20130903

परदे के पीछे शिक्षित भी कराते हैं भ्रूण हत्या : नील


फिल्म आइएम कलाम से सराहना बटोर चुके नील माधव पांडा इस बार फिल्म जलपरी लेकर आये हैं. इस फिल्म में भी मुख्य भूमिका में बच्चे हैं. लेकिन मुद्दा चुना गया है कन्या भू्रण हत्या पर.
फिल्म व इस फिल्म के विषय पर निर्देशक नील ने विशेष बातचीत की.

नील माधव पांडा हमेशा लीक से हटकर विषय सोचने व उन्हें बिना किसी बड़े स्टारकास्ट के फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं. क्यों अहम है कन्या भ्रूण हत्या जैसे विषयों पर पूरी की पूरी फिल्म बनाना. बता रहे हैं नील

जलपरी का ख्याल
जलपरी एक युवा लड़की की कहानी है. एक लड़की की काल्पनिक जिंदगी है. उस जिंदगी में पानी है.तालाब है, नदियां  हैं. पहाड़ हैं. जैसा कहानियों में होता है. लेकिन वास्तविक रूप से उसने कभी वह दुनिया देखी है. वह कभी गांव नहीं गयी. उसे पहली बार गांव जाने का मौका मिलता है. दिल्ली के पास है वह गांव. वह वहां पहुंचती है और उसके सामने एकएक करके सारे हकीकत सामने दिखते हैं. उसे दिखता है कि किसी गांव में कितनी परेशानी होती है. किस तरह से गांव के लोग इसका सामना करते हैं. वहीं उसे कन्या भ्रूण हत्या के बारे में पता चलता है. वह तय करती है कि वह इसके प्रति आवाज उठायेगी. जलपरी बनाने का ख्याल मेरे मन में उस वक्त आया था. जब मैंने लगातार कई अखबारों में इसके बारे में पढ़ा. लोगों से सुना. मुझे इस मुद्दे ने पूरी तरह झकझोर दिया था. मेरा मानना है कि बतौर निर्देशक यह जिम्मेदारी है मेरी कि मैं इस विषय पर बात करूं तो मैंने इस पर काम शुरू किया.
शूटिंग 
इस फिल्म की पूरी शूटिंग हरियाणा के छोटे से गांव में हुई है. और मैंने इस जगह का चुनाव इसलिए किया क्योंकि दुर्भाग्यवश यहां का लिंग अनुपात बेहद असंतुलित है. यहां लगभग हर घर में लोग बोलते थे कि बेटी नहीं बेटा चाहिए. तो मैंने तय किया कि मैं यही शूट करूंगा और यहां के लोगों को समझाने की भी कोशिश करूंगा.
चूंकि फिल्म महिला पर आधारित है. मैंने अपनी फिल्म के क्रू में भी अधिकतर महिलाओं को रखा . ताकि वे वहां के लोगों की संवेदनाओं को समझ सकें.
रिसर्च
इस फिल्म के लिए मैंने लगभग 9 सालों तक रिसर्च किया है. मैं उत्तर भारत के कई जिलों में गया. गांव में गया. वहां रहा. वहां की जिंदगी को समझने की कोशिश की. इसके अलावा महाराष्टÑ, गुजरात, ओड़िशा में रहा. कई लोग मानते हैं कि कन्या भ्रूण हत्या का मुख्य कारण असाक्षरता है. लेकिन मेरे रिसर्च से पता चला कि एजुकेटेड लोग भी कराते हैं हत्या. मेरा मानना है कि लोगों को सिर्फ किसी टॉक शो में एक हफ्ते इस पर बात करके इस मुद्दे को बंद नहीं कर देना चाहिए. इस पर फिल्में बननी चाहिए.इस हत्या को रोकने की कोशिश करनी ही होगी और वह हम ही कर सकते हैं. ऐसी फिल्में बना कर मैं जिम्मेदारी निभा रहा हूं. यह मानता हूं मैं.  

जानकारी क ेअभाव में


आशा पारेख ने हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान बताया कि विकिपिडिया में कई जगहों पर इस बारे में चर्चा है कि आशा पारेख का जन्म गुजरात में हुआ था. चूंकि वे पारेख हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि उनका जन्म महाराष्टÑ में हुआ है. हाल ही में जब जिया खान की मौत हुई. उस वक्त विकिपिडिया में कई जगह इस बात का जिक्र था उन्होंने अपनी पहली शुरुआत फिल्म तुमसा नहीं देखा से की थी. यह जानकारी भी पूरी तरह गलत है. दरअसल, हकीकत यही है कि हम फिल्म पत्रकार कई बार इंटरनेट की दुनिया पर पूरी तरह विश्वास करते हैं और उनमें दी गयी जानकारियों के आधार पर ही अपना आलेख पूरा करते हैं. जबकि हकीकत यह है कि कई बार इंटरनेट पर मनगढंत कहानियां और जानकारी होती है, खासतौर से फिल्मी कलाकारों को लोग गंभीरता से नहीं लेते. सो, उनके बारे में ऐसी कई जानकारी जो गलत भी होती है. हम उसे सही मान लेते हैं. कई बार फिल्मी सितारों व फिल्मी हस्तियों तक पहुंच संभव नहीं होती. सो, आलेख की पूर्ति के लिए गलत जानकारियां हम शामिंल कर लेते हैं. इस संदर्भ में पीके नायर साहब ने एक बेहतरीन प्रयास किया, तब जाकर फिल्म का आर्काइव तैयार हो पाया. दरअसल, फिल्मी दुनिया को अब भी भारत में उतनी गंभीरता से नहीं देखा जाता. इसलिए उनके इतिहास को लेकर भी गंभीरता नहीं. जबकि हिंदी सिनेमा के कुछ शख्सियत जैसे अन्नु कपूर, तब्बसूम, फरीदा जलाल जैसे कलाकारों ने हिंदी सिनेमा की धरोहर और हिंदी फिल्म के शख्सियत की कहानियों और उनकी जानकारियों को समेटने का महत्वपूर्ण प्रयास किया है.सो, यह जरूरत है कि जिनके पास पुराने जमाने की ऐसी जानकारियां उपलब्ध है, उन्हें ज्यादा से ज्यादा मंच दिया जाये. ताकि जानकारी में मौलिकता आ सके. 

कोलकाता : ख्वाहिशों अरमानों का शहर


कोलकाता. हिंदी फिल्मों के निर्देशकों ने हमेशा इस शहर को अपना नजरिया दिया है. किसी के लिए यह शहर खुद कभी किरदार बन जाता है तो कभी उनके किरदार इस शहर में रम जाते हैं. कभी यहां का माहौल कहानी को बयां करता है, तो कभी यहां की संस्कृति. आज भी कोलकाता व बांग्ला प्रांत में वह रुमानियत है जो प्राचीन होकर भी नवीन है और शायद यही वजह है कि फिल्मकारों को यह शहर व यहां की संस्कृति बार बार अपनी तरफ खींचे लिये आती है. फिलवक्त आधे दर्जन हिंदी फिल्मों की कहानी यही के बैकड्रॉप पर आधारित है.

 फिल्म कहानी का कोलकाता पर आधारित गीत में कोलकाता का वर्णन बखूबी किया गया है. सुजोय घोष फिल्म कहानी में कोलकाता को एक शहर नहीं, बल्कि एक किरदार के रूप में दर्शाते हैं. उनकी फिल्म कहानी में विद्या बागची अपने पति की तलाश में कोलकाता शहर आती है. और फिर दर्शक विद्या के साथ साथ कोलकाता की हर गलियों की सैर करने लग जाते हैं. फिर वह शहर कुछ अपना सा लगने लगता है. फिल्म बर्फी में अनुराग बसु अपने मुख्य किरदार झिलमिल और बर्फी को बंगाल की सैर कराते हुए कोलकाता लाते हैं. झिलमिल की इच्छा होती है कि जब वह शादी करे तो बांग्ला अंदाज में ही करे. फिल्म में बर्फी का कोई सरनेम नहीं और न ही दर्शकों का ध्यान उनके सरनेम पर जाता है.
जिससे यह अनुमान लगाया जाये कि बर्फी बांग्ला संस्कृति से संबंध रखता था या नहीं, लेकिन जिस तरह बर्फी ने दार्जलिंग की वादियों में, फिर बंगाल के अंदुरनी इलाकों से अपनी दोस्ती निभायी है. वह शहर बर्फी के माध्यम से अपना लगने लगता है.  दरअसल, कोलकाता की अपनी खासियत यही है कि यहां प्राचीनता में भी नवीनता है. आप जितनी बार इसे फिल्मी परदे पर देखें , यह नया लगता है. हिंदी फिल्मों में अब तक न जाने कितनी बार हावड़ा ब्रिज को दर्शाया जाता रहा है. लेकिन आज भी इसका रोमांच खत्म नहीं होता. यह हर बार नया सा लगता है. यही इस शहर की खूबी है कि यह जितना पुराना है. उतना अपना सा है. ओल्ड इज गोल्ड के तर्ज पर चलनेवाले एकमात्र इसी शहर को ग्लैमर ने अपने आगोश में नहीं लिया है. यहां ग्लैमर का मतलब अपनी संस्कृति , अपने त्योहार से प्यार है. यह शहर चूंकि अपनी पुरानी शैली पर चला आ रहा है. इसका यह कतई मतलब नहीं कि यहां बुद्धिजीवी लोगों की कमी है. गौर करें तो फिल्म विकी डोनर में नायिका के पिता उसके खुल कर बातें करते हैं. वे उसे समझाते हैं कि अपने जीवनसाथी के चुनाव में उसे क्या क्या सर्तकता रखनी चाहिए. आमतौर पर अन्य राज्य या प्रांत में पिता अपनी बेटी से इस कदर खुल कर बातें नहीं रख पाते. स्पष्ट है कि हिंदी फिल्मों के माध्यम से ही सही लेकिन कोलकाता की खूबसूरत छवि को परदे पर हमेशा सही तरीके से प्रस्तुत किया जाता रहा है. शायद यही वजह है कि हिंदी फिल्मों में अब तक फिल्मों में किसी शहर को सबसे ज्यादा प्रस्तुत किया जाता रहा है तो वह कोलकाता ही है.
रोमांटिक शहर
इम्तियाज अली की फिल्म लव आज कल में ऋषि कपूर का किरदार भी अपनी माशूका की तलाश में कोलकाता आ पहुंचता है. यहां निश्चित तौर पर इम्तियाज ने कोलकाता के बैकड्रॉप इसलिए लिया है, चूंकि उन्हें कहानी फ्लैशबैक में दिखानी थी और पुराने जमाने के क्लासिकल प्यार को दर्शाने के लिए कोलकाता से बेहतरीन रोमांटिक शहर और कौन सा हो सकता था. दरअसल, हकीकत यही है कि कोलकाता ने भले ही अपने नाम में तब्दीली कर ली हो. लेकिन यहां की संस्कृति , रहन सहन और लोग आज भी वैसे ही हैं. आज भी कोलकाता में ब्रिटिश जमाने की सारी इमारतें जस की तस उसी रूप में नजर आयेंगी. आज भी हावड़ा ब्रिज पर अपने फिल्मों के दृश्य फिल्माना  फिल्मकारों को रोमांचित कर देता है. तभी तो शुरुआती दौर से अब तक हिंदी फिल्मों के बड़े फिल्मकार इस शहर को अपने कैमरे में कैद करने आ पहुंचते हैं. विशेष कर वे फिल्म मेकर जिन्हें अपनी फिल्म में विंटेज चीजें दिखानी है. उनके लिए विजुअली कोलकाता से बेहतरीन शहर और कोई भी नहीं होता. यही वजह है कि हाल के दिनों के भी कई फिल्मकार यहां फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं. यशराज की फिल्म गुंडे की शूटिंग कोलकाता में हुई है. तिग्मांशु धूलिया की बुलेट राजा के कुछ हिस्से यहां फिल्माये गये हैं. विक्रमादित्य मोटवाने तो पूरी फिल्म का बैकड्रॉप ही बांग्ला संस्कृित पर आधारित रखा है. फिल्म की शूटिंग कोलकाता समेत कोलकाता से कुछ दूरी पर स्थित पुर्लिया में भी की गयी है. सुजोय घोष अपनी फिल्मों में हमेशा कोलकाता को दर्शाते रहेंगे. सुजोय मानते हैं कि कोलकाता का मतलब केवल यहां का लोकप्रिय रसगुल्ला नहीं. बल्कि काफी कुछ है. कोलकाता यहां की मिठाईयों की तरह ही मीठा शहर है, जहां हर गली में मिठास घूली हुई है.
जहां चारों तरफ घुली है भावुकता : अली अब्बास, निर्देशक गुंडे
 कोलकाता शहर सिनेमेटिक दृष्टिकोण से बेहद खूबसूरत शहर है, कोलकाता भारत का एकमात्र ऐसा शहर है. जहां चारों तरफ भावुकता है. लोग भावुक हैं. वहां की गलियां सबकुछ से आपको भावनात्मक जुड़ाव हो जायेगा. कोलकाता हमेशा भारत का सांस्कृतिक कैपिटल रहेगा. चूंकि इसी शहर से हर तरफ संस्कृति का जुड़ाव होता है. मेरी फिल्म गुंडे में जो मेरे किरदार हैं, उन्हें कुछ ऐेसे ही शहर की मिट्टी चाहिए थी. सो, इससे बेहतर शहर और कोई भी नहीं होता. मेरी फिल्म गुंडे में मैं कोलकाता को और भी खूबसूरत नजरिये से दर्शाने की कोशिश कर रहा हूं. मैं जब कोलकाता बचपन में जाया करता था. हावड़ा ब्रिज के नीचे घाट पर लोगों को स्रान करते देखना और दुर्गा विसर्जन देखना कभी नहीं भूल सकता. यह सब अदभुत नजारा है कोलकाता का जो कभी धुमिल नहीं होगा और इसलिए यह शहर मेरे लिए खास है.

भावुक किरदारों को दर्शाने के लिए इससे बेहतर शहर और कौन सा होता : अनुराग बसु
मैंने न सिर्फ कोलकाता बल्कि पूरी बांग्ला संस्कृि का बैगड्रॉप ही फिल्म बर्फी के लिए चुना. चूंकि मेरी कहानी पूरी तरह से इमोशनल लव स्टोरी थी और ऐसी कहानियों को दर्शाने के लिए जो सीन चाहिए, प्रॉप्स चाहिए, कॉस्टयूम और जो इमोशन चाहिए वह इससे बेहतर और कहीं नहीं मिलता. आगे भी मैं अपनी फिल्मों में कोलकाता दर्शाता रहूंगा. यह शहर प्राचीन होते हुए भी मॉर्डनिटी के साथ चलता है और यह बात मुझे सबसे अधिक आकर्षित करती है.

क्लासिक व प्राचीन चीजों को दर्शाने के लिए अदभुत प्रांत : विक्रमादित्य मोटवाने
लूटेरा प्रेम कहानी है और हमें जिस रोमांटिक शहर की जरूरत थी, वह हमें कोलकाता व आसपास के इलाकों से मिली. सो, हमने इसे ही अपनी कहानी का बैकड्रॉप रखा है. सोनाक्षी सिन्हा जितनी खूबसूरत भारतीय परिधानों में इस प्रांत के अंदाज में नजर आ रही हैं. वह कैमरे पर काफी अपीलिंग हैं. फिल्म में कई पुराने दौर की चीजें दिखाई गयी हैं, सो अगर मैं किसी और जगह का चुनाव करता तो वह आॅथेटिंक नहीं बनावटी लगता. सो, हमने यहीं का चुनाव किया है और मुझे लगता है हमारा निर्णय बिल्कुल सही है.

ेंसोनाक्षी सिन्हा : मैं खुशनसीब हूं कि मेरी दो फिल्में बुलेट राजा और लूटेरा दोनों की शूटिंग के सिलसिले में मुझे इतने खूबसूरत शहरर का हिस्सा बनने का मौका मिला. मैं कोलकाता से बेहद प्यार करने लगी हूं. खासतौर से वहां के रिक् शे से. फिल्म बुलेट राजा में आप मुझे ट्रैम और हैंड पुल रिक् शे की सैर करते देखेंगे. यहां के लोग, यहां का खानपान सबकुछ आकर्षित करता है.
विद्या बालन : विद्या बालन कभी विद्या बागची का किरदार शानदार तरीके से नहीं निभा पाती. अगर उसे कोलकाता जैसा शहर नहीं मिलता. कोलकाता अपने आप में एक किरदार है और इस शहर में इतनी गहराई है. इससे जितना भी निकालो यह और अमीर होता जाता है. मेरी जिंदगी के अहम शहरों में से एक है कोलकाता. खासतौर से यहां की पुराने दौर की टैक्सी, यहां के इमारत और यहां की भाषा मुझे बार बार इस शहर की तरफ खींच लाती है.

 किसी दौर में बिमल रॉय और पीसी बरुआ ने फिल्मों में बांग्ला संस्कृति को काफी उजागर किया है. फिल्म परिणीता, देवदास में इस प्रांत की खूबसूरती को दिखाया जाता रहा है.

फिल्म कहानी में कोलकाता का वर्णन
ंकोलकाता दिल का बाजार है. थोड़ा बिजार है
कोलकाता ख्वाहिशों अरमानों का आचार है
जितने भी दूर जाओ, दिल से न फार है
कोलकाता देखो तो बाकी दुनिया बेकार है
स्ट्रॉग है पॉवरफुल फिर भी लाचार है
बिल्कुल नया है फिर भी बीते कल में गिरफ्तार है....

आनंद एल राय की रांझणा


 आनंद एल राय की फिल्म रांझणा का कुंदन बनारस की गलियों का रांझणा है. वह जोया से प्यार करता है. लेकिन यह प्यार निस्वार्थ है. वह प्यार की खातिर कुछ भी कर गुजरने को तैयार है. आनंद एल राय ने वाकई धनुष को कुंदन के रूप में ढाल कर एक नया प्रयोग किया है. फिल्म की रिलीज से पहले इस बात पर खास चर्चा हो रही थी कि क्या धनुष तमिल प्रांत के होकर बनारस के छोरे का किरदार निभा पायेंगे. लेकिन आनंद एल राय ने वह करके दिखाया है. फिलवक्त साउथ की फिल्मों का हिंदी में जम कर रीमेक दिखाया जा रहा है. हूबहू दृश्यों को परदे पर उतारा जा रहा है. फर्क सिर्फ इतना होता है कि फिल्म के कलाकार बदल जाते हैं. यह प्रयोग नहीं, लेकिन बॉलीवुड ने धनुष के रूप में जो सितारा साउथ से चुना है. वह नायाब है. धनुष ने जिस तरह कुंदन के किरदार को संजीवनी प्रदान की है. वह कोई और अभिनेता नहीं कर पाता. लोग उन्हें कोलावरीडी के रूप में फिल्म देखने से पहले तक ही याद रखेंगे. लेकिन फिल्म देखने के बाद निश्चित तौर पर कुंदन रांझणा अमर हो जायेगा. हाल के दिनों में इतने सशक्त किरदारों वाली फिल्म नहीं आयी है. कई दिग्गज बड़े बड़े विषय लेकर आये हैं. लेकिन जो कमाल आनंद एल राय ने कर दिखाया है. वह हर किसी के बस की बात नहीं. इन दिनों शाहरुख खान की फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस भी चर्चा में है. फिल्म में दीपिका पादुकोण ने पूरी तरह तमिल डिक् शन में बात की है. दीपिका बिल्कुल लुक में नहीं अपनी बातचीत में भी चेन्नई की लड़की नजर आ रही है. फिल्मकार इन दिनों इस तरह के नये प्रयोग कर रहे हैं. जो अच्छे हैं. हिंदी फिल्मों के इतिहास में रांझणा भी खास मुकाम बनायेंगी. चूंकि न सिर्फ फिल्म के संवाद, कहानी, सबकुछ में आनंद राय ने एक अलग कहानी कहने की कोशिश  की है.कामयाब कोशिश के लिए आनंद एल राय बधाई के पात्र हैं

फर्स्ट लुक का कमाल


बॉलीवुड में इन दिनों एक नया ट्रेंड है. ट्रेलर लांच पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि रिसर्च टीम बताती है कि हाल के दिनों में दर्शक फर्स्ट लुक से तय करते हैं कि हमें किसी फिल्म को देखना है और किसे नहीं. यही वजह है कि निर्माता फर्स्ट लुक को लेकर हमेशा गंभीरता से सोचते हैं. फिल्म का प्रोमोशन उतना महत्व और प्रभावशाली नहीं रहता. जो कमाल फर्स्ट लुक करता है. पिछली फिल्मों की बात करें तो फर्स्ट लुक में वे सारे संवाद और दृश्य को खासतौर से दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती है. जो सबसे ज्यादा प्रभावित कर सके. रांझणा का यह संवाद कि लौंडा बनारस में भी नहीं जीतेगा तो कहां जीतेगा. बार बार दोहराया जाता रहा और यही वजह रही कि दर्शकों को वह काफी पसंद भी आया. फिल्म रांझणा को अच्छी ओपनिंग मिली क्योंकि उसके संवाद कमाल के थे. और दृश्य भी. यही वजह है कि इन दिनों फिल्म के फर्स्ट लुक के प्रोमो एडिटर को हद से अधिक सैलरी दी जाती है. इन दिनों फिल्म के एडिटर से अधिक महत्व प्रोमो एडिटर को दिया जाता है. इन दिनों फिल्म कृष 3 और चेन्नई एक्सप्रेस के प्रोमो पर विशेष रूप से फिल्म के मेकर्स काम कर रहे हैं. चेन्नई एक्सप्रेस के प्रोमो को देखने के बाद ही उसे 100 करोड़ क्लब की फिल्म बता दिया गया है. भाग मिल्खा भाग, लुटेरा और घनचक्कर के प्रोमो को देख कर भी काफी उत्सुकता है. स्पष्ट है कि फर्स्ट लुक के लांच पर इसी वजह से फिल्म के मेकर्स खर्च करते हैं. इन दिनों कम से अपनी फिल्मों के तीन से अधिक प्रोमो लांच किये जाते हैं.हाल ही में प्रकाश झा ने भी अपनी फिल्म सत्याग्रह का  नया ट्रेलर किया है, जिसे यू टयूब पर काफी लोकप्रियता भी मिल रही है. स्पष्ट है कि इन दिनों जमाना ट्रेलर का ही है, न कि फिल्मी प्रोमोशन का.

जिंदगी की पाठशाला है मिल्खा की जिंदगी : फरहान



फरहान, इतना कठिन किरदार और वह भी एक ऐसी शख्सियत का किरदार जो अपने आप में एक खास हस्ती हैं तो कैसे फरहान बने सेल्युलाइड के मिल्खा सिंह?
यह सवाल को आपको राकेश ओमप्रकाश मेहरा से पूछनी चाहिए. उन्होंने मुझे फोन किया और कहा कि उनके पास एक कहानी है जो वह मुझे सुनाना चाहते हैं. मैंने कहा बिल्कुल मैं सुनूंगा. मैंने पहले की राकेश की सारी फिल्में देख रखी हैं तो मुझे पता है कि राकेश किस मिजाज के निर्देशक हैं. हम मिले और उन्होंने मुझे 20-25 मिनट में ये कहानी सुनायी.मिल्खा सिंह की जिंदगी पर बेस्ड थी. मुझे कहानी तो बहुत अच्छा लगी. 20-25 मिनट की कहानी से ही मैंने अपना इमोशनल कनेक् शन महसूस किया.ताज्जुब भी हुआ कि इतना कुछ उनकी जिंदगी में हुआ है और कितना कम पता है हमको. तो ये एक सुनहरा मौका भी था कि इस प्रोजेक्ट से जुड़ कर हम दूसरे लोगों को भी बता सकें कि उनके जो लेजेंड हैं. मिल्खा सिंह. वह कैसे लेजेंड बने. तो मुझे बहुत सही लगा.मुझे लगा मैं सीखूंगा भी काफी कुछ.

 बायोपिक फिल्में दो तरह से बनती हैं. एक तो जीवित व्यक्ति पर आधारित होती है. एक जो नहीं होते उनपर. तो कितना मुश्किल रहा मिल्खा सिंह पर बायोपिक फिल्म का किरदार निभाना?
बायोपिक फिल्म बनाते वक्त भले ही वह व्यक्ति जीवित हो या नहीं. एक कलाकार की तो जिम्मेदारी होती है कि वह उनकी तसवीर को दर्शकों के सामने सही तरीके से प्रस्तुत करे, क्योंकि दर्शक उस कलाकार के रूप में अपने लेजेंड को देख रहे होते हैं. जहां तक इस फिल्म की बात है तो मेरे लिए आसान था. चूंकि मेरे पास रिसर्च के विकल्प अधिक थे. मैं जो समझना चाहता था. जानना चाहता था. वह मंै मिल्खा सिंहजी से मिल कर पूछ सकता था. जान पाता था.उस वक्त वे कैसा महसूस कर रहे थे. जब वहघटनाएं जो फिल्मों में दिखाई गयी हैं. यह सब समझने की कोशिश की मैंने. लेकिन फाइनली जब आप काम पर उतरते हैं तो यह जिम्मेदारी उस कहानी की होती है, उस निर्देशक की होती है.तो सच कहूंगा किसी ने आप पर भरोसा किया है, तभी खुद पर फिल्म बनाने की इजाजत दी है.अपनी जिंदगी की कहानी देकर. उसकी इज्जत करना बहुत जरूरी है. मुझे खुशी है कि उन्होंने पूरे परिवार के साथ फिल्म देखी.सबको बहुत अच्छी लगी. उन्हें लगा कि उन्होंने राकेश और प्रसून को कहानी देकर अच्छा किया. अच्छी च्वाइस दिया.

इस फिल्म के लिए आपने खुद को कैसे फरहान से मिल्खा सिंह में बदल लिया. चूंकि इस फिल्म में आप पूरी तरह मिल्खा सिंह ही नजर आ रहे हैं?
यह कमाल तो कास्टिंग का है कि उन्होंने मुझे ऐसे किरदार के लिए चुना. इस फिल्म को मैंने टोटली डेढ़ साल दिये हैं. सितंबर 2011 से जनवरी 2013 तक़. जब शूटिंग खत्म हुई. सितंबर में प्रीपरेशन शुरू किया है. मतलब उनकी जिंदगी को पूरी तरह से एक्सपीरियंस करना तो बहुत मुश्किल था. वह वक्त अलग था. दुनिया अलग थी, जब वह पले बढ़े. और सोसाइटी डिफरेंट थी. लेकिन उनका जो एथेलेटिक साइड था. वह एक्सपीरियंस करना बहुत जरूरी था. तो बिल्कुल लाइफस्टाइल चेंज किया. डेढ़ साल के लिए. मैं चाहता था कि जो सबसे कम मेरे दिमाग में क्योशन मार्क हो वह यह हो कि जब हम रिसेज कर रहे हैं, या जो एथेलेटिक क्वालिटी है फिल्म की.उसके बारे में ज्यादा नहीं सोचना है. जब शूटिंग का वक्त आये. तब तक सबकुछ मशीन की तरह बॉडी में बैठ जाना चाहिए.तो मैं जब वहां हूं तो राकेश के साथ सीन के बारे में डिस्कस करते थे. फिल्म के जरिये हम क्या बताना चाहते हैं. उसके बारे में सोच सकते हैं. ये नहीं कि कैसे करेंगे,कैसे इतना भागेंगे. वगैरह वगैरह.पहले छह महीने बिल्कुल एक एथेलिट जैसे ट्रेनिंग करते हैं. मैंने बिल्कुल वही ट्रेनिंग की. जो उसका डायट होता है, लाइफस्टाइल होता है . सब मैंने किया.

आपने  कहा है कि यह आपके लिए सबसे अहम फिल्म है?
हां, चूंकि  इस फिल्म से मैं बतौर सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि इंसान के रूप में इनरिच हुआ हूं. मिल्खासिंह जी की जिंदगी से आपको बहुत कुछ सीखने का मौका मिलता है और फिर जब आप ऐसी फिल्म करते हो तो आप यही सोचते हो कि किस तरह आप उस फिल्म को अपना बेस्ट दें. चूंकि आप ऐसी फिल्म करते वक्त अपने बारे में नहीं, उस शख्सियत के बारे में सोचता है.सारी मुश्किलें काम आसान हो जाता है. मिल्खा सिंह की जिंदगी खुद में पूरी की पूरी पाठशाला है. जिसके हर पहलू से आपको कुछ न कुछ सीखने का मौका मिलता है और सीखते रहना चाहिए.

अपने स्कूल के दिनों में क्या आप स्पोर्ट्स में दिलचस्पी लेते थे. 
हां, मुझे हर तरह के स्पोर्ट्स पसंद है. मैं आज भी ढेर सारे स्पोर्ट्स देखता हूं. मैं अपने स्कूल में शॉर्ट डिस्टेंस के लिए दौड़ा करता था. 100 200 40 0 डिले इन सभी में मैं पाटर््स लेता था.मैंने कुछ मेडल्स भी मिले हैं. लेकिन बाद में स्पोर्ट्स नहीं खेलता. बाद में मैंने स्वीमिंग में अच्छा करना शुरू किया था. स्वीमिंग में काफी दिनों तक जुड़ा रहा था. वॉलीबॉल, फुटबॉल खेलता रहता हूं.

मिल्खा सिंह का किरदार निभाते हुए. जैसा कि आपने कहा कि उनके संघर्ष की कहानी हर किसी को प्रेरित करती है तो कभी आपको अपने संघर्ष के दिन याद आये?
हर व्यक्ति जिसने संघर्ष से अपनी जगह बनायी है. मुकाम हासिल किया है. वह हर व्यक्ति इस कहानी को देखने के बाद अपने संघर्ष के दिनों को या द करेगा ही. गौर करें तो मैंने अब तक जितनी फिल्मों में अभिनेता का किरदार निभाया है. फिर चाहे वह रॉक आॅन हो, या लक बाय चांस , सभी में मैं सेल्फीस बना हूं. लेकिन यह पहली बार है. जब मैं संघर्षशील व्यक्ति बना हूं. और यही वजह है कि इस फिल्म ने मुझे पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया है. सच कहूं तोमिल्खा सिंह जैसा संघर्ष मेरी जिंदगी में नहीं रहा. इसलिए तो मैं ताज्जुब में था कि कोई व्यक्ति इतनी मेहनत भी कर सकता है. इतने धैर्य से भी आगे बढ़ सकता है. यह सब सीखा मैंने
आपकी आानेवाली फिल्में?
शादी के साइड इफेक्ट्स का सीक्वल कर रहा हूं मैं 

अभिनेत्रियों का स्वभाव


विद्या बालन दिन में एक बार मेकअप करने के बाद दोबारा मेकअप करना पसंद नहीं करतीं. उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे रूप में कैसी नजर आ रही हैं. उनके लिए यह महत्व रखता है कि वे जो करें और जो बोलें वह दर्शकों को पसंद आये. यह सिर्फ विद्या ही कर सकती है कि कहानी जैसी फिल्म में वह प्रेगनेंट बन कर पूरी फिल्म को प्रोमोट करती है. वह अपने लुक को लेकर बहुत कांसस नहीं. मीडिया उनसे बातचीत करने आये तब भी वह दिखावा नहीं करतीं और अगर कोई मीडिया पर्सन उनके साथ तसवीर लेना चाहें तो वह इस बारे में नहीं सोचतीं कि उनका चेहरा कैमरे पर कैसा आयेगा. दरअसल, वह जानती हैं कि उनका काम ही उनकी यूएसपी है. वे इसलिए अपने लुक को लेकर बहुत कांसस नहीं. माधुरी दीक्षित भी अपने लुक को लेकर उतनी कांसस नहीं रहती. बल्कि वह अपने डांसिंग स्टेप को लेकर अधिक कांसस रहती हैं. झलक दिखला जा के सेट पर कुछ वक्त जब उनके साथ गुजारने का मौका मिला तो ये बात सामने आयी. सोनम कपूर अपने लुक को लेकर बहुत कांसस हैं. लेकिन उनके मन में अब भी एक बच्चा है. वह अपनी तसवीरें खींचने से अधिक इस बात में दिलचस्पी लेती हैं कि वह पत्रकारों की तसवीर लेकर इंस्टेग्राम पर दें. दीपिका पादुकोण इंटरव्यू के वक्त हंसी के फुव्वारे छोड़ती हैं. सोनाक्षी सिन्हा अपनी आंखों का सबसे अधिक इस्तेमाल करती हैं बातचीत के दौरान. क्योंकि उन्हें पता है कि उनकी आंखें बेहद एक्सप्रेसिव हैं. दरअसल, यहां तमाम अभिनेत्रियों के इस स्वभाव की चर्चा इसलिए क्योंकि यह उनके व्यक्तित्व को दर्शाता है कि वह किस स्वभाव की हैं. अनुष्का शर्मा को मीडिया से खास बातचीत पसंद नहीं. वे औपचारिक रूप से बात करती हैं. इन सभी अभिनेत्रियों में दिल जीत कर ले जाती हैं विद्या. वे जीवन से संतुष्ट हैं. इसलिए बनावटी बातचीत नहीं करतीं