20151216

गायक-गायिकाएं व रॉयल्टी


अलीशा चिनॉय ने इस बात का खुलासा किया कि उन्हें फिल्म बंटी बबली के गीत कजरारे के लिए केवल 15 हजार रुपये फीस के रूप में मिले थे. उन्होंने  गुस्से में आकर यशराज को वह चेक लौटा भी दिया था. लेकिन यशराज ने उन्हें फिर से वह चेक वापस कर दिया था.अलीशा बताती हैं कि उन्हें इससे अधिक अफसोस इस बात का हुआ था कि वे जब भी इन गीतों को  किसी समारोह में गाती हैं. आॅरगनाइजर उनसे कहते हैं कि वे इस गीत को न गाएं, क्योंकि यशराज वाले बाद में उनसे काफी रॉयल्टी फीस वसूलते हैं. सिर्फ यशराज ही नहीं, बल्कि एक बड़ी म्यूजिक कंपनी के बारे में भी यह खबर लोकप्रिय है कि वह छोटे छोटे गांवों और शहरों के होटलों पर भी पैनी नजर रखती है, और इस बात का रिकॉर्ड रखती है कि क्या वहां उस कंपनी के गाने बज रहे हैं. और अगर उन्हें जानकारी मिले तो वह रॉयल्टी फीस लेने से नहीं चूकती. सोनू निगम ने कई अरसे तक रॉयल्टी के लिए अपनी लड़ाई लड़ी है. लेकिन अब भी गायक-गायिकाओं को उनकी फिल्मों के गीतों की रॉयल्टी नहीं मिलती. अलीशा जिस दौर में कजरारे गीत को अपनी आवाज देने के लिए तैयार हुई थीं. उस दौर में वे लोकप्रिय गायिकाओं में से एक थीं. उस दौर में म्यूजिक वीडियो एलबम इस तरह के बेहतरीन गायक गायिकाओं का एक खास माध्यम था, आमदनी का. लेकिन उस दौर में भी उन्हें मामूली सी फीस देना उनका अनादर ही था. लता मंगेशकर शायद इस बात से वाकिफ होंगी सो उन्होंने अपनी लड़ाई लड़ी भी और जीती भी. उन्हें उनके गीतों की रॉयल्टी मिलने भी लगी. लेकिन एक बड़ा वर्ग है गायक-गायिकाओं का. उन्हें आज भी रॉयल्टी नहीं मिलती. जबकि म्यूजिक कंपनियां उनके नाम पर कमाई कर रही है. इस सिस्टम में बदलाव होने ही चाहिए. लेकिन आने वाले समय में तो खास बदलाव की गुंजाईश नहीं दिखती.

टीवी और हॉरर शो


सारिका से हाल में एक टीवी शो की लॉन्चिंग के दौरान मुलाकात हुई। मुलाकात के दौरान उन्होंने पुराने दौर की कई यादें संझा किया। उन्होंने बताया कि जिस दौर मैं उन्होंने हॉरर फिल्मों में काम शुरू किया था। उस दौर में रामसे ब्रदर्स ही इस तरह की फिल्में बनाते थे। वे जिस तरह की कहानियां उस दौर में दिखाते थे। भले ही आज लोग उनका मजाक बनाये।लेकिन उस दौर में वही दौर हिट था। और उस वक़्त लोगों के पास उस तरह के साधन उपलब्ध नहीं थे। उनकी चाहत है कि आज के दौर जब साधन की कमी नहीं है। ऐसे में अवश्य नई कहानियों के बारे में सोचना चाहिए। दरअसल एंटरटेनमेंट की दुनिया में डर का भी एक बाद दर्शक समूह रहा है। और इस दर्शक समूह को तैयार रामसे ब्रदर्स ने ही किया था। सो उनकी उपलब्धि को भूला जाना नहीं चाहिए। उन्होंने ही एंटरटेनमेंट का यह जॉनर खास बनाया। इन दिनों एंड टीवी के शो डर सबको लगता है युवाओं को बेहद पसंद आ रहा है,क्योंकि इस शो में फिक्शन और रियलिटी का मिश्रण है। सो युवा इसमें काफी दिलचस्पी भी ले रहे हैं। यह हकीकत है कि इनदिनों हमारी फिल्मों की दुनिया में इस जॉनर को लेकर बहुत सारे प्रयोग नहीं हुए हैं। जबकि विदेशों में यह एक लोकप्रिय जोनर है और यह काफी पसंद भी किया जाता है। इसकी बड़ी वजह यह भी है कि हिंदी फिल्मों के निर्देशकों को इस तरह की कहानियों में खास रुचि नहीं है। तभी तो अबतक किसी भी बड़े सुपरस्टार को हमने हॉरर फिल्मों में नहीं देखा है। और शायद भविष्य में भी उम्मीद कम है। बहुत हद तक विक्रम भट्ट ने कोशिशें की लेकिन खास कामयाब नहीं हुए। मेरी समझ से अगर बड़े निर्देशक इस तरफ रुचि लें तो अच्छी कहानियां लोगों के सामने आएगी। एंड टीवी के शो डर सबको लगता है में कई फिल्मों के निर्देशकों को मौके मिल रहे हैं। सो मेकिंग के आधार पर यह शो बड़े कैनवास पर नजर आता है। अगर स्टोरी डेवलपमेंट पर भी कोशिशें की जाये तो टीवी के स्तर पर भी बड़े प्रयोग किये जा सकते हैं।

अनुष्का के स्वतंत्र विचार


अनुष्का शर्मा ने हाल ही में एक वरिष्ठ फिल्म समीक्षक से बातचीत के दौरान कई बातें बेबाकी से रखी हैं. उन्होंने कई हकीकत से रूबरू कराया है. अनुष्का अपनी बातचीत में बताती हैं कि किस तरह फिल्म इंडस्ट्री में स्त्री पुरुष को लेकर लोगों की अलग सोच है. अभिनेत्री व अभिनेता में किस तरह से भेदभाव किये जाते हैं. अनुष्का ने इंडस्ट्री में अपने सात  साल पूरे किये हैं और जो अनुष्का से मिलते रहे हैं वे इस बात से वाकिफ होंगे कि अनुष्का पर ग्लैमर दुनिया का प्रभाव बहुत हद तक हावी नहीं हैं. वे संवेदनशील बातें करती हैं और वे अपनी जमीन को नहीं भूली हैं. वे बताती हैं कि किस तरह आउटडोर शूटिंग के दौरान भी अभिनेत्रियों से बड़े रूम अभिनेताओं को दिये जाते हैं. इस छोटी सी बात से ही इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि पुरुषवादी सोच किस तरह इंडस्ट्री पर हावी है. अनुष्का की इस बात के लिए सराहना होनी चाहिए कि किस तरह उन्होंने बेबाकी से इस बारे में बातचीत की है कि मेहनताना देते वक्त भी पहले अभिनेता के मेहनताना को क्लीयर किया जाता है. बाद में अभिनेत्रियों की बारी आती है. हाल ही में अनुष्का अनुराग कश्यप और उनकी टीम से नाराज हुई थीं, चूंकि उन्हें बांबे वेल्वेट का मेहनताना अब तक नहीं मिला है. अनुष्का पर उनके अंतरंग मित्र विराट कोहली को लेकर कई बार कटाक्ष किये गये हैं, कि उनकी वजह से उनका परफॉरमेंस खराब हुआ है. लेकिन अनुष्का ने इसका बार बार विरोध कर अपना मुंह खाली नहीं किया. अब जब उन्हें मौका मिला है तो वे अपनी बात रख रही हैं और बेहद संजीदगी से रख रही हैं. उन्होंने यह भी जाहिर किया है कि अगर कोई अभिनेत्री अपनी बात निर्देशक के सामने रखती हैं तो निर्देशक उन्हें बेवकूफ समझते हैं. अनुष्का की यह सारी बात गौरतलब हैं

सिया के राम व शांता


स्टार प्लस के धारावाहिक सिया के राम में फिलवक्त राम की बहन शांता की कहानी विस्तार से दिखाई जा रही है. निखिल सिन्हा इस लिहाज से बधाई के पात्र हैं, कि उन्होंने रामायण के अनछुए पहलुओं को दर्शकों के सामने रखने की ंिहम्मत की है.चूंकि फिलवक्त जो दौर चल रहा. हर मुद्दे को लेकर विवाद हो रहे. मुमकिन यह भी है कि इस विषय पर भी काफी विवाद हो सकते हैं. कई बुद्धिजीवी अपने तर्क रख सकते. चूंकि शो में कहानी में आगे दिखाया जा रहा है कि किस तरह दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यत् न किये. यह भी एक बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है कि दशरथ जैसे ज्ञानी भी इस तरह की बातों पर सोचते थे. उन्हें भी पुत्र रत् न चाहिए था. सिया के राम दरअसल, पुरुष अंहकार की मृथ्याओं को पूरी तरह से धाराशायी कर रहा है. एक दृश्य में सीता गौतम ऋषि से पूछती है कि ज्ञान का क्या लाभ. गौतम ऋषि कहते हैं कि ज्ञान होने से व्यक्ति अपने गुस्से और अहंकार पर नियंत्रण कर लेता है. तो सीता के सवाल होते हैं कि तो फिर आपने अपनी पत् नी अहिल्या को श्राप क्यों दिया. वर्षों से चली आ रही मृथ्या और पुरुषों को परम पूजनीय समझने वाले समाज के लिए यह सटीक जवाब है. पहली बार किसी पौराणिक कथा पर आधारित धारावाहिक दरअसल, धार्मिक नजर नहीं आ रहा. उसके किरदार पूजनीय नहीं, बल्कि तर्कसंगत लगते हैं. किसी दौर में कैकयी, सुर्पनखा जैसे किरदारों को खलनायिका समझने वाले रामायण में दशरथ और गौतम ऋषि के जीवन के भी क्या ग्रे शेड रहे हैं. यह धारावाहिक उसे भलिभांति दर्शकों के सामने प्रस्तुत कर रहा है. वह पुरुष को परमात्मा बना कर पेश नहीं कर रहा. शांता की कहानी अब से पहले किसी ने न सुनी न ही कही. जबकि शांता के पहलुओं पर भी नजर डालना आवश्यक था. इस लिहाज से वर्तमान दौर के महत्वपूर्ण धारावाहिकों में से एक है यह शो.

निर्देशक व दर्शक

इम्तियाज अली की यह खूबी है कि वह फिल्मों के प्रदर्शन के बाद भी आम लोगोंं से खूब मिलते हैं और उनसे अपनी फिल्म के बारे में राय लेते हैं. यह सिलसिला पिछले कई  सालों से चला आ रहा है. अनुराग कश्यप व अन्य निर्देशकों ने भी यह संस्कृति शुरू की थी.लेकिन धीरे धीरे वे इससे कट रहे हैं. लेकिन इम्तियाज ने अब भी यह सिलसिला जारी रखा है. उनकी हाल ही में प्रदर्शित फिल्म तमाशा को लेकर भी उन्होंने मुलाकात की. दर्शकों के मन में कई सवाल थे और इम्तियाज ने बारी बारी से सारे सवालों के जवाब भी दिये. यह फिल्म लड़कियों को बेहद पसंद आ रही है. दरअसल, यह सिलसिला बादस्तूर जारी रहना इसलिए जरूरी है क्योंकि निर्देशक और दर्शक का रिश्ता इससे मजबूत होता है. दर्शक भी इस बात को समझते हैं कि निर्देशक को उनकी फिक्र है. और उनकी राय की परवाह है. फिल्म लूटेरा की रिलीज के बाद विक्रमादित्य मोटवाणे ने भी मेल के माध्यम से दर्शकों के सारे सवालों के जवाब दिये थे. चूंकि इम्तियाज, विक्रमादित्य उन निर्देशकों में से एक हैं, जिनकी फिल्मों में कई परत होते हैं. उनकी फिल्म से हर दर्शक अलग अलग नजरिया बनाता है. इनकी फिल्मों में कई सवालों के जवाब फिल्म में स्पष्ट नहीं होेते. लेकिन चूंकि इनके किरदार जीवंत होते हैं, दर्शक उन्हें साथ लेकर निकलते हैं थियेटर से. सो, उनके मन ेमें कई तरह की जिज्ञासाएं होती हैं और वे उनके जवाब तलाशना चाहते हैं. इम्तियाज की फिल्म तमाशा में ही उन्होंने अपने पोस्टर पर लिखा है कि व्हाय द सेम स्टोरी... इस वाक्य को कई लोगों ने कई नजरियों से देखा है. एक नजरिया फिल्म का यह भी था कि इम्तियाज सवाल पूछ नहीं रहे, बल्कि सवाल का जवाब दे रहे हैं कि हमेशा कहानियों के एक होने की वजह क्या है. तो दूसरी तरफ किसी दर्शक के मन में सवाल बन कर भी खड़े हों. सो, यह जरूरी है कि निर्देशक उनकी प्यास बुझाए.

angry indian godess

ऐंग्री इंडियन गॉडेस महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण फिल्म है। फिल्म की कहानी 6 महिलाओं की जिंदगी से शुरू होती है जिनके पास धन की कमी नहीं है। लेकिन सभी जिंदगी से खुश नहीं है। इसी दौरान एक दोस्त की शादी में सभी एकत्रित होते हैं। और उनकी जिंदगी के गम दर्शकों के सामने एक एक कर जाहिर होने लगते हैं।एक लक्ष्मी का किरदार भी है। लक्ष्मी फ्रीडा की देख रेख करती है। उसके भाई की मौत उसकी आंखों के सामने होती है और वह तय करती है कि वह भाई के खूनी से बदला लेकर रहेगी। इस फिल्म जिस तरह से महिलाओं की जिंदगी के अहम पहलुओं को सामने प्रस्तुत करती है।वह दिल को छूती है। एक महिला कितनी भी बड़ी कामयाबी हासिल क्यों न कर ले। इसके बावजूद उसके किस तरह तंज़ सहने पड़ते हैं। क्यों लोग उन्हें भोग की नजर से ही देखते हैं। और वह किस हद तक उन्हें चोट पहुंचाता है।वह किस तरह टूटती हैं और खुद को निहत्था महसूस करती हैं।इस फिल्म में इसे बखूबी और बारीकी से दर्शाया गया है। गोवा में आये दिन सागर किनारे होने वाली बलात्कार के बाद हत्याओं के मुद्दे पर भी प्रकाश डालती है। और उसपर पुलिस प्रशासन का महिलाओं के प्रति गलत और बेबुनियाद कटाक्ष की दास्तां को भी दर्शाता है।इन दिनों किसी भी बलात्कार जैसी घटनाओं के लिए भी महिलाओं के कपड़े और उनके देर रात तक घूमने फिरने को लेकर साधू संतों की बयानबाजी होती है। इस मसले को भी गहराई से फिल्म में दर्शाया गया है। और सारी परेशानियों से जूझते हुए , किस तरह महिला हथियार उठाने पर विवश होती है। यह भी इस फिल्म का एहम हिस्सा है। इस लिहाज से फिल्म में ऐसी कई घटनाएं हैं जो आपको आपके आस पास की लगती है। समलैंगिक के मुद्दे लेकर भी लोगों की क्या दोहरी राय है और किस तरह लोगों के मन में उन्हें लेकर दुर्व्यवहार है।इस मुद्दे पर भी निर्देशक अपनी पैनी नजर रखती हैं। एक बड़ी कामयाबी इस फिल्म की यह है कि सभी कलाकारों के चेहरे मुख्यधारा में दिखने वाले चेहरे नहीं हैं। संध्या मृदुल स्वाभिमान जो उनका पहला शो था उस दौर से लेकर अबतक खुद को बेहतरीन तरीके से साबित कर रही हैं और उन्हें अपनी सारी कलाकार का सहयोग भी बखूबी मिला है। इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस से अधिक महिलाओं के दिलों में दस्तक देना जरूरी है। ऐसी फिल्मों का निर्माण होते रहना आवश्यक है।

जावेद साहब की महत्वपूर्ण बातें


हाल ही में एक समारोह के दौरान जावेद अख्तर ने असहिष्णुता के विषय पर कई महत्वपूर्ण बातें रखी हैं. उन्होंने कहा है कि हम भी तालिबानी बन रहे हैं. हम हर बात पर प्रतिक्रिया दे रहे. लोग लड़ने को आतुर हो जा रहे. उन्होंने बेहद सटीक उदाहरण देते हुए अपनी बात रखी कि फिल्म शोले के एक दृश्य में बसंती और वीरू के बीच के दृश्य मंदिर में फिल्माये गये हैं. लेकिन जावेद यह स्वीकारते हैं कि आज के दौर में मंदिर वाले सीन फिल्माना मुश्किल है. चूंकि उस दौर में इनटॉलरेंस जैसे मुद्दे नहीं थे. फिल्म संयोग में फिल्म के गीत में कृष्ण सुदामा की दोस्ती का पूरा विवरण है. एक फिल्म में दिलीप कुमार जो कि हकीकत में युसूफ खान है. वह मंदिर में भगवान की मूर्ति उठा कर बोलता है कि नहीं मानता मैं ऐसे भगवान को और उसे नाले में फेंक देता है. उस दौर में वह सिनेमा था. आज वह असहिष्णुता हो चुका है. आज के दौर में लोग राजू हिरानी से पूछते हैं कि उन्हें क्या हक है कि वह पीके में हिंदू भगवान की फिरकी ले रहे हैं. लेकिन मुसलिम के साथ ऐेसा कर पाते क्या. दरअसल, जावेद अख्तर की कई बातें पिछले लंबे समय से चली आ रही बहस पर कही गयी ठोस बातें ंहैं और महत्वपूर्ण भी है. हाल ही में मुंबई के एक सिनेमाघर से राष्टÑीय गान के दौरान खड़े न होने की वजह से एक मुसलिम परिवार को थियेटर से खदेड़ा गया. क्या यह उचित है. जावेद साहब ने हकीकत बयां की है कि हिंदू धर्म में खुले दिल से सबकुछ स्वीकार करने देने की अनुमति है. यह इसकी खूबसूरती है. लेकिन हम इसे ही खोते जा रहे हैं और यही हकीकत भी है. हम अपनी संस्कृति सभ्यता को भूल कर केवल जबरदस्ती करने में यकीन कर रहे हैं और बिल्कुल अनुचित है. यह जानना समझना बेहद जरूरी है कि आप किसी से न जबरदस्ती सम्मान हासिल कर सकते न उन्हें बाध्य करें. गंभीरता से इस बारे में सोचना बहुत जरूरी है.