सलमान खान हाल ही में नरेंद्र मोदी के साथ गुजरात में नजर आये. सलमान वहां अपनी फिल्म के प्रोमोशन के लिए गये थे. हर अखबार ने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया है. यह पहली बार नहीं, जब किसी अभिनेता के साथ मोदी की तसवीरें आती रही हैं. इससे पहले भी अक्षय कुमार और परेश रावल ने हाल ही में जब मोदी से रात के 2 बजे मुलाकात की थी उस वक्त भी इस खबर को काफी महत्ता दी गयी थी. दरअसल, हकीकत यही है कि मोदी इन दिनों इस कदर किसी भी अखबार के मुख्य तत्व हो चुके हैं कि उनके बिना किसी भी अखबार का पन्ना ही अधूरा रह जा रहा है. एक तरफ तो हम लगातार यह चर्चा कर रहे हैं कि मोदी अपना अत्यधिक प्रचार कर रहे हैं और दूसरी तरफ लगातार खबरें लोगों तक पहुंच रही हैं. बात जहां तक सेलिब्रिटिज की है तो यह तथ्य बिल्कुल सही है कि सेलिब्रिटिज में वाकई मोदी सबसे लोकप्रिय अभिनेता हैं. खुले तौर पर तो नहीं लेकिन बात जब विकास की आती है तो सभी कलाकार मोदी का नाम लेते हैं. साथ ही वह यह कहना नहीं भूलते कि गुजरात में शूटिंग करना सबसे आसान काम है. जब भी मुंबई से लोग शूटिंग के लिए गुजरात जाते हैं. उन्हें वहां काफी सहुलियत भी होती है. फिल्म गोरी तेरे प्यार में और विशाल भारद्वाज की फिल्म मटरू की बिजली का मंडोला जैसी फिल्मों में भी मोदी ने काफी सहयोग किया था. यही नहीं मोदी के फैशन की सोच लेकर भी अभिनेत्रियां उनकी काफी तारीफ करती हैं. मल्लिका सहरावत ने तो मोदी को अपने एक टीवी शो के दौरान शादी तक के लिए प्रस्ताव भेज दिया था.मलायैका भी हमेशा उनके अंदाज की मुरीद रहती हैं. स्पष्ट है कि यह सिर्फ मोदी की राजनीतिक सोच नहीं, बल्कि उनकी अन्य गुणवता है जो आम लोगों के साथ सेलिब्रिटिज को भी प्रभावित करती है.
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20140218
दो प्रतिद्वंदी अभिनेत्रियां
फिल्म गुलाब गैंग का प्रोमो हाल ही में रिलीज किया गया है. डेढ़ इश्किया माधुरी दीक्षित की दूसरी फिल्म है. गुलाब गैंग में माधुरी की प्रतियोगिता उनकी अपने दौर की ही प्रतियोगी जूही चावला से है. भले ही जूही चावला ने बाद के दौर में माधुरी से कम लोकप्रियता हासिल की हो. लेकिन इस फिल्म में जिस तरह उनके अंदाज भी नजर आ रहे हैं. यह स्पष्ट है कि उन्होंने अपनी प्रतिभा में कोई कमी नहीं होने दी है. अनुभव सिन्हा ने दो अच्छी प्रतिभाशाली प्रतिभाओं को एक साथ फिल्म में एकत्रित कर बेहतरीन व सराहनीय काम किया है. चूंकि शायद जूही चावला ने अब तक जितनी भी फिल्मों में काम किया. उससे कहीं अधिक उन्होंने इस फिल्म में मेहनत की होगी. चूंकि भले ही कोई भी प्रतिद्वंद्वी यह कह ले कि अब हमारे बीच कोई युद्ध नहीं. लेकिन जीत की ललक और प्रशंसा की ललक हर किसी में होती है. खासतौर से आज के दौर में जहां, फिल्मों के छोटे किरदार भी कभी कभी बड़े बड़े सितारों पर हावी हो जाते हैं और फिल्म की सफलता का पूरा श्रेय उन्हें मिल जाता है. हो सकता है कि जूही चावला के साथ भी कुछ ऐसा ही हो. पिछले लंबे अरसे से उन्होंने अपनी प्रतिभा को गलत तरीके से इस्तेमाल होने दिया है. वे बहुसितारा फिल्मों में भाभी दीदी बनती नजर आ रही हैं,. लेकिन गुलाब गैंग में वह नकारात्मक किरदार में हैं और प्रोमो से स्पष्ट है कि जूही माधुरी को कड़ी टक्कर देंगी. यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि ये दोनों अभिनेत्रियां जो लंबे अरसे से इस बात की भूखी हैं कि उन्हें दर्शकों से प्रशंसा मिले तो जाहिर सी बात है. दोनों ने मेहनत बहुत की है. माधुरी ने खुद से स्टंट करने के जो फैसले इस फिल्म के लिए लिया है. स्पष्ट है कि माधुरी खुद को कहीं से कम नहीं आंकना चाहतीं. सो, गुलाब गैंग इस लिहाज से महत्वपूर्ण फिल्म होगी कि दोनों किस तरह अपना सर्वश्रेष्ठ देती हैं.
प्यार से भी जरूरी कई काम है
हाल ही में दीपिका पादुकोण करन जौहर के शो पर आयी थी. उनके साथ प्रियंका चोपड़ा भी थीं. करन ने प्रियंका और दीपिका दोनों से यह सवाल किया कि जब वे अपने पुराने प्रेमी से मिलती हैं या रूबरू होती हैं तो उन्हें कैसा लगता है. इस पर दीपिका ने कहा कि वे इसे लेकर बेहद सहज हैं और प्रियंका का भी यही जवाब था. दीपिका और प्रियंका दोनों ही कामयाब अभिनेत्रियां हैं और दोनों ने अपनी पहचान अपने स्तर से बनायी है. दोनों बाहर से आयी हैं. उनका फिल्मी दुनिया से कोई ताल्लुकात नहीं रहे हैं. दोनों ने अपनी पहचान स्थापित की. दोनों को वक्त लगा लेकिन दोनों ने मुकाम हासिल कर लिये. जहां एक तरफ दीपिका ने इस साल सफलता के झंडे गाड़े. वही प्रियंका ने भी अपने स्तर पर अंतरराष्टÑीय पहचान भी बनायी. इससे स्पष्ट है कि ये दोनों ही अभिनेत्रियां कितनी स्वतंत्र मिजाज की हैं. दीपिका भी रणबीर को देख कर आंखें नहीं फेरतीं और प्रियंका भी शाहिद कपूर के साथ पार्टी में शिरकत करती हैं. दरअसल, अब दौर बिल्कुल बदल चुका है. अब मुंबई से बाहरी शहरों से आयी लड़कियों में आत्मविश्वास अधिक नजर आता है. अब वे देवदास की पारो की तरह रोना नहीं चाहतीं. वे अब बिंदास हो चुकी हैं. उन्हें पता है कि उन्हें आग ेकरियर में क्या करना है. वे अपने करियर के साथ कोई समझौता नहीं कर रहीं. दीपिका और प्रियंका दोनों ने ही प्रेम संबंधों में सफलता हासिल नहीं की है. लेकिन इस बात की सिकन उनके चेहरे पर नजर नहीं आती. और यह बहुत अच्छी बात है कि अब लड़कियों को प्रेम संबंध की वजह से आत्महत्याएं करने की नौबत नहीं आ रही हैं. ये दो सफल नायिकाएं इस बात का सबूत है कि प्यार ही सबकुछ नहीं दुनिया में. प्यार से भी जरूरी कई काम है. ..प्यार सबकुछ नहीं आदमी के लिए. खुद को इस भीड़ में बनाये रखने के लिए यह मजबूती जरूरी भी है.
छोटे शहरों में गोविंदा छाप
कॉमेडी नाइट्स विद कपिल में कुछ हफ्तों पहले गोविंदा आये थे. गोविंदा एक दौर में हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय हास्य अभिनेताओं में से एक रहे. जिन्होंने अपने अंदाज से खासतौर से सिंगल स्क्रीन थियेटर के दर्शकों के लिए ट्रेंड तय किया था. उनकी अदाकारी का अंदाज व डांस के स्टेप आज भी छोटे शहरों में सबसे अधिक लोकप्रिय हैं. मुझे याद है मेरे अपने शहर बोकारो स्टील सिटी में किस तरह गोविंदा की फिल्में आने पर मोहल्ले के सभी लोग स्टॉल में बैठ कर भी फिल्में देखना पसंद करते थे. मैंने फिल्म आंखें बिहार के कटिहार के एक सिनेमा हॉल में देखी थी. तब मंै बेहद छोटी थी. और उस वक्त फिल्मों की सफला का सीधा मापदंड फिल्म का हाउसफुल होना ही होता था. इसके अलावा मुझे कोई शब्दावली आती भी नहीं थी. उस वक्त की वह भीड़ आज भी मेरे जेहन में जिंदा है. लोग सीढ़ियों पर बैठ कर गोविंदा की फिल्में देख रहे थे. और उनके हर गाने पर सिटियां और तालियां बज रही थीं. लेकिन आज वही गोविंदा फिल्मों में सहयोगी कलाकार के रूप में नजर आते हैं. हाल में जब वह कॉमेडी नाइट्स में आये तो लगा फिर से पुराने दौर का गोविंदा लौट आया है. वही गोविंदा जिनके गानों पर सबसे अधिक सेंसर की कैंची चलाई जाती थी. शादी और पार्टी गोविंदा छाप गानों के बगैर संभव ही नहीं था. खुद अयान मुखर्जी व बड़ी हस्तियां मानते हैं कि आज भी गोविंदा छाप गानों पर डांस करते हैं. दरअसल, हकीकत यही है कि हम खुद को बौद्धिक जताने की कोशिश करें लेकिन हकीकत यही है कि मस्ती के वक्त हम गोविंदा की मस्ती ही याद करते हैं. गोविंदा वास्तविक जिंदगी में पहले की अपेक्षा अधिक गंभीर हो चुके हैं. लेकिन कॉमेडी नाइट्स में जिस तरह वे कॉमेडी किंग कपिल को भी अपने बातों को जाल में लपेट रहे थे. इससे यह तो स्पष्ट है कि गोविंदा का दौर न खत्म हुआ है न होगा.
सहेजने के सरोकार
सोनम कपूर फोटोग्राफी की काफी शौकीन हैं. इसका अनुमान उनके इंस्टैग्राम व अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर उनके द्वारा पोस्ट की गयी तस्वीरों से लगाया जा सकता है. सोनम आमतौर पर भी जब पत्रकारों से मिलती हैं तो वे उनकी तसवीरें लेकर उसे एकत्रित करती हैं. उनके सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी ऐसी कई तसवीरें हैं जो उनकी दिलचस्पी को दर्शाते हैं. सोनम कपूर किसी बाहरी देश में जाती हैं तो वहां से कपड़ों के एंटिक्स का भी कलेक् शन एकत्रित करती हैं. हाल के दौर में ऐसा शौक कम अभिनेत्रियों में नजर आता है, जिन्हें किसी भी चीज को एकत्रित करने का शौक हो. पुराने दौर में मीना कुमारी को गजल लिखने का शौक था और अपनी नज्में लिख कर उन्हें एकत्रित करती थीं. उनके कई नज्मों पर गाने भी बने. अमिताभ बच्चन को कलम एकत्रित करने का शौक है. राजेश खन्ना ने अपने घर आशीर्वाद में दुनिया की तमाम प्रसिद्ध शराब के ब्रांड्स एकत्रित कर रखे थे. लेकिन वर्तमान दौर में स्टार्स उन चीजों को ही अहमियत अधिक देते हैं. जो भौतिक है. राजकपूर ने अपने कमरे में दुनिया के तमाम कॉमिक्स का संग्रह रखा था.देव आनंद सिगार एकत्रित करने के शौकीन थे. दरअसल, हकीकत यही है कि सफलता को सहेजा जाना भी एक अहम विधा है , जिसे हर कोई नजर अंदाज कर देता है. इस लिहाज से अमिताभ बच्चन एकमात्र कलाकार हैं, िजन्होंने अपनी पारिवारिक धरोहर को भी सहेजा और अपनी जिंदगी की तमाम घटनाओं को वह तसवीरों के माध्यम से सहेजते रहते हैं. आज सबकुछ डिजिटल है और स्टार्स भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स के माध्यम से चीजें शेयर करते रहते हैं. लेकिन उन्हें दस्तावेज के रूप में सहेजना बेहद कम कलाकारों ने किया है. जबकि यह उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा है. जिन्हें उन्हें सहेजना ही चाहिए.
शहर शहर घूमते स्टार्स
फिल्म डेढ़ इश्किया का प्रोमोशन देशभर में नहीं किया जायेगा. इसकी बड़ी वजह यह है कि फिल्म के निर्देशक अभिषेक चौबे का मानना है कि आज भी माधुरी दीक्षित के प्रशंसक कम नहीं हुए हैं. वे जहां भी जाती हैं. वहां काफी प्रशंसकों की भीड़ उमड़ पड़ती है. ऐसे में माधुरी की सुरक्षा के लिए कड़े इंतजाम करने पड़ते हैं. सो, उन्होंने तय कर लिया है कि माधुरी को पूरे देशभर में नहीं भेजा जायेगा. इस बात से निस्संदेह माधुरी बेहद खुश होंगी. चूंकि फिल्मों के प्रोमोशन का जो प्रचलन इन दिनों है. वर्तमान में स्टार्स इससे सबसे ज्यादा परहेज करते हैं. सभी का मानना है कि यह उनके लिए थका देनेवाला वक्त होता है. उन्हें जितना वक्त फिल्मों की शूटिंग को नहीं देना पड़ता. उससे अधिक प्रोमोशन में देना पड़ता है. उन्हें छोटे छोटे अंतराल पर दुनियाभर की सैर करनी पड़ती है. फिल्म जिंदगी न मिलेगी दोबारा जैसे विषयों पर फिल्म बनी हो तो छोटे अंतराल में कई शहरों की सैर भी करनी पड़ जाती है. इससे कई बार स्टार्स बीमार भी पड़ जाते हैं. लेकिन प्रोमोशन चूंकि फिल्मों की सफलता का अहम हिस्सा बन चुका है. वे उससे इनकार भी नहीं कर सकते. यही वजह है कि करिश्मा, करीना, बिपाशा बसु, कट्रीना जैसे कई कलाकार प्रोमोशन के दौरान बीमार भी पड़ जाते हैं. लेकिन फिल्म के निर्माता एक फिल्म की देखा देखी कर कोई कसर नहीं छोड़ते. वे लगातार प्रोमोशन करवाते ही हैं. शाहरुख खान ने फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस के लिए जिस कदर प्रोमोशन किया. शायद ही इससे पहले कभी उन्होंने इस तरह से प्रोमोशन किया था. दरअसल, फिल्मों की सफलता के लिए प्रोमोशन एक अहम जरिया बन चुका है. इसके माध्यम से ही दर्शकों के जेहन में फिल्म के बारे में छवि बार बार गढ़ने की कोशिश की जाती है और उसके आधार पर ही उन्हें फिल्म की रिलीज पर दर्शक मिलते हैं.
पहला कदम
हाल ही में फिल्म क्वीन के निर्देशक विकास बहल से बातचीत हुई. उन्होंने बताया कि उन्होंने शुरुआत टीवी से ही की थी. बाद में उन्होंने फिल्मों में कदम बढ़ाये. अनुराग बसु ने भी शुरुआत टीवी से ही की थी. और वे हमेशा कहा करते हैं कि हर नये टैलेंट को पहले टीवी में अपना हाथ आजमाना चाहिए. इससे उन्हें इस इंडस्ट्री के कल्चर के बारे में जानकारी मिल जाती है और फिर वे सही तरीके से फिल्मों से जुड़ पाते हैं. खासतौर से मुंबई से बाहर फिल्मों की दुनिया में कदम रखने का सपना देखने वालों के लिए यह बेहद जरूरी है कि उन्हें इस बात की पूरी जानकारी हो कि आखिर फिल्मी दुनिया की असलियत क्या है. किस तरह सपनों को उड़ान भरने के लिए भी उन्हें सही तरीका चुनना होगा. फिल्म गिप्पी की निर्देशिका सोनम नायर ने एक बेहतरीन लेख लिखा है कि अगर आप अपनी पहली शुरुआत करना चाहते हैं तो आपको किस तरह की तैयारी करनी चाहिए. उन्होंने बताया है कि कभी बड़े प्रोडक् शन हाउस को टारगेट न करें. लेकिन मुंबई से बाहर रहनेवाले युवाओं की हमेशा यही कोशिश होती है कि वे आकर तुरंत बड़े प्रोडक् शन से जुड़ जायें और जब उन्हें वहां से निराशा मिलती है तो उनका मनोबल टूट जाता है. जबकि हकीकत यही है कि कोई भी प्रोडक् शन हाउस अपनी फिल्मों पर करोड़ों खर्च करता है तो वह किसी भी नौसिखिया को काम नहीं सौंपेगा. इस हकीकत को नये लोग जितनी जल्दी स्वीकारें उतना बेहतर. किई निर्माता निर्देशक जो अपनी पहचान बना चुके हैं. उन्हें भी हर फिल्म के बाद अपने करियर को आगे बढ़ाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है.फिल्में बनाने का मतलब आपकी फिल्म में स्टार्स हो यह जरूरी नहीं. आप शॉर्ट फिल्मों से भी अच्छी शुुरुआत कर सकते हैं.कई वर्कशॉप होते हैं. उनके माध्यम से भी रास्ते बन सकते हैं. जरूरी यही है कि पहला कदम सोच समझ कर लिया जाये.
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