20110823

बराबरी का बॉलीवुड



इन दिनों हिंदी सिनेमा जगत में जब भी फिल्म से जुड़े किसी भी विषय पर चर्चा हो रही है. कुछ फिल्में किसी न किसी संदर्भ में उस चर्चा का विषय बन जा रही है. फिर चाहे उस फिल्म की कहानी वजह हो, निदर्ेशन वजह हो या फिल्म के गाने वजह हो. संदर्भ अलग होने के बावजूद इन सभी फिल्मों में कहीं न कहीं एक तार मिलते हैं.. सभी ये फिल्में समीक्षकों और दर्शकों दोनों के ही नजरों में खरी उतरी है. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म 404 फिल्म एक साइकोलॉजिकल थ्रीलर है. फिल्म की कहानी और फिल्म के वीजन ने दर्शकों के साथ साथ समीक्षकों का भी दिल जीता. फिल्म का निदर्ेशन प्रवाल रमण ने किया है. प्रवाल झारखंड के जमशेदपुर शहर के हैं. प्रवाल ने शुरुआती दौर में रामगोपाल वर्मा के साथ कई फिल्मों पर काम किया. जिस वक्त 404 रिलीज हुई. उस दौरान और भी कई थ्रीलर फिल्में रिलीज हुई थीं. लेकिन इसके बावजूद दर्शकों को फिल्म ने बांधे रखा. कुछ इसी तरह वर्ल्ड कप के दौरान बिना किसी बड़े स्टारवाली फिल्म तनु वेड्स मनु रिलीज हुई. ट्रे्ड पंडितों के अनुसार रिलीज से पहले अनुमानतः कहा गया कि दर्शक वर्ल्ड कप के दौरान फिल्म देखने पहुंचेंगे ही नहीं. लेकिन इसके बावजूद कम लागत में बनी यह फिल्म दर्शकों को पसंद आयी. वजह फिल्म की सामान्य लेकिन सुलझी सी कहानी. फिल्म के गीत भी दर्शकों को बेहद पसंद आये. और कई दिनों बाद किसी फिल्म के गीतों को दर्शकों ने एक एलबम की तरह संजो कर अपने कलेक्शन में शामिल किया. फिल्म की कहानी लखनऊ और कानपुर के इर्द-गिर्द घूमने के बावजूद दर्शकों मल्टीप्लेक्स में बैठे दर्शकों को लुभा गयी. इस फिल्म के लेखक हिंमाशु शर्मा लखनऊ के रहनेवाले हैं. फिल्म के गीतकार राज शेखर बिहार के मधेपुरा से हैं. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म शैतान का नाम भी दर्शकों की जुबां पर चढ़ चुका है. फिल्म की कहानी दर्शकों को पसंद आयी है. विशेष कर फिल्म का कैमरावर्क. फिल्म के निर्माता अनुराग कश्यप हैं और वे उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के रहनेवाले हैं. इस वर्ष के शुरुआत में फिल्म नो वन किल्ड जेसिका ने सफलता हासिल की. फिल्म की कहानी जेसिका लाल हत्याकांड पर आधारित थी. और दर्शकों और समीक्षकों दोनों को पसंद आयी. फिल्म के निदर्ेशक राजकुमार गुप्ता झारखंड के हजारीबाग से हैं. फिल्म रेडी के गीत कैरेक्टर ढीला, बैंड बाजा का गीत एंवी, डेली बेली के गीत डीके बोस के गीतकार नीलेश मिश्र और अमिताभ भट्टाचार्य भी लखनऊ से ताल्लुक रखते हैं. किसी न किसी रूप में यह सारी फिल्मों ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया है. मुद्दे अलग. विषय अलग. कलाकार भी अलग. तकनीकी रूप से भी किसी की किसी से कोई तुलना नहीं. लेकिन इन सबके बावजूद एक तार है जो सभी में सामान्य है, वह है यह सभी फिल्में और इन फिल्मों से जुड़ी हस्तियां किसी न किसी रूप में छोटे शहरों से हैं. फिर चाहे वह गीतकार के रूप में हो, निर्माता के रूप में हो या फिर निदर्ेशक के रूप में. इससे साफ जाहिर है कि किसी न किसी रूप में छोटे शहर से आये लोगों ने हिंदी सिनेमा जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज कर ली है. यह छोटे शहर से आये लोगों की प्रतिभा का ही परिणाम है कि आज बड़े बैनर भी अपनी फिल्मों की कहानियों के लिए इन पर आश्रित हैं. बॉलीवुड के स्थापित शख्सियत अनुराग कश्यप हमेशा इस बात की चर्चा करते हैं कि उन्हें इस बात का दुख है कि वे् अपनी फिल्म पांच को रिलीज नहीं कर पाये. कभी अपनी फिल्मों के लिए निर्माता न तलाश पानेवाले अनुराग इन दिनों खुद निर्माता की कुर्सी पर बैठे हैं और लगातार अलग लीक से हटकर फिल्में दे रहे हैं. अनुराग की यह कामयाबी छोटी कामयाबी नहीं, बल्कि उन तमाम छोटे शहर के लोगों के लिए प्रेरणा भी है. दरअसल, बदलते दौर और सिनेमा के बदले तेवर ने हर किसी के लिए अवसरों के रास्तें खोल दिये हैं. कभी केवल अभिनय में भाग्य आजमानेवाले लोगों और युवाओं ने भी इस तथ्य को जान लिया है कि अगर वह चाहें तो और भी कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां आप अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं. वे जिम्मेदारियां निभा सकते हैं. और वाकई वे जिम्मेदारियां निभा भी रहे हैं. शायद यही वजह है कि बड़े बैनर के लोगों का विश्वास भी अब ऐसी प्रतिभाओं की पर और गहराता चला गया है. गौर करें तो बॉलीवुड व टेलीवुड की पूरी रीढ कुछ ऐसे ही प्रतिभाशाली लोगों पर हैं. सिर्फ सिनेमा में ही नहीं बल्कि छोटे परदे पर भी छोटे शहर से आकर खुद दूसरों के साथ काम करने के साथ साथ अब खुद निर्माता के रूप में उभर कर सामने आये हैं. आप किसी भी सीरियल या फिल्म के सेट पर जायें, आपको वहां काम कर रहे अधिकतर व्यक्ति मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के लोग ही नजर आयेंगे. टेलीविजन पर इन दिनों लव यू जिंदगी, गीता जैसे शोज का निर्माण पटना के शील कुमार कर रहे हैं. बाबा ऐसा वर ढूंढो और लुटेरी दुल्हन जैसे शोज का निर्माण झारखंड के चाइबासा से आये राकेश पासवान कर रहे हैं. साथ निभाना साथिया में डीओपी का काम झारखंड के निशि चंद्रा संभाल रहे हैं. प्रतिज्ञा का निदर्ेशन प्रभात प्रभाकर कर रहे हैं, बिग बॉस जैसे शोज का संपादन चाईबासा के प्रभात सिन्हा ने किया. झलक दिखला जा सीजन चार के प्रोडक्शन मैनेजर के रूप में झारखंड के जमशेदपुर की झिलमिल ने एक बड़ी जिम्मेदारी संभाली. यहां तक कि उनके काम करने के तरीके की तारीफ खुद माधुरी दीक्षित ने भी किया. फिल्म यमला पगला दीवाना में असोसियेट निदर्ेशक की भूमिका रांची के आशिष खतपाल ने निभायी. वे हाल ही में रिलीज हुई फिल्म भींडीबाजार में असोसियेट प्रोडयूसर के रूप में जुड़े हैं. रांची की नंदिता साहु चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म मोहल्ला अस्सी में कॉस्टयूम डिजाइनिंग से जुड़ी हैं. इसी फिल्म के आर्ट निदर्ेशक पंजाब के छोटे से शहर से हैं. फिल्म वांटेड और खेले हम जी जान से जैसी बड़े बैनर की फिल्मों के संपादन दिलीप देव रांची से हैं. सुधीर मिश्रा की फिल्म ये साली जिंदगी व सुधीर की अधिकतर फिल्मों का संपादन कर चुके आर्चित रस्तोगी लखनऊ शहर से हैं. फिल्म ऊंट पंटाग से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में आयी अर्पणा जोशी बनारस शहर से हैं. मशहूर गीतकार स्वानंद किरकिरे इंदौर से हैं. जल्द ही रिलीज होनेवाली फिल्म डियर फ्रेंड हिटलर की पटकथा रांची के नलिन सिंह ने लिखी है. महेश भट्ट बोकारो के इमरान जाहिद को लेकर चंदू फिल्म का निर्माण करने जा रहे हैं. फिल्म रा.वन के वीएफएक्स के निर्माण से जुड़े अनुराग उत्सव बिहार के रहनेवाले हैं. यह एक छोटी फेहरिस्त हैं.

दर्शकों की समझ का फलख अब बढ़ चुका है ः राज शेखर, गीतकार

मैं भारतीय सिनेमा के इस बदलाव को कई चरणों ( फेजेज) में देखता हूं. मैं मानता हूं कि कोई भी बदलाव अचानक से नहीं होते. लेकिन बदलाव जब भी होते हैं. वह नये होते हैं. ऐसा नहीं है कि सिनेमा में बदलाव या नये बदलाव आज ही हो रहे हैं. हर दौर में होते आये हैं. किसी दौर में जब जावेद व सलीम साहब ने शानदार कहानियां लिखी थीं और लोगों ने उन्हें पसंद किया क्योंकि उस दौर में उन्होंने नया रचा था. वह उस दौर के लिए लीक से बिल्कुल हट कर चीजें थी. सच्चाई भी यही है कि सिनेमा को आप किसी फार्मूले में बांध भी नहीं सकते. अगर आप ऐसा करेंगे तो जाहिर है कि आप पीछे रह जायेंगे. ऐसा नहीं है कि आज ही छोटे शहरों से आये लोगों को मौके मिल रहे हैं. पहले भी ऐसे कई लेखक व सिनेमा से जुड़ी रही कई हस्तियां भी छोटे शहरों से ही ताल्लुक रखती थी. उस वक्त अवसर कम थे. लेकिन अब अधिक हैं. लेकिन यह बदलाव भी अचानक से नहीं हुए. वर्ष 1998 के दौर की बात रही होगी जब पहली बार सुजॉय घोष आम विषय से अलग लेकर कुछ आये. झंकार बिट्स बनी और दर्शकों ने इन फिल्मों को बिना किसी स्टार के होते हुए भी पसंद किया. इससे नये कलाकारों, निदर्ेशकों और निर्माताओं की भी हिम्मत बढ़ी. कुछ बड़े नाम जिन्होंने यह सोच लिया था कि वे हर बार राज मल्होत्रा, राहुल, सिमरन की कहानियां परोस कर भी दर्शकों को लुभा पायेंगे. उनका फार्मूला पूरी तरह फेल हुआ. चूंकि धीरे धीरे समय के साथ दर्शक भी समझदार होते गये. उन्हें यह बात समझ में आने लगी कि उन्हें बार बार एक ही तरह की चीजें नहीं चाहिए. राज और सिमरन तो आम जिंदगी में भी उन्हें आने लगे. तब उनकी इच्छा हुई थी कि उन्हें कुछ नया चाहिए. मेरा तो मानना है कि नये लोगों को बैकगेट से एंट्री मिली है. मतलब उन लोगों को अधिक मौके मिलने लगे, जिनके पास उनकी सोच थी और वे कई काम कर सकते हैं. फिर फिर धीरे धीरे निदर्ेशन के क्षेत्र में, लेखन के क्षेत्र में और सिनेमा से जुड़े हर क्षेत्र में छोटे शहर के लोगों ने भी उपस्थिति दर्ज करायी. गौर करें, तो हिंदी सिनेमा जगत ने जब जब खुद को फार्मूले में बांधा है. वह विफल रहा है. वर्ष 2005 तक कई फिल्में नकल फिल्मों के रूप में दर्शकों के सामने आयी. दर्शकों ने उसे भी स्वीकारा. लेकिन एक दौर के बाद उसे भी नकारना शुरू कर दिया. छोटे शहर की कहानियां दर्शकों को इसलिए भी छूने लगी. चूंकि हम भारतीय दर्शक किसी भी मनोरंजन से जुड़ी चीजों में हमेशा अपना नायक ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं. साथ ही हमेशा सेलिब्रेशन की आस रखते हैं तो जब वही कहानियां दर्शकों के सामने आने लगी तो दर्शक इसे पसंद करने लगे. चूंकि एक छोटे शहर में सपने बेहद अहमियत रखते हैं. कुछ वैसे ही सपने जब फिल्मों के नायक भी देखने लगे तो लोगों ने उससे खुद को जोड़ना शुरू किया और उसकी स्वीकृति बढ़ी. फिर एक खास क्रांति का दौर रहा. जब भारत में सैटेलाइट चैनलों की शुरुआत हुई. जैसे जैसे चैनल बढ़े, दर्शकों की समझ भी बढ़ी. अब दर्शक कई तरह की और ढेर सारी फिल्में देखने लगे और समझदार होते गये. अब फिर से लोगों के सामने नयी चुनौती आ खड़ी हुई कि अब क्या बदलाव किये जायें. चूंकि अब गांव तक भी डिश टीवी की पहुंच बढ़ी. धीरे धीरे फिल्मकारों ने इस मानसिकता को समझा और खुद में बदलाव प्रारंभ किये. मैं मानता हूं कि सैटैलाइट चैनलों की वजह से सबसे बड़ी कामयाबी यह मिली कि मुंबई अपने सपने को साकार करने आये कई लोगों को काम मिलने लगा. सीखने का मौका मिलने लगा और उनके सपने साकार होते नजर आने लगे. चूंकि उनका नाम के्रेडिट के रूप में लोगों के सामने आने लगा. इस तरह अपने दोस्तों को सामने सफलता हासिल करते देख साथ में रह रहे व्यक्ति को भी लगा कि वह भी तो अपना सपना पूरा कर सकता है. करियर ऑप्शन देखते हुए वह भी आगे बढ़ा, और सफलता अर्जित की. धीरे धीरे करियर अवसरों के रूप में निदर्ेशन, लेखन, प्रोडक्शन से जुड़े कई कामों में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी, क्योंकि यह आय का स्रोत बना.

नीलेश मिश्र, गीतकार

दर्शक वर्ग जो बंट चुका था, फिर से एक हुआ

बॉलीवुड में अब सभी को बराबरी का दर्जा मिल रहा है. इसकी वजह है कि अब अवसर बढ़ रहे हैं. इसकी सबसे खास वजह यह भी है कि बॉलीवुड का अर्थशास्त्रभी पूरी तरह बदल चुका है. पहले कई प्रोडक्शन हाउस चाहते थे और इसी सोच में रहते थे कि वह बड़े स्टार्स को लेकर बड़ी बजट वाली फिल्में बनायेंगे. लेकिन कई बार उन्हें इसमें घाटा भी होता गया. दूसरी बात है कि बड़े सितारों के पास वक्त की बेहद कमी आने लगी. तब प्रोडक्शन हाउस ने फंडा निकाला कि वे कम पैसे में कम लागत वाली स्टारविहीन फिल्में बना कर भी दर्शकों को आकर्षित करेंगे और ऐसा हुआ भी. दर्शकों को नयी कहानियां पसंद आने लगी. अब जब फिल्मों की कहानियों में बदलाव हुए. उनके ट्रेंड में बदलाव हुए तो साथ ही साथ उसकी पूरी परिकल्पना, उसकी सोच में बदलाव आया.निर्माताओं ने इस बात की सुध ली कि एक बड़ा दर्शक वर्ग है जो मल्टीप्लेक्स से बाहर भी फिल्में देखना पसंद करता है. उन्होंने गौर करना शुरू किया कि किस तरह छोटे शहरों की कहानियां भी मल्टीप्लेक्स दर्शकों को भी पसंद आने लगीं. लेकिन इन सारे बदलाव में हम इस बात को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते कि सलमान खान की रेडी जैसी फिल्मों को भी दोनों ही दर्शक मिले हैं. सिंगल थियेटर और मल्टीप्लेक्स थियेटर. सलमान खान दरअसल उन स्टार्स में से हैं जिन्होंने यह अवधारणा तोड़ी है. वे दोनों ही दर्शकों के चहते रहे हैं. पहले फिल्मों के लोकेशन विदेशों के होते थे और दर्शकों को वह पसंद भी आते थे. लेकिन जब निर्माताओं ने देखा कि तनु वेड्स मनु के किरदारों की बातचीत, उनका शहर, वास्तविक लोकेशन भी जब दर्शकों की पसंद बन सकता है तो फिर दूर शूटिंग करके पैसे क्यों लगाये जायें. सिनेमा व्यवसाय है. और सिनेमा से जुड़े लोगों ने इसकी अर्थव्यवस्था को देखते हुए पूरे इसके प्रारूप में बदलाव किया या यह बदलाव होते चले गये.एक दौर में सिनेमा देखना. अभी कुछ सालों पहले तक एक महंगा सौदा हो गया था. आपको 40 रुपये की टिकट मिल ही नहीं सकती.,ऐसे में मनोरंजन की बजाय सिनेमा आपके बजट को बिगाड़ने का एक रूप बना. जिससे दर्शकों की दूरियां आयीं लेकिन फिल्म से मल्टीप्लेक्स के लोगों ने एक ही तरह की फिल्मों को नकारा और नयी चीजों का स्वागत किया.तो जब जब नयी शुरुआत हुई है. उसका संचालन भी नये लोगों ने ही करना शुरू किया, और लोगों को मौके मिलने लगे. कभी जो दर्शक के लिए वाचिंग एक्सपीरियंस पींचिंग एक्सपीरियंस बन गया था. वह फिर से अपनी कहानी लगनी लगी. और फिर से सिंगल थियेटर के दर्शकों का जमावड़ा बढ़ा और निर्माताओं ने उसकी एहमियत स्वीकारी. यही वजह रही कि अब लोग भी उन्हीं कहानियों को उन्हीं शहरों से ढूंढे जाने लगे. मैं मानता हूं कि फिलहाल बॉलीवुड में नये लोगों के लिए एक बड़ी उपलब्धि यह हो गयी है कि फिलहाल हकीकत यह है कि उन्हें पहचान पूरी तरह नहीं मिल पा रही. वक्त लग रहा है लोगों को परदे के पीछे के लोगों के काम को सराहने में लेकिन अब लोगों को काम मिलना शुरू हो गया. अब लोगों ने फिल्म देखने के दौरान इस बारे में बातचीत करनी शुरू की है कि वे बैक स्टेज के लोगों को भी जानने की कोशिश कर रहे हैं. दूसरी बात जो एक मेरे जेहन में आती है कि फिल्में भावनाओं को बहुत जोड़ती है और यही वजह है कि उत्तर भारत के लोगों को मौके मिल रहे हैं. वे अच्छी कहानियां लिख पा रहे हैं. अच्छे गीतकार वहां से आ रहे हैं. चूंकि कहीं न कहीं वे नोस्टोलेजिक होते हैं. और साथ ही यह भी बात बहुत अहम है कि बॉलीवुड की हिंदी थोड़ी टेढ़ी-मेढ़ी है. इसलिए भी दुरुस्त भाषावाले लोगों की जरूरत हुई और मौके मिलते गये और भविष्य में भी मौके मिल रहे हैं.

डिब्बा बंद ः आधा अधूरा लाइट कैमरा एक्शन



हम भले ही कितनी बातें बना लें. फिल्म बनने के बाद उसकी समीक्षा कर लें, लेकिन सच्चाई यही है कि किसी फीचर फिल्म का निर्माण एक कठिन तपस्या से कम नहीं. चूंकि यहां कई तत्व एक साथ फिल्म के निर्माण को प्रभावित करते हैं.यही वजह है कि हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसी कई फिल्मों का नामांकन तो हुआ. लेकिन सुगबुगाहट के साथ फिल्में डिब्बा बंद हो गयीं. कहीं कलाकारों की आपसी रंजीश तो कहीं निदर्ेशकों के नजरिये में दोष इसका खास कारण बना. कुछ ऐसी ही फिल्मों व उनके अधूरे रह जाने के कारणों पर अनुप्रिया अनंत और उर्मिला कौरी की पड़ताल.

अपने प्रिय और करीबी दोस्तों में से एक कृष्ण खन्ना से मृत्यु से पहले मकबूल फिदा हुसैन ने अपने मन की बात जाहिर की थी कि वह अपनी जिंदगी पर आधारित एक फिल्म बनाना चाहते हैं. उन्होंने फिल्म का नाम द मेकिंग ऑफ पेंटर रखा था. फिल्म में उन्होंने युवा किरदार श्रेयस तलपड़े को दिया था. फिल्म की पटकथा पर उन्होंने बहुत हद तक काम भी कर लिया था. लेकिन इससे बावजूद उनकी यह मनसा पूरी नहीं हो पायी. वजह वे आर्थिक रूप से फिल्म के लिए धन एकत्रित नहीं कर पाये. माधुरी दीक्षित अभिनीत फिल्म गजगामिनी व तब्बू अभिनीत फिल्म मिनाक्षी के निर्माण के बाद इस बात से पूरी तरह वाकिफ हो चुके थे कि फिल्म एक महंगा व्यवसाय है. मकबूल चाहते थे कि वह अमृता राव व अनुष्का को लेकर भी फिल्में बनाये. लेकिन उनकी यह इच्छा अधूरी रह गयी. दरअसल, किसी फिल्म को पूरा करने का यह सपना सिर्फ हुसैन साहब का ही नहीं अधूरा नहीं रहा. ऐसे कई निदर्ेशक हैं, जिनकी कई फिल्में आधी अधूरी रह गयीं. कुछ तो फ्लोर तक पहुंची, लेकिन टिकट खिड़की का मुंह नहीं देख सकीं. कुछ फिल्में इस वजह से भी डिब्बे में बंद हो गयी, चूंकि निदर्ेशकों व कलाकारों में अनबन हुई. हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसा सिर्फ छोटे बजट की फिल्मों के साथ ही नहीं हुआ. बल्कि कई ऐसी फिल्में रहीं, जो आधी अधूरी रह गयी. एक दौर में राज कपूर ने भी ऐसी कई फिल्मों की परिकल्पना की थी. उसकी शूटिंग भी की, लेकिन वे फिल्में पूरी न कर सके. इन फिल्मों में हीना भी प्रमुख है. आगे चल कर यह फिल्म रणधीर कपूर ने पूरी की. सुभाष घई के अधूरे सपने

सुभाष घई उन निदर्ेशकों में से एक हैं, जो अपनी पटकथा के साथ साथ अपने निदर्ेशन के स्टाइल को अपने किरदारों पर थोपते हैं. लेकिन शायद सुभाष घई ने यह सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस जमाने में वह शोमेन के रूप में मशहूर थे. ऐसे दौर में उन्हें किसी कलाकार की वजह से भारी नुकसान का सामना करना पड़ेगा. उस दौर में अमिताभ बच्चन अपनी दूसरी लेकिन कमजोर पारी खेल रहे थे. लेकिन इसके बावजूद अमिताभ बच्चन ने सुभाष घई के सामने अपनी अभिनय क्षमता के गुमान का प्रमाण दिया था. अमिताभ बच्चन के साथ वे फिल्म देवा की शूटिंग कर रहे थे. पूरे 28 दिन फिल्म की शूटिंग हो गयी थी. लेकिन इसके बावजूद अमिताभ ने सुभाष की फिल्म के बारे में नहीं सोचा. हुआ यूं कि सुभाष घई की आदत थी कि वे अपने किरदारों को सेट पर जाकर समझाते थे कि इस शॉट को ऐसे नहीं, ऐसे करें. उन्होंने अमिताभ को भी समझाने की कोशिश की. नतीजा यह हुआ कि अमिताभ को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि कोई उन्हें किसी तरह से कुछ समझा रहा है. उन्होंने अपने सेक्रेटरी को तुरंत बुलाया और सुभाष घई से पूछने को कहा कि उनसे पूछें कि कितने भुगतान के बाद वे वहां से जा सकते हैं. और सेट छोड़कर चले गये. अमिताभ बच्चन के फिल्म छोड़ कर जाने की वजह से सुभाष को भारी क्षति उठानी पड़ी थी. लेकिन उन्होंने उसी नष्ट हुए धन के भार के बावजूद फिर राम लखन बनायी.

सनी-ऐश में दूरी

हिंदी सिनेमा में ऐसी भी कई जोड़ियां हैं, जो बनते बनते रह गयीं. चाह कर भी निदर्ेशक उन फिल्मों को पूरी नहीं कर सके. इन्हीं फिल्मों में से एक थी इंडियंस. पहलाज निहलानी ने सनी देओल और ऐश्वर्य राय को लेकर इंडियंस फिल्म का मुहूर्त किया. फिल्म की शूटिंग फिल्म सिटी में होनी भी शुरू हो गयी थी. लेकिन ऐश्वर्य राय के नखरों से परेशान होकर सनी देओल ने फिल्म आधी अधूरी छोड़ दी. इस फिल्म के सिलसिले में ही एक दिन जब सनी देओल ऐश्वर्य से मिलने पहुंचे. लेकिन ऐश ने सनी को बहुत देर तक इंतजार कराया. इस बात से नाराज होकर सनी ने फिल्म अधूरी छोड़ दी और निदर्ेशक को भारी नुकसान उठाना पड़ा.

मुहूर्त तो हुआ...लेकिन

एक दौर में फिल्मों के मुहूर्त हुआ करते थे. मुहूर्त का मतलब फिल्म के श्रीगणेश से होता था. फिल्म का पहला शॉट इसी दिन लिया जाता था. एक तरह से फिल्म की शुरुआत की यह पारंपरिक शुरुआत होती थी. हिंदी फिल्मों के इतिहास में ऐसी कई फिल्में बनीं जो मुहूर्त के बावजूद डिब्बा बंद होकर रह गयी. अमिताभ बच्चन ने दिल, बेटा की सफलता के बाद आमिर खान और माधुरी के साथ रिश्ते का मुहूर्त किया. लेकिन फिर भी फिल्म बन नहीं पायी. शेखर कपूर ने आमिर खान, रेखा के साथ टाइम मशीन फिल्म के कई शॉट्स ले लिये थे. शेखर कपूर की फिल्म पानी की घोषणा कई बार की गयी है. फिल्म की शूटिंग बहुत हद तक हो भी चुकी थी. लेकिन बावजूद इसके फिल्म अब तक पूरी नहीं हो पायी है. लेकिन शेखर कपूर की अब तक की यह मनसा पूरी नहीं हो सकी है. वे चाह कर भी इस फिल्म को पूरा नहीं कर पाये हैं.

अनुराग की पांच

अनुराग कश्यप आज फिल्म इंडस्ट्री में पूरी तरह स्थापित हैं. इसके बावजूद उन्हें इस बात का हमेशा दुख है कि वे अपनी पहली फिल्म पांच को रिलीज का मुख नहीं दिखा पाये. उन्होंने अपनी इस फिल्म को हाल ही में रिलीज फिल्म शैतान से जोड़ने की कोशिश की है. फिल्म पांच विवादों में फंस जाने के कारण रिलीज नहीं हो पायी थी.

बाजीराव मस्तानी

संजय लीला भंसाली फिल्म बाजीराव मस्तानी का निर्माण करनेवाले थे. यह फिल्म वह अपनी पसंदीदा नायिका ऐश्वर्य राय और सलमान खान के साथ बनाना चाहते थे. इस फिल्म की शूटिंग भी शुरू हो चुकी थी. लेकिन ऐश और सलमान के बीच आयी दूरी की वजह से यह फिल्म डिब्बे में चली गयी. लेकिन उनकी कहानी की नकल कर उनके दोस्त नितिन ने मराठी में बाजीराव मस्तानी नामक सीरियल का निर्माण कर दिया.

दस

कभी नितिन मनमोहन फिल्म दस का निर्माण कर रहे थे. इस फिल्म में मुख्य किरदारों में संजय दत्त, सलमान खान और शिल्पा शेट्ठी थे. इस फिल्म का गीत हिंदुस्तानी बेहद लोकप्रिय भी हो चुका था. लेकिन इसके बावजूद बीच में नितिन की मृत्यु हो गयी और यह फिल्म अधूरी रह गयी. फिल्म को कई सालों पर इसी नाम से बनाया गया. लेकिन फिल्म की कहानी और कलाकार सभी में परिवर्तन किया गया.

साहेब, बीबी, गुलाम

प्रीतिश नंदी कम्यूनिकेशन की इस फिल्म में प्रियंका और जॉन काम कर रहे थे. फिल्म का फर्स्ट लुक भी जारी कर दिया गया था. लेकिन फिल्म का निर्माण नहीं किया जा सका.

राजकपूर ने अपने फिल्मी करियर में सबसे अधिक पटकथा अपनी पसंदीदा अभिनेत्री नरगिस को ध्यान में रख कर लिखी थी. वे उनके साथ कई फिल्मों का निर्माण करना चाहते थे. लेकिन वे कर नहीं पाये. इन्हीं फिल्मों में से एक थी फिल्म अंजता. जिसके लिए उन्होंने कैमरामैन राधू करमरकर को लंदन में ट्रेनिंग लेने भी भेजा.

गुरुदत्त ने कई फिल्मों की पटकथा लिखी थी. लेकिन उनकी फिल्में अधूरी रह गयीं.

दिलीप कुमार की फिल्म कलिंगा भी दिलीप कुमार व निदर्ेशक में अनबन होने की वजह से डिब्बा बंद रह गयीं.

जिंदगी तेरे नाम, जमानत जैसी मल्टी स्टारर फिल्में भी रिलीज नहीं हो पायीं.

क्या है वजह

फिल्में रिलीज न हो पाने की कई वजहें होती हैं. ऐसी कई फिल्में हैं जो निर्माण के बावजूद सिनेमा थियेटर में नहीं पहुंच पातीं. क्योंकि इन फिल्मों को डिस्ट्रीब्यूटर नहीं मिलते. फिल्मों की रिलीज की यह बड़ी वजह है और जो फिल्में आधी अधूरी रह जाती हैं, उनकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इन फिल्मों के साथ निदर्ेशक व किरदार के बीच की आयी दूरियां होती हैं. इसमें कई बार भारी नुकसान निर्माताओं को ही चुकाना पड़ता है.

साहित्य से अलग नहीं हो सकता ः विशाल भारद्वाज


मैं मानता हूं साहित्य और सिनेमा का मेल कभी अलग नहीं किया जा सकता. अगर मुझे कोई मौका दे दे तो मैं साहित्य पर आधारित बेहतरीन फिल्में बना दूंगा. मैं नहीं मानता कि साहित्य से जुडने के लिए किसी उम्र की बाधा होती है. आप कभी भी इससे जुड सकते हैं. मेरा मानना है कि हिंदी सिनेमा को हमेशा साहित्य से जुडे रहना चाहिए. ताकि हमारी संस्कृति बरकरार रहे. साहित्य के माध्यम से एक खास संस्कृति को जानने का मौका मिलता है. फिर चाहे वह किसी भी देश के लेखक हो. साहित्य और सिनेमा में सामंजस्य तभी बन सकता है जब आप गउसे बोझ के रूप में देखना बंद करेंगे. अक्सर ऐसा होता है कि लोग सोच लेते हैं कि साहित्य पर आधारित सिनेमा है तो वह उबाऊ होगा. फिर उसे किसी निर्धारित वर्ग की फिल्म घोषित कर दिया जाता है. जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए. स्कूल कॉलेज के दौरान मुझे साहित्य से ज्यादा क्रिकेट लुभाता था. मैं पूरी तरह से एक आम लड़का था. जो अमिताभ बच्चन की मसाला फिल्में पसंद करता था. मैं कालीचरण, अमर अकबर एंथोनी जैसी फिल्मों को देखकर बडा हुआ हूं लेकिन जब मैं मुंबई आया और गुलजार साहब के साथ काम करने का मौका मिला तो मेरी सोच में थोड़ा बहुत बदलाव आया. उनकी फिल्म अंगूर जो उपन्यास कामेडी आफ एरर पर आधारित है. मुझे बहुत पसंद आयी थी लेकिन उस वक्त भी साहित्य को पढ़ने की मेरी रूचि नहीं जगी. मैं अचानक ही साहित्य की ओर मुड़ गया. मुझे याद है जब मैं संगीतकार से बतौर निदर्ेशक अपनी शुरूआत करने जा रहा था. मैंने पढ़ना शुरू कर दिया था लेकिन साहित्य से मेरा दूर दूर तक कोई लेना- देना नहीं था. मैं तो डायरेक्शन और स्क्रीनप्ले राइटिंग के बारें में पढता था. उसी दौरान यात्रा करते हुए अचानक एक बच्चें के हाथ में मैंने कापी आफ द शेक्सपीयर टेल देखी. मैंने उससे वह किताब देखने के लिए मांगी. सफर लंबा था इसलिए मैंने समय कटाने के लिए एक कहानी पढने का मन बनाया.उस किताब की पहली कहानी मैकबेथ की थी. वो कहानी पढकर मैं मंत्रमुग्ध हो गया. मुझे वह ड्रामाटिक कहानी इतनी पसंद आयी कि मैंने उसी वक्त यह निश्चय कर लिया कि मैं अपनी पहली फिल्म इसी कहानी पर बनाऊंगा. सिर्फ मैकबेथ पढ़ने के बाद ही मेरा मन शेक्सपियर के लिए एक अळग ही सम्मान से भर आया. जिसके बाद एक के बाद एक मैंने शेक्सपीयर के सारे नाटक पढ़ डाले. उनके नाटक उनकी कहानियां मुझमे एक अलग ही उर्जा का संचार करते हैं. शेक्सपीयर की कृतियों को पढते हुए मेरे मन में पहले दिन से आज तक यही बात आयी है कि मैं अपनी पूरी जिंदगी इनके नाटको पर फिल्में बना कर निकाल सकता हूं. शेक्सपीयर की खासियत यह है कि अगर आप थोड़े भी इंटेलिजेंट हो तो उनकी कहानियों को आप बेहतरीन ढंग से परदे पर उतार सकते हो. साहित्य से मेरा परिचय शेक्सपीयर के नाटकों ने ही किया था इसलिए शेक्सपीयर के नाटकों पर फिल्म बनाते हुए मैं इतना खो जाता हूं कि मुझे लगता है कि चार सौ साल पहले मैंने ही यह नाटक लिखा था इसलिए मैं अपने तरीके से कहानी को प्रस्तुत करने लगता हूं. हां मैं उस नाटक की मूल आत्मा से खिलवाड़ नहीं करता हूं लेकिन उसे मौजूदा दौर के हिसाब से जरूर प्रस्तुत करता हूं. सभी को लगता है कि साहित्य बोरिंग होता है लेकिन शेक्सपीयर की कृति को पढ़ने के बाद मुझे लगता है कि कोई भी ऐसा नहीं कह सकता है. शेक्सपीयर की कृतियां बहुत ज्यादा ही इंटरटेंनिग, डिप हयूमन नेचर को प्रस्तुत करती है.जो काबिले तारीफ है. अक्सर सुनने में आता है कि मैं हमेशा अंग्रेजी साहित्य की ओर रूझान क्यों हो रहा है. शेक्सपीयर के बाद रस्किन बांड की कहानियां मुझे अपनी फिल्मों के लिए प्रभावित करती रही है.हालिया रिलीज हुई मेरी फिल्म सात खून माफ रस्किन बांड की कहानी सुजैनास सेवन हसबैंड पर आधारित थी. मुझे लगता है संगीत, साहित्य और सिनेमा में कभी भी भेदभाव नहीं करना चाहिए.वैसे मैं रस्किन बांड के लेखन को कभी भी विदेशी नहीं मानता हूं. उनका जन्म हो या परवरिश सभी कुछ भारत में ही हुई है. उनकी भाषा भले ही अग्रेंजी है लेकिन उनकी कहानियों के जो किरदार हैं. वह हमारे देश के ही किरदार है. वैसे अब अंग्रेजी भी हमारी ही भाषा बन चुकी है सो इसे मैं हिंदुस्तानी साहित्य का दर्जा देना चाहूंगा. साहित्य चाहे अंग्रेजी हो या हिंदी वह मानव मनोभावों का बहुत ही सुंदर और सजीव चित्रण करता है. शेक्सपीयर और रस्किन का ज्यादा से ज्यादा फालो करने की यही वजह है. मैं अपनी फिल्मों की कहानियों को विषम परिस्िथितयों में देखना चाहता हूं (हंसते हुए) मुझे सीदी -साधी कहानियां पसंद नहीं है और मुझे कहानियों में इतने सारे लेयर इनके साहित्य से ही मिलता है. मैं यहां सुजैनास सेवन हसबैंड का उदाहरण देना चाहूंगा. वह सिर्फ चार पन्नों की छोटी सी कहानी थी. जब मैंने वह कहानी पढ़ी तो मुझे लगा कि वह 400 पेजेस में तब्दील हो सकती है. स्पेशली रस्किन साहब ने जिस तरह अपनी मास्टरी से 10 साल की कहानी को एक पेज में समेटा था. वह कमाल का था. सो मैंने उनसे संपर्क किया और उनसे इस पर फिल्म बनाने की इच्छा जाहिर करते हुए इसे उपन्यास में ढालने को कहा क्योंकि यह उनकी कहानी उनके किरदार थे जो वे बेहद खूबसूरती से आगे बढा सकते थे. मुझे खुशी है कि उन्होंने मेरी बात मानी. मजे की बात यह है कि वे अब भी टाइपराइटर की बजाए हाथ से लिखते हैं. वह मुझे ओरिजिनल भेजकर झेराक्स खुद रखते थे.यकीन कीजिए उनकी हाथों से लिखी कहानी को पढ़कर मुझे लगता कि मैं उनका एकमात्र पाठक हूं. जो उन्हें पढ रहा हूं. शेक्सपीयर ने मुझे पूरी तरह से साहित्य से जोड़ दिया है. अब मैं हर तरह का साहित्य पढ़ रहा हूं. चाहे पुराने रचानकार हो या नये. शेक्सपीयर की सभी कृतियों के अलावा शरद जोशी की किताब मुद्रिका रहस्य पर फिल्म बनाने की मेरी दिल्ली ख्वाहिश है.

(मकबूल, ओंकारा, ब्लू अब्रेला, कमीने और सात खून माफ जैसी फिल्मों का निदर्ेशन कर चुके फिल्मकार विशाल भारद्वाज की प्रेरणा शुरू से ही साहित्य रहा है. उनकी अधिकतर फिल्में साहित्यिक कृतियों पर आधारित रही है फिर चाहे वह शेक्सपीयर के नाटक मैकबेथ पर बनी मकबूल हो या ओथेलो पर आधारित ओंकारा. साहित्यकार रस्किन बांड की किताब ब्लू अंब्रेला पर भी वे फिल्म बना चुके हैं. हालिया रिलीज उनकी फिल्म सात खून माफ भी रस्किन बांड की लघु कहानी सुजैनास सेवन हसबैंड पर आधारित थी.)