20140802

अनुपम का नया शो


अनुपान जल्द ही कुछ भी हो सकता है नामक शो लेकर कलर्स चैनल पर आ रहे हैं।  इस शो में हमारे लिए सेलिब्रिटी अनुपम के लिए उनके दोस्त नजर आएंगे।  पहले एपिसोड में शाहरुख़ खान आ रहे हैं।  शो की लॉन्चिंग के दौरान अनुपम ने बताया कि वे इस शो में फ़िल्मी हस्तियों की निजी जिंदगी से जुड़े किसी भी विवाद के बारे में बातें नहीं करेंगे।  चूँकि इस शो का मकसद ऐसी बातों को जानना है जिसके बारे में आम लोगों को जानकारी नहीं मिल पाती है।  जैसे शाहरुख़ ने बताया कि उन्हें जिंदगी में एक बात से काफी डर लगता है की वे बार बार अपनी बाहें फैलाते रहते हैं।  उन्हें डर लगता है कि कोई उनकी बाहें आकर न कांट दें।  वाकई शाहरुख़ जैसे सुपरस्टार के मुख से सुनी ये बात हम मजाकिया तौर पे ले सकते हैं।  लेकिन हकीकत यही है कि खास लोगों की जिंदगी में डर ऐसे ही अजीबोगरीब होते हैं।  आमिर खान बताते हैं कि वे जब काम कर रहे हो और अचानक किरण का फोन आ जाए तो वो चौंक जाते हैं।  चूँकि वे जानते हैं कि किरण काम पर उन्हें परेशान नहीं करतीं और अगर फोन आया है तो निशिचित्तौर कोई बात हो सकती है।  खुद अनुपम ने बताया कि उन्हें अपनी याददाश्त चले जाने का डर सताता है।  मैंने गांधी तो नहीं मारा के दौरान उन्होंने अल्जाइमर के बारे में इतना ज्यादा रिसर्च कर लिया था कि वे डरने लगे थे कि कही उन्हें भी ये बीमारी न हो जाए।  एक दिन सुबह उन्हें मन्त्र याद नहीं आरहे थे तो वे मान बैठे कि वे याददाश्त  खो बैठे हैं।  तो इस शो के माध्यम से कुछ ऐसी ही चुनिंदा बातें दर्शकों के सामने लाने की कोशिश है अनुपम की।  मैंने एक सवाल अनुपम से पूछा कि ऐसी क्या वजह है की जब करन जोहर कोई सवाल पूछते हैं या अनुपम खेर कोई शो लेके आते हैं तो सेलेब्रिटीज हर सवाल का जवाब देते हैं।  लेकिन अगर मीडिया ये सवाल करे तो वो नाराज हो जाते हैं।  उनका जवाब था चूँकि हम दोस्त हैं आप खुल कर किसी से तभी अपनी बातें शेयर करते हैं जब आप उनके दोस्त बन जाते हैं।   जरुरी है।  दरअसल यह सच्चाई है की हम उनसे ही अपनी बातें शेयर करते हैं जिन्हे हम दोस्त मानने लग जाते हैं।  पूरी उम्मीद है की अनुपम इस शो  माधयम से हमें और भी कई नयी बातों से अवगत कराएँगे 

बॉलीवुड व bhagya ke सितारें


आयुष्माना खुराना को फिल्म विकी डोनर से बॉलीवुड में एंट्री मिली. न सिर्फ एंट्री मिली, बल्कि इस फिल्म ने कामयाबी हासिल की और प्रयोगात्मक सिनेमा में नया अध्याय जोड़ा. इसी साल फिल्म इशकजादे के लिए परिणीति चोपड़ा को उस साल के हर अवार्ड समारोह में नवोदित अभिनेत्री के लिए कई अवार्डस मिले. और फिलवक्त ये दोनों कलाकार एक साथ किसी फिल्म में काम नहीं कर रहे. मगर जी सिने स्टार की खोज में वे मेंटर के रूप में नजर आ रहे हैं. आयुष्मान ने इसी शो की लांचिंग में बताया कि किस तरह उन्हें इसी शो के पहले संस्करण में रिजेक्ट कर दिया गया था. और आज उसी शो में वे मेंटर के रूप में उपस्थित हैं. वाकई आयुष्मान के साथ बिल्कुल किसी फिल्म की कहानी की तरह टिष्ट्वस्ट आया. वही दूसरी तरफ परिणीति चोपड़ा कभी अभिनेत्री बनने का ख्वाब नहीं देखती थीं. लेकिन एक दिन आदित्य चोपड़ा की नजर गयी और वह अभिनेत्री बन गयीं. इन दोनों कलाकारों की कहानियों को देखें, तो दोनों ही कहानियां दरअसल, बॉलीवुड की दुनिया की सच्चाई को दर्शाते हैं कि यहां किसी के लिए मेहनत से आगे बढ़ना लिखा है तो किसी के लिए लक है. मसलन, सितारों की दुनिया में शामिल होने के लिए मेहनत के साथ साथ भाग्य भी अहम हैं. हां, सितारों की दुनिया में शामिल होने के लिए आपके सितारों का बुलंद होना भी जरूरी है. बहरहाल, जी सिने स्टार ने यह बेहतरीन निर्णय लिया है कि वे प्रतिभागियों को इंडस्ट्री में सक्रिय कलाकारों से बातचीत करायेंगे. ताकि वह अवगत हो सकें. चूंकि वर्तमान में यह बेहद जरूरी है कि आप थ्योरी नहीं, प्रैक्टिकल में दुनिया देखें. यह जानना बेहद जरूरी है कि इंडस्ट्री में किस तरह काम होता है. फिल्में जब फ्लोर पर जाती हैं तो एक कलाकार को कितनी मेहनत करनी होती है. सो, सक्रिय कलाकारों के अनुभव उन्हें जानने ही चाहिए.

जिंदगी गुलजार है


 वक्त रात के 1 बज रहे. टीवी का रिमोट हाथ में. अचानक हाथ एक चैनल पर ठहरता है. वजह 10 मिनट में  ही उस चैनल में नयेपन का एहसास होता है. कोई शोर शराबा नहीं. कोई चकाचौंध नहीं. जबरन तड़का परोसने की भी कोशिश नहीं और उन्हीं चंद लम्हों में दिल जीत लिया. जीटीवी की नयी पेशकश जिंदगी वाकई छोटे परदे के नियमित दर्शकों को जिंदगी प्रदान कर रही. सच है कि आंखों को वीजा नहीं लगता. सरहद पार की कहानियों को जो रास्ता जीटीवी और जिंदगी चैनल की सोच रखने वाली शैलजा केजरीवाल ने की है. दरअसल, कई सालों के बाद वास्तविकता में यह नयी क्रांति आयी है. इसे क्रांति कहते हैं. शैलजा ने उन तमाम लोगों के चेहरे पर तमाचा लगाया जो कहते फिरते हैं कि दर्शक यही देखना चाहते. पिछले कई सालों से छोटे परदे पर ग्लैमर के नाम पर केवल भव्य सेट का दर्शन करानेवाले मेकर्स को अब सतर्क होना चाहिए. जिंदगी ने दस्तक दे दी है. जिंदगी चैनल के पास तहजीब है, सोच है. टीवी के लिए एक नयी जुबान है. शैलजा के इस सोच की तारीफ होनी चाहिए कि उन्होंने पाकिस्तान और भारत के बीच की खाई को मिटाने के लिए इतनी बेहतरीन नींव रखी. गौर करें तो पाकिस्तान के धारावाहिकों में या तो प्रेम कहानी, परिवार की कहानी या फिर समाज की कहानी दिखा रहे. इससे प्रतीत होता है कि वहां के मेकर्स की सोच इस बात को कितनी अच्छी तरह व्यक्त करते हैं कि हां, सिनेमा और टीवी का एक फर्ज समाज के लिए सोचना और समाज की कहानियों को दिखाना भी है. वहां के शोज देखें. वहां के शोज के सेट, कलाकारों की अदाकारी. उनके पहनावे. कोई दिखावा नहीं. सिर्फ ज्यों का त्यो हम तक एक सच्चाई पहुंच रही. और हमें इसे जरूर स्वीकारना चाहिए. वर्षों बाद एक नयी कली और उम्मीद की किरण लेकर आयी है ये जिंदगी. तहे दिल से स्वागत करें.

सलीम खान का प्रयास


हाल ही में लीजेंडरी लेखक सलीम खान के बारे में एक और जानकारी मिली. उन्होंने बैंड स्टैंड को साफ करने के लिए एक अलग जिम्मेदारी उठाई है. उन्होंने तय किया है कि वे किसी सरकार का इंतजार नहीं करेंगे. उन्होंने वहां कचरा उठाने वाले दो लड़कों को एक दिन अपने घर पर बुला कर कहा कि अगर वे सही तरीके से साफ सफाई करते हैं तो वे उन्हें आम तौर पर मिलने वाले मेहनताना देंगे और वे खुश हैं कि उन्हें कामयाबी भी मिल रही है. सलीम खान का मानना है कि उन्हें सिनेमा ने बहुत कुछ दिया है. और अब उनके पास काफी वक्त है. और वह उस वक्त का इस्तेमाल अब समाज के लिए करना चाहते हैं. उनका समाज सेवा करने का अंदाज औरों से अलग है. उनका मानना है कि हमें शुरुआत खुद से ही करनी होगी. बैंड स्टैंड मुंबई के उसी इलाके में स्थित है, जहां बॉलीवुड के ही नहीं, बल्कि कई रयिशों के घर हैं. वहां लोग पैसों से अमीर हैं. मगर शायद दिल से नहीं.वे सभी मिल कर भी अगर चाहें तो वे इस जगह को और खूबसूरत बना सकते हैं. लेकिन मुंबई में लोगों के पास वक्त नहीं...ऐसा यहां के लोग मानते हैं. अक्षय कुमार भी आये दिन उन लोगों को आगाह करते हैं, जो सड़कों पर गंदगी फैलाते हैं. और वे भी कुछ प्रयास करते रहते हैं. चूंकि सलीम खान इस प्रयास में आगे आये हैं तो उन्हें अब कई लोगों का साथ मिल रहा है. सलमान ने एक बार कहा था कि मछली के बच्चों को कोई तैरना नहीं सिखाता. यह हकीकत है कि सलीम खान के जीन में ही समाज सेवा है और वे छोटे प्रयासों से आगे बढ़ना और बढ़ाना चाहते हैं. दरअसल, वर्तमान में यह जरूरत है कि बॉलीवुड के सेलिब्रिटिज ऐसे कामों के लिए आगे आयें. तभी ज्यादा से ज्यादा लोग उन्हें सुनेंगे और उस पर अमल करने की कोशिश करेंगे. सो, इस सोच को और आगे ले जाने की जरूरत है.

विश्वास का रिश्ता


रणबीर कपूर ने एक बार अपनी बातचीत में इस बात का जिक्र किया कि उनके चाचा राजीव कपूर रणबीर के कितने अच्छे दोस्त हैं. और दोनों में कितनी ज्यादा बातचीत होती है. राजीव किस तरह रणबीर कपूर का ख्याल रखते हैं और केवल रणबीर का ही नहीं बल्कि परिवार के हर बच्चे का ख्याल वह सबसे ज्यादा रखते हैं. नवोदित कलाकार अरमान जैन, जिनकी फिल्म लेकर हम दीवाना दिल भी जल्दी ही रिलीज होनेवाली है. उन्होंने भी बताया कि वे घर में सबसे करीब अपने मामा राजीव के ही हैं. उन्होंने राजीव को ही सबसे पहले बताया कि वह अभिनेता बनना चाहते हैं. अरमान की फिल्म के म्यूजिक लांच पर वे मौजूद भी थे और उनके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वे कितने खुश हैं. दरअसल, राजीव के अपने बच्चे नहीं हैं. लेकिन उनमें वह पिता का प्यार, अपनों के लिए अपनापन कम नहीं हुआ है. वह इसे नकारात्मक तरीके से लेने की बजाय सकारात्मक तरीके से ही लेते हैं और वे कामयाब व्यक्ति की भूमिका निभा रहे हैं. हर परिवार में आपका कोई न कोई हमराज, दोस्त होता है. जिससे आप अपने सारे सुख दुख बांटते हैं. यह रिश्ता खून के आधार पर नहीं, विश्वास के आधार पर बनता है. राजीव ने अपने परिवार के बच्चों के साथ वही विश्वास कायम किया है. भले ही वह फिल्मों में कामयाब नहीं रहे. लेकिन इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि वे कामयाब व्यक्ति नहीं. उनकी यह सफलता ही है कि उनके परिवार के बच्चे उनकी इतनी तारीफ कर रहे. इसका अर्थ है कि अच्छे इंसान हंै वह. कुछ इसी तरह अर्जुन कपूर उनकी बहन और सोनम कपूर के बेहद करीब उनके चाचा संजय कपूर हैं. वे भी फिल्मों में नाकामयाब हैं. लेकिन वे अपने परिवार का लाड़ले हैं. आमतौर पर इन नाकामयाब अभिनेताओं के बारे में हमें जानने की दिलचस्पी ही नहीं होती. और हम उनके इस अच्छे पक्ष से अज्ञात ही रह जाते हैं.

काबुलीवाला का लौटना


फ्रेंच पटकथा लेखक जीन क्लोडे कैरीइरे ने प्रोडयूसर सुनील ढोशी, अनुराग कश्यप, शर्मिला टैगोर और एड मेकर पीयूष पांडे के संयोजन में निर्णय लिया है कि वे पुरानी लघुकथाओं को कहानियों का रूप देंगे. जीन का मानना है कि अगर शेक्सपीयर के काम को बार बार एडॉप्ट किया जा सकता है और बार बार उन पर नयी फिल्में बन सकती हैं तो फिर टैगोर की कहानियों को हम नया रूप क्यों नहीं दे सकते. जीन ने तय किया है कि रवींद्रनाथ टैगोर की कहानी काबुलीवाला को वह परदे पर जीवित रूप प्रदान करेंगे. और इसी तरह वे और भी कहानियों को बड़े परदे पर उतारेंगे. निस्संदेह यह बेहतरीन शुरुआत है. अच्छी बात यह है कि जैसे हिंदी फिल्ममेकर शेख्सपीयर से बहुत ज्यादा प्रभावित रहते हैं. भारत से बाहर भारतीय लेखकों को पसंद किया जाता है. जीन ने टैगोर की कहानियों की अहमियत को समझा है. यह शुुरुआत एक अच्छी शुुरुआत है. चूंकि ऐसी कई कहानियां हैं, जो हमसे अछूती हैं. उन्हें इस माध्यम से हम तक पहुंचाया जायेगा. यूटयूब पर इन दिनों कबीर के दोहे, वाणी को नीरज पांडे कबीर कैफे के रूप में एक नया रूप दे रहे हैं. इसे म्यूजिकल रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है और यह भी बेहद रोचक है. भारत में ऐसे सृजनात्मक पहल की जरूरत है. चूंकि यह बेहद जरूरी है कि हम पुरानी बातों, किस्से कहानियों को याद करें. भले ही उसके नये कलेवर में प्रस्तुत किया जाये. लेकिन मूल बातें वही रहें.कुछ सालों पहले रीमिक्स गानों का चलन शुरू हुआ था. इससे वे गाने भी लोकप्रिय हुए, जिनके ओरिजनल गीत लोगों ने देखे सुने ही नहीं थे. कुछ लिहाज में भले ही रीमिक्स ने संगीत की दुनिया को हानि पहुंचायी. लेकिन अगर इस लिहाज से देखें तो उन्होंने पुरानी यादों को तरोताजा किया. इन दिनों तो प्रासंगिकता को बरकरार रखते हुए नये कलेवर में अच्छी चीजें परोसी जा रहीं.

अभिनेत्री का हक


बिपाशा बसु को इस बात से तकलीफ हुई है कि उन्हें फिल्म हमशकल्स में खास भूमिका नहीं मिली. उन्होंने अपने गुस्से का इजहार टिष्ट्वटर पर किया तो फिल्म के निर्माता वासु भगनानी ने घोषणा कर दी कि वे भविष्य में कभी बिपाशा के साथ काम नहीं करेंगे. हालांकि बिपाशा को फिल्म में उतने ही दृश्य मिले हैं, जितने बाकी दो अन्य अभिनेत्रियों को. चूंकि सच्चाई यह है कि हिंदी फिल्मों में अभी भी महिला प्रधान फिल्म न हो तो सारे दृश्य अभिनेताओं के खाते में ही जाते हैं. फिल्म धूम 3 में गौर करें तो कट्रीना को कितने दृश्य मिले हैं. उन्हें फिल्म के गानों में प्राथमिकता से दिखाया गया है. लेकिन फिल्म में नहीं. पूरी फिल्म में आमिर ही आमिर नजर आये हैं. फिल्म हॉलीडे में भी सोनाक्षी सिन्हा केवल नाच गाने के लिए ही नजर आती हैं. फिल्म बुलेट राजा में भी उनका काम बस गानों तक ही सीमित था. हिंदी फिल्मों में आप एक सुपरस्टार अभिनेता के साथ एक सुपरस्टार अभिनेत्री को चंद दृश्यों में देख सकते हैं. लेकिन किसी भी महिला प्रधान फिल्म में अब तक किसी सुपरस्टार ने काम नहीं किया है और आगे भी वे नहीं करेंगे. बिपाशा बसु ही नहीं, बल्कि हर अभिनेत्री को वाकई बराबरी का दर्जा मांगना ही चाहिए. ऐसे में अगर परिणीति चोपड़ा और विद्या बालन जैसी अभिनेत्रियों ने ठान लिया है कि वे बड़े स्टार्स के साथ काम नहीं करेंगी तो उनका निर्णय बिल्कुल सही है. कट्रीना कैफ और खासतौर से  सोनाक्षी सिन्हा को जरूर सीख लेनी चाहिए. चूंकि एक के बाद एक सोनाक्षी फिल्मों में केवल कठपुतलियों की तरह ही नजर आ रही हैं. अभिनेत्रियों को स्थान मिलेगा. जब सारी अभिनेत्रियां स्टार्स को अहमियत देना छोड़ेंगी. वरना, स्थिति कुछेक दृश्यों तक ही सिमट जायेगी. जो काम बिपाशा ने किया है. वही बात अगर कोई सुपरस्टार कहता तो क्या वासु की यही प्रतिक्रिया होती. शायद नहीं.