार हैं. उन्हें वह सराहना मिल रही है.
स्नेहा खानवलकर : टुंगटुंग दा साउंड करदा
एमटीवी ट्रिफिन पर कुछ दिनों पहले से स्नेहा खानवलकर एक कार्यक्रम आ रहा है. इसमें स्नेहा अपने संगीत के सफर को वाकई सफर में तलाशती हैं और गांव गांव जाकर अलग अलग तरह की चीजों को लेकर संगीत बना रही हैं. नये लोगों को तलाश रही हैं. उनके ट्रिफिन का गीत टुंगटुंग दा साउंड करदा बेहद लोकप्रिय हो रहा है. दरअसल, स्नेहा खुद भी टुंगटुंग सी ही हैं. मतलब वे थोड़ी अनसुलझी सी हैं. जो बिल्कुल समझ से परे हैं. लेकिन उनका संगीत आज पूरे भारत में लोकप्रिय हैं. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर 1- और जल्द ही रिलीज होने जा रही फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर 2 के गीत लगातार लोकप्रिय हो रहे हैं. इस फिल्म के संगीत को खास बनाना का श्रेय उन्हें ही जाता है. भारत में लड़कियां संगीत के क्षेत्र में नहीं आतीं. हिंदी सिनेमा जगत में जद्दनबाई, उषा खन्ना जैसे कुछेक नामों को छोड़ दें तो एक स्थापित म्यूजिक निर्देशक के रूप में स्नेहा ने अपनी पहचान स्थापित कर ली है.प्राय: लोगों का मानना होता है कि लड़कियां इनोवेटिव नहीं होतीं. जबकि स्नेहा ने तो इनोवेशन की सारी सीमाएं ही तोड़ दी है. उन्होंने एक राह चुन ली है. स्नेहा शुरुआती दौर से ही गाने की शौकीन  रहीं. वे कविताएं भी धुन पर याद करती थीं. स्नेहा के चेहरे पर एक अलग तेज हैं. वह ऐसी बेफिक्र और बोल्ड लड़की हैं कि गाने की रिकॉर्डिग के वक्त जरूरत पड़ने पर वे किसी पुरुष से भी भीड़ गयीं. वे लड़की हैं लेकिन फिर भी ऐसे स्थानों पर जाती हैं जहां वह असुरक्षित हैं. लेकिन वे कहती हैं कि उन्हें पता है कि वे परेशानियों को हैंडल कर सकती हैं.स्नेहा का बनाया गीत वुमनिया. वाकई उन पर सबसे सटीक बैठता है. वह वाकई खास वुमनिया हैं बॉलीवुड की आनेवाली पीढ़ी की.
जूही चतुव्रेदी : विकी डोनर की मां
जी हां, यहां जूही चतुव्रेदी को विकी डोनर की मां इसलिए कहना उचित होगा. चूंकि जूही चतुव्रेदी ने  विकी डोनर की फिल्म की कहानी को जन्म दिया है. इस फिल्म से इन्हें इतनी लोकप्रियता मिली है कि शेखर कपूर जैसे निर्देशक ने उन्हें अपने साथ फिल्म लिखने का अवसर दिया है. जूही चतुव्रेदी ने कभी विकी डोनर की कहानी अपने पहले बॉस पीयुष पांडे को दिखाई थी और कहा था कि यह फिल्म नहीं बन सकती यह तो एक विज्ञापन की कहानी है. लेकिन उसी वक्त शूजीत को कुछ ऐसी ही कहानी की जरूरत थी. उस वक्त जूही ने शूजीत से मुलाकात की. और शूजीत को यह नया आइडिया बेहद पसंद आया. फिर दोनों साथ बैठे और लगातार काम किया. इसी क्रम में नयी कहानियां जुड़ती गयीं. और फिर इस कहानी ने फिल्म का रूप लिया. जूही शूजीत की एक और फिल्म जिसमें अमिताभ अभिनय कर रहे हैं. उसे लिखने में व्यस्त हैं. जूही ने फिल्म की दो महिला विकी की दादी और मम्मी को काफी अलग दिखाया है. यह दर्शाता है कि जूही चतुव्रेदी जैसी महिलाएं किरदारों में भी महिलाओं की छवि को बदल रही हैं.
उर्मि जुवेकर : शांघाई का स्तंभ
उर्मि जुवेकर ने दिबाकर बनर्जी के साथ मिल कर शांघाई लिखी है. दिबाकर मानते हैं कि शांघाई उर्मि और उनके दोनों की सोच के सौंजन्य से बनी. उर्मि और दिबाकर ने मिल कर शांघाई के लिए कई ड्राफ्ट लिखे. फिल्म ओये लकी के बाद दिबाकर ने उर्मि से कहा कि वह जी जैसी एक पॉलिटिकल फिल्म बनाना चाहता हैं. उर्मि चाहती थीं कि वह जी की तरह कोई फिल्म लिखे. सो, उन्होंने दिबाकर को कहा. फिर तय हुआ दोनों ने साथ सोचना शुरू किया और मिल कर शांघाई बनी. उर्मि जुवेकर ने इससे पहले ओये लकी लकी ओये, रुल्स और आइएम भी बतौर स्क्रीन राइटर लिख चुकी हैं.
ऐलियाना डिक्रूज : बर्फी -सी मीठी
ऐलियाना डिक्रूज अनुराग बसु की फिल्म बर्फी में प्रियंका चोपड़ा व रणबीर कपूर के साथ नजर आ रही हैं. यह बॉलीवुड में उनकी पारी की शुरुआत है और अभी  फिलवक्त फिल्म के केवल प्रोमो जारी किये गये हैं. लेकिन फिल्म के ट्रेलर में ही ऐलियाना प्रियंका को टक्कर देती नजर आ रही हैं. यह दर्शाता है कि हिंदी फिल्मों में अब धीरे धीरे दो अभिनेत्रियोंवाली फिल्मों में भी कोई नया चेहरा अपने शानदार अभिनय से दर्शकों का ध्यान खींच सकता है. इस फिल्म में प्रियंका से अधिक ऐलियाना को लेकर दर्शकों में रुचि है. ऐलियाना तेलुगु फिल्मों में काम कर चुकी हैं. वे मुंबई से ही हैं. उन्हें तेलुगु फिल्मों में सराहना मिलती रही है. अनुराग खुद मानते हैं कि ऐलियाना काफी मैच्योर अभिनेत्री हैं. वे वर्सेटाइल हैं. हिंदी फिल्मों में उनका भविष्य उज्जवल है.
डायना पेंटी : कॉकटेल की मीरा
डायना पेंटी ने फिल्म कॉकटेल से शुरुआत की है और फिल्म की रिलीज से पहले से ही उन्होंने खासी लोकप्रियता हासिल कर ली थी. फिल्म देखने के बाद दर्शकों को वह भा गयी हैं. वे फिल्म में दीपिका को टक्कर देती नजर आयी हैं. और दर्शकों को उनका सीधा साधा अंदाज बेहद पसंद आया है. हिंदी फिल्मों में अभिनय के लिए उन्हें इस फिल्म के बाद से कई ऑफर मिल रहे हैं. फिल्म कॉकटेल में उन्होंने अपने अभिनय को ही नहीं अपनी डांसिंग स्कील को भी दर्शाया है.
गौरी शिंदे : इंग्लिश विंग्लिश
गौरी शिंदे आर बाल्की की पत् नी है. फिलहाल लोग उन्हें भले ही आर बाल्की की पत् नी के रूप में जानें. लेकिन फिल्म की रिलीज होने की देरी है. वे फिल्म इंग्लिश विंग्लिश से अपने निर्देशन करियर की शुरुआत कर रही हैं. और इसी फिल्म से वे श्रीदेवी की वापसी स्क्रीन पर करवा रही हैं. फिल्म के प्रोमो ने जिस तरह दर्शकों की सराहना बटोरी है और गौरी ने जिस तरह से अलग तरीके से फिल्म का सेंसर सर्टिफिकेट का इस्तेमाल करके बिल्कुल अद्वितीय प्रोमो बनाया है. वह दर्शाता है कि फिल्म कितनी अलग है. और श्रीदेवी की वही ताजगी फिर से स्क्रीन पर नजर आ रही है. यह एक निर्देशिका की अलग सोच को दर्शाती है. निस्संदेह गौरी आनेवाले समय में महत्वपूर्ण महिला निर्देशकों में से एक होंगी जो लीक से हट कर फिल्में बनाती नजर आयेंगी.
बेला सेहगल : शीरी फरहाद की लव गुरु
बेला सेहगल जैसी महिला निर्देशिका जिन्होंने अभिनेत्री के रूप में किसी प्रचलित अभिनेत्री की बजाय किरदार की डिमांड को देखते हुए फराह खान को चुना है. जो कि एक कोरियोग्राफर हैं और निर्देशिका हैं. दो ढलती उम्र के लोगों को लेकर फिल्म की कहानी सोचनेवाली बेला दर्शाती हैं कि वे सोच के विपरीत, ट्रैक के विपरीत काम करनेवालों में से हैं. इसके बावजूद कि आज स्टार का बोल बाला है. वे बिल्कुल विपरीत सोच के साथ रिस्क ले रही हैं. आनेवाले समय में महिला निर्देशकों में अलग तरह की सोच रखनेवालों में वे भी महत्वपूर्ण रूप से शामिल होंगी.
ऋचा-हुमा कुरेशी : वासेपुर की खोज
ऋचा चड्डा ने भले ही फिल्म ओये लकी लकी ओये में अभिनय किया है. लेकिन उन्हें पहचान मिली फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर से. फिल्म में मनोज बाजपेयी की पत् नी का महत्वपूर्ण और सशक्त किरदार निभा कर उन्होंने साबित कर दिया है कि वे फिल्मी खानदान से न होते हुए भी खास पहचान स्थापित कर सकती हैं. अपने अभिनय के दम पर. इसी फिल्म से प्रभावित होकर उन्हें मीरा नायर की फिल्म में भी काम करने का मौका मिल रहा है. फिल्म गैंग्स में ही नयी अदाकारा के रूप में नजर आनेवाली प्यारी सी हुमा कुरेशी भी आनेवाले समय में अभिनेत्रियों को चेहरा बनेंगी. दोनों ही भागों में उनके किरदार से दर्शक प्रभावित नजर आ रहे हैं. हूमा की मासूमियत और खूबसूरती का कॉकटेल उन्हें बॉलीवुड की खास अभिनेत्रियों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देगा.

20120725

बहुत-बहुत शुक्रिया, थैंक यू और मेरा बहुत बहुत सलाम।...

kaka ka unke chahne walon ke liye messege.
source : db and ndtv
http://www.youtube.com/watch?v=t7xwuAVDbH0

 मेरे प्‍यारे दोस्‍तों, भाइयों और बहनों। नोस्‍टैल्जिया में रहने की आदत नहीं है मुझे। हमेशा भविष्‍य के बारे में ही सोचना पड़ता है। जो दिन गुजर गया है, बीत गया है, उसका क्‍या सोचना, लेकिन जब जाने पहचाने चेहरे अनजान से एक महफिल में मिलते हैं तो यादें वापस ताजा हो जाती हैं


मेरा जन्‍म थियेटर से हुआ। मैं आज जो कुछ भी हूं ये स्‍टेज, ये थियेटर की बदौलत हूं। मैं जब फिल्‍मों में आया तो मेरा कोई गॉडफादर नहीं था। कोई रिश्‍तेदार नहीं थे। कोई सिर पर हाथ रखने वाला नहीं था। मैं यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स फिल्‍मफेयर टैलेंट कॉन्‍टेस्‍ट के जरिये आया। हमको टाइम्‍स ऑफ इंडिया में बुलाया गया था। वहां पर बड़े बड़े प्रोड्यूसर्स थे। चाहे वो चोपड़ा साहब थे, बिमल रॉय थे, शक्ति सामंत थे, बहुत सारे थे। उन्‍होंने कहा कि हमने आपको डायलॉग भेजा है, वो याद किया आपने? मैं सामने बैठा था और वो एक बड़ी सी टेबल में लाइन में बैठै थे.मुझे ऐसा लग रहा था कि कोर्ट मार्शल हो रहा है। जैसे ये बंदूक निकालेंगे और मुझे मार देंगे। मैंने कहा कि डायलॉग तो याद है लेकिन ये जो डायलॉग है, ये आपने नहीं बताया कि इसका कैरेक्‍टराइजेशन क्‍या है कि ये हीरो जो है वो अपनी मां को बताता है कि मैं एक नाचनेवाली से शादी करना चाहता हूं और उसको तेरी घर की बहू बनाना चाहता हूं। मैंने कहा, आपने ना कैरेक्‍टर बताया मां का, ना हीरो का कि भई अमीर है, गरीब है, मां गरीब है, मां सख्‍त, कड़क है, नरम है, मिडिल क्‍लास है, आदमी पढ़ा लिखा या अनपढ़ है? तो चोपड़ा साहब ने झट से कहा कि आप थियेटर से हो


हां जी. मैंने कहा, डायलॉग तो आपने भेज दिया किस तरह मां को कन्‍विंस करना है, डायलॉग बोलना है, आपने कैरेक्‍टराइजेशन नहीं बताया। ये तो कोई स्‍टेज का एक्‍टर ही बोल सकता है। तो बोले ठीक है, अच्‍छा है, तुम कोई अपना ही डायलॉग सुनाओ। अब काटो तो खून नहीं, पसीना छूट रहा था। मैंने कहा, क्‍या डायलॉग बोलूं, मेरे सामने बड़े बड़े लोग, इनकी सब पिक्‍चर 10-10 बार देखी है, प्रोड्यूस-डायरेक्‍ट की हुई। जो डायलॉग, जिसकी वजह से मैं फिल्‍मों में आया, मुझे जीपी सिप्‍पी ने चांस दिया 40 साल पहले, 'हां मैं कलाकार हूं, हां मैं कलाकार हूं, क्‍या करोगे मेरी कहानी सुनकर'


दोस्‍तों आपका एक हिस्‍सेदार मैं भी हूं और जैसे मैंने पहले भी कहा कि आप अपना कीमती वक्‍त निकालकर, आपका ये प्‍यार था कि आप मौजूद हुए और इतनी भारी संख्‍या में... मैं यहीं कहूंगा कि बहुत-बहुत शुक्रिया, थैंक यू और मेरा बहुत बहुत सलाम।

20120724


मेरा पहला फिल्मी प्रीमियर: लाइफ इन अ मेट्रो @ पीवीआर जूहू



फिल्मी प्रीमियर की तसवीरें अखबारों व टीवी में देखती सुनती रहती थीं. मन
में कई तरह की जिज्ञासाएं थीं. लेकिन दो दिनों के मुंबई भ्रमण के पहले ही
मौके पर प्रीमियर में जाने का मौका मिल जायेगा. यह सोचा नहीं था. वर्ष
2007 की बात है. मैं और मेरे दोस्त पुणो आये थे. हमारी एक डॉक्यूमेंट्री
फिल्म का चयन एफटीआइआइ प्रभात फिल्मोत्सव में हुआ था.  सो, उसी दौरान
पहली बार दरअसल, महाराष्ट्र में पहला कदम रखा था.5 दिनों का आयोजन था.सो,
हमने फिल्मोत्सव से वक्त निकाल कर मुंबई का कार्यक्रम बनाया. मुंबई में
परिवार के कई सदस्य रहते हैं. सो, हम मिलने मिलाने चले आये. पहले यही
योजना थी कि एक दिन में सबसे मिल कर चले आयेंगे. लेकिन हम भूल गये थे कि
हम आ रहे हैं मुंबई शहर. जहां बनी बनाई योजनाएं भी फेल हो जाती हैं और पल
में क्या बदल जाता है. पता नहीं रहता. सो, हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ.
मुंबई आये. दिन बुधवार था. दादर के बस स्टैंड पर आकर रुकी थी पुणो से
हमारी बस. वहां उतर कर गोरेगांव का रास्ता पूछा. मुङो याद है. टैक्सी वाले
ने उस वक्त 80 रुपये लिये थे. रास्ते में हम दोनों ही उत्सुकता से मुंबई
की सड़कों, वहां के लोगों को, बेस्ट बस को देख रहे थे. लाइफ इन अ मेट्रो
के पोस्टर्स भी नजर आ रहे थे. बहरहाल हम पहुंचे गोरेगांव. हमें दूसरे दिन
पुणो वापसी करनी थी. दिन था गुरुवार. इसी दिन मुंबई में प्राय: फिल्मी
प्रीमियर आयोजित किये जाते थे. हम भी लकी थे. यह सुन कर कि आज रुक जाओ
लाइफ इन मेट्रो रिलीज हो रही है. प्रीमियर देख आओ. यह सुनते ही फिल्मी
लालची मन ने तुरंत मन बदल दिया. एक बार में हां में सिर हिला दिया कि हम
रुकेंगे.रात में 9 बजे का शो था. उस वक्त मुंबई के किसी भी इलाके से मैं
वाकिफ नहीं थी.( सच कहूं तो मुङो आज भी मुंबई के कई इलाकों के रास्ते एक
से लगते हैं. विशेष कर पीवीआर जूहू). पीवीआर जूहू में ही प्रीमियर था
शायद. किसी मल्टीप्लेक्स में भी फिल्म देखने का यह पहला अनुभव था
मेरा.जहां तक मुङो याद है. हम तीन लोग थे. हम ऑटो से उतरे ही थे कि मेरी
नजर इरफान खान पर गयी. वे ब्लैक या स्लेटी कलर के कोट में थे. किसी
फिल्मी हस्ती को इतने नजदीक से देखने का पहला मौका था. हम अंदर गये. वहां
रेड कारपेट का कार्यक्रम चल रहा था और इरफान मीडिया को बाइट दे रहे थे.

मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था कि आज पहली बार फिल्मी सितारों के साथ फिल्म
देखने का मौका मिलेगा. लेकिन अचानक जैसे ही सामने एक्सलेटर की सीढ़ी नजर
आयी. मेरी खुशी में लंबा सा पॉज लग गया. मैं ठहर गयी. मेरे दोस्त और
विपुल मामा दोनों एक्सलेटर से ऊपर जा चुके थे. उन्होंने ध्यान नहीं दिया
था. लेकिन मैं डरपोक नीचे ही रह गयी. कि पीछे से आवाज आयी. चलिए मैडम
चलिए, कोई दिक्कत नहीं है.डरिए मत. नहीं गिरियेगा. पलट कर देखा तो इरफान
खान थे. मैंने कहा नहीं नहीं मैं नहीं जा पाऊंगी. मैं किनारे हो गयी.
इरफान ने दोबारा कहा अरे मैडम डरिए मत. अच्छा ऐसा करिये डर रही हैं तो उस
तरफ सीढ़ी है. वहां से आ जाइए. इधर कैमरों के फ्लैश फ्लैश हो रहे थे
इरफान पर. और वे मुङो निर्देश दे रहे थे. लेकिन मुङो इरफान की उतनी देर
के बरताव से ऐसा लगा कि वाह फिल्मी सितारे तो बहुत कॉपरेटिव होते हैं.
बहरहाल मैं, सीढ़ियों से ऊपर आयी. मेरे साथ आये और दो महारथियों की अब
मेरी याद आ गयी थी.मेरे रोमांच के पल्स जिसने वहां एक्सलेटर के पास पॉज
ले लिया था. वह फिर से प्ले मोड में चले गये. हम थियेटर में पहुंचे. तो
थियेटर के अंदर जाते हुए भी मैं कुछ नया महसूस कर रही थी. तभी बगल से
समीर सोनी, रॉनित रॉय, उनकी पत् नी मानसी जोशी, मीता भट्ट, कल्पना
लाजिमी, सुधीर मिश्र जाते दिखे. जिन्हें हमेशा से टीवी पर देखती रहीं. आज
उन्हें मैं अपने सामने देख रही थी. हमें कोने की तीन सीट मिल गयी. अभी शो
शुरू नहीं हुआ था. सितारों का आना जाना जारी था. मेरी आंखें लगातार सबको
पहचानती जा रही थी. जिनके नाम याद नहीं थे. उनके धारावाहिक के किरदार से
उन्हें याद कर रही थी. लोग आपस में चर्चा कर रहे थे कि कंगना भी आनेवाली
है. उस वक्त कंगना की केवल गैंगस्टर ही रिलीज हुई थी. मुङो उस फिल्म से
प्यारी लगी थी कंगना सो, मैं इंतजार करने लगी थी. सच कहूं तो ईमानदारी
से. उस दिन भले ही आयी थी मैं फिल्म देखने. लेकिन मैं लगातार जो भी
कलाकार आ रहे थे. उन्हें ही देख रही थी. लेकिन थोड़ी ही देर के बाद
लाइट्स ऑफ हुए और फिल्म लाइफ इन अ मेट्रो शुरू हुई. फिल्म शुरू होने से
पहले यकीनन मेरा मन भटक चुका था. कलाकारों को देखने में. लेकिन जैसे जैसे
फिल्म आगे बढ़ती गयी. फिल्म की कहानी ने इस कदर बांधा  और मैं इस कदर
कहानी में रमी कि फिर खोती चलती गयी. लाइफ इन मेट्रो इसलिए मेरी आज भी
पसंदीदा फिल्मों में से एक नहीं है, क्योंकि यह मेरे जीवन का पहला
प्रीमियर शो था. लेकिन इसलिए क्योंकि अनुराग बसु ने न सिर्फ कहानी के
आधार पर, बल्कि संगीत से भी मुंबई की जिंदगियों की जो सैर करायी थी. वह
खासियत थी इस फिल्म की. 


मेरा दूसरा दिन मुंबई में और एक ऐसी फिल्म देख
रही थी जो मुंबई की कहानी बयां कर रही थी. सो, मैं फिल्म से काफी कनेक्ट
कर पा रही थी. दो दिनों में ही मुंबई मुङो अपना सा लगने था. न जाने
क्यों. लेकिन फिल्म की कहानियां, उसके किरदार, लोकल ट्रेन सारी चीजें ऐसा
लग रहा था जैसे दो दिनों में ही मैंने  इन सभी चीजों को आस पास महसूस
किया है. विशेष कर फिल्म में धर्मेद्र और नफीशा अली के बीच का प्रेम
प्रसंग इस हिस्से ने मुङो बेहद प्रभावित किया था.बहरहाल, मेरा पहला
प्रीमियर रोमांच इंटरमिशन पर आ पहुंचा था. इंटरमिशन पर भी बेहद रोमांटक
बातें हुईं मेरे साथ. मुङो पॉपकॉर्न और कोल्ड ड्रिंक्स खाने की इच्छा थी.
लेकिन मैंने जब बाहर प्राइस लिस्ट पर नजर दौड़ाई तो मेरी हिम्मत नहीं
हुई. आकर फिर से अपनी सीट पर बैठ गयी.जबकि हमारी सीट पर आकर मुङो थियेटर
ब्वॉय ने पॉपकॉर्न ऑफर किया था. मेरे पास पैसे तो थे नहीं. विपुल मामा और
मेरे दोस्त भी बाहर गये थे.सो, मैंने मना कर दिया. दोनों आये तो दोनों से
बताया तो विपुल मामा ने बताया कि पैसे देकर नहीं खरीदने थे. प्रीमियर में
गेस्ट्स के लिए रिफ्रेशमेंट रहता है. अब फिल्म शुरू हो चुकी थी. फिल्म की
शुरुआत से ही इरफान खान के किरदार से मुङो प्यार हो गया था. एक तो फिल्म
में उनका किरदार था भी बहुत मजेदार. और बाहर जो उनसे रूबरू होकर आयी थी
जो वह भी जादू था. सो, फिल्म के इरफान वाले हिस्से को मैंने सबसे ज्यादा
एंजॉय किया. इरफान की ईमानदारी मुङो बेहद प्यारी लगी. वह जो सोचते थे वह
भी बोल जाते थे.फिल्म में शिल्पा की बेबसी, और धर्मेद्र -नफीशा के प्यार
के पूरे न हो पाने का भी अफसोस था. लेकिन लाइफ इन मेट्रो की सबसे खास बात
यह थी कि फिल्म में कई कहानियां थीं. लेकिन जिस तरह दादर सेंट्रल और
वेस्टर्न लोकल को जोड़ती है. फिल्म की सारी कहानियां. सारे किरदार उलझते,
सुलझते, एक दूसरे से जुड़े थे. अनुराग बसु की अब तक की सबसे बेस्ट फिल्म
है ये मेरी नजर में. फिल्म खत्म होने पर वापसी के दौरान शिल्पा का शाईनी
के पास वापस न जाना बार बार अखड़ रहा था मुङो. गाइड की रोजी याद आ रही
थीं. 
अनुराग बसु को उस दिन भी मैंने नहीं देखा था. लेकिन उनकी कहानी कहने का तरीका बेहद भा गया था. a. लेकिन उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने का मौका हाल में मिला.मेरे मन में यह सवाल था कि मैं उनसे
पूछूं कि शिल्पा शाईनी के पास वापस क्यों नहीं जाती. लेकिन पूछ नहीं
पायी. अनुराग को मैं लाइफ इन मेट्रो वाले अनुराग से ही जानने लगी थी.
उम्मीदन जल्द ही वह बर्फीवाले अनुराग बसु बन जायेंगे. क्योंकि इन फिल्मों
में दरअसल, निर्देशक की अपनी छवि, उनकी वास्तविक सोच की झलक है. 2007 में
पीवीआर जूहू के अपने पहले फिल्मी प्रीमियर के अनुभव हमेशा जेहन में जिंदा
रहेंगे. मैंने वापस जाकर अपने हॉस्टल में सभी को पूरी बात बताई थी. आज भी
इरफान सामने आते हैं तो एकबारगी पीवीआर के फ्लैशबैक में चली जाती हूं.
वर्तमान में प्राय: पीवीआर जूहू में ही फिल्मों की प्रेस स्क्रीनिंग होती
है और वहां अक्सर आना जाना होता है. आज भी एक्सलेटर की सीढ़ियां वही हैं.
वे बार बार एक तरफ से चढ़ कर दूसरी तरफ उतर जा रही हैं. इन पांच सालों
में कुछ खास नहीं बदला. लेकिन फर्क बस यही आया है कि   अब मैं एक्सलेटर
पर चढ़ने से नहीं डरती और पीछे से एक्सलेटर पर चढ़ने के लिए मेरा हौसला
बढ़ानेवाले इरफान से अब पीछे से नहीं आमने सामने बातें होती हैं