20130513

धर्मेंद्र मोहब्बत खुदा है. खुदा है मोहब्बत. खुदा की मोहब्बत का ही तो फरमान हूं मैं. प्यार, मोहब्बत आपकी सींचती हैं मुझे इसलिए शायद जवान हूं मैं


 धर्मेंद्र
मोहब्बत खुदा है.
खुदा है मोहब्बत.
खुदा की मोहब्बत का ही तो फरमान हूं मैं.
प्यार, मोहब्बत आपकी सींचती हैं
मुझे इसलिए शायद जवान हूं मैं
भारतीय सिनेमा के 100 साल के पूरे होने के अवसर पर मैं बस यही कहना चाहूंगा कि अभी तो बस 100 ही बसंत देखे हैं अभी 101 बसंत देखना तो बाकी ही है.  सबसे पहले तो सभी साथियों को और भारतीय सिनेमा के हर शख्स और सबसे अहम हमारे दर्शकों का धन्यवाद और उन्हें 100 साल पूरे होने के  उपलक्ष्य में बहुत बहुत बधाई.भारतीय सिनेमा ने ही मुझे सबकुछ दिया है. यह मेरी रोजी रोटी भी बनी और मेरी मां भी. और मैं खुश हूं कि इस मां के लिए मैंने अपनी तरफ से कुछ योगदान करने की कोशिश की.  निस्संदेह इन 100 सालों में दर्शकों ने मुझे बहुत प्यार दिया और शायद आज मैं इस मुकाम पर हूं.  एक बात की खुशी है कि इन 100 सालों में कभी किसी ने हमसे बैर नहीं की और न ही हमने किसी से बैर किया. यह इंडस्ट्री आज भी मेरे लिए परिवार सा ही है और मैं हमेशा उन्हें अपने परिवार की तरह ही मानता हूं. अच्छा लगता है सीनियर प्यार लुटाते हैं और शाहरुख़, सलमान जैसे बच्चे मुझे आदर देते हैं. मैंने सिनेमा जगत को बस इतना ही योगदान दिया कि दर्शकों ने मेरी फिल्में देख कर मुझे गालियां नहीं दी. वे मेरी फिल्में देख कर रोये भी हंसे भी और सबसे अधिक तो वह नाचे. तो मैंने जो मोहब्बते लुटायी. उन्होंने न सिर्फ स्वीकार किया बदले में मुझे भी काफी सम्मान दिया. मेरी पसंदीदा फिल्मों की बात की जाये तो शोले मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक है. चूंकि इस फिल्म में हमने दर्शकों को हंसाया भी भरपूर और रुलाया भी भरपूर. मुझे लगता है कि शोले हिंदी फिल्मों की उन चुनिंदा फिल्मों में से एक हैं, जिन्होंने दर्शकों की नब्ज को सही तरीके से समझा था. लोगों को भरपूर आनंद भी दिया और भावनात्मक रूप से भी उस फिल्म से दर्शकों को जोड़े रखा. मुझे लगता है कि मैंने जितने किरदार निभाये दरअसल, आम लोगों के बीच के ही किरदार थे. फिल्म प्रतिज्ञा में मैं ट्रक ड्राइवर बन जाता हूं तो कभी इंस्पेक्टर. फिर लोगों को हंसाता हूं. मेरा मानना है कि हम सभी अभिनेता भी तो आपके बीच के ही हैं और आपसे ही तो हम प्रेरणा लेते हैं. हम आपके बीच के ही किरदार चुनते हैं और फिर उसे परदे पर निभाते हैं तो मेरे लिए तो दर्शक ही संजीवनी हैं. एक और खास बात जो आप लोगों से शेयर करना चाहूंगा कि कई बार हम अभिनेताओं की जिंदगी में भी ऐसे पल आते हैं जो हमें इमोशनल कर देते हैं और हम पब्लिक के सामने भी रो पड़ते हैं. तब जब मैं मीडिया में ऐसी बातें सुनता हूं कि अभिनेता दिखावे के लिए रो देते हैं तो ऐसी बातें सुन कर तकलीफ होती है. एक बात की खुशी है कि अब रियलिस्टिक फिल्में भी खूब बन रही हैं. लेकिन दुख इस बात का भी है कि फिल्मों में इमोशन खोते जा रहे हैं. अब इमोशन को फिल्मों में सेकेंडरी चीजें मानने लगे हैं हम यह गलत है. और यही वजह है कि अब मेरे पास जो फिल्में आती हैं. मैं सभी में काम नहीं करना चाहता क्योंकि वैसी कहानियां नहीं होतीं. आज आप ब्रांड तभी हैं जब आप लगातार दिख रहे हैं. वरना आपकी अहमियत कम हो जाती है. इन बातों से तकलीफ होती है. लेकिन 100 साल के मौके पर मैं चाहंूगा कि जश्न का माहौल बना रहे , सो कमियां न गिना कर उपलब्धि पर बात होनी चाहिए तो मैं मानता हूं कि नये कलाकारों को मौके खूब मिल रहे हैं, तकनीकी रूप से हम काफी समृद्ध हो गये हैं. यह हमारी उपलब्धियां हैं. मैं दिलीप कुमार साहब, अमित, देव आनंद साहब, राजेश खन्ना साहब व सभी अभिनेत्रियों को स्रेह और प्यार देना चाहूंगा इस मौके पर.मैं खुशनसीब हूं कि मुझे दर्शकों ने हर रूप में स्वीकार किया. मैं पीछे मुड़ कर देखता हूं तो लगता है कि वाकई एक सदी जी ली. कितनी मस्ती किया करते थे. फिल्म चुपके चुपके के सेट पर सभी ने जितनी मस्ती की थी. शायद ही किसी और सेट पर की थी.फिल्म शोले में तो मुझे ठाकुर का किरदार इतना पसंद आ गया था कि मैं खुद उस किरदार को निभाना चाहता था. हिंदी सिनेमा के लिए यह भी खास बात है कि इस साल प्राण साहब को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से नवाजा जा रहा है. चूंकि प्राण साहब इसे डिजर्व करते हैं. सो, मैं कहना चाहूंगा  िक हमारी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री इसी तरह फलती फुलती रहे और हम सभी को काम मिलता रहे. दर्शकों का प्यार मिलता रहे.

अमिताभ बच्चन ेसमाज में अब सिनेमा को इज्जत की नजर से देखते हैं



मुझे भारतीय फिल्म इंडस्ट्री पर बहुत गर्व है.इस बात से कि जब से यह शुरू हुई. शुरू के जो साल थे. उसमें फिल्मों को ज्यादा अहमियत नहीं दी जाती थी. जो भी अच्छे घर के बच्चे होते थे. उन्हें फिल्मों में नहीं आने दिया जाता था. लेकिन मुझे खुशी है कि मेरा  परिवार कभी इसके खिलाफ नहीं था. हां, यह जरूर था कि जब मैं भी छोटा था तो मेरे माता पिता भी पहले खुद जाकर उस फिल्म को देख कर आते थे. फिर वह अनुमान लगाते थे कि क्या ये बच्चों को दिखाने लायक फिल्म है या नहीं. तभी फिर वे हमें जाने देते थे. हालांकि आज देखिए आज हम कहां आ चुके हैं. समाज का जो सिनेमा को लेकर नेगेटिव प्वाइंट था अब वह बदला है . हां आज भी कुछ जगह हैं जहां आज भी सिनेमा को गलत दृष्टिकोण से देखा जाता है. हेय दृष्टि से देखा जाता है.  जबकि सिनेमा तो हमारे जीवन का अहम हिस्सा है. और सिनेमा की वजह से ही हम देश दुनिया के लोगों से वाकिफ होते हैं. वर्ल्ड सिनेमा हमें दुनिया की सैर ही नहीं कराती. इतिहास को भी बताती है और मुझे लगता है कि सिनेमा से बेहतरीन कुछ नहीं क्योंकि जो चीजें किताब में होती हैं कई बार बंद रह जाती हैं लेकिन हमारी आंखों ने जो देखा होता है. वह उन्हें याद रखता है तो मुझे तो लगता है कि संस्कृति को जिंदा रखने में फिल्मों का योगदान रहा है.मुझे लगता है कि अब लोगों के बीच जो यह अवधारणा थी कि  जो लोग सिनेमा से जुड़े हैं. वह गलत लोग हैं. अब यह सोच बदल चुकी है.आप चाहे माने या न माने चाहे देश माने या न माने लेकिन हमारी फिल्म इं्डस्ट्री आज समाज का पैरलल कल्चर बन चुकी है और न केवल हमारे देश है. बल्कि विदेश में भी जहां भी हम जाते हैं. फिल्म इंडस्ट्री का नाम होता है और उन्हें अब सम्मान की नजर से देखा जाता है. और इसलिए मैं खुद को गौरवान्वित महसूस करता हूं कि मुझे आज भी दर्शकों का प्यार मिल रहा है. और मैं 100 सालों के इस सफर का अब भी हिस्सा हूं. मैं महसूस करता हूं कि मैं एक छोटा अंश हूं इस हिंदी सिनेमा जगत का. जिस तरह से यह प्रगति कर रही है. इस पर मुझे बहुत गर्व है. 100 वर्ष बीत गये हैं और इन 100 सालों में हमें देश विदेश में लगातार पहचान मिल रही है. अभी कान फिल्मोत्सव में भी हमारी कई फिल्में जा रही हैं. अनुराग कश्यप, जोया, फरहान नये दौर के बच्चे अच्छा काम कर रहे हैं और ये सभी मेहनत से लगे हुए हैं कि हमारी फिल्मों को नाम मिले. इसका मान बढ़े. मैं अभी हाल ही में कई एक जगहों पर जा रहा हूं, अभी हाल ही में मोरक्को गया था.वहां की फिल्म इंडस्ट्री ने हमारे 100 साल पूरे होने पर ज्श्न मनाया. यह दिखाता है कि वे भी हमारी फिल्मों का सम्मान करते हैं. बाहर के भी निर्माता निर्देशकों की भी अवधारणा बदली है. अभी स्पीलबर्ग आये थे. उनका बड़ा गर्व हुआ हमारी फिल्म इंडस्ट्री पर. ऐसा सुनने में आ रहा है कि हर बड़े फिल्मोत्सव में भारतीय सिनेमा की फिल्मों को दिखाया जायेगा. उन्हें स्थान दिया जायेगा. इससे हमें तसल्ली मिलती है कि हमारी मेहनत बेकार नहीं गयी है. तो मैं चाहूंगा कि इन 100 वर्ष में हम सोचें कि हम सभी ने बहुत प्रगति की है. कम से कम समाज में इज्जत बनायी है. पहले जो समाज हमें नीची नजर से देखता था. अब वह हमें सम्मान की नजर से देखने लगा है. अब एक ऐसा स्तर आ गया है कि फिल्मों का डिस्कशन होता है. अच्छे अच्छे घरों के बच्चे फिल्में बनाने आ रहे हैं. बकायदा ट्रेनिंग ले कर आ रहे हैं. पढ़ कर आ रहे हैं तो सम्मान तो हासिल किया है हमने. मुझे बहुत अच्छा लगता है जब नयी पीढ़ी से मिलता हूं. एनर्जी मिलती है. वे काफी एक्टिव हैं. उनके पास उनकी दिशा है. वे मेहनत करते हैं और वे बहुत सुंदर काम कर रहे हैं और अपनी पहली ही फिल्म में आजकल कलाकार और निर्देशक ऐसे ऐसे एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं कि उनका कोई सानी नहीं. हमेनं तो वक्त लग जाया करता था. वे अपना हुनर दिखाते हैं. जो हम नहीं कर पाते थे. तो मैं मानता हूं कि भारतीय सिनेमा ने बहुत कुछ पाया है. और मैं धन्यवाद देना चाहूंगा उन सभी लोगों को जिन्होंने मुझे इस मुकाम तक पहुंचाने में मदद की. देव आनंद साहब, राजेश खन्ना,. धमेभर््ंद्र जी सबको मैं सादर प्रणाम करता हूं. यह सभी मेरे गुरु रहे और मैं हमेशा इनका आभारी रहूंगा. इन सभी का योगदान भी भारतीय सिनेमा कभी नहीं भूलेगी. मैं महमूद साहब को भी धन्यवाद कहना चाहूंगा. हिंदी सिनेमा ने ही मुझे मेरे होने का मतलब दिया. एक बड़ा प्लैटफॉर्म दिया. अगर हिंदी सिनेमा जगत न होता तो शायद कई बेहतरीन ुहनर लोगों के सामने नहीं आ पाता. विदेशों में लोग हमारी फिल्मों के स्टार्स के नाम जानते हैं. भले ही यहां के पॉलिटिक्स से वाकिफ हो कि नहीं. इससे समझ में आता है कि आपने कुछ तो पहचान बनायी है.मुझे लगता है कि हमारी इनडस्ट्री ने कई बार बुरे हालातों में भी काम किया. खुद को बुरे हालातों में भी संभाला और यही हमारा आत्मविश्वास है. मुझे लगता है कि भारतीय सिनेमा आज जहां भी है. हमारे आत्मविश्वास की वजह से है. यहां हर किसी ने अपनी पहचान बनायी है. मुझे लगता है कि पिछले कुछ सालों में फिल्म की तकनीक काफी अच्छी हो गयी है. साथ ही साथ मैं यह भी कहना चाहूंगा कि ज्यादा से ज्यादा चैनल आने की वजह से भी फिल्मों का विस्तार बढ़ा है. अब हर चैनल पर फिल्मों के बारे में सारी जानकारी दी जाती है तो आम लोगों के बीच अब अधिक रीच हो गयी है हमारी. मुझे लगता है कि हिंदी सिनेमा के साथ साथ भारत की अन्य भाषा की फिल्मों को भी दर्शकों तक पहुंचाया जाना चाहिए. ताकि भारतीय सिनेमा पूरी तरह से समृद्ध हो.
 प्रस्तुति : अनुप्रिया अनंत

 अमिताभ बच्चन
ेसमाज में अब सिनेमा को इज्जत की नजर से देखते हैं
मुझे भारतीय फिल्म इंडस्ट्री पर बहुत गर्व है.इस बात से कि जब से यह शुरू हुई. शुरू के जो साल थे. उसमें फिल्मों को ज्यादा अहमियत नहीं दी जाती थी. जो भी अच्छे घर के बच्चे होते थे. उन्हें फिल्मों में नहीं आने दिया जाता था. लेकिन मुझे खुशी है कि मेरा  परिवार कभी इसके खिलाफ नहीं था. हां, यह जरूर था कि जब मैं भी छोटा था तो मेरे माता पिता भी पहले खुद जाकर उस फिल्म को देख कर आते थे. फिर वह अनुमान लगाते थे कि क्या ये बच्चों को दिखाने लायक फिल्म है या नहीं. तभी फिर वे हमें जाने देते थे. हालांकि आज देखिए आज हम कहां आ चुके हैं. समाज का जो सिनेमा को लेकर नेगेटिव प्वाइंट था अब वह बदला है . हां आज भी कुछ जगह हैं जहां आज भी सिनेमा को गलत दृष्टिकोण से देखा जाता है. हेय दृष्टि से देखा जाता है.  जबकि सिनेमा तो हमारे जीवन का अहम हिस्सा है. और सिनेमा की वजह से ही हम देश दुनिया के लोगों से वाकिफ होते हैं. वर्ल्ड सिनेमा हमें दुनिया की सैर ही नहीं कराती. इतिहास को भी बताती है और मुझे लगता है कि सिनेमा से बेहतरीन कुछ नहीं क्योंकि जो चीजें किताब में होती हैं कई बार बंद रह जाती हैं लेकिन हमारी आंखों ने जो देखा होता है. वह उन्हें याद रखता है तो मुझे तो लगता है कि संस्कृति को जिंदा रखने में फिल्मों का योगदान रहा है.मुझे लगता है कि अब लोगों के बीच जो यह अवधारणा थी कि  जो लोग सिनेमा से जुड़े हैं. वह गलत लोग हैं. अब यह सोच बदल चुकी है.आप चाहे माने या न माने चाहे देश माने या न माने लेकिन हमारी फिल्म इं्डस्ट्री आज समाज का पैरलल कल्चर बन चुकी है और न केवल हमारे देश है. बल्कि विदेश में भी जहां भी हम जाते हैं. फिल्म इंडस्ट्री का नाम होता है और उन्हें अब सम्मान की नजर से देखा जाता है. और इसलिए मैं खुद को गौरवान्वित महसूस करता हूं कि मुझे आज भी दर्शकों का प्यार मिल रहा है. और मैं 100 सालों के इस सफर का अब भी हिस्सा हूं. मैं महसूस करता हूं कि मैं एक छोटा अंश हूं इस हिंदी सिनेमा जगत का. जिस तरह से यह प्रगति कर रही है. इस पर मुझे बहुत गर्व है. 100 वर्ष बीत गये हैं और इन 100 सालों में हमें देश विदेश में लगातार पहचान मिल रही है. अभी कान फिल्मोत्सव में भी हमारी कई फिल्में जा रही हैं. अनुराग कश्यप, जोया, फरहान नये दौर के बच्चे अच्छा काम कर रहे हैं और ये सभी मेहनत से लगे हुए हैं कि हमारी फिल्मों को नाम मिले. इसका मान बढ़े. मैं अभी हाल ही में कई एक जगहों पर जा रहा हूं, अभी हाल ही में मोरक्को गया था.वहां की फिल्म इंडस्ट्री ने हमारे 100 साल पूरे होने पर ज्श्न मनाया. यह दिखाता है कि वे भी हमारी फिल्मों का सम्मान करते हैं. बाहर के भी निर्माता निर्देशकों की भी अवधारणा बदली है. अभी स्पीलबर्ग आये थे. उनका बड़ा गर्व हुआ हमारी फिल्म इंडस्ट्री पर. ऐसा सुनने में आ रहा है कि हर बड़े फिल्मोत्सव में भारतीय सिनेमा की फिल्मों को दिखाया जायेगा. उन्हें स्थान दिया जायेगा. इससे हमें तसल्ली मिलती है कि हमारी मेहनत बेकार नहीं गयी है. तो मैं चाहूंगा कि इन 100 वर्ष में हम सोचें कि हम सभी ने बहुत प्रगति की है. कम से कम समाज में इज्जत बनायी है. पहले जो समाज हमें नीची नजर से देखता था. अब वह हमें सम्मान की नजर से देखने लगा है. अब एक ऐसा स्तर आ गया है कि फिल्मों का डिस्कशन होता है. अच्छे अच्छे घरों के बच्चे फिल्में बनाने आ रहे हैं. बकायदा ट्रेनिंग ले कर आ रहे हैं. पढ़ कर आ रहे हैं तो सम्मान तो हासिल किया है हमने. मुझे बहुत अच्छा लगता है जब नयी पीढ़ी से मिलता हूं. एनर्जी मिलती है. वे काफी एक्टिव हैं. उनके पास उनकी दिशा है. वे मेहनत करते हैं और वे बहुत सुंदर काम कर रहे हैं और अपनी पहली ही फिल्म में आजकल कलाकार और निर्देशक ऐसे ऐसे एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं कि उनका कोई सानी नहीं. हमेनं तो वक्त लग जाया करता था. वे अपना हुनर दिखाते हैं. जो हम नहीं कर पाते थे. तो मैं मानता हूं कि भारतीय सिनेमा ने बहुत कुछ पाया है. और मैं धन्यवाद देना चाहूंगा उन सभी लोगों को जिन्होंने मुझे इस मुकाम तक पहुंचाने में मदद की. देव आनंद साहब, राजेश खन्ना,. धमेभर््ंद्र जी सबको मैं सादर प्रणाम करता हूं. यह सभी मेरे गुरु रहे और मैं हमेशा इनका आभारी रहूंगा. इन सभी का योगदान भी भारतीय सिनेमा कभी नहीं भूलेगी. मैं महमूद साहब को भी धन्यवाद कहना चाहूंगा. हिंदी सिनेमा ने ही मुझे मेरे होने का मतलब दिया. एक बड़ा प्लैटफॉर्म दिया. अगर हिंदी सिनेमा जगत न होता तो शायद कई बेहतरीन ुहनर लोगों के सामने नहीं आ पाता. विदेशों में लोग हमारी फिल्मों के स्टार्स के नाम जानते हैं. भले ही यहां के पॉलिटिक्स से वाकिफ हो कि नहीं. इससे समझ में आता है कि आपने कुछ तो पहचान बनायी है.मुझे लगता है कि हमारी इनडस्ट्री ने कई बार बुरे हालातों में भी काम किया. खुद को बुरे हालातों में भी संभाला और यही हमारा आत्मविश्वास है. मुझे लगता है कि भारतीय सिनेमा आज जहां भी है. हमारे आत्मविश्वास की वजह से है. यहां हर किसी ने अपनी पहचान बनायी है. मुझे लगता है कि पिछले कुछ सालों में फिल्म की तकनीक काफी अच्छी हो गयी है. साथ ही साथ मैं यह भी कहना चाहूंगा कि ज्यादा से ज्यादा चैनल आने की वजह से भी फिल्मों का विस्तार बढ़ा है. अब हर चैनल पर फिल्मों के बारे में सारी जानकारी दी जाती है तो आम लोगों के बीच अब अधिक रीच हो गयी है हमारी. मुझे लगता है कि हिंदी सिनेमा के साथ साथ भारत की अन्य भाषा की फिल्मों को भी दर्शकों तक पहुंचाया जाना चाहिए. ताकि भारतीय सिनेमा पूरी तरह से समृद्ध हो.
 प्रस्तुति : अनुप्रिया अनंत

अनुराग कश्यप फिल्में देख देख कर पैदा किया फिल्मी कीड़ा



वर्ष 1993 में दिल्ली के इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से मेरी जर्नी शुरू हुई. उसी फिल्मोत्सव के बाद मुझे लगा कि मुझे फिल्में बनानी हैं. मैंने इस फेस्टिवल में विटोरियो डिसिका जैसे फिल्मकारों की फिल्में देखीं थीं. वही चिल्ड्रेन आर वाचिंग, बाइसाइकिल थीफ और दूसरी फिल्में देखी. वहीं फिल्मों से प्यार हो गया. उसी साल मैच फैक्ट्री गर्ल भी आयी थी. इन फिल्मों ने मुझ पर बहुत प्रभाव डाला और फिर क्या था. मैं पागल हो गया फिल्मों के पीछे. बैग पैक किया और आग गया मुंबई.  मुंबई आने से पहले की जर्नी की बात करूं और अपने बचपन व सिनेमा के जुड़ाव की बात तो मुझे याद है कि मैं फिल्में देखने का शौकीन शुरू से था. पता नहीं क्यों देखता था. लेकिन अच्छा लगता था देखना.उस वक्त पिताजी बहुत नाराज हुए थे. चूंकि मैं तब स्ट्रीट थियेटर करता था तो काफी कंफ्यूज रहता है. पता नहीं था क्या करना है. पिक्चर कैसे बनती है. मेरे पास कोई एक्सपोजर नहीं था सिनेमा का. डिसिका देखा था. उसके बाद यह एक्सपोजर थोड़ा बदला. बचपन में हमारे मोहल्ले में क्लब था. वही हफ्ते में दो बार फिल्में देखते थे. मैं उस वक्त छह साल का था तो हर फिल्म देखने भी नहीं मिलती थी. यूपी के रेणपुर में मेरा बचपन गुजरा. वहां एक ही थियेटर था. चलचित्र नाम था उसका. उवही जाकर मैंने आंधी और कोरा कागज देखी थी. उस वक्त पिताजी को मेरी यह हरकतें अच्छी नहीं लगती थीं. वे कहते कि ये बड़ों का सिनेमा है. इसे क्यों देखते हों. लेकिन मैं देखता था. उन फिल्मों के इमेज आज भी दिमाग में जिंदा है. उसके बाद फिल्में देखने का सिलसिला टूट गया. फिर जब मैं हॉस्टल पहुंचा तो वहां फिल्में देखने लगा. खासतौर से शनिवार को देखा करता था. उस वक्त सबसे अधिक बार दो बदन ही दिखाया जाता था. चूंकि प्रिसिंपल की फेवरिट फिल्म थी. प्रोजेक्ट्र पर देखते थे वह फिल्म. लेकिन बाद में मेरा कई सालों तक फिल्मों से नाता टूट गया. देहरादून में पढ़ने के बाद जब दिल्ली आया तो यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया. वहां फिल्में देखने लगीं.यूनिवर्सिटी के आस पास के सिनेमा थिेटरों में जाता था. उसी दौरान फिल्म अनटचबेल देखी तो लगा कि अंगरेजी फिल्में भी देखनी चाहिए और इसी तरह मैंने उस वक्त वर्ल्ड सिनेमा की कई फिल्में देखीं. कई इंटरनेशनल फिल्मोत्सव में शामिल हो जाता था फिल्में देखने के लिए. सिनेमा का एक्सपोजर वहां से मिलने लगा. फिर मुंबई आ गया. मुंबई में तब क नयी जर्नी शुरू हुई. उस वक्त पता नहीं चल रहा था क्या करना है. एक्टिंग कि निर्देशन. ये भी समझ नहीं आता था किसके पास जाऊं. फिर तनाव में आकर मैं नाटक लिखा करता था. नाटक लिख कर मैं गोविंद निहलानी के पास गया तो उन्हें मेरा काम पसंद आया. उसके बाद गोविंद जी के लिए एक नाटक का काम किया. मुझे उस वक्त कोई न तो दिशा मिल रही थी न कुछ. मैं तनाव में आकर कई बार फोन बंद करके रहने लगा. लेकिन इसी बीच मुझे टैक्सी ड्राइवर फिल्म देखने का मौका मिला. उस वक्त इस फिल्म से मैं अलग तरीके से ही जुड़ गया. फिर मैं श्रीराम राधवन, श्रीधर राघवन से मिला. श्री राम राघवन ने अपनी बातचीत में जितनी किताबों का जिक्र किया. वे मैं अपनी कॉपी में लिख लेता था. फिर वे सारी किताबें खरीदता था. एक दिन श्रीधर ने ही बताया कि ये किताबें साांताक्रूज स्टेश्न के पास मिलती हैं. मैंने वही से कई किताबें खरीदी पढ़ी. वहीं जेम्स एम केम को पढ़ने के बाद फिर एक बेचैनी सी आ गयी. धीरे धीरे काम मिला. एक फिल्म की कहानी लिखनी शुरू की. लेकिन निर्देशकों ने कहा कि फिल्म नहीं बनेगी. मैंने पूछा क्यों तो कहा कि स्क्रिप्ट मजेदार नहीं है. मैं दोबारा उसे लेकर बैठा और रातोंरात मैंने दोबारा स्क्रिप्ट लिखी. बाद में वह फिल्म बनी मुझे क6ेडिट भी मिला. धीरे धीरे शिव सुब्ररमणयम, श्रीधर , श्रीराम ने ही आगे बढ़ाया. फिर मनोज बाजपेयी को रामगोपाल ने कहा कि मुझे तुम्हारे साथ फिल्म बनानी है. लेकिन एक नया रायटर दो. मनोज ने मेरा नाम सुझाया. मैं पहले चौंका की रामू की फिल्म लिखने का मौका मिलेगा. फिर मैं मिला. बातें हुईं और सत्या लिखी. उसी वक्त से मैंने और भी बहुत कुछ लिखना शुरू किया और निर्देशन का जज्बा धीरे धीरे पैदा हो गया. मैंने पांच लिखना शुरू की. उस वक्त पांच का नाम मिराज रखा था. स्क्रिप्ट पूरी हुई. मैंने पांच लिखते वक्त फन नामक एक फिल्म देखी थी जिसे देख कर मैं फिर प्रभावित हुआ. पांच की कहानी फन से मिलती जुलती है. और यही मेरी जर्नी की शुरुआत हुई फिल्म मेकिंग की. पांच कभी प्रदर्शित नहीं हुई. लेकिन मैंने फिल्में बनाना नहीं छोड़ा. वह जूनून जो मेरे अंदर आ चुका था. आज भी है.फिल्में देख देख कर मैंने फिल्में बनानी सीखी है. और हमेशा इसे बनाता रहूंगा.

आम लव स्टोरी को खास तरीके से दर्शाना है

अयान, काफी लंबा समय लग गया आपको अपनी दूसरी फिल्म के प्रदर्शन में. कोई खास वजह?

दरअसल, मैं किसी हड.बड.ी में नहीं हूं. आराम से काम करना चाहता हूं. यह कहानी ऐसी थी कि इसे वक्त देना जरूरी था. चूंकि फिल्म युवाओं पर आधारित है और युवा हर दिन बदलते रहते हैं. सो, उनके टेस्ट का ख्याल रखना पड.ता है. दूसरी बात यह भी है कि मेरी कोशिश यह बिल्कुल नहीं है कि मुझे कुछ अलग करना है. बस सिंपल स्टोरी को दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं.

दीपिका और रणबीर के ब्रेकअप के बाद भी वे दोनों इस फिल्म में काम करने के लिए कैसे तैयार हुए? कितना मुश्किल रहा दोनों को मनाना?

दीपिका और रणबीर मेरे अच्छे दोस्त हैं. जब मैंने कहानी लिखी थी. तभी यह तय कर लिया था कि फिल्म में रणबीर को ही लूंगा. चूंकि मैं जानता हूं कि उनके अंदर जो पागलपंती है, वह जबरदस्त है. उस पागलपंती की इस फिल्म में जरूरत है. ‘वेक अप सिड’ के दौरान ही हम दोनों की बहुत अच्छी दोस्ती हो गयी थी. हम दोनों के इक्वेशन मिलते हैं और हमारी पसंद भी एक जैसी है. उन्हें जिस तरह की फिल्में पसंद आती हैं, मुझे भी आती हैं. सो उन्हें मनाना बिल्कुल कठिन नहीं था. दीपिका को लेने की खास वजह यह थी कि वह मॉर्डन गर्ल के साथ ट्रेडिशनल किरदार भी अच्छी तरह निप्रभाती हैं. जब मैंने रणबीर और दीपिका से कहा तो मेरे दिमाग में यह बात थी कि शायद वे मना कर देंगे, लेकिन स्क्रिप्ट सुन कर दीपिका को भी लगा कि उन्हें यह फिल्म करनी चाहिए. मुझे खुशी है कि दोनों साथ आये. आप खुद देखें दोनों की जोड.ी कितनी बेहतरीन लग रही है. खुशी इस बात की भी है कि इस फिल्म के माध्यम से ही सही लेकिन दीपिका और रणबीर एक बार फिर अच्छे दोस्त बन गये और यह रिश्ता भी तो बेहद खास होता है. 

रणबीर और दीपिका के किरदार के बारे में बताएं?

इस फिल्म में रणबीर का किरदार एक ऐसे युवा का है जो अपने कैरियर को लेकर नहीं, बल्कि जिंदगी में एडवेंचर को लेकर कांशियस है. वह चाहता है कि वह हर तरह का एक्साइटमेंट हासिल करे. इसलिए वह सारे प्रयास करता है और जिंदगी जीता है. नैना पढ.ी-लिखी अपने क्लास की टॉपर लड.की है, जिसे रणबीर के किरदार से प्यार तो होता है. लेकिन रणबीर चूंकि मस्तमौला है तो वह उसे हां नहीं कहता. इसके बावजूद दोनों मस्ती करते हैं. इस फिल्म में आप रणबीर को वे सारी चीजें करते देखेंगे जो उन्होंने कभी नहीं किया है. मस्ती और पागलपंती की हद तक जाकर आप क्या-क्या एडवेंचर कर सकते हैं, वह सब है इस फिल्म में. मेरी फिल्म में मस्ती का मतलब केवल शराब पीना नहीं, बल्कि हिमाचल की ऊंची पहाड.ी से कूदना है.

‘ये जवानी है दीवानी’ का ख्याल कैसे आया? 

मैं अपने एक दोस्त की शादी में गया था. वहां हम सभी मस्त होकर गोविंदा और करिश्मा कपूर के गानों पर डांस कर रहे थे. उससे पहले मैं कहानी तो लिख रहा था, लेकिन कहानी में वह स्पार्क नहीं था. वहां से मुझे स्पार्क मिला और फिर मैंने तय किया कि ऐसी कोई फिल्म बनाऊंगा.

आप खुद युवा हैं तो क्या इस फिल्म में आपकी जिंदगी के भी कुछ अनुभव हैं?

मैं अपने कॉलेज में बहुत ज्यादा मस्तीखोर नहीं था, लेकिन अपने दोस्तों के साथ काफी मस्ती करता था और हमारी लाइफ में भी वैसे इंसिडेंट्स हुए थे. कुछ वैसे हिस्से लिये हैं, जो आप फिल्म में देखेंगे. 

फिल्म के गाने बिल्कुल अलग हैं. काफी लोकप्रिय भी हो रहे हैं?

हां, मैं फिल्म के गानों को लेकर पहले से काफी सतर्क था. मैं चाहता था कि वे सारे गाने दर्शकों को याद रहें. अमिताभ भट्टाचार्य से करन जाैहर ने ही बात की. उन्होंने तो कमाल के गाने लिखे हैं. मुझे लगता है कि एक युवा की फिल्म में ऐसे गाने होने ही चाहिए थे. दिल्लीवाली गर्लफ्रेंड मेरा पसंदीदा गीत है. फिल्म में होली के गाने को भी लोग काफी पसंद कर रहे हैं. अयान, काफी लंबा समय लग गया आपको अपनी दूसरी फिल्म के प्रदर्शन में. कोई खास वजह?

दरअसल, मैं किसी हड.बड.ी में नहीं हूं. आराम से काम करना चाहता हूं. यह कहानी ऐसी थी कि इसे वक्त देना जरूरी था. चूंकि फिल्म युवाओं पर आधारित है और युवा हर दिन बदलते रहते हैं. सो, उनके टेस्ट का ख्याल रखना पड.ता है. दूसरी बात यह भी है कि मेरी कोशिश यह बिल्कुल नहीं है कि मुझे कुछ अलग करना है. बस सिंपल स्टोरी को दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं.

दीपिका और रणबीर के ब्रेकअप के बाद भी वे दोनों इस फिल्म में काम करने के लिए कैसे तैयार हुए? कितना मुश्किल रहा दोनों को मनाना?

दीपिका और रणबीर मेरे अच्छे दोस्त हैं. जब मैंने कहानी लिखी थी. तभी यह तय कर लिया था कि फिल्म में रणबीर को ही लूंगा. चूंकि मैं जानता हूं कि उनके अंदर जो पागलपंती है, वह जबरदस्त है. उस पागलपंती की इस फिल्म में जरूरत है. ‘वेक अप सिड’ के दौरान ही हम दोनों की बहुत अच्छी दोस्ती हो गयी थी. हम दोनों के इक्वेशन मिलते हैं और हमारी पसंद भी एक जैसी है. उन्हें जिस तरह की फिल्में पसंद आती हैं, मुझे भी आती हैं. सो उन्हें मनाना बिल्कुल कठिन नहीं था. दीपिका को लेने की खास वजह यह थी कि वह मॉर्डन गर्ल के साथ ट्रेडिशनल किरदार भी अच्छी तरह निप्रभाती हैं. जब मैंने रणबीर और दीपिका से कहा तो मेरे दिमाग में यह बात थी कि शायद वे मना कर देंगे, लेकिन स्क्रिप्ट सुन कर दीपिका को भी लगा कि उन्हें यह फिल्म करनी चाहिए. मुझे खुशी है कि दोनों साथ आये. आप खुद देखें दोनों की जोड.ी कितनी बेहतरीन लग रही है. खुशी इस बात की भी है कि इस फिल्म के माध्यम से ही सही लेकिन दीपिका और रणबीर एक बार फिर अच्छे दोस्त बन गये और यह रिश्ता भी तो बेहद खास होता है. 

रणबीर और दीपिका के किरदार के बारे में बताएं?

इस फिल्म में रणबीर का किरदार एक ऐसे युवा का है जो अपने कैरियर को लेकर नहीं, बल्कि जिंदगी में एडवेंचर को लेकर कांशियस है. वह चाहता है कि वह हर तरह का एक्साइटमेंट हासिल करे. इसलिए वह सारे प्रयास करता है और जिंदगी जीता है. नैना पढ.ी-लिखी अपने क्लास की टॉपर लड.की है, जिसे रणबीर के किरदार से प्यार तो होता है. लेकिन रणबीर चूंकि मस्तमौला है तो वह उसे हां नहीं कहता. इसके बावजूद दोनों मस्ती करते हैं. इस फिल्म में आप रणबीर को वे सारी चीजें करते देखेंगे जो उन्होंने कभी नहीं किया है. मस्ती और पागलपंती की हद तक जाकर आप क्या-क्या एडवेंचर कर सकते हैं, वह सब है इस फिल्म में. मेरी फिल्म में मस्ती का मतलब केवल शराब पीना नहीं, बल्कि हिमाचल की ऊंची पहाड.ी से कूदना है.

‘ये जवानी है दीवानी’ का ख्याल कैसे आया? 

मैं अपने एक दोस्त की शादी में गया था. वहां हम सभी मस्त होकर गोविंदा और करिश्मा कपूर के गानों पर डांस कर रहे थे. उससे पहले मैं कहानी तो लिख रहा था, लेकिन कहानी में वह स्पार्क नहीं था. वहां से मुझे स्पार्क मिला और फिर मैंने तय किया कि ऐसी कोई फिल्म बनाऊंगा.

आप खुद युवा हैं तो क्या इस फिल्म में आपकी जिंदगी के भी कुछ अनुभव हैं?

मैं अपने कॉलेज में बहुत ज्यादा मस्तीखोर नहीं था, लेकिन अपने दोस्तों के साथ काफी मस्ती करता था और हमारी लाइफ में भी वैसे इंसिडेंट्स हुए थे. कुछ वैसे हिस्से लिये हैं, जो आप फिल्म में देखेंगे. 

फिल्म के गाने बिल्कुल अलग हैं. काफी लोकप्रिय भी हो रहे हैं?

हां, मैं फिल्म के गानों को लेकर पहले से काफी सतर्क था. मैं चाहता था कि वे सारे गाने दर्शकों को याद रहें. अमिताभ भट्टाचार्य से करन जाैहर ने ही बात की. उन्होंने तो कमाल के गाने लिखे हैं. मुझे लगता है कि एक युवा की फिल्म में ऐसे गाने होने ही चाहिए थे. दिल्लीवाली गर्लफ्रेंड मेरा पसंदीदा गीत है. फिल्म में होली के गाने को भी लोग काफी पसंद कर रहे हैं

कुछ तो लोग कहेंगे


ये जवानी है दीवानी दीपिका की पहली फिल्म नहीं है. लेकिन इस फिल्म में उनका उत्साह यह दर्शा रहा है कि यह उनकी पहली फिल्म है. इस फिल्म के प्रोमोज और फिल्म के गानों को गौर से देखें तो दीपिका पादुकोण इन गानों और फिल्म में बिल्कुल अलग नजर आ रही हैं. स्पष्ट है कि इस फिल्म में उन्होंने पूरे दिल से काम किया है. इसकी अहम वजह रणबीर भी हैं,जो उनकी जिंदगी में कभी सबसे खास स्थान रखते थे. यह उनकी और रणबीर की केमेस्ट्री ही है जिसकी वजह से दीपिका बेहद खुश नजर आ रही हैं. दरअसल, हकीकत यही है कि हिंदी फिल्म जगत में फिल्मी सितारों की जिंदगी उनकी वास्तविक जिंदगी की वजह से काफी प्रभावित होती है. फिल्म सिलसिला में जिस कदर रेखा ने अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश की है. और अमिताभ के साथ उनकी केमेस्ट्री अन्यफिल्मों की तूलना में इस फिल्म में अधिक निखर कर इसलिए आ पायी थी चूंकि वास्तविक जिंदगी में अमिताभ रेखा एक दूसरे से काफी क्लोज थे. मधुबाला को दिलीप कुमार के साथ फिल्में करना अच्छा लगता था. तो नरगिस ने जितना बेहतरीन अभिनय राज कपूर के साथ की जोड़ियों वाली फिल्मों में किया है. अन्य में नहीं. फिल्म श्री 420 के गीत प्यार हुआ इकरार हुआ में छतरी के नीचे जिस तरह राजकपूर और नरगिस का रुमानी दृश्य फिल्माया गया है. वह आज भी सदाबहार नजर आता है. फिल्म सिलसिला के गीत ये कहां आ गये हम...में अमिताभ और रेखा का रोमांस निखर कर आता है. फिल्म हम दिल चुके सनम में सलमान खान और ऐश्वर्य वाकई एक दूसरे के लिए बने हैं हैं. ऐसा नजर आता है. दर्शकों को जितनी दिलचस्पी प्रेमी युगल को परदे पर देखने में होती है. उनकी शादी हो जाने के बाद वे उन जोड़ियों में उतनी दिलचस्पी नहीं लेते. और यही वजह है कि ये फिल्में सफल होती हैं.

कलाकारों का अनप्रोफेशनलिज्म



 हाल ही में विवेक ओबरॉय ने टेलीविजन के सेट पर ऐसा ड्रामा किया कि उन्हें देख कर सभी दंग थे. वे एपिसोड के शूट के लिए अपनी वैनिटी वैन से बाहर ही नहीं निकले. जबकि उन्हें उस दिन शूट करना था. विवेक ने ऐसा पहली बार नहीं किया है. किसी दौर में जब वह उभरते सितारे के साथ ही चमकते सितारे बन गये थे. तब कामयाबी उनके सिर पर चढ़ कर बोलने लगी थी और इसी वजह से उन्होंने नखरे दिखाने शुरू कर दिये थे. विवेक इस नखरे की वजह से पूरे प्रोडक् शन टीम को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. दरअसल, प्रोड्क् शन का काम कोई आसान काम नहीं होता.यह एक खर्चीला माध्यम हैं. जहां बजट का मीटर एक एक सेकेंड के अनुसार चलता है. ऐसे में अगर कोई अभिनेता अनप्रोफेशनल तरीके से व्यवहार करता है तो इससे करोड़ों का नुकसान हो सकता है. फिल्म ओम शांति ओम में इस बात को बेहतरीन तरीके से दर्शाया गया है. लेकिन हिंदी फिल्मों  के सेट पर ऐसा होना आम बात हो चुकी है. हिंदी सिनेमा के ऐसे कई स्टार हैं, जो सेट पर इस तरह से परेशानी गढ़ते हैं कि उससे पूरी यूनिट को परेशानी का सामना करना पड़ता है. एक दौर में प्राण साहब जब उपकार फिल्म की शूटिंग कर रहे थे. उनकी बहन की मौत हुई थी. लेकिन उन्होंने यह बात मनोज कुमार को नहीं बतायी थी. चूंकि उनका मानना था कि मेरी बहन की मौत हुई है लेकिन मैं बाकी के पेट को क्यों मारूं. अगर एक दिन शूटिंग नहीं होगी तो कितना नुकसान होगा. यह वह अच्छी तरह से जानते थे. अमिताभ बच्चन और सुभाष घई में कभी कहा सुनी हो गयी थी और उन्होंने एक फिल्म को डिब्बाबंद कर दिया. दरअसल, हकीकत यही है कि यह कलाकारों पर निर्भर करता है कि वह अपने काम के प्रति कितना प्रतिबद्ध है. वह कितना समर्पित है. वह काम को पूजा की तरह लेता है या नहीं