20160711

हां, स्टारडम खोने से डर किसे नहीं लगता : सलमान खान


सलमान खान फिल्म सुल्तान को अपनी कठिन फिल्मों में से एक इसलिए मानते हैं क्योंकि इस फिल्म में उन्हें शारीरिक रूप से काफी मेहनत तो करनी ही पड़ी है,पहली बार उन्होंने धोबी पछाड़ सीखी है. पेश है अनुप्रिया अनंत से बातचीत के मुख्य अंश

फिल्म को हां कहने की खास वजह क्या रही?
मैं किसी भी फिल्म को हां तभी कहता हूं, अगर मुझे फिल्म का पहला नैरेशन सुन कर मुझे बहुत मजा आता हो. मुझे लगता है कि ऐसी फिल्म करो कि सेट पे जाने का मन करे. यह नहीं कि सेट पर जाऊं और बाद में वहां हर किसी से पूछता रहूं कि पैक अप कब होगा तो वैसी फिल्म में मजा नहीं आता. इस बार फिल्म में मुझसे काफी मेहनत करायी गयी है. इतनी मेहनत मैंने कभी भी नहीं की थी. इस फिल्म में मैं शूटिंग से पहले वर्कआउट करता था. फिर फिल्म की शूटिंग होती थी और फिर लगातार हमलोग रिटेक प्रैक्टिस करते रहते थे. दरअसल, जब अली फिल्म की स्क्रिप्ट लेकर आये थे, मुझे सुल्तान की एक लाईन में कहानी पसंद आ गयी थी. दबंग में भी कहानी थी. घर की कहानी होगी तब भी हां नहीं करूंगा. जब तक कहानी पसंद न आये. अरबाज को तो मैं हमेशा कहता रहता कि दुरुस्त करो और दुरुस्त करो. मैं अरबाज की फिल्म दबंग 3 का भी हिस्सा रहूंगा.इसलिए मैंने तय किया कि मैं यह फिल्म जरूर करूंगा.
इस उम्र में आप और कौन-कौन सी चीजें सीखना चाहते हैं?
मेरी दुनिया थोड़ी उल्टी चलती है. मैं पहले चीजें कर लेता हूं और फिर सीखता हूं. जैसे मैंने पहले स्विमिंग की और फिर सीखा. मुझे याद है, सात-आठ साल का था. मुझे मेरे कजिन्स ने एक कुएं में फेंक दिया था और फिर मुझे  कहा तैर कर दिखाओ. मैंने कहा स्विमिंग नहीं आती तो सबने कहा. अब सीख जाओगे. मुझे  याद है, वहां एक सांप था,जिसे देख कर मुझे बहुत डर लग रहा था. लेकिन तैरते-तैरते सीख गया. अभी मैं गाना गाना सीखना चाहता हूं. लेकिन गाना सीखने से पहले तो मैं गा चुका हूं. और फिर गाना सीखना चाहता हूं. और मैं सीखूंगा. लोग मुझसे पूछते हैं कि इस फिल्म के लिए हरियाणवी सीखी क्या. मैं साफ कहता हूं कि इतना आसान नहीं है यह सब. मुझसे नहीं होता. आमिर कर लेता है. मेरी तो शूटिंग के बाद ही बैंड बज जाती थी. मैं टूटी फूटी काम चलाऊ, जितनी फिल्म को जरूरत है. उतना ही सीख पाया हूं. मैं फोक्सड काम नहीं कर पाता बहुत ज्यादा.
आपको कभी स्टारडम खोने का डर सताता है?
किस एक्टर को नहीं सताता. हर एक्टर इस बात से तनाव में रहता है. एक दिन उठो और अचानक तुम्हें कोई प्यार करने वाला न मिले. कोई तुम्हें देखना पसंद न करे. डर लगता है कि क्या होगा. मेरे पिताजी हमेशा कहते हैं कि अपना ख्याल रखना जरूरी है, इसलिए उन्होंने कहा कि मुझे अपना ख्याल रखना जरूरी है. मैंने फिर अपनी बॉडी, अपनी फिटनेस पर ध्यान देना शुरू किया. आखिर लोग हॉल में मुझे देखने आते हैं. पैसे खर्च करके. तो वे मेरी भद्दी शक्ल या बॉडी नहीं देखेंगे न, मैं चाहता हूं कि लोग बोले कि अरे देखो 50 का है. लेकिन लगता नहीं है. इसलिए खुद पर मेहनत करता हूं. स्मोकिंग छोड़ी. अल्कोहल छोड़ी. अपना ख्याल रखा है. वरना, अपना तो पत्ता साफ था न.
रईस आपके साथ रिलीज होने वाली थी. लेकिन उसकी रिलीज तारीख आगे बढ़ गयी. इस पर क्या कहना है आपका? 
मेरा मानना है कि इसे इस तरह न लें कि शाहरुख पीछे हटा या सलमान ने शाहरुख को पीछे हटा दिया. दोनों बड़े स्टार हैं और मुझे लगता है कि दो बड़े स्टार्स की फिल्में एक साथ रिलीज नहीं होनी चाहिए. इससे नुकसान होता है. चूंकि दोनों को जितने थियेटर्स चाहिए. उतने थियेटर्स नहीं हैं हमारे यहां. मैं तो बोलता हूं कि थियेटर बनाना बेहद जरूरी है. जितनी फिल्में रिलीज होती हैं. थियेटर्स नहीं होते. फिर निर्माता बेवजह पैसे बढ़ाता है टिकट के. यह सब झोल लगता. दिलवाले और बाजीराव के साथ यही हुआ. सो, सब अलग अलग टाइम पर आयें और सभी की फिल्में कमाई करें. मेरा यही मानना है. 
हॉलीवुड की फिल्मों ने एक के बाद एक हिंदी फिल्मों को पछाड़ा है. इस पर आपकी क्या राय है?
मेरी यही राय है कि हां, यह सोचनीय मुद्दा है. हमें डरना चाहिए. हम सब तो हॉलीवुड की तरह फिल्में बनाना चाहते हैं. लेकिन बना नहीं पाते तो कहीं के नहीं रह जाते. अपने जड़ों और हिंदुस्तानी फिल्में बनाना जरूरी है. हालांकि प्रेम रतन धन पायो जैसी फिल्मों को लोग यही कहते हैं कि वह आउटडेटेड फिल्में हैं. देखी सी लगती है. लेकिन असली सिनेमा वही है, क्योंकि हिंदुस्तानी है. इस फिल्म को विदेशी भारतीयों के बच्चों को पसंद आयी. फैन्स मेल से पता चलता है. इससे पता चलता है कि भारतीय फिल्मों को भारतीय रहना जरूरी है. वरना, हॉलीवुड ने पूरी तरह से धावा बोला है और यह संकेत है. हमारी इंडस्ट्री के लिए दुख की बात है. 
सुल्तान की जिंदगी से खुद कितने प्रभावित हुए हैं?
बहुत प्रभावित हुआ. खास बात यह आकर्षित करती है कि कैसे कोई व्यक्ति बिना किसी सुख सुविधा के आगे बढ़ने का जज्बा रखता है. फिर खुद को खोकर दोबारा अपनी शान को तलाशने और हासिल करने की सोच रखता है. साथ ही फिल्म में अभिनेत्री का जो किरदार, रियल जिंदगी में वैसी महिलाएं होती हैं, क्या जज्बा होता है उनमें, फोक्सड होते. जिंदगी में सिर्फ एक चीज हासिल करना होता. लालची नहीं होते. इन लोगों को देख कर आप आम सोचना शुरू करते हैं. रियलिस्टिक बनते हैं. 

किरदार ऐसे हों कि पांच साल भी याद रखें लोग मुझे : अनुष्का शर्मा


अनुष्का शर्मा पहली बार महिला पहलवान के किरदार में हैं. वे अपने इस नये अवतार से बेहद खुश हैं. फिल्म सुल्तान को लेकर वे चर्चे में हंै. पेश है अनुप्रिया से हुई बातचीत के मुख्य अंश

इस फिल्म में अपने किरदार की तैयारी आपने कैसे की?
मुश्किल तो था. चूंकि रेस्टलिंग में आप सामने से लड़ते हो. आपका चेहरा कभी किसी की आर्मफिट पर है. कभी कही हैं. कभी कमर में है.तो इन चीजों से आपको असहजता होती है. लेकिन मैंने इस असहजता को तुरंत दूर किया. अगर नहीं करती तो मैं फिर यह किरदार सही तरीके से नहीं निभा पाती. फिर मेरे मन में भी यह बात आयी कि मैं लड़की हूं और जो किरदार निभा रही. वह तो बहुत जोशिली है. सो, मैंने तय किया. जो भी अच्छे से परफॉर्म करूंगी ही. और फिर मैंने यह सब किया. तो मैंने अच्छे से यह सीख लिया. बाद में फिर मैंने भाषा सीखनी शुरू की. हरियाणवी सीखी. डायलॉग को मैं फोनेटिकिली लिखती थी. ताकि मैं जब उसे सीखूं तो वैसे ही सीखूं. मेरे लिए यह कठिन इसलिए भी हो गया था. चूंकि मुझे बहुत कम वक्त में सबकुछ सीख लेना था.मुझे छह हफ्ते से कम समय मिला इसके लिए.लेकिन जब फिल्म का पहला टीजर आया और लोगों ने कहा कि मैं किरदार में फिट दिख रही हूं तो मुझे लगा मेरी मेहनत सफल हो गयी.
यशराज फिल्म्स से ही आपने अपने करियर की शुरुआत की थी. फिर से यशराज की एक और फिल्म आप कर रही हैं. जब इस बैनर की फिल्म करती हैं तो क्या महसूस करती हैं?
मेरा सफर बहुत अच्छा रहा है.मेरे लिए यशराज घर जैसा है. मुझे यशराज ने अपने बैनर की सारी अच्छी फिल्में करने का मौका दिया है हमेशा. उनकी वजह से ही आज मैं यहां हूं. आदित्य ने उस वक्त मुझमें विश्वास जताया जब मुझ पर कोई विश्वास नहीं कर रहा था. खुद करन जौहर कहते आये हैं कि उन्होंने आदित्य को मना किया था कि वह मुझे कास्ट न करें बैंड बाजा में. लेकिन उन्होंने मुझे मौका दिया और बाद में धीरे-धीरे लोगों का यकीन मुझ पर जगा.
जो किरदार निभा रही हैं. उनसे वास्तविक जिंदगी में आप खुद कितनी प्रभावित हुई.
मैं काफी प्रभावित हुई. चूंकि यह एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसकी दुनिया गोल्ड मेडल पर आधारित है. वह ओलंपिक का गोल्ड मेडल जीतना चाहती है. उसे बहुत कुछ नहीं करना. तो ऐसे किरदार आपको प्रभावित करते हैं. आप फोक्स्ड होने की कला सीख पाते हैं. मैंने काफी कुछ सीखा है. साथ ही इसे महिला होने के नाते हर लिहाज से आपका मनोबल बढ़ता है. लड़की होने के बावजूद यह लड़की शादी व्याह के साथ अपना परिवार भी चलाती है और अपना काम भी भलिभांति संभालती है. यह सारी बातें मेरे लिए काफी मायने रखती है.यह एक सिंपल लेकिन बहुत प्यारी सी किरदार है.
सिनेमा कितना बदला है?
राइटर्स की भूमिका बढ़ी है. मेरा मानना है. अच्छी कहानियां अब लोगों को पसंद आने लगी है और अब प्रोडयूर्स भी चाहते हैं कि वे अच्छी कहानियां लेकर आयें. अच्छे स्टूडियोज लेकर आयें.बॉक्स आॅफिस पर भी अच्छी फिल्में बन रही हैं. बतौर एक्ट्रेस मुझे खुशी है कि मैं अच्छी फिल्में कर रही हूं. मुझे हर जगह दिखने में दिलचस्पी नहीं है. मेरे लिए एक्टिंग करना बहुत बड़ी बात है. मैं अच्छे किरदार निभा रही हूं. मैं  अपने किरदारों को दोहराना नहीं चाहती. मैं चाहती हूं कि पांच सालों के बाद अपनी फिल्मों को देखूं तो यह महसूस होना चाहिए कि हां, मैं कुछ ठोस काम किया और ठोस काम इसलिए कर रही, क्योंकि अच्छे आॅफर मिल रहे हैं.
क्या आप मानती हैं कि अभिनेत्रियों का करियर अच्छे काम करने के बावजूद एक वक्त के बाद थम जाता है. इसकी वजह आप क्या मानती हैं?
मुझे हमेशा इस बात से निराशा होती है कि लोग इस तरह की बातें क्यों करते हैं. कमबैक जैसी बातें क्यों करते हैं. कई बार तो हीरो भी ब्रेक पर जाते हैं. साल में उनकी फिल्में नहीं आती हैं. लेकिन फिर भी वे कामयाबी हासिल करते हैं. उनसे कोई नहीं पूछता. उनको कोई नहीं कहता कि यह उनकी कमबैक फिल्म है. मुझे याद है एक साल शाहरुख की कोई फिल्म नहीं आयी थी. लेकिन लोगों ने उन्हें भी कुछ नहीं कहा. अभिनेत्रियां किसी से कम मेहनत थोड़ी करती हैं और उन्हें उनका सम्मान मिलना ही चाहिए.
लड़कियों के लिए आपको क्या लगता  है रेस्टलिंग में कितनी संभावना है?
मेरा मानना है कि हरियाणा तो इसमें अग्रणिय रहा है. वहां काफी मौके मिलते हैं. लेकिन मैं चाहती हूं कि उन्हें और सुविधाएं मिले. स्कोप खुले. एक्पोजर मिले. तभी हम बेहतर काम कर सकते  हैं. लड़कियां तभी इस क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहित होगी.
आपकी और कौन सी फिल्में आने वाली है?
मैं शाहरुख के साथ इम्तियाज की फिल्म कर रही हूं और ऐ दिल है मुश्किल करन की फिल्म है. और भी कई फिल्मों की स्क्रिप्ट पढ़ रही हूं.
अब प्रोडयूर बनने के बाद प्रोडयूसर बनने के कितने गुण आ गये हैं?
मैंने अब थोड़ा बॉक्स आॅफिस, बजट का गणित समझना शुरू किया है. बाकी तो भाई देखते हैं. संभालते हैं. क्रियेटिव स्तर पर काफी नया करने की कोशिश जारी रहती है.

स्वतंत्र सिनेमा बनाना कठिन तो है लेकिन सफर मजेदार है : अशोक यादव


कैरी आॅन कुत्तों... फिल्म के शीर्षक ने ही बॉलीवुड में इस फिल्म को चर्चित बना दिया था. फिल्म के निर्देशक अशोक यादव मनोरंजन के साथ फिल्म में व्यंग्यात्मक तरीके से अपनी बात रख रहे हैं.  अशोक की यह फिल्म स्वतंत्र फिल्म के रूप में उभरी है. वे इस सफर को बेहद रोचक तरीके से तय करते आये हैं.फिल्म के बारे में विस्तार से उन्होंने अनुप्रिया अनंत से बातचीत की.

 शुरुआत कैसे हुई
मैं मध्य प्रदेश के छोटे से शहर दतिया से हूं, जहां से मैंने अपनी प्राथमिक शिक्षा हासिल की, इसके बाद मैं ग्वालियर, इंदौर और दिल्ली में रहा. जहां मैंने आगे की पढ़ाई पूरी की. फिर अंतत: मुंबई आया. आखिर यह मेरी मंजिल जो थी. चूंकि मैं फिल्म मेकिंग को लेकर बहुत ज्यादा क्रेजी था. हर भारतीय दर्शक की तरह मैं भी हिंदी फिल्म का दर्शक रहा हूं. और जब मैं कॉलेज में था. उसी दौरान मैंने अपने एक दोस्त की शॉर्ट फिल्म देखी थी. वह फिल्म ब्लैक एंड वहइट में थी. वही से मेरा प्यार जागा. वहां से मैंने कैमरा खरीदा और काम शुरू किया. मैंने अपनी मां की सोने की चेन बेंच दी थी. जो उन्होंने मुझे गिफ्ट की थी. मैंने शॉर्ट फिल्मों से ही एक्सपेरिमेंट करना शुरू किया. मैंने मोबाइल से फिल्में बनायी, मेरी मोबाइल से बनी फिल्म एडवेंचर्स आॅफ मिस्टर आइ को बेस्ट फिल्म अवार्ड मिला इंटरनेशनल सेलफोन सिनेमा प्रतियोगिता में.
 मुंबई का सफर
यहां से मेरा नया सफर शुरू हुआ. मैं मुंबई आया. मेरा कोई कनेक्शन नहीं है फिल्म इंडस्ट्री में. मुझे अशोक मेहता सर के साथ काम करने का मौका मिला, जो कि लीजेंडरी सिनेमेटोग्राफर माने जाते हैं. उन्होंने शूटिंग के आखिरी दिन कहा कि किसी को अस्टिट मत करो. बस काम शुरू करो. और फिर वहां से मैंने अपनी जर्नी की शुरुआत की. 
कैरी आॅन कुत्तों की कहानी
कैरी आॅन कुत्तों ऐसे टीनएजर्स की कहानी है, जो काफी क्रांतिकारी हैं. बलिया की कहानी है. फिल्म के को राइटर हिमांशु ओंकार त्रिपाठी हैं. वे खुद बलिया से हैं तो उन्हें वहां के बारे में काफी जानकारी है. याह जगह अपने क्राइम में रिबेलियस नेचर के लिऐ बहुत जानी जाती है. मेरा गांव भी इस वजह से जाना जाता है. और बचपन से यह सारी बातें सुनता आ रहा था. तो मुझे लगा कि इस पर फिल्म बननी चाहिए.और मैं चूंकि इससे वाकिफ हूं तो अच्छी तरह से अपनी कहानी कह पाऊंगा.
स्वतंत्र फिल्म बनाना एक चुनौती
हां, यह सच है कि  स्वतंत्र फिल्म बनाना एक चुनौती होती है. आपको फिनांशियल ही नहीं कई परेशानियों से जूझना होता है. फिल्म का पूरा प्रोसेस अलग होता है. लेकिन आपके पास सर्पोटिव टीम हो तो काम आसान हो जाता है. फिर काफी मजा आता है. हर दिन आप पोजिटिव एनर्जी के साथ काम करते हैं. लेकिन यह है कि ऐसी फिल्में बनाते हुए आप सबकुछ सीख जाते हैं. यह लर्निंग प्रोसेस मैंने एंजॉय किया है.  
फिल्म का अंदाज
चूंकि मैं और मेरे को राइटर रत्ती से हैं तो हम जानते हैं कि वहां किस तरह की बोली बोली जाती है. तो हमारे लिए यह गढ़ना बहुत कठिन नहीं था. हमारी कोशिश रही कि हमारे एक्टर्स एक्चुअल डायलेक्ट में ही बात करें. एंबीयंस भी सही रहे. सबकुछ स्वभाविक लगे. बनावटी न लगे. ताकि छोटे शहर का वह माहौल बड़े परदे पर सच नजर आये. 
कैरी आॅन कुत्तों शीर्षक क्यों
फिल्म में कैरी मेरे किरदार का नाम है और कांदिबरी दूसरा किरदार है जो अपनी ड्रीम को पूरा करने के कोशिश में लगा रहता है. वह मिलिनेयर बना चाहता है. इस तरह कैरेक्टर्स को लेकर फिल्म का शीर्षक सोचा. टीनएजर्स को भी ध्यान में रख कर लिखा है शीर्षक़.
नये कलाकार क्यों
चूंकि फिल्म का थीम ऐसा है. मुझे लगा कि सभी नये लोग ही परदे पर इसकी फ्रेशनेस को बरकरार रख सकते हैं. साथ ही मेरी भी पहली फिल्म है. तो तर्जुब करने का मौका अधिक होगा. इसलिए मैंने तय किया कि मैं अपने सात साथ नये कलाकारों के साथ काम करूंगा. नये लोग ज्यादा पैशन के साथ काम करते हैं और वे भी चाहते हैं कि उन्हें अधिक एक्सपोजर मिले. स्वाभाविक है काम बेहतर ही होगा इससे.
नये लोगों को टिप्स
मैं नये लोगों को यहीकहूंगा कि मेरा भी फिल्मी बैकग्राउंड नहीं था. लेकिन फिर भी मेरी पहली फिल्म रिलीज हो रही है. तो सपने देखें और जुनून के साथ उसे पूरा करने की कोशिश में जुटें.  हर मेहनत करने वालों को सफलता मिलती ही है.

लड़के की मैनरिज्म समझने में वक्त लगा : अदिति भाटिया


 अदिति भाटिया स्टार प्लस के नंबर वन शो ये हैं मोहब्बते में कमाल दिखा रही हैं. उनका रुही का किरदार बेहद पसंद किया जा रहा है. पेश है अनुप्रिया अनंत से हुई बातचीत के मुख्य अंश

 अब तक आपका अनुभव कैसा रहा है?
 अब तक का अनुभव अच्छा रहा है.जो काम आप करते हैं, उसमें अगर आपको मजा आ रहा होता है, तो अनुभव हमेशा शानदार ही होता है. अपने साथी कलाकारों से मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है. हम शो में बहुत मस्ती करते हैं.मैं दूसरे प्रोजेक्ट के लिए 10 दिनों तक कश्मीर में थी और मुझे ये है मोहब्बते की बहुत याद आयी.मुझमें और कृष्णा में बहुत बनती है. हम साथ में शॉपिंग के लिए बहुत जाते हैं.शो में बहुत से दिलचस्प मोड़ आने वाले हैं. दर्शकों की प्रतिक्रिया को लेकर उत्सुक हूं.
इस शो में कई दिग्गज वरिष्ठ कलाकार हैं. उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?
 सबसे काफी कुछ सीखा है. मैं उनके साथ स्क्रीन पर न दिखूं. फिर भी सभी से बातें करती हूं. सेट पर ज्यादातर वरिष्ठ कलाकारों की कहानियां और उनके अनुभवों को सुनते हुए वक्त बीतता है. हम बहुत मस्ती करते हैं और हर इंसान से बहुत कुछ सीखने को मिलता है. कुल मिला कर ये हैं मोहब्बते के लिए काम करना मेरी जिंदगी के खुशनुमा दिनों में से एक है.
 शो में किस तरह के मोड़ आने वाले हैं?
 मैं बताना चाहूंगी कि इस बात की खुशी है कि दर्शकों को शो का ट्रैक पसंद आ रहा है. अभी कई तरह के मोड़ आयेंगे और दिलचस्प मोड़ आने वाले हैं.
 शो से जुड़ने से पहले कभी यह शो देखती थीं?
 मैं इसे नियमित रूप से देखती थी और सोचती भी थी कि काश किसी दिन इस शो का हिस्सा बन पाती. यह इतना लोकप्रिय शो है कि कोई भी कलाकार इसका हिस्सा बनना चाहेगा. मुझे याद है जब बालाजी से मुझे कॉल आया था कि  मुझे चुन लिया गया है तो मेरी खुशी और रोमांच की सीमा नहीं थी.जब मैंने शूटिंग शुरू की तो यह सब एक सपने के सच होने जैसा लग रहा था. मैंने बहुत सारे शोज किये हैं, लेकिन मेरे प्रिय शोज में से एक है. एक तो मुझे इतने शानदार कलाकारों के साथ काम करने का मौका मिला. और इसमें मैं लड़के की चुनौतीपूर्ण भूमिका भी निभा पायी.
 मन में यह डर था कि पता नहीं दर्शक बड़ी रुही को पसंद करेंगे या नहीं?
 हां, मन में डर तो था ही, क्योंकि नन्ही रुही ने काफी अच्छे तरीके से अपना किरदार निभाया था. तभी तो वह आज भी अलग रूप में शो का हिस्सा बनी हुई है. और जब भी लीप आता है.दर्शकों की दिलचस्पी को लेकर प्रश्न चिन्ह लगते ही हैं.लेकिन खुशी इस बात की है कि दर्शकों ने मुझे भी स्वीकार किया.
 लड़के की भूमिका निभाने को लेकर मन में क्या बात थी?
 मैं काफी कम उम्र से काम करने लगी थी. यह शो मैंने दिव्यांका त्रिपाठी जी की वजह से की थी.लड़के की भूमिका निभाना मजेदार अनुभव है.लड़कियां समझदार होती हैं, जबकि लड़के बेपरवाह होते हैं. लड़के की तरह व्यवहार करने में पहले परेशानी होती थी. लेकिन अब मुझे आदत हो गयी है. मेरे बाल बहुत बड़े हैं और मेरी कमर तक आते हैं, जिसकी वजह से विग पहनने के वक्त मुझे काफी वक्त लग जाता था.सेट पर लड़के की मैनरिज्म को सीखने में आदी मेरी मदद करता था. अब तो मुझसे चाहे जैसे भी रोल करवालो. मैं जरूर कर लूंगी.
 इनके अलावा किन चीजों में दिलचस्पी है?
 मुझे ट्रैवलिंग और पढ़ना पसंद है. काफी किताबें पढ़ती हूं.

> चुनौतियों के दंगल में एक सुपरस्टार



 आमिर खान ने बॉलीवुड में गौर करें तो स्पोर्ट्स फिल्मों का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व किया है. खास बात यह रही है कि वे फिल्में कामयाब रही हैं. इस बार भी वे रेसलिंग लेकर आ रहे हैं . पेश है अनुप्रिया अनंत की रिपोर्ट

 आमिर खान जब कोई किरदार निभाते हैं, तो वे बतौर एक्टर उस किरदार में खुद को ढालने के लिए शिद्दत से मेहनत करते हैं. यही वजह है कि अगर चुनौती के रूप में उनके सामने कोई स्पोर्ट्स फिल्म भी आये तो वे अपनी उम्र से अधिक मेहनत करने में जुट जाते हैं. नतीजन वे दर्शकों का दिल जीत लेते हैं. आमिर मानते हैं कि बॉलीवुड में स्पोर्ट्स पर बनी फिल्मों को लेकर सोच अलग है.लेकिन फिर भी वे इसे कामयाबी मानते हैं कि उनकी सारी फिल्मों को दर्शकों ने पसंद किया है.
> दंगल
 हाल ही में आमिर खान ने दंगल फिल्म का पोस्टर रिलीज किया है, जिसमें वे चार बेटियों के पिता के रूप में हैं, जो कि सच्ची घटनाओं पर आधारित है. इस फिल्म के पोस्टर में वे जिस अंदाज में नजर आ रहे हैं, उससे साफ है कि उन्होंने किरदार में ढलने के लिए कितनी मेहनत की है. इस फिल्म के लिए तो उन्होंने अपने वजन पर एक ही साल में दो बार काम किया है. यही नहीं उन्होंने अपने बालों के रंग पर भी काम किया है. यह किसी सुपरस्टार के लिए एक बड़ी चुनौती रही होगी कि उन्होंने चार बेटियों के पिता का किरदार निभाने का निर्णय लिया. आमिर खुद मानते हंै कि यह उनके लिए बड़ी चुनौती थी. चूंकि वे फिलवक्त बुजुर्ग के किरदार में नजर नहीं आना चाहते थे. वे अपनी भविष्य की फिल्मों को लेकर चिंतित थे कि कहीं बुजुर्ग का किरदार निभाऊं और फिर उन्हें फिल्में ही न मिले. लेकिन उन्हें कहानी इतनी पसंद आ गयी कि उन्होंने नितेश तिवारी को फौरन फिल्म बनाने के लिए कह दिया. वरना, उन्होंने मन बनाया था कि वे यह फिल्म जब 60 साल के हो जायेंगे तब बनायेंगे.
 लगान
 फिल्म लगान को लेकर भी आमिर के मन में कई उलझने थीं. वे कई बार इन बातों को सोच रहे थे कि न जाने यह फिल्म बन पायेगी या नहीं और जिस तरह से लगान बनने में कई दिक्कतें आयी थीं. आमिर फिल्म को लेकर आश्वस्त नहीं थे. आशुतोष को भी फिल्म को लेकर कई लोगों ने मना कर दिया था. कोई इतनी महंगी फिल्म पर बाजी नहीं खेलना चाहते थे. लेकिन ऐसे में आमिर ने हां कह कर सबको चौका दिया था. सभी ने फिर भी आमिर को राय दी थी कि वह गलत निर्णय ले रहे हैं. इतनी महंगी फिल्म नहीं चलेगी और आज के दौर में कौन क्रिकेट मैच पर बनी फिल्म देखना पसंद करेगा. लेकिन आमिर ने उस वक्त भी हिम्मत जुटायी और फिल्म का निर्माण हुआ. आखिरकार आमिर को कामयाबी मिली. आमिर ने भुवन में किरदार में खुद को बखूबी ढाल लिया और दर्शकों को वे बेहद पसंद आये थे.
 अव्वल नंबर
 आमिर क्रिकेट प्रेमी रहे हैं. शायद यही वजह है कि शुरुआती दौर में भी उन्होंने स्पोर्ट्स पर बनी फिल्म में काम किया था. शुरुआती दौर की उनकी फिल्म अव्वल नंबर देव आनंद के साथ उनकी पहली फिल्म थी. 
 जो जीता वही सिकंदर
 जो जीता वही सिकंदर टीनएज की कहानी थी. इस फिल्म में साइकिलिंग को महत्वपूर्ण तरीके से दर्शाया गया था. फिल्म दर्शकों को खूब पसंद आयी थी. फिल्म में आमिर खान का चुटीला अंदाज भी दर्शकों को बेहद खास लगा था. फिल्म के गाने आज भी दर्शक सुनना और देखना पसंद करते हैं.
 आमिर की बिटिया को भी है फुटबॉल से लगाव
> आमिर की बेटी भी फुटबॉल में काफी दिलचस्पी लेती हैं और हाल ही में उन्होंने सेलिब्रिटीज के साथ फुटबॉल मैच का भी आयोजन किया था, जिसमें कई सेलिब्रिटीज ने शिरकत होकर उनका हौसला भी बढ़ाया 
शाहरुख़ खान ने ईद के मौके पर खासतौर से मीडिया से बातचीत की. उन्होंने इस मौके पर अपने बचपन की कई यादों को भी शेयर किया. पेश है अनुप्रिया और उर्मिला से हुई बातचीत के मुख्य अंश 

बच्चों को कोई इदी नहीं देता 
शाहरुख़ खान ने बातचीत के दौरान कि अब वह बच्चों को कोई ईदी नहीं देते हैं।  पहले दिया करते थे। खुद उन्हें बचपन में ११ रूपये मिला करते थे।  लेकिन अब न तो उन्हें ईदी मिलती है और न ही वे बच्चों को देते हैं।  वे कहते हैं कि जब वे अपने बच्चों को इस दिन सफ़ेद लिबाज पहनने को बोलते हैं तो बच्चों की चाहत होती है कि वे अपने तरीके के लिबाज पहने।  लेकिन वे अपने पिता का मन रखने के लिए पहन लेते हैं। खासतौर से छोटे बेटे अबराम को सफ़ेद कपड़े बेहद पसंद आते हैं। 

चलो पापा बच्चे आ गए
शाहरुख़ खान ने बताया कि  उनके छोटे बेटे अबराम  को भी उनके फैंस से मिलना बेहद पसंद है।  किसी खास पर्व या जन्मदिन के मौके पर शाहरुख़  अबराम तैयार हो जाते हैं और शाहरुख़ से जाकर कहते हैं कि पापा चलो बच्चा हैज कम।  वे फैंस को बच्चा कह कर बुलाते हैं और वे खुद शाहरुख़ को बार बार हाथ खींच कर बाहर बालकनी तक ले आते हैं।  अबराम  को हर पर्व को एन्जॉय करना पसंद है 

क्या कहते हैं अपने बच्चों को 
शाहरुख़ अपने तीनों बच्चों के बारे में  कहते हैं कि मेरे पास खुदा ने  सुहाना के रूप में एक प्रीटी लेडी दी है।  आर्यन के रूप  में हैंडसम हंक दिया है और अबराम  के रूप में मुझे लिटिल गैंगस्टर दिया है।  मेरी दुनिया उनमें ही सिमटी हुई है 

कुछ इस तरह हो रही है बेटे की तयारी 
शाहरुख़ खान अपने बड़े बेटे को एक्टिंग स्कूल में दाखिला दिलाने जा रहे हैं।  लेकिन उन्होंने साफ़ किया है कि  इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि आर्यन एक्टर ही बनेंगे।  कोर्स पूरा करने के बाद यह उनकी मर्जी होगी।  उन्होंने बताया कि  उन्होंने आर्यन के लिए फिल्मों की सूची बना कर उन्हें सौंपी है और कहा है कि  वे वर्ल्ड सिनेमा के साथ साथ भारतीय सिनेमा को भी जरूर देखें।  शोले उन फिल्मों में शामिल है। 

तीनों मिलकर बिरयानी खाएंगे 
शाहरुख़ खान ने बताया कि  पिछले कई सालों से तीनों खान एक दूसरे के घर बिरयानी का आदान प्रदान करते हैं और यह मुमकिन है कि  कभी तीनों खान किसी जगह पर बैठ कर तीनों बिरयानी को मिक्स करके साथ साथ तीनों बिरयानी का मजा लें।  साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि  उन्हें सलमान के घर के पकवान सबसे अधिक पसंद हैं।  चूँकि वहां हर मौके पर बहुत ही स्वादिष्ट पकवान बनते हैं। 

20160624

मेरी सोच से बिल्कुल ऊपर का सनकी है टॉमी : शाहिद कपूर


शाहिद कपूर हैदर के बाद एक बार फिर से अलग किरदार में हैं. फिल्म उड़ता पंजाब को लेकर काफी विवाद हुए. लेकिन अंतत: फिल्म आज रिलीज हो रही है.  शाहिद कपूर इस फिल्म को खास मानते हैं. पेश है अनुप्रिया अनंत और उर्मिला कोरी से हुई बातचीत के मुख्य अंश

हैदर के बाद एक बार फिर से एक सनकी किस्म का किरदार निभा रहे हैं.ऐसे किरदारों को निभाने में मजा आता है?
डर लगता है.लेकिन मजा भी आता है. टॉमी लेकिन बिल्कुल नेक्स्ट लेवल का सनकी है. मैंने इसका आधा भी अब तक प्ले नहीं किया है.अभिषेक ने हैदर देखने के बाद कहा था कि वह सीन जहां तुम उस आदमी को शूट करना चाहते हो. लेकिन शूट नहीं करते. वहां से टॉमी का किरदार शुरू होता है. तो आप समझ सकते हैं कि उसे इस फिल्म के किस तरह के सनकी किरदार की जरूरत थी. बहुत चैलेंजिंग किरदार है. मेरे लिए कठिन किरदार है. लोगों ने इससे पहले मुझे इस तरह के किरदार में नहीं देखा है.
इस तरह के किरदार निभाना आपके लिए मानसिक रूप से भी एक चुनौती रहती है?
हां, बिल्कुल रहती है. क्योंकि मैं तो ऐसा हूं ही नहीं बिल्कुल भी निजी जिंदगी में. एक तो वह रॉकस्टार है. तो उसका पर्सोना है. फिर वह कोकिन हाइ है तो इससे भी उसका पर्सोना अलग रहता है. उसका इमोशनल पार्ट हमेशा लाउड रहता है. टॉमी बहुत हाइपर है. हमेशा उत्तेजित रहता है. लेकिन फिर भी टॉमी सिंह से आपको प्यार हो जायेगा. टॉमी सिंह सुपरस्टार है तो उसे वह पर्सनैलिटी भी बरकरार रखनी थी. वही दूसरी तरफ वह कोकिन एडिक्ट है तो वो लोग अधिक खाते नहीं थे. मुझे दोनों तरह से खुद को तैयार रखना पड़ता था. मुझे फिट भी रहना था और हाइपर भी रहना था. खाना भी था और अंडर इटिंग पर भी रहना था. मुझे बहुत कॉफी पीनी पड़ती थी. यह किरदार निभाते हुए मुझे बहुत थकान हुई है, क्योंकि मुझे हर सीन में हाइपर रहना पड़ा है. ज्यादातर सीन रात में शूट हुए हैं. तो मैं सोता भी सुबह में था. 
फिल्म को लेकर काफी विवाद हुए. इस पर आपको क्या कहना है?
मैं तो सबसे पहले यह कहूंगा कि हम सेंसर बोर्ड कहना बंद करें. बेहतर है कि जो नाम है बोर्ड का वह हम सही से लें. सीबीएफसी. हमारी किसी से भी दुश्मनी नहीं है. व्यक्तिगत तौर पर. हमारी लड़ाई अपनी फिल्म को लेकर थी. और हमारे प्रोडयूर्स ने वह लड़ी और जीत हासिल हुई है. इस बात की हमें खुशी है. फिल्म अपनी रिलीज तारीख पर रिलीज हो रही है. 
फिल्मों को हमेशा इन बातों के लिए टारगेट किया जाता रहता है कि वे युवाओं को बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाती है. साथ ही फिल्म स्टार्स फर भी यह आरोप लगते रहते हैं. इस बारे में आपकी क्या राय है?
मैं नहीं मानता. मैं बिल्कुल नहीं मानता. फिल्म का यह जो कांसेप्ट है. आप फिल्म देखेंगे तो खुद समझेंगे कि फिल्म ड्रग या किसी चीज को प्रोमोट नहीं कर रही न ही कोई मेसेज लेकर आ रही. हां, मगर एक इश्यू पर बात कर रही है. और वह जरूरी है.कर्मशियल फिल्म है चूंकि यह तो इसे लोग अलग नजरिये से देखते हैं और खासतौर जब स्टार्स इसमें शामिल हो तो. मेरा मानना है कि कुछ फिल्में देखने के बाद उसका इंपैक्ट रह जाता है. उड़ता पंजाब उनमें से एक होगी. मैं चाहता हूं कि लोग इसे बोरिंग फिल्म की तरह देखने न जायें. इसका काम एंटरटेनमेंट है. टॉमी ऐसा किरदार है, जिसको यूथ देखना पसंद करेंगे.
टॉमी जैसे रियल किरदार इमोशनल होते हैं?
टॉमी बहुत इमोशनल है.टॉमी इगोस्टिक है, बदतमीज है. लेकिन फिर भी आप उससे प्यार करने लगेंगे, क्योंकि आप उसे देख कर महसूस करने लगेंगे कि वह दिल का बुरा नहीं है  और इसलिए उसका नाम टॉमी है. वह बच्चे की तरह है. उसे पता नहीं है कि उसे क्या करना है. कोकिन एडिक्ट के साथ भी ऐसा होता है, जब वे नशे में होते हैं वे ओवर कांफीडेंट होते हैं और जब वह लो होते हैं तो वे डिप्रेशन में होते हैं. 
यह एक अलग मिजाज की फिल्म लग रही है. चूंकि फिल्म में चार बड़े स्टार्स हैं, लेकिन आपस में उनका कनेक् शन नहीं है?
इस फिल्म में अलग तरह के कैरेक्टर हैं. सभी की अपनी जर्नी है फिल्म में. डायमेटिकली अलग बैकड्रॉप हैं. 
आप कितने  वाकिफ थे इस विषय के बारे में फिल्म से जुड़ने से पहले?
मैं कहूंगा कि यहां बैकड्रॉप पंजाब है, लेकिन समस्या सिर्फ पंजाब की नहीं है. इस जेनरेशन की है. इस देश की है. युवा बहुत जल्दी आते हैं ड्रग के चपेट में. सभी कूल बनने की चक्कर में यह सब करने लगते हैं. आने वाले समय में यह एक महत्वपूर्ण इश्यू बनेगा.
आप जब 17-18 साल के थे. तो आप किस तरह की जीवनशैली में रहना पसंद करते थे?
मैं तो बहुत सामान्य सी जिंदगी जीता था. पार्टी कभी कभार कर लिया तो कर लिया. क्लासेज बंक करता था. लेकिन डांस क्लासेज करने के लिए शामक डाबर के पास क्लासेज लेता था. कूल दिखने के लिए मैं डांस करता था. डांस को लेकर मैं बचपन से दिलचस्पी लेता था. चूंकि मेरी मां क्लासिकल डांसर रही हैं तो वही से प्रेम चढ़ा था डांस करने का. मैं बेली डांस करना पसंद करता था.
आपने शुरुआत वीडियो एलबम से की थी.उस दौर में कई टैलेंट को वीडियो एलबम की वजह से मौके मिले. लगता है कि वीडियो एलबम का वह दौर कभी वापस आयेगा?
उस दौर में वीडियो एलबम में मौके नहीं मिलते थे. अब तो फिल्मों में आसानी से मौके मिल जाते हैं. उस वक्त मैंने आर्यन का एक वीडियो किया था. उस वक्त कुत्ते को ज्यादा अहमियत दी गयी थी मुझसे. तो मैं उससे बहुत ईर्ष्या कर रहा था. अपने दोस्तों के बीच लोग खुश हो जाता था. लेकिन सच कहूं तो उस वक्त मैं बहुत डरा हुआ था कि चांस मिलेगा भी नहीं काम करने का. क्या मुझे यह लाइन छोड़ देनी चाहिए. आज आसान है दिखना. उस वक्त दिखना बहुत कठिन था. आज तो सोशल मीडिया से बहुत कुछ चीजें आसान हो गयी हैं. उस वक्त लोग नये लोगों को मौका देने से डरते थे.