20160206

अपने स्वभाव की वजह से मिस्टीरियस लगती हूँ : तब्बू


फिल्म हैदर में हम एक ही वक्त पर गजाला की नजाकत देखते हैं तो अगले ही पल वह हमें इंटेंस किरदार से चौंकाती हैं. फिल्म तलवार में वे चंद दृश्यों में नजर आयी हैं. लेकिन थियेटर में बैठे दर्शक उन्हें देख चहक उठते हैं. दृश्यम की पुलिस अफसर के तेवर देख दर्शक भी चौंकते हैं.फिल्म फितूर में बेगम हजरात की भूमिका में भी उनका अलग ही आकर्षण हैं. बात हो रही है तब्बू की, जिन्हें जब भी अपने किरदारों को जीने के मौके मिलें. वे खुल कर जीती हैं. छैई छप्पा छई करती हुई यह लड़की कब कौन सा करिश्मा कर दें, किसी को नहीं पता. शायद यही वजह है कि आज भी तब्बू निर्देशकों की पहली पसंद हैं.
आप अपनी फिल्मों को लेकर काफी सजग रही हैं. फिर फितूर को तीन दिनों में हां कैसे कह दिया?
दरअसल, जब आपके सामने अच्छे प्रोजेक्ट्स होते हैं. तो आपको चूजी होने की जरूरत नहीं पड़ती. इस फिल्म में मुझे बहुत अच्छा किरदार मिला है. अच्छे निर्देशक का साथ मिला है.इतने अच्छे को-स्टार्स मिले हैं. मेरा मानना है कि इन सब चीजों से ही आपकी फिल्में अच्छी बनती हैं.
आप जब किसी फिल्म से जुड़ती हैं, तो इसे दर्शक भी गारंटी मान लेते हैं कि फिल्म में कुछ तो अच्छा जरूर होगा. आप फिल्मों की ब्रांड हैं अब. आप इस प्रतिक्रिया को किस तरह लेती हैं?
मैं वाकई में इस बारे में काफी सोचती हूं, क्योंकि मेरे लिए फैन मायने रखते हैं. हां, यह सच है कि कई बार आपको पता नहीं चल रहा होता है कि लोग किस तरह से आपके काम पर रियेक्ट कर रहे हैं. लेकिन जब पता चलता है तो यह भी महसूस होता है कि यह मेरी भी जिम्मेदारी है कि मैं अपना काम अच्छे तरीके से करूं, क्योंकि जब कोई किसी चीज का इंतजार करता है.तो उसे निराश नहीं होना चाहिए. मैं इस बात का खास ख्याल रखती हूं. और मैं हमेशा यही कोशिश करती हूं. लेकिन होता यह है कि फिल्म मैंने नहीं बनाई होती है. सो, मैं सिर्फ अपने परफॉरमेंस की जिम्मेदारी ले सकती हूं कि मैं संतुष्ट करूं. 
आप सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अब भी नहीं हो. लेकिन आप फैन्स को महत्व देती हैं. फिर फैन्स को इस बारे में कैसे जानकारी मिलेगी कि आप उनकी कद्र करती हैं. इस दौर में किस तरह कनेक्ट कर पाती हैं?
मैं मुझे लगता है कि हमेशा से ही अपने काम के जरिये ही लोगों से जुड़ना चाहती हूं. पहले  तो सोशल नेटवर्किंग नहीं था. फिर भी हमारे फैन्स थे ही. आॅडियंस और एक्टर का रिलेशनशीप तो था ही. मेरे ख्याल से मेरे दर्शक मेरा काम देखने जाते हैं.चाहे मैं उनसे मिलूं या न मिलूं. वो प्यार उनका मेरे काम के लिए है. 
आपने अपनी निजी जिंदगी में एक मिस्ट्री गढ़ रखी है.इसकी कोई खास वजह है?
नहीं, मुझे नहीं मालूम कि मैंने जानबूझ के क्रियेट किया है. या फिर ऐसा हो गया है.लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि यह मेरे स्वभाव की वजह से भी है. मुझे ऐसा लगता है कि मैंने अपनी जिंदगी जिस तरह से जी है. लोगों के जेहन में यह बात आ गयी है कि मैं मिस्टीरियस हूं. हम दरअसल, एक किस्म से लोगों को सोचना चाहते हैं, जो हमको अच्छा लगता है. तो शायद उनके दिमाग में कहीं फिट होती है मेरी मिस्टीरियस दुनिया और इमेज़. लेकिन इस इमेज में कितनी सच्चाई है. वह मिस्ट्री है भी कि नहीं. अगर है ही तो ठीक ही है. मैं ऐसा मानती हूं.मैंने हमेशा से ही खुद से अधिक अहमियत काम को दिया है. मैं काम के सामने और किसी चीज के बारे में नहीं सोचती. और काम के वक्त काम ही मेरी दुनिया है. फिर अगर वह मिस्टीरियस भी है तो मुझे कोई दिक्कत नहीं.
फिल्मों से आप जब खुद को अलग  करती हैं तो क्या कर रही होती हैं?
मुझे ट्रेवलिंग बहुत अधिक पसंद है. म्यूजिक सुनना और गाना सुनना मुझे बेहद पसंद है. ट्रैवल डेस्टिनेशन में फोटोग्राफी करना पसंद है मुझे. लिखना भी अच्छा लगता है. हां, मगर इसका यह कतई मतलब नहीं कि मुझे स्क्रिप्ट लिखने में कोई दिलचस्पी है या मुझमें स्क्रिप्ट लिखने की क्षमता है. मैं बकवास थॉट्स लिख लेती हूं.
हर फिल्म एक कलाकार को निखरने में कितना सहयोग करती है?
मुझे लगता है कि हर कलाकार के लिए उसकी फिल्म का अहम योगदान होता है. उसे निखारने और संवारने में. मुझे अब यह समझ आया है, क्योंकि एक तो आप वह किरदार जी रहे होते हैं, फिर इतने सारे इमोशन्स को निभा रहे हैं. इतने सारे लोगों से इंटरैक्ट कर रहे होते हैं. नये लोगों के साथ, पुराने लोगों के साथ. अनजान लोगों के साथ, नये माहौल के साथ, या फिर आप फिल्म के बहाने नयी जगह देखते हैं. हर चीज आपकी पर्सनैलिटी में एक-एक परत जोड़ती जाती है.और मेरी हमेशा ही यही कोशिश होती है कि इससे मेरी पर्सनल ग्रोथ कितनी होगी. तो मैं हर चीज के सक्सेस से मैं अपने आप को डिफाइन करती हूं कि इस एक्सपीरियंस से मैंने कितना सीखा. इस अनुभव ने मेरी पर्सनैलिटी में क्या चीजें नयी जोड़ीं. तो वह मेरे लिए सक्सेस है. फितूर से भी मैंने काफी कुछ सीखा है. खूबसूरत-सा अनुभव रहा. मैंने फिल्म के दौरान कोई बैगेज या प्रेशर महसूस नहीं किया. 
आप होमवर्क करती हैं?
इस फिल्म में लुक पर काफी काम किया गया है. फिल्म में जो बेगम है. वह रॉयल है. उसका अपीयरेंस ही अलग सा है. तो उस जमाने में रहती हैं. 30 साल पहले के दौर की है वह दिमागी तौर पर. तो उसकी जिंदगी थम गयी है. हेरिटेज की तरह. तो लुक काफी अहम था. बालों का रंग भी काफी अलग है. तो इसके लिए तैयारी की. वरना, आमतौर पर मुझे किसी ने यह बोल कर सिखाया तो नहीं कि होम वर्क क्या होता. किस तरह होता है.
कोई ऐसा किरदार, जिससे बाहर आने में आपको वक्त लगा हो?
मकबूल का किरदार मेरे लिए काफी खास था और उस फिल्म से निकलने में मुझे वक्त लगा, क्योंकि वह किरदार ही बिल्कुल अलग सा था. डार्क था. माहौल ही अलग था उस फिल्म का. वह फिल्म इनकंप्लीट लव स्टोरी थी. शायद यह भी वजह रही है.
आपकी बहन से आप काफी करीबी हैं?
हां, बिल्कुल वही तो एक मेरी दोस्त है. मेरी बेस्ट फ्रेंड. मुझे तो अब भी उससे खूब डांट पड़ती है. वह मुझे लेकर काफी फिक्रमंद रहती हैं. उसे मेरे काम और मेरी पर्सनल दोनों ही जिंदगी के बारे में जितने अच्छे से पता है, शायद मुझे भी नहीं पता है. मैं उसके लिए अब भी छोटी बेबी ही हूं और मुझे खुशी है कि मेरे साथ कोई ऐसा है, जो मेरा इतना ख्याल रखता है. वह मेरी दूसरी मां हैं. मां के बाद .

20160205

मेरे दिल से मेरे गांव को कोई नहीं निकाल सकता : धर्मेंद्र


 कोई बच्चा जिस फिल्म को देख कर यह ख्वाब बसा ले कि मुझे फिल्मों में हीरो बनना है और आगे चल कर उसी फिल्म के निर्देशक उन्हें अपनी फिल्म में काम करने का न्योता भेजें तो जाहिर है उस शख्स के ख्वाब को पंखों लगे ही होंगे. वह फिल्म थी शहीद और निर्देशक थे रमेश सेहगल. शहीद फिल्म देखने से शुरू हुआ वह सिलसिला उस दौर में जाकर पहले पड़ाव पर पहुंचता था और यही उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी में से एक थी. जिनके अंदाज पर वे मर मिटे थे. एक दिन उन्होंने ही आकर कहा कि खुदा मुझे ऐसा हुस्र क्यों नहीं दिया था. किसी व्यक्ति के लिए इससे बड़ी कामयाबी और क्या होगी कि जिनसे उन्हें इश्क हुआ था. वह खुद उनकी तारीफों के पूल बांध रहे. जी हां, हम बात कर रहे हैं ही मैन धर्मेंद्र सिंह देओल उर्फ सबके चहेते धर्मेंद्र साहब की, िजन्होंने अपने बलबुते एक अलग पहचान बनायी. और आज भी कई दशकों के बावजूद उनकी बातें, उनके अंदाज के लोग कायल हैं. धर्मेंद्र हिंदी सिनेमा के उन सदाबहार अभिनेताओं में से एक थे, िजनके अंदाज, सूरत, सीरत के लोग दीवाने हुए. वे कई मायनों में स्टाइल आइकॉन बने. बंदिनी, सतकाम, अनुपमा, हकीकत व कई गंभीर  व विषयपरक फिल्में करते हुए उन्होंने चुपके-चपुके और शोले जैसी फिल्मों से मनोरंजन को नये मायने दिये. धर्मेंद्र ने हमेशा यह कोशिश की कि उन्होंने कभी खुद को किसी छवि में नहीं बांधा. अमूमन ऐसा होता है कि स्टार जब किसी टाइटिल से बंध जाते हैं तो वे सीमित हो जाते हैं. लेकिन यह धर्मेंद्र की खासियत थी कि उन्होंने हीमैन वाली छवि के बावजूद अनुपमा, देवर जैसी फिल्में करने से गुरेज नहीं की.  एक तरफ वह रफ एंड टफ रहे, तो दूसरे तरफ उनके व्यक्तित्व में  आपको सरलता,सहजता और मासूमियत नजर आयेगी. उनका अब तक का सफर बेहद सुहावना रहा है और सबसे खास बात यह है कि वे बेहतरीन अभिनेता के साथ साथ बेहतरीन इंसान भी हैं. आज भी उनका दिल गांव से जुड़ा है. उनकी जिंदगी के कुछ ऐसी ही पहलुओं पर प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश 


आप आज जहां हैं, वहां से मुड़ कर देखते हैं तो कैसा लगता है?
मुझे बस यही महसूस होता है कि ये लोगों का प्यार, मेरे अपनों का प्यार, ऊपर वालों की मेहर ही थी कि आज भी इस उम्र में लोगों ने मुझे प्यार करना कम नहीं किया है. जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो यही सोचता हूं कि जिस गांव ने मुझे इतना प्यार दुलार दिया है. आज भी देता आ रहा है. अगर मैं उस गांव का नहीं होता तो क्या जिंदगी जी पाता. मैं मानता हूं कि मैं भाग्यशाली रहा हूं कि मेरा जन्म गांव की मिट्टी में हुआ है. तभी तो मुझे जिंदगी की असली हकीकत पता चली है. शायद यही वजह है कि आज भी दिल से मैं किसान हूं. जमीन से जुड़ा हुआ हूं.  मैं आज भी भले ही मुंबई में रहूं. लेकिन दिल और आत्मा मेरे पिंड में ही रहती है. मैंने अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण पल यहां बिताये हैं. मुझे याद है, जब मां को मैंने पहली बार कहा था कि मैं बांबे जाना चाहता हूं. मां ने कहा था कि बाबूजी सुनेंगे तो नाराज हो जायेंगे. लेकिन फिर उन्होंने ही मुझे कहा कि अरजी देदो. देखो बुलावा आ जाये. उस वक्त फिल्मफेयर कांटेस्ट हो रहा था. मैंने जय माता दी बोल कर, गायत्री मंत्र पढ़ कर वह अरजी भरी थी. अपनी तसवीर भेजी थी. और कुछ हफ्तों के बाद बुलावा आया था. यह मेरे जैसे बच्चे के लिए बहुत बड़ी बात थी. मुझे याद है मेरे घर के ड्रेसिंग टेबल में मैं खुद को देखता था और बोला करता था कि मुझे दिलीप कुमार बनना है. मुझे तो एक्टिंग का ए भी नहीं आता था. क्या होता है ये सब कुछ भी नहीं पता था. फिर भी सपना देख लिया था.
आपके पिताजी शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े थे.तो कभी उधर रुझान नहीं हुआ?
नहीं, मुझे सच कहंू तो शुरू से किताबी पढ़ाई में बहुत मजा नहीं आता था. मुझे याद है मैं जब कभी स्कूल में बिना पगड़ी के जाता था. यह सोच कर कि पिताजी तो इसी स्कूल में अध्यापक हैं. मुझे कौन डांटेगा. उस दिन अधिक डांट पड़ जाती थी. खूब धुलाई होती थी मेरी. बाबूजी तो मेरे साथ अधिक सख्त रहते थे स्कूल में कि बाकी बच्चों को ये न लगे कि मास्टर जी अपने बेटे को तो कुछ कह ही नहीं रहे हैं. तो वह ज्यादा डांटते थे मुझे. और तो और घर में आने के बाद भी पहाड़ा बहुत सुनते थे. एक दिन मां को कहा था कि मां बाबूजी के साथ सो जाता हूं. मां ने भी कहा सो जाओ. गया सोने तो बाबूजी ने सोते हुए भी कहा कि चलो पहाड़ा सुनाओ. उस दिन से कान पकड़ी कि कभी भी उनके साथ नहीं सोऊंगा. मुझे याद है मैं अपने गांव से दूर जाता था फिल्में देखने. उस वक्त गांव में सिनेमा थियेटर नहीं थे. तो मैं बस में बैठ कर दूसरे गांव जाता था फिल्म देखने. और फिल्म खत्म होने के कुछ देर पहले मैं निकल जाता था. मतलब फिल्मों की एंडिंग अच्छे से नहीं देख पाता था, क्योंकि मुझे वापस अपने गांव आना होता था और आखिरी बस मुझे पकड़नी होती थी. लेकिन मैं फिल्में खूब भाग भाग कर देखा करता था. मुझे याद है मां कभी कभी मुझे छेड़ने के लिए कह देती थी कि मैं सुंदर नहीं हूं. लेकिन जब मैं फिल्मफेयर कांटेस्ट में सेलेक्ट हुआ तो उस दिन ही मुझे उन्होंने कहा था कि तू जितना चंगा दिखता है. देखना तुझे बुला ही लेंगे. मुझे याद है, कि एक फिल्म में मैंने प्रोफेसर का रोल किया तो पिताजी को बताया कि बाबूजी इसमें प्रोफेसर बना हूं. अब तो फिल्म देख लीजिए. तो उन्होंने मुझसे कहा कि तुझे ऐसा प्रोफेसर नहीं बनाना चाहता था. फिल्मी प्रोफेसर नहीं वास्तविक प्रोफेसर बनता तो कोई बात होती.
क्या आप महसूस करते हैं कि एक मूल्य के रूप में धैर्य और सहिष्णुता कम हुई है या बढ़ी है?
मैं यह सब नहीं जानता. मैं बस अपने बारे में यह कहना चाहता हूं कि जब मैं पिंड से मुंबई आ रहा था. मेरी माताजी या पिताजी ने मुझे एक ही बात समझायी थी कि तहजीब ही तेरा सम्मान है और इंसानीयत तेरी ताबिज़ इंसानीयत ही धर्म है. वही मजहब है. वही जात है और कोई जात नहीं. मैं आज भी इसी बात को मुक्कमल मानता हूं. मुझे याद है पार्टिशन से पहले मेरे कई यार दोस्त थे. सभी दूसरे धर्म के थे लेकिन कभी मैंने उनका धर्म नहीं पूछा. उस वक्त तो समझ भी नहीं आया था कि वे क्यों मुझसे बिछुड़ रहे हैं. क्यों अलग हो रहे हैं. हमारे प्रिय मास्टर जी भी जा रहे थे और मैं उन्हें पकड़ कर बहुत रोया था कि आप क्यों जा रहे हैं. न जाइये. उस वक्त मास्टर जी ने कहा था कि जाना पड़ेगा. एक छोटी सी लड़की थी, उसे हम घर लेकर आये थे. वह बाबूजी को अब्बा अब्बा कह कर बुलाती थी. लेकिन बाद में उसे जब हम काफिले में छोड़ने जा रहे थे.तो वह भी रो रही थी मैं भी रो रहा था. मुझे लगता है कि मुझे जिंदगी में उससे अधिक दुख कभी नहीं हुआ था. चूंकि मैंने पार्टिशन के दर्द को महसूस किया था. अपनी आंखों से देखा था. तो मैंने उस वक्त यह बात समझ ली थी कि ये सब धर्म के नाम पर ही हो रहा है और इसलिए मैंने हमेशा इंसानीयत को ही अहमियत दी है. और माता-पिता की इसी परवरिश पर आगे बढ़ा हूं. अपने बच्चों को भी यही सिखाया है. और मुझे पूरा यकीन है कि वे भी यही सोच रखते हैं. इस बात की तो मुझे खुशी है कि मैंने अपने बच्चों को एक अच्छा इंसान तो जरूर ही बनाया है और यही मेरी जिंदगी की उपलब्धि है. उस वक्त जब पार्टिशन हुआ तो मैंने कई दोस्तों को खोया था और उस वक्त से ही मेरे दिल में ये बातें घर कर गयी थी कि धर्म सिर्फ अपनों को दूर करता है और कुछ नहीं और मैंने सिर्फ इंसानीयत को ही अहमियत दी बस.
क्या चीजें सबसे ज्यादा खुशी देती हैं?
मुझे अपनों का साथ सबसे ज्यादा पसंद है. मुझे अपने गांव की दुनिया पसंद है. मेरी वहां आत्मा बसी होती है और मैं हमेशा वहां की बातें याद करता हूं. मेरा मानना है कि वह गांव ही है, जहां कुछ भी आर्टिफिशियल नहीं. न चीजें, न लोगों की सीरत, न लोगों की सूरत. वहां तालाब का कीचड़ भी मुझे अपनी ओर आकर्षित करता है. मुझे वहां के लोगों की मासूमियत आकर्षित करती है. मुझे याद है. मैं तालाब में कितनी डूबकी लगाता था और घर आने पर मां कितना नाराज होती थी. लेकिन कीचड़ में खेलना नहीं छोड़ता था. पहले जब वहां स्टेशन पूरी तरह नहीं बना था. फिर बाद में स्टेशन बना तो वहां के पब्लिक ब्रिज पर मैं घंटों वक्त बिताया करता था. मुझे वहां के खेत-खलियानों में वक्त बिताना पसंद है. ट्रैक्टर पर घूमना अब भी पसंद है. वह सारी यादें मेरी जेहन में जिंदा हैं और मुंबई आने के बाद भी मैंने खुद को ग्लैमर की दुनिया में पूरी तरह कभी नहीं रंगा और न ही वह रंग चढ़ने दिया पूरी तरह. मुझे खुशी होती थी, जब माता-पिता मुंबई आते थे. जब मैं शूटिंग के लिए जाता था उनके पैर छूता तो वही कहते थे, जल्दी आ जाना बेटे...मां भी मेरा इंतजार करती रहती थी.जब तक मैं आ ना जाऊं. ये सारी बातें याद है मुझे. पापा से पूछता कि पापा किसी चीज की जरूरत है क्या. वह नीचे गार्डन में धूप सेंका करते थे. तो पापा कहते क्या चीज की कमी होगी. सबकुछ है तो यहां. बस थोड़ा तू कभी कभी जल्दी आ जाया कर...और मेरी कोशिश भी हमेशा यही रही कि मैं अपने बच्चों को भी परिवार का महत्व समझा सकूं. मैंने हमेशा परिवार को अहमियत दी है और वही मेरी दुनिया. मेरी खुशी रही है. पैसे को तो मैंने कभी जिंदगी में खास माना ही नहीं. कभी पैसों का लालच मुझसे कुछ भी नहीं करा पाया. मुझे हमेशा अपने लोगों से घिरे रहना अच्छा लगा. और तसल्ली है कि मेरी जिंदगी में ऐसे कई लोग मुझे मिले. इसके अलावा मैं खुशनसीब मानता हूं कि इस उम्र में भी लोग मुझे प्यार देते हैं. जहां भी जाता हूं. मुझे लगता है कि चलो कुछ तो अच्छे कर्म किये हैं जो लोग आज भी मुझे याद रखते हैं. या रखना चाहते हैं. लोग मुझे बतौर एक्टर के साथ बेहतर इंसान के रूप में याद करते हैं तो और ज्यादा खुशी होती है मुझे. और सबसे खुशी की बात है कि मैंने अपने अंदर के इंसान को मरने नहीं दिया है.
क्या चीजें सबसे ज्यादा परेशान करती हैं?
मुझे अपनों को खोने से डर लगता है. मैं काफी इमोशनल व्यक्ति हूं और काफी अपनों को खोया है. मेरी बहन, मेरे भाई मेरी दुनिया था. और उन्हें खोना जिंदगी की पूंजी को खोने जैसा था. मां बाबूजी को खोया तब भी काफी दुख हुआ था. चूंकि माता पिता और परिवार की जगह कोई नहीं ले सकता.
जब दुखी होते हैं तो प्रेरणा कैसे मिलती है?
मुझे याद है, मैं अपने पिंड में छत पर सोना बहुत पसंद करता था और मैं रात में तारे-सितारों को देखा करता था. और बहुत कुछ सोचा करता था. लिखने की प्रेरणा शायद मुझे वही से मिली. मैं काफी लिखता हूं और मुझे लगता है कि चूंकि मैं लिखता हूं इसलिए मुझे डिप्रेशन कभी नहीं होता. चूंकि जो लिखते हैं, वे अपनी भावना को कई बार लिख देते हैं. तो मैं इससे ही प्रेरणा लेता हूं. काफी लिखता हूं मैं. लोगों का प्यार ही मेरी स्ट्रेंथ है. मेरी प्रेरणा है. मैं ये बातें हमेशा दोहराता हूं कि मोहब्बत आपकी अगर न देती रोशनी मेरे नाम को. बनता कैसे धर्म मैं आपका. पहुंचता कैसे इस मुकाम को.
कभी कोई बात जो सालती हो?
मुझे लगता है कि मेरे डनगोन गांव के लोगों को यह बात हमेशा बुरी लगी है कि मैं उस गांव के बारे में नाम नहीं लेता. वह मेरा पैतिृक स्थान है. लेकिन चूंकि मेरा ज्यादातर वक्त साहनेवाल में बीता है तो वही की बातें ज्यादा हैं जेहन में. लेकिन मैं वहां के लोगों से बहुत प्यार करता रहा हूं और मैं यह मानता हूं कि मेरे सारे गांव के लोगों को, उन तमाम स्थानों का काफी योगदान रहा है. आज मैं जो कुछ भी हूं.मैं बस यह मानता हूं कि यहां कुछ भी परमानेंट नहीं है. समदरें  शोहरत की साहिर नहीं होते..तो जानता हूं कि ये स्टारडम भी जायेगा. लेकिन बस चाहता हूं कि जब तक रहूं. लोगों के जेहन में जिंदा रहूं.
अपने प्रोफेशन की नयी पीढ़ी को किस तरह देखते हैं आप?
मुझे काफी ऊर्जा नजर आती है. मैं तो उनके साथ काफी काम करता भी रहा हूं. लोग मुझसे हमेशा पूछते हैं कि मुझ पर कभी बायोपिक बनेगी तो कौन एक्टर हैं जो सबसे बेहतरीन काम करेगा तो मैं बेझिझक नाम लेता हूं सलमान का. मुझे लगता है कि सलमान मेरी तरह ही हरफनमौला है. शाहरुख ने अपनी मेहनत से पहचान बनाई है. आमिर समझदार बच्चा है. ऋतिक जैसा डांस कौन कर सकता है भला. मुझे लगता है कि सभी बच्चे अच्छा काम कर रहे हैं. मुझे नयी पीढ़ी से कोई शिकायत नहीं. मैं मानता हूं कि वे अपने वक्त के साथ कदम ताल करते चल रहे हैं. इसलिए फास्ट हैं. हां बस ये कहना चाहता हूं कि फास्ट रहें. लेकिन अपनी जमीन को और अपने माता पिता को कभी न भूलें. अभी मेरे परिवार की एक और जेनेरशन कदम रखने वाली है. उन्हें भी यही बात समझाता हूं कि परिवार की अहमियत सबसे खास है. अब टेक्नीकली भी हम बहुत आगे निकल चुके हैं.

प्रिय अभिनेता 
1.धर्मेंद्र दिलीप कुमार  साहब के   हमेशा फैन रहे. बचपन से उनकी फिल्में देखीं. उनका अंदाज बचपन से अपनाया. लेकिन वह सबसे बड़ी खुशी के पल थे, जब दिलीप साहब ने एक समारोह के दौरान धर्मेंद्र की तारीफ करते हुए कहा कि खुदा मिलेगा तो मैं उससे पूछूंगा कि हुजूर मेरा चेहरा वैसा क्यों नहीं बनाया. धर्मेंद्र ने दिलीप साहब की पहली फिल्म शहीद देखी थी और उसी वक्त से वे उनके मुरीद हो गये थे. फिल्म में किरदार का नाम राम था. तो धर्मेंद्र ने मान लिया था कि इस व्यक्ति का नाम ही राम हैं.बाद में पता चला कि दिलीप कुमार नाम है और उस वक्त से इश्क हुआ. 
2.प्रिय गायक
धर्मेंद्र मोहम्मद रफी के भी हमेशा फैन रहे. उन्हें उनकी आवाज काफी पसंद थी. खासतौर से उन्होंने जो पहला गीत धर्मेद्र के लिए गाया था जाने क्या ढूंढती रहती है आंखें मुझमें...उनका पसंदीदा गीत है. 
3. प्रिय अभिनेत्री
धर्मेंद्र को जहां दिलीप साहब से बेहद प्यार हो गया था. उन्हें अभिनेत्रियों में सुरैया से बेइतहां प्यार हो गया था. उन्होंने सिर्फ सुरैया की वजह से फिल्म दिल्लगी 40 बार देख ली थी.
4. धर्मेंद्र के दिल के आज भी यह गीत बेहद करीब है कि मुझे रात की तन्हाईयों में आवाज न दो...चूंकि ये गीत उन्हें उ्य दिनों की याद दिलाते हैं, जब वे मुंबई में संघर्षरत थे और उनके पास रात के खाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे. वे उस दौर में कई स्टूडियोज में जाते थे. लेकिन कई बार उन्हें पैसे नहीं मिलते थे और वे वापस खाली हाथ आते थे तो यही गीत सुनते थे और यही वजह है कि आज भी यह गीत उनके दिल के बेहद करीब है.
5.1965  उनके फिल्मी करियर के लिहाज से अहम साल रहा. चूंकि इस वर्ष उनकी सात फिल्में रिलीज हुई थी.फिल्म हकीकत उस दौर की अपने तरह की अलग फिल्मों में से एक थी. इससे पहले वैसी वार वाली फिल्में नहीं बनी थी. इसी वर्ष में फूल और पत्थर रिलीज हुई तो पूरे मूल्क में एक लहर दौड़ गयी थी. इसी फिल्म से उन्हें ही मैन का टाइटिल मिला. 
6. दोस्ती को धर्मेंद्र ने जिंदगी में हमेशा महत्व दिया है. उन्होंने अपने प्रिय दोस्त मनोज कुमार साहब से भी अच्छी दोस्ती निभायी तो दूसरी तरफ देवेन वर्मा की फिल्म की शूटिंग के लिए वे दिन भर काम करने के बाद फिर रात के एक बजे भी शूटिंग के लिए पहुंच जाते थे. चूंकि वह चाहते थे कि दोस्त की फिल्म पूरी हो जाये.
7.प्रिय निर्देशक
धर्मेंद्र जी यह कहने से कभी नहीं झिझकते कि तमाम निर्देशकों के साथ काम करने के बावजूद उन्हें सबसे अधिक डर ऋषिकेश मुखर्जी के साथ लगता था. चूंकि वह काफी परफेक् शनिष्ट निर्देशक थे. उन्होंने उनके साथ कई फिल्मों में काम किया. चुपके-चुपके और सतकाम उनकी पसंदीदा फिल्मों में से एक रही. 
8. प्रिय भोजन
कम ही लोगों को यह जानकारी होगी कि पंजाबी होने के बावजूद धर्मेंद्र के घर में खाना शाकाहारी ही बनता था और अगर कभी धरम जी की इच्छा हो भी तो उन्हें और उनके भाई बहनों को बाहर जाकर खाना होता था. शाकाहारी भोजन में उन्हें टिंडा और शलगम से बने डिश खाना बेहद पसंद है. खासतौर से शलगम के गोस्त बेहद पसंद हैं. उन्हें बासी भोजन से सख्त चिढ़ है और वे मानते हैं कि जैसी रोटियां उनकी मां बनाती थी. वैसी और कोई नहीं बना सकता

फाइनल टू पर आकर अटक जाती थी गड्डी मेरी : विकी कौशल

फिल्म मसान से उन्होंने खुद को स्थापित कर लिया है. इस वर्ष के नवोदित अभिनेता के सारे अवार्ड भी इनके ही खाते में गये हैं. अमूमन इंडस्ट्री में पिता अगर पहले से स्थापित और बड़े नाम हैं तो लोग बेटे को पिता के नाम से संबोधित करने लगते हैं. लेकिन इन्होंने नाम पहले बनाया बाद में लोगों ने पिता का नाम जाना. वजह यह भी रही कि उन्होंने ठान रखा था कि खुद के बलबुते पहचान बनायेंगे. पिता भी तो यही चाहते थे. जी हां, हम बात कर रहे हैं विकी कौशल की, जिन्होंने मसान के माध्यम से बॉलीवुड में एक शानदार दस्तक दी है. 

 जुबां से जुड़ना कैसे हुआ?
जुबां मेरी पहली फिल्म थी लीड के रूप में मसान से पहले इसे साइन किया था. जुबां मेरी जिंदगी में तब आयी, जब मैं स्ट्रगल कर रहा था.रोज आॅडिशन देता था. थियेटर, फिल्म, एड. हर किस्म का आॅडिशन देता था. थियेटर कर रहा था.रिहर्सल और आॅडिशन मेरी जिंदगी का अहम हिस्सा थी. उस वक्त घर पर मायूस होकर लौटता था कि यार कुछ हो नहीं रहा है.फिर सुबह उठ कर लगता था कि चलो फिर से कुछ करें. फिर रात को आता था फिर से वही मायूसी...तो वह दौर चल रहा था. उसी दौरान मुझे जुबां के लिए फोन आया.मुकेश छाबड़ा जी ने मेरी एक शॉट फिल्म देखी थी यूटयूब पर.उन्होंने और फिल्म की  प्रोडयूसर गुनीत मोंगा ने मोजेज( फिल्म के निर्देशक) को यह फिल्म दिखाई थी. उस वक्त मुझे पता नहीं था कि मोजेज 250-300 लोगों का आॅडिशन कर चुके थे. लेकिन वह संतुष्ट नहीं थे.गुनीत ने उन्हें दिखायी. तो मोजेज ने कहा कि आॅडिशन के लिए बुला लो. उस दिन मुझे तीन सीन्स करने थे. मैंने तीनों सीन्स किये. और घर आये. जैसा कि मेरे साथ कई दिनों से हो रहा था आॅडिशन के दौरान कि आप एक बस्ता लेकर घूमते हो. उसमें एक कोर्ट होता है, एक टी-शर्ट होती है. एक शर्ट होता है. कुर्ता होता है.जहां जैसा माहौल हो. वह पहन कर शुरू हो जाओ. उस आॅडिशन से मैं किसी और आॅडिशन में चला गया था. फिर मैं घर पहुंचा.रात को मुझे 1 बजे गुनीत का फोन आया कि यार आॅडिशन तो कमाल का था.तो मुझे लगा कि रोल मिल गया क्या. तो मैंने पूछा. वहां भी इंतजार खत्म नहीं हुई थी. गुनीत ने कहा कि नहीं नहीं अभी भी फाइनल टू में है तू. तो मेरे लिए फाइनल टू जिंक सा हो गया था. चूंकि 80 प्रतिशत आॅडिशन में मैं फाइनल टू में आकर रुक जाता था. मुझे लगा कि फिर से यह फिल्म गयी. लेकिन मुझे अगले दिन फिर से आॅडिशन के लिए बुलाया गया. फिर से नया सीन मिला. और ये सिलसिला एक हफ्ते तक चलता रहा. दरअसल, ये मेरी लाइफ का मोस्ट ग्रीलिंग आॅडिशन था. जहां मुझे रियली टेस्ट किया गया था. बाद में मुझे समझ आया कि पूरी फिल्म एक ही किरदार के ऊपर है. अंतिम चरण था, जब मुझे और सारा को फोटो शूट करने थे. और देखना था कि दोनों की जोड़ी कैसी लग रही है.हफ्ते भर  के बाद फिर से बुलाया गया. मुझे तो ऐसा लग रहा था कि आॅडिशन में ही मैं फिल्म खत्म कर चुका हूं. मैं गया इस बार.वहां देखा मैंने आॅडिशन का सेटअप नहीं था. फिर उन्होंने कहा कि आप लीड के लिए सेलेक्ट हो गये हैं और मैं सामान्य रूप से सिर हिला रहा था. बाद में मोजेज को आश्चर्य हुआ उन्होंने पूछा कि तुम खुश नहीं हो, पता नहीं मुझे भी समझ नहीं आया था कि मैंने ऐसे क्यों रियेक्ट किया था. लेकिन शायद जिंदगी में पहली बार सुना था कि मैं सेलेक्ट हुआ हूं. घर गया. मां पापा को बताया. मां खुशी से उछल रही थीं. पापा पीके की शूट पर दिल्ली में थे. वे वहां खुश थे काफी. और इस तरह यह सफर पूरा हुआ.
आमतौर पर इंडस्ट्री में जब पिता एक बड़े नाम होते हैं और स्थापित नाम होते हैं तो लोग मान बैठते हैं कि उनकी संगत की वजह से बेटे को नाम मिलेगा.लेकिन आपके साथ अलग सी बात हुई. पहले आपने खुद को साबित किया. फिर लोगों ने जाना कि अच्छा ये शाम  कौशल जी का बेटा है. 
जी , बहुत बहुत शुक्रिया और खुशी है कि लोग इस तरह सोचते हैं. लोगों ने नोटिस किया कि मुझे अपने दम पर काम मिला है. दरअसल, मैं इंजीनियरिंग पास आउट हूं. टेली कम्यूनिकेशन की पढ़ाई कर रहा था. जॉब भी थी हाथ में.चूंकि सेकेंड ईयर में न फैक्लिटी हमें ले जाते थे इंडस्ट्रीयल विजिट पर. तब मुझे ऐसा लगा था कि मैं ये काम नहीं कर सकता. मैं नाइन टू फाइव नहीं कर सकता.मैं कंप्यूटर के सामने कोडिंग-डिकोडिंग नहीं कर  सकता. तब मैंने सोचना शुरू किया कि मैं जिंदगी में करना क्या चाहता हूं.और मैं बचपन से मैं एक्टिव था. स्टेज पर. एक्टिंग़. डांस में भी. तो मुझे लगा कि मैं ये दुनिया एंजॉय करता हूं. तब मैंने अपने पापा से कहा कि मैं एक्टर बनना चाहता हूं. पापा अचंभित थे, क्योंकि हर परिवार की तरह हमारे यहां भी दादा जी सभी मानते थे घर लेलो, नौकरी लेलो, सेटल हो जाओ. पापा ने कहा कि तेरे पास जॉब है. लेकिन फिर भी तू इस लाइन में आना चाहता है. जहां हर रोज एक जॉब ढूंढनी है. पापा ने ये भी साफ कहा कि यह मत सोचना कि मैं तेरे लिए कहीं काम की बात करूंगा या पापा इस क्षेत्र में तो आसानी से काम मिल जायेगा. जो करना होगा अपनी दम पर करना होगा. लेकिन मैं फिर भी रेडी था.और पापा से मैंने उसी वक्त वादा किया था कि खुद के दम पर ही काम करूंगा. और खुशी होती है कि मैंने वह वादा पूरा किया. मैंने पापा से यह भी कहा था कि मैंने आपका हार्डवर्क देखा है. आपकी मेहनत देखी है और मैं जानता हूं कि मैं ये सब कर पाऊंगा. मैं किसी इल्यूजन से नहीं आ रहा. मैं इसलिए आ रहा हूं.
आपने कभी एक् शन निर्देशक बनने का ख्वाब नहीं देखा. पापा को बचपन से ही आपने स्टंट करते देखा है तो?
हां, बचपन में सारे बच्चों की तरह मैं भी जब फिल्में देखता था तो लगता था कि मैं भी बड़े होकर ऐसा ही एक् शन करूंगा. हीरोइन को बचाऊंगा. पापा की मिटिंग्स होती थी घर पर नाश्ते पर. सारे निर्देशक, राइर्ट्स आते थे घर पर तो. मैं सबकी बातें सुनता था. हालांकि हमलोग कभी सेट पर नहीं जाते थे. चूंकि पापा को फिल्म को घर लाना पसंद नहीं था और न ही घर को फिल्म सेट पर ले जाना.लेकिन हां, पहली दफा मैं  फिजा फिल्म की शूटिंग पर गया था. चूंकि मुझे ऋतिक रोशन का डांस बहुत पसंद था. लेकिन मैं शूटिंग देख कर बोर गया था. 12 साल का था तब मैं. मुझे लगता था कि तीन घंटे की फिल्म है तो 1 दिन में तो शूटिंग खत्म हो जाती होगी. मुझे पता ही नहीं था कि इतना वक्त लगता है. वहां मैं देख कर दंग रह गया था कि लोग एक एक सीन को ही कई बार शूट कर रहे थे. मैं शूटिंग देख कर काफी बोर भी हो गया था.
आमतौर पर बड़ी लांचिंग होती है इंडस्ट्री के बच्चों की तो आपका भी कुछ ऐसा सपना था?
नहीं, मैं कभी भी यह सोच कर नहीं आया था कि मुझे लीड करना है या मुझे हीरो बनना है. मैं बस यह सोच कर आया था कि मुझे एक्टिंग करनी है. चाहे वह जिस तरीके का भी हो. मैं हरेक तरह का आॅडिशन देता था. इसलिए मैं किसी माइंडसेट से नहीं आया था कि मुझे हीरो बनना है.मुझे सिर्फ एक्टिंग करनी थी. मैंने इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद इसलिए सबसे पहले किशोर नमित एक्टिंग स्कूल है. वहां ज्वाइन किया. वहां छह महीने का कोर्स करना था. दरअसल, मुझे अपना इंट्रोवर्ट नेचर बदलना था.चूंकि वह पहला कदम है. अगर आपको एक्टर बनना है तो आपको एक्सप्रेसिव बनना होगा. और इसके अलावा मैं जानना चाहता था कि वाकई मुझमें वह जुनून है भी कि नहीं कि जिंदगी भर मैं यह करना चाहता हूं. चूंकि इसमें स्ट्रगल बहुत था. छह महीने के कोर्स के बाद मुझे यकीन हुआ कि मुझे इश्क है एक्टिंग से.इसके बाद मुझे गैंग्स आॅफ वासेपुर में अस्टिेंट डायरेक्टर बनने का मौका मिला तो मुझे वहां सीखने मिला कि परदे के पीछे कैसे काम होता है.तो अस्टिेंड डायरेक्टर बनने पर आपको सबसे ज्यादा काम सीखने का मौका मिलता है.आप फिल्म के ग्राउंड लेवल से जुड़े रहते हैं और आपका पता लगता है कि फिल्म बनती कैसे है.वह मेरे लिए फिल्म स्कूल था. वहां मुझे अगला कदम पता लगा कि थियेटर की अहमियत क्या होती है. चूंकि उसमें सभी थियेटर से थे. नवाज भाई. ऋचा. मनोज सर.तो उसके बाद मुझे पता चला कि मुझे थियेटर करना चाहिए. तो यहां मानव कौल  साहब हैं. नसीर साहब हैं. पीयूष मिश्रा साहब हैं.उनके साथ थियेटर करना शुरू किया. धीरे-धीरे मसान और जुबान जिंदगी में आयी.
आपके इंस्पीरेशन कौन रहे हैं?
मैं गुरदास मान साहब का बहुत बड़ा भक्त हूं. जब भी मैं हताश महसूस करता हूं. मैं उन्हें सुनता हूं. मैं निजी जिंदगी में भी उन जैसा बनना चाहता हूं. आप उनसे मिलेंगे तो महसूस करेंगे कि उनकी एनर्जी कमाल की है. उनका आॅरा है. डिवाइन सा आॅरा है. संतों वाला आॅरा है. वह तीन तीन घंटे तक स्टेज परफॉरमेंस देते हैं. मेरे पास कंप्यूटर में मान साहब का नाम का फोल्डर ही है. मैं उनके वीडियो देखता हूं तो खुश होता हूं.
और कौन-कौन सी फिल्में कर रहे हैं?
मैं रमन राघव और मनमर्जियां कर रहा हूं. रमन राघव अनुराग कश्यप बना रहे हैं और मनमर्जियां समीर शर्मा बना रहे हैं.

ेस्पोर्ट्स फिल्में बनाने की रही है तमन्ना : सनी देओल



सनी देओल फिर से निर्देशन की कुरसी संभाल रहे हैं. उनकी लोकप्रिय फिल्मों में से एक रही है घायल  और वे मानते हैं कि इस बार भी उन्हें कामयाबी मिलेगी. इस बार वे घायल वंस अगेन  लेकर आये हैं. 
 आज भी प्रासंगिक है फिल्म
मेरा मानना है कि आज भी घायल आज भी  प्रासंगिक है. लोगों के जेहन में आज भी सारी बातें याद है. और उस दौर में भी भ्रष्टाचार तो था ही. आज भी है. इस बार मैं फिल्म में यह लेकर आ रहा हूं कि आज वह आदमी किस तरह जेल से निकलने के बाद किस तरह की सोसाइटी में रह रहा होगा. आज बलवंत राय किस तरह का है. सोसाइटी किस तरह बदली है. मेरा मानना है कि सोसाइटी बदलती है यूथ के साथ.17-18 साल के बाद जब वह कदम रखता है यूथ के साथ तब क्या क्या चीजें बदलती हैं. इस पर है फिल्म मेरी. मेरा मानना है कि प्रॉब्लम बदली नहीं है. अब बस दर्द का एहसास करना बदल गया है. चीजें बदल गयी हैं. लेकिन बात वही हैं. लोग टिष्ट्वट करते हंै , क्योंकि उनके अंदर अंदर एक रिवोल्ट चल रहा होता है. अब बस एक माध्यम बदला है. अगर  सच कहूं तो. तकलीफें वही हैं.
सोशल नेटवर्र्किंग साइट्स पर नहीं लेकिन अवगत रहता हूं
लोगों को ऐसा लगता है कि आज के  दौर में जो सोशल साइट्स पर नहीं हैं,वह अपडेट नहीं रहता है.  लेकिन मैं फिर भी अपडेट रहता हूं. मेरा मानना है कि आपका सोशल साइट्स पर रहना जरूरी नहीं, बल्कि समस्याओं को  समझना जरूरी है. हमारा काम सिर्फ टिष्ट्वट करके शांत रहने का नहीं. जड़ को समझना जरूरी है और जड़ को समझ कर  ही आप उस पर कुछ गंभीरता से सोच सकते हैं. मैं खुद को अपडेट रखता हूं. आस-पास की दुनिया की सारी बातें मैं जानता हूं समझता हूं.
स्पोर्ट्स में शुरू से है दिलचस्पी
मुझे हमेशा से स्पोर्ट्स से दिलचस्पी रही है. स्पोर्ट्स की वजह से ही शायद मैं अनुशासित हो पाया हूं. आज भी मुझे जल्दी उठ कर सारा काम निबटाने की आदत है. आज भी मैं एक भी दिन मिस नहीं करता हूं. जब मैं एक्सरसाइज न करूं. कसरत न करूं. अगर मैं लेट नाइट शूट से भी देर से लौटता हूं. तब भी मैं कसरत करता हूं और उठता हूं. मुझे लगता है कि यह सबकुछ मुझे स्पोर्ट्स से ही मिली है. मुझे हमेशा से इच्छा थी कि मैं स्पोर्ट्स पर फिल्म बनाऊं. उस दौर में तो चक दे आयी भी नहीं थी. मिल्खा जैसी फिल्म भी नहीं बनी थी. हमने काफी कुछ सोचा था. बातें भी हुई थी. लेकिन फिर बाद में हम बना नहीं पाये और अब तो काफी फिल्में बन चुकी हैं. मैं फुटबॉल, क्रिकेट, बास्केट बॉल सबकुछ खेला करता था और शायद इसलिए आज भी शरीर में फुर्ती जरूरी है. ये एक अच्छी चीज हुई है. मुझे याद है मैंने और शेखर कपूर ने तय किया था कि हम साथ में स्पोर्ट्स पर फिल्म बनायेंगे. हमने साइन भी कर लिया था. हमारी फिल्म मिल्खा सिंह जैसी फिल्म वाली कहानी थी. जीपी सिप्पी इस फिल्म का निर्मा्रण कर रहे थे. लेकिन बाद में वह पीछे हट गये तो नहीं बन पायी. दरअसल, वह स्पोर्ट्स को ही बढ़ावा देने के लिए हमने सोचा था कि फिल्म बनाते हैं. फिल्म का नाम चैंपियन था. लेकिन वह बन नहीं पायी. मुझे दुख है कि उस वक्त फिल्म बनाने के लिए मेरे पास खास पैसे नहीं थे.
पिताजी से अब भी लगता है डर
पता नहीं शायद यह हमारी खानदानी परंपरा चली आ रही है कि पिताजी अपने पिताजी से डरते थे. और हम अपने. जबकि पापा इतने मजाकिया हैं. इतनी बातें करते हैं सभी से. उनकी इच्छा होती है कि हम उनके साथ बैठ कर बातें करें. लेकिन पता नहीं एक लिहाज है अलग सा. हम उनके साथ अधिक देर बैठ ही नहीं पाते. मेरे बेटे के साथ भी शायद कुछ ऐसा ही है रिश्ता. लेकिन एक बात अपने बेटे को जरूर समझायी है कि जिस तरह पापा ने हमें इंसानीयत का पाठ पढ़ाया है और जमीन से जुड़े रहना सिखाया है. मैंने भी बेटे को यही बात सिखायी है.
जब मैंने की थी शुरुआत
मुझे याद है, जब मैंने शुरुआत की थी. तो हम लोग बहुत रॉ होते थे. कुछ भी तैयारी से नहीं आते थे. हर कुछ सीखने की कोशिश करते रहते थे. मैंने जब बेताब की थी तो मुझे खास कुछ भी नहीं पता था कि फिल्में बनती कैसे हैं. हां, मगर दिलचस्पी बहुत थी. चूंकि पापा को हमेशा देखता आया था. तो रुझान तो था ही. उस वक्त की क्योरिसिटी अलग होती थी. आज के बच्चे जब आते हैं तो वह मेकअप को ही सबकुछ समझ लेते हंैं. सिर्फ स्कीनी बॉडी लेकर सोचते हैं कि यही अभिनय है. पूरी तैयारी से आते हैं. लेकिन एक्टिंग छोड़ कर हर तरह की तैयारी होती है. मेरी फिल्म में तो मैंने अपने सारे नये बच्चों को जब कहा कि मेकअप करना ही नहीं है. मेकअप से तो इनोसेंस चला जाता है तो एक मिनट के लिए बच्चे चौंके थे. मैंने ये भी कहा कि मुझे किसी तरह का सिक्स पैक एब्स नहीं चाहिए. सामान्य लोग चाहिए. तो उन्हें भी आश्चर्य हुआ था. लड़कियों को तो मेकअप से कितना प्यार होता है. मगर फिर भी हमने उन्हें मेकअप नहीं करने दिया है. मुझे मासूमियत ही पसंद है और मैं चाहता हूं कि वे मासूमियत से ही आगे बढ़ें. हां, मगर मैं भी आश्चर्यचकित रहता हूं कि उन्हें इंडस्ट्री के बारे में कितनी सारी जानकारी है. मैं तो इंडस्ट्री का होकर भी यहां के तौर तरीकों से खास तरह से अवगत नहीं हो पाया था.
निर्देशन में दिलचस्पी
जब मैंने शुरुआत की थी. तो कॉलेज पास करते ही आ गया था. मेरी और निर्देशक राहुल रवेल की उम्र में खास फर्क नहीं था. तो काफी कुछ देखा करता था. सीखा करता था कि परदे के पीछे कैसे काम होता है. फिर फिल्म दिल्लगी से एक बार कोशिश भी की तो खुद पर आत्म विश्वास बढ़ा. मुझे इस बार लगा कि जो मैं कहानी दिखाना चाहता हंूं शायद मैें खुद ही लिख पाऊंगा और खुद ही बनाऊंगा तो उसके साथ जस्टीस कर पाऊंगा. इसलिए यह कमान संभाली
खुश हूं कि बेटे की बारी है
मैं खुश हूं कि अब मेरे बेटे की बारी आ रही है. उम्मीद है कि वह अच्छा काम करेगा. वह अभी से मेहनत कर रहा है. हमने उसे यह समझा दिया है कि मेहनत से बढ़ कर कुछ नहीं होता. तो वह इन बातों पर अमल कर रहा है. 

20160202

मां और नानी हैं मेरी प्रेरणास्रोत : अभिनव देव


निर्देशक अभिनय  देव इस बार अपने भाई अजिंक्य देव के साथ निर्माता की पारी की भी शुरुआत कर रहे हैं. दोनों स्टार प्लस के एक नये शो तमन्ना के साथ सामने आ रहे हैं. अभिनय  खुश हैं कि वे एक अलग कहानी लेकर आ रहे हैं. शो के प्रोमोज को काफी सराहना मिली है. चूंकि शो की लीड किरदार क्रिकेटर के रूप में दर्शकों के सामने आ रही हैं तो उम्मीद की जा रही है कि शो का मिजाज अन्य धारावाहिकों से अलग होगा. पेश है अभिनय से हुई अनुप्रिया अनंत की बातचीत के मुख्य अंश
तमन्ना का ख्याल कैसे आया?
 मैं फीचर फिल्म हो, टेलीविजन हो या विज्ञापन हो. कोशिश होती है कि कुछ अलग किया जाये.जो लोग कर रहे हैं, इतने सालों से उससे अलग करूं.अलग इसलिए क्योंकि मेरे सिस्टम में ऐसा है कुछ.जो बहुत लोग कर चुके हैं. तो मैं उस रेस का हिस्सा नहीं बनना चाहता. मैं अलग तरह से कहानी कहना चाहता हूं.तो कुछ हद तक ठानी है. टेलीविजन में आने के बाद जब तमन्ना की कहानी का ख्याल आया. मैं चाहता था कि कहानी एक ऐसे कैरेक्टर की हो. जो लोग देख चुके हैं. जो लोग रियल है. जो हम में से एक है. लेकिन उस कहानी को लिखने का, परफॉर्म करने का, प्रेजेंट करने का तरीका अलग हो. हम वीमेन ओरियेंटेड की टेरिटरी में जाकर अनकॉमन कहानी करने की इच्छा थी और स्टार प्लस ने मेरा साथ भी दिया. और कहा कि जैसे चाहते. वैसे ही बनायें. शो में हमने नये कास्ट को लिया है. छोटे शहर की लड़की होगी धरा...धरा शो की लीड का नाम है.मीडिल क्लास लड़की है. शुरुआत हमारी कॉमन है. लेकिन कहानी अनकॉमन होगी. कहने और देखने का अंदाज अलग है.
कहानी के लिए प्रेरणा आपको कहां से मिली?
मेरे ख्याल से प्रेरणा हर उस औरत से मिली है, जो अपने सपने को साकार करना चाहती है. मेरी अपनी व्यक्तिगत राय है कि मेरी जिंदगी में दो ऐसी औरतें हैं, जिनकी वजह से हम सबकुछ हैं. वह हैं मेरी मां और एक हैं उनकी मां यानी नानी. मेरी नानी ने अकेले 1930-40 के दौर में उन्होंने चार बच्चों को बड़ा किया. उनको वैल्यू सिस्टम दिया. उनकी ख्वाहिशों को पूरा किया उन्होंने. वहां से लेकर हम तक, हमारे भाई में हमें शिक्षा दी. वह एक ऐसी औरत हैं, जिनको मैंने देखा है कि सबकुछ मैनेज किया. नानाजी के नहीं रहते हुए भी. दूसरी औरत हैं मेरी मां, जिन्होंने 14 साल की उम्र में अपना एक्टिंग करियर शुरू किया, क्योंकि हालात ऐसे थे. लेकिन इसके बावजूद कहीं भी, कभी भी बिना कांप्रमाइज किये. एक औरत के हर पहलू को बैलेंसिंग एक्ट करते हुए उन्होंने अपने सपने को पूरा किया कि आज महाराष्टÑ में मेरी माताजी का नाम लो तो ऐसा कोई व्यक्ति नहीं, जो उन्हें न जानता हो. तब 50-60 के दशक में. तो वह दौर कैसा रहा आप समझ सकती. ये दोनों ही लोग मुझे हमेशा प्रेरणा देते हैं.तो जब हमने शुरुआत की इसे लिखने की तो यह सोचा कि उस दौर में जब फिल्म इंडस्ट्री इंडस्ट्री ही नहीं मानी जाती थी.उस वक्त औरतों के लिए वह इंडस्ट्री अच्छी नहीं मानी जाती थी. ऐसे में कोई यह मुकाम हासिल करती हैं महिला तो वह सम्मानजनक हैं.
शो के लेखक के बारे में बतायें?
शो के लेखक सौम्य जोशी हंै, वह अभिजात जोशी के भाई हैं. इस शो का कांसेप्ट मेरे दिमाग से आया. लेकिन उन्होंने इसे ऐसा रंग दे दिया कि कमाल हो गया.हिंदी टेलीविजन में सौम्य का यह पहला शो है. लेकिन थियेटर पर उन्होंने काफी काम किया है. और काफी जाना-माना नाम हैं. उन्होंने गुजराती भाषा में बहुत काम किया है.
आप अपने माता-पिता में किससे अधिक करीबी रहे हैं?
अपनी मां से. शायद यही वजह है कि हमने करीब से देखा है अपनी मां की पूरी जिंदगी को.पापा हमेशा व्यस्त रहते थे. लेकिन मां भी बहुत व्यस्त रहती थीं. लेकिन फिर भी अपने परिवार के लिए वह वक्त निकाल ही लेती थीं. तो जब हम बड़े हो रहे थे तो ऐसा महसूस ही नहीं हुआ कि मां जा रही है शूटिंग पर, क्योंकि मां काम पर जाने से पहले हमारे लिए इतना कुछ कर जाती थी कि हमें कभी महसूस ही नहीं हुआ कि हमारे साथ वह नहीं हैं.और मैं मानता हूं कि औरतें अपने परिवार को मैनेज करना जानती हैं. मेरा मानना है कि हर पुरुष को अपने घर की महिलाओं की इन सारे बलिदानों को याद रखना चाहिए और उन्हें सराहा जाना चाहिए.तमन्ना शो में हम यही कहने की कोशिश कर रहे हैं कि एक औरत की जो तमन्ना होती है, उसकी जो चाहत होती है. यह जिम्मेदारी हमारी भी होती है कि हम उन्हें पूरा करें. उतना ही वजन दें. जितना आप अपने सपने को देते हैं.
आपके परिवार में सभी एक्टर हैं. पिता, मां, भाई. फिर आपने निर्देशन की राह क्यों चुनी?
मुझे हमेशा से कहानी कहने और बताने में दिलचस्पी रही.तो मेरे ख्याल से उसका सबसे सरल उपाय था कि मैं निर्देशन में आ गया.वैसे तो मैं हूं आर्किटेक्ट और पढ़ाई खत्म होने के बाद मैंने निर्देशन की राह चुनी.
शो के बाकी स्टारकास्ट कौन-कौन हैं?
केतिकी दवे, किरण करमरकर, विशाल, हर्ष छाया जैसे उम्दा कलाकार हैं. 

लाल बालों की लाली


फिल्म फितूर में कट्रीना  कैफ के बालों में ५५ लाख रूपये खर्च किये गए हैं. इस बात पर काफी शोर हो रहा।  वजह यह है कि  कट्रीना के बालों को संवारने  के लिए विदेशी हेयर स्टाइलिस्ट को बुलाया गया था. इस वजह  से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में काम कर रहीं कई हेयर स्टाइलिस्ट को ऐतराज है. उनका मानना है कि  भारत में काफी काम पैसे में यह स्टाइलिंग हो सकती थी. लेकिन यहां ट्रेंड हैरस्टीलिस्ट होने के बावजूद विदेशी  लोगों को अधिक मौके दिए जाते हैं। लंबे अरसे से यह लड़ाई चल रही है. यहाँ काम करने वाले कई हैरस्टीलिस्ट, मेकअप आर्टिस्ट ने अपनी परेशानी सामने जाहिर की है. दरअसल हकीकत यह है कि  हमें हमेशा ही विदेशी चावल अधिक पसंद आते हैं.. यह हकीकत है कि गांव  वालों को हमेशा शहर आकर्षित करता है।  प्रियंका चोपड़ा  ने लगातार कई सालों तक खुद की  क्षमता साबित की है।  लेकिन उनकी जय जय कार अभी अधिक हो रही चूँकि इसके लिए उन्हें भी विदेशी जमीन तलाशनी पड़ी है. वे खुद कई बार ये बातें स्वीकार चुकी हैं कि  उन्हें इस बात की तकलीफ रही है कि  उन्हें फिल्म बर्फी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार क्यों नहीं मिला. सनी देओल  भी स्वीकारते हैं कि उन्हें बॉलीवुड स्टंट मैन पर खास भरोसा नहीं है।  इसलिए उनकी यही कोशिश होती है कि वे अपनी फिल्मों के लिए बाहर से स्टंट मास्टर को बुलायें।  फिल्म घायल वन्स  अगेन के लिए भी उन्होंने बाहरी स्टंट मैन का  ही सहारा लिया है।  फिल्म पा के लिए भी विदेशी मेकअप विशेषज्ञ को  मौके दिए गए थे।  शाहरुख़ खान की फिल्म फैन के लिए भी विदेशी मेकअप मैन  आमंत्रित किया गया है।  इस बारे में भी गंभीरता से  सोचनी जरुरी है कि  भारत में अब भी क्या दक्ष और नयी तकनिकी और वक़्त के साथ चलने वाले प्रयोग  नहीं हो रहे हैरस्टीलिंग की  दुनिया में , या मेकअप की दुनिया में।  या स्टंट की दुनिया में। तो इसके भी कारण  क्या हैं ? और अगर कमियां हैं तो क्यों हैं , और इसके उपाय क्या हो सकते।  या फिर वाकई सिर्फ यह मानसिकता भर ही हैं  की दूर के ढोल ही हमेशा सुहावने लगते हैं। 

दर्शक का दिल


करीबी मित्र जो कि रंगोली कार्यक्रम से जुड़ी हैं, उनके माध्यम से पता चला कि रंगोली धारावाहिक में कई प्रशंसकों के खेत जेल से भी आते हैं. वे लिखते हैं, कि जेल में उनके लिए मनोरंजन का माध्यम सिर्फ दूरदर्शन चैनल है. वे यह भी बताते हंै कि वे अकेले नहीं, बल्कि पूरे समूह के साथ वे यह शो देखते हैं और कम से कम इसी बहाने उनके थोड़े दुख कम हो जाते हैं. वे इस बात से खुश हैं कि फिर से रंगोली की शुरुआत हुई है. इस जानकारी बाद मैंने महसूस किया कि कुछ धारावाहिक व कुछ कार्यक्रम किस तरह लोगों के जेहन में जिंदा रहते हैं. कभी रेडियो पर फौजी भाईयों के लिए  शो कितना लोकप्रिय था. संगीत के माध्यम से वे जो अपने परिवार से दूर हैं, किस तरह चंद लम्हों के लिए ही सही मुस्कुरा तो लेते होंगे. कल्पना करें कि संजय दत्त ने भी इतना वक्त जेल में गुजारा है. ऐसे में जाहिर सी बात है, उनके लिए भी मनोरंजन का माध्यम दूरदर्शन ही रहा होगा. मुमकिन है कि रंगोली व चित्रहार जैसे शोज में कभी उनके गाने भी प्रसारित हुए होंगे और उनके दिल को कितनी तसल्ली मिली होगी कि उन्होंने अच्छा काम भी किया है. दरअसल, यह हकीकत है कि हिंदी सिनेमा के बारे में आलोचना होती रही है कि यहां संगीत हावी है. जबरन गाने ठूसे जाते हैं. लेकिन हकीकत यह है कि इसी संगीत की वजह से आज भी कुछ लोगों के चेहरों पर मुस्कान होती है. यह संगीत ही है, जो तमाम म्यूजिक चैनलों की मौजूदगी के बावजूद रंगोली की यादों को खुद से जोड़े रखना चाहते हैं. सुरभि की यादों के बारे में खुद रेणुका सहाणे ने स्वीकारा था कि उनके पास शो की समाप्ति के बाद भी दर्शकों के खत आते थे. यह उस दौर की खूबसूरती और खुशनसीबी थी कि सोशल नेटवर्र्किंग साइट्स हावी नहीं थे. वरना, शायद कलाकार भी उस भावना को उतनी अहमियत नहीं दे पाते. आखिर खत लिखने, फिर उसे पोस्ट करने में उनकी शिद्दत नजर आती थी.