हंसल मेहता की फिल्म शाहिद इस वर्ष मामी फिल्मोत्सव की चर्चित फिल्मों में से एक रही थी. फिल्म की कहानी एक ऐसे वकील की कहानी थी, जो आतंकवाद के खिलाफ उन मासूम लोगों के हक की लड़ाई लड़ता था, जिन्हें केवल शक के आधार पर आतंकवादी मान लिया जाता है.फिल्म में मुख्य किरदार निभा रहे राजकुमार यादव शाहिद की भूमिका में हैं और फिल्म में वे खुद इसके भुक्तभोगी होते हैं. किसी के बहकावे में आकर सिर्फ एक बार जेहादी संगठन से जुड़ने के बाद फिर वहां से भाग आने के बाद, सिर्फ इसलिए उन्हें कई सालों तक जेल में रखा जाता है, क्योंकि उन पर आतंकवादी होने के आरोप लग जाते हैं. शाहिद जब जेल में पहुंचता है तो वह देखता है कि उसकी तरह कई ऐसे निर्दोष लोग हैं, तब वह तय करता है कि वह वकील बनेगा और ऐसे लोगों की मदद करेगा. जेल में ही उन्हें प्रोफेसरों का साथ मिलता है और वह अपनी पढ़ाई पूरी करता है. लगातार संघर्ष के बाद उसकी पढ़ाई पूरी होती है और फिर वह एक वकील बन जाता है. लेकिन वकील बनने के बाद जब भी वह किसी मासूमों की तरफ से केस लड़ता है. उसका बीता कल उसका साथ नहीं छोड़ता. लोग आज भी उस पर छींटाकशी करते हैं कि वे खुद भी आतंकवादी संगठन के हिस्से रहे थे. दरअसल, हंसल मेहता की यह फिल्म आतंकवाद के मसले को बिल्कुल अलग तरह से दर्शाती है. यह फिल्म उन मासूम लोगों के जीवन की कहानी बयां करती है, जो सिर्फ इसलिए मुजरिम हैं, क्योंकि वे शक के गिरोह में हैं. शाहिद हर लिहाज से एक महत्वपूर्ण फिल्म है. चूंकि इस फिल्म में ऐसे मुद्दों को उजागर करने की कोशिश की गयी है. जो आमतौर पर आतंकवाद पर आधारित फिल्मों में नहीं देखे जाते. जल्द ही रामगोपाल वर्मा की फिल्म 26-11 मुंबई पर हुए आतंकवादी हमलों पर ही आधारित है. लेकिन हंसल मेहता अब तक जितनी भी फिल्में ऐसे विषयों को लेकर बनाई गयी हैं, उन सब से ऊपर और गहराई से जाकर उन आम लोगों के मर्म को दर्शाती है जो आमतौर पर फिल्मों में नजर नहीं आता. न सिर्फ भारत में बल्कि पूरे विश्व में कितने मासूम हैं, जो सिर्फ इस वजह से परेशानियां झेल रहे हैं. दर्द झेल रहे हैं कि वह मुसलिम हैं. गुअतनामो जेल इस बात का गवाह रहा है कि उसने कितने मासूमों को अपनी दीवारों में कैद कर रखा था. ऐसे सिस्टम के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं ऐसी फिल्में. हंसल बधाई के पात्र हैं. और हिंदी सिनेमा में ऐसी और भी फिल्में बननी चाहिए.
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20130204
हंसल ke शाहिद
हंसल मेहता की फिल्म शाहिद इस वर्ष मामी फिल्मोत्सव की चर्चित फिल्मों में से एक रही थी. फिल्म की कहानी एक ऐसे वकील की कहानी थी, जो आतंकवाद के खिलाफ उन मासूम लोगों के हक की लड़ाई लड़ता था, जिन्हें केवल शक के आधार पर आतंकवादी मान लिया जाता है.फिल्म में मुख्य किरदार निभा रहे राजकुमार यादव शाहिद की भूमिका में हैं और फिल्म में वे खुद इसके भुक्तभोगी होते हैं. किसी के बहकावे में आकर सिर्फ एक बार जेहादी संगठन से जुड़ने के बाद फिर वहां से भाग आने के बाद, सिर्फ इसलिए उन्हें कई सालों तक जेल में रखा जाता है, क्योंकि उन पर आतंकवादी होने के आरोप लग जाते हैं. शाहिद जब जेल में पहुंचता है तो वह देखता है कि उसकी तरह कई ऐसे निर्दोष लोग हैं, तब वह तय करता है कि वह वकील बनेगा और ऐसे लोगों की मदद करेगा. जेल में ही उन्हें प्रोफेसरों का साथ मिलता है और वह अपनी पढ़ाई पूरी करता है. लगातार संघर्ष के बाद उसकी पढ़ाई पूरी होती है और फिर वह एक वकील बन जाता है. लेकिन वकील बनने के बाद जब भी वह किसी मासूमों की तरफ से केस लड़ता है. उसका बीता कल उसका साथ नहीं छोड़ता. लोग आज भी उस पर छींटाकशी करते हैं कि वे खुद भी आतंकवादी संगठन के हिस्से रहे थे. दरअसल, हंसल मेहता की यह फिल्म आतंकवाद के मसले को बिल्कुल अलग तरह से दर्शाती है. यह फिल्म उन मासूम लोगों के जीवन की कहानी बयां करती है, जो सिर्फ इसलिए मुजरिम हैं, क्योंकि वे शक के गिरोह में हैं. शाहिद हर लिहाज से एक महत्वपूर्ण फिल्म है. चूंकि इस फिल्म में ऐसे मुद्दों को उजागर करने की कोशिश की गयी है. जो आमतौर पर आतंकवाद पर आधारित फिल्मों में नहीं देखे जाते. जल्द ही रामगोपाल वर्मा की फिल्म 26-11 मुंबई पर हुए आतंकवादी हमलों पर ही आधारित है. लेकिन हंसल मेहता अब तक जितनी भी फिल्में ऐसे विषयों को लेकर बनाई गयी हैं, उन सब से ऊपर और गहराई से जाकर उन आम लोगों के मर्म को दर्शाती है जो आमतौर पर फिल्मों में नजर नहीं आता. न सिर्फ भारत में बल्कि पूरे विश्व में कितने मासूम हैं, जो सिर्फ इस वजह से परेशानियां झेल रहे हैं. दर्द झेल रहे हैं कि वह मुसलिम हैं. गुअतनामो जेल इस बात का गवाह रहा है कि उसने कितने मासूमों को अपनी दीवारों में कैद कर रखा था. ऐसे सिस्टम के सामने कई महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं ऐसी फिल्में. हंसल बधाई के पात्र हैं. और हिंदी सिनेमा में ऐसी और भी फिल्में बननी चाहिए.
सम्मान की हकदार
इन दिनों बॉलीवुड में अवार्ड समारोह की भरमार है. लगातार समारोह हो रहे हैं. इस समारोह के सबसे अहम अवार्ड जिस पर सबकी निगाह रहती है. वह है बेस्ट एक्टर व बेस्ट एक्ट्रेस का पुरस्कार.वर्ष 2012 में निस्संदेह कई महिला प्रधान फिल्में आयीं और दर्शकों ने इन्हें पसंद किया. वर्ष 2012 में हर साल की तूलना में अधिक बेहतरीन फिल्में आयीं. इसमें कोई संदेह नहीं. शायद यही वजह रही कि इस बार हर अवार्ड समारोह में जूरी के लिए यह तय करना काफी कठिन था कि बेस्ट कौन है. इस वर्ष लगभग सभी महत्वपूर्ण अवार्ड समारोह में बेस्ट एक्ट्रेस का खिताब हर बार की तरह विद्या बालन को फिल्म कहानी के लिए मिला. और बेस्ट एक्टर के रूप ेमें सारे अवार्ड रणबीर कपूर को फिल्म बर्फी के लिए और इरफान खान को पान सिंह तोमर के लिए मिले. निस्संदेह दोनों ही बेस्ट भी थे. लेकिन जिस तरह अभिनेताओं में बेस्ट एक्टर का अवार्ड दो एक्टर्स में शेयर किया गया. उस तरह अभिनेत्रियों में भी यह अवार्ड शेयर किये जाने चाहिए थे. चूंकि पिछला साल 2012 इस बात का गवाह है कि यह साल पूरी तरह महिलाओं का रहा. अभिनेत्रियों ने जितनी मजबूत भूमिकाएं इस वर्ष निभायीं. शायद ही किसी वर्ष निभाई होंगी. फिर चाहे वह श्रीदेवी की फिल्म इंगलिश विंगलिश हो या रानी मुखर्जी की अय्या. प्रियंका चोपड़ा ने अपने करियर का बेस्ट बर्फी में दिया है. बर्फी में जितना बेहतरीन काम रणबीर कपूर ने किया. प्रियंका ने भी किया. लेकिन उन्हें किसी भी अवार्ड समारोह में यह सम्मान नहीं मिला. जबकि रणबीर कपूर पर फिल्माये गये कई सीन तो नकल के थे. अगर किसी ने फिल्म में मौलिकता से अपने किरदार को निभाया तो वह प्रियंका थीं. लेकिन इसके बावजूद वे वंचित रहीं. ऐसा क्यो? कि अभिनेताओं को उनके हिस्से का सम्मान मिले और अभिनेत्रियां वंचित रहे. पुरस्कार समारोह में अभिनेत्रियों को भी अवार्ड शेयर करने का मौका मिलना चाहिए था. दरअसल, हकीकत यही है कि अब भी हिंदी सिनेमा में महिलाएं पुरुषों से पीछे ही हैं. उनके साथ किसी न किसी रूप में पक्षपात होता ही है. जबकि लगातार अभिनेत्रियां अपने किरदारों से साबित कर रही हैं. हिंदी सिनेमा में आज से नहीं शुरुआती दौर से ही पुरस्कारों में पक्षपात किया जाता रहा है. लेकिन आज के दौर में अभिनेत्रियां पुरस्कारों का खंडन नहीं कर पातीं. दिल में भले ही उन्हें अफसोस होता होगा. मलाल होता होगा. लेकिन वह इसे कभी जाहिर नहीं होने देतीं. जबकि उन्हें सम्मान मिलना ही चाहिए.
किरदारों से वंचित कलाकार
मनोज बाजपेयी को हाल ही में एक अंतरराष्टÑीय फिल्म के आॅफर मिले हैं. खुद मनोज इस बात से काफी खुश हैं. अनिल कपूर, इरफान खान, अनुपम खेर जैसे कलाकारों के बाद अब मनोज बाजपेयी को भी विदेशी फिल्मों के आॅफर मिल रहे हैं. मनोज को यह आॅफर उनकी फिल्म गैंग्स आॅफ वासेपुर की वजह से मिल रही है. चूंकि गैंग्स का प्रीमियर कान महोत्सव में किया गया था और फिल्म में उनके सरदार खान वाली दमदार भूमिका को दर्शकों ने काफी पसंद किया है. यही वजह है कि अब उन्हें नये आॅफर भी मिल रहे हैं. यह िहंदी सिने जगत के लिए अच्छी बात है कि यहां के कलाकारों को न सिर्फ बाहरी निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिल रहा है, बल्कि वे सारी फिल्में आॅस्कर व कई पुरस्कार समारोह में नामांकित हो रही हैं. अनुपम खेर की फिल्म सिल्वर लिविंग प्लेबुक को आॅस्कर में आठ नॉमिनेशन मिले हैं. इससे पहले इरफान खान की फिल्म स्लमडॉग को भी अवार्ड मिले थे. इरफान की हालिया रिलीज फिल्म लाइ आॅफ पाइ को भी नॉमिनेशन मिले हैं. लेकिन इसके बावजूद हिंदी फिल्मों में अब भी इन कलाकारों का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया गया है. आज भी ये कलाकार सुपरस्टार की पंक्ति में शामिल नहीं होते.मनोज बाजपेयी, इरफान खान कई अरसे से फिल्मी दुनिया में सक्रिय हैं. नवाजुद्दीन सिद्दकी जिन्हें इस वर्ष के लगभग सभी अवार्ड मिल रहे हैं. वे भी लंबे समय से संघर्ष कर रहे थे. लेकिन उन्हें पहचान अब जाकर मिली है. इससे स्पष्ट है कि अब भी हिंदी सिनेमा में प्रतिभाओं की पहचान सही तरीके से नहीं की जा रही है. जबकि हिंदी सिने जगत में बेहतरीन कलाकारों की भरमार है. पंकज कपूर को हाल ही में उनके किरदार मंडोला के लिए काफी सराहना मिली. इससे पहले उन्होंने विशाल की ही फिल्म ब्लू अंब्रैला में केंद्र भूमिका निभाई थी. पंकज कपूर भी लंबे समय से हिंदी सिने जगत में हैं. लेकिन अब भी उन्हें वह पहचान नहीं मिली. वे किरदार नहीं मिले, जिसमें वे अपनी प्रतिभा का पूरा इस्तेमाल करें. फिल्म सत्या के बाद ही मनोज ने खुद को साबित कर दिया था. लेकिन इसके बाद उन्हें लंबे अरसे के बाद सरदार खान जैसा किरदार मिला. दरअसल, हकीकत यह है कि हिंदी फिल्मों में ऐसी कहानियां ही कम बनती हैं जो कलाकारों को प्राथमिकता देकर बनाई जाये. बॉलीवुड में अब भी सुपरस्टार्स का ही जलवा है और आगे भी यह बरकरार ही रहेगा. जबकि ऐसी फिल्मों की भी जरूरत है जो कलाकारों को प्राथमिकता दे.
यह कैसा विज्ञापन ?
सिनेमा थियेटर में इन दिनों धूम्रपान निषेद को लेकर कई तरह के विज्ञापन दिखाये जा रहे हैं. हर फिल्म निर्माता से यह बात साफ कर दी गयी है कि वे अपनी फिल्मों से पहले इस विज्ञापन का प्रेजेंटेशन जरूर करेंगे. सरकार की तरफ से यह निर्देश तो दे दिया गया है. लेकिन उन्होंने धूम्रपान पर जो विशेष विज्ञापन जारी किया है. वह किसी खौफनाक फिल्म से कम नहीं लगता. हर फिल्म के पहले हिंदी व अंगरेजी में जो तंबाकू निषेद पर फीचर प्रेजेंटेशन दिखाये जा रहे हैं. वह हद से अधिक डरावने है. डरावने इस लिहाज से कि हर प्रेजेंटेशन में कई कैंसर पीड़ित मरीजों के उन हिस्सों को दिखाया जाता है जो कैंसर से ग्रसित भाग हैं. साथ ही कई कैसंर पीड़ित मरीजों को भी दिखाया जाता है. क्या इस तरह तंबाकू पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है? आमतौर पर हम बच्चों को अस्पतालों से दूर रखते हैं. लेकिन इस लंबे अंतराल के लिए चलनेवाले फीचर प्रेजेंटेशन का क्या बुरा प्रभाव बच्चों पर नहीं होगा. सरकार की सोच है कि तंबाकू और धूम्रपान पर निषेद हो. तो वे उस तरह के विज्ञापन बनाएं. आखिर सिनेमा थियेटरों में केवल बड़े बुजुर्ग नहीं जाते. बच्चे भी जाते. हाल ही में इंकार फिल्म देखते हुए मैंने यह महसूस किया कि इस विषय पर सरकार का ध्यान खींचना जरूरी है. चूंकि मेरी ही बगल में एक बच्चा बैठा था. जो यह विज्ञापन देख कर बार बार रोने लगा. उसकी मां उसकी आंखें बंद करके उसे अपने गले में लगा रही थी. ऐसा पहली बार नहीं हुआ. कई बार ऐसी स्थिति मैंने महसूस की है. आखिर आपका मुख्य उद्देश्य क्या है. विज्ञापन के माध्यम से संदेश पहुंचाना न. तो एक अच्छे विज्ञापन से भी यह तो संभव है. हाल ही में रिलीज हुई फिल्म मटरू की बिजली का मंडोला में विशाल भारद्वाज ने अपनी फिल्म से पहले ऐसे विज्ञापनों की शुरुआत करने से मनाही कर दी थी. उन्होंने खुद गुलजार से गीत लिखवाये और फिर उस पर विज्ञापन बनवाया. हिंदी सिने जगत में क्रियेटिव लोगों की कमी नहीं है. और सरकार चाहे तो कई खूबसूरत और प्रभावशाली विज्ञापन बनाये जा सकते हैं. विशाल की तरह बाकी निर्देशकों को भी इसकी पहल करनी ही चाहिए. चूंकि यह नजरअंदाज करनेवाला मुद्दा नहीं है. हम थियेटर मनोरंजन के लिए जाते हैं. ऐसे में कई व्यक्ति सिर्फ इस विज्ञापन की वजह से उलटियां करने लगें या फिर तबियत खराब कर लें. बच्चे डर जायें तो यह कैसा मनोरंजन होगा. अच्छी फिल्मों को देखने की इच्छा भी मर जायेगी. सो जरूरी है कि यह तरीका बदला जाये.
टिकट टू हॉलीवुड
विधु विनोद चोपड़ा को पहली बार हॉलीवुड की किसी फीचर फिल्म को निर्देशित करने का मौका मिला है. विधु ब्रोकेन हॉरसेस नामक एक फिल्म का निर्देश्न कर रहे हैं. विधु ने दरअसल अपनी फिल्ममेकिंग की पढ़ाई लांस एंजिल्स से पूरी की थी. उस वक्त उन्होंने 20 मिनट की एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी और वह आॅस्कर के लिए मनोनित हुई थी. इससे पहले शेखर कपूर ने हॉलीवुड के लिए फिल्म क्वीन एलिजाबेथ बनाई थी और फिल्म काफी सफल रही थी. आॅस्कर में भी इस फिल्म को बेस्ट कॉस्टयूम डिजाइनर के लिए अवार्ड मिला था. विधु की यह पारी हिंदी सिनेमा के निर्देशकों के लिए एक दूसरी पारी की शुरुआत है. चूंकि हिंदी सिनेमा की यह विडंबना है कि यहां दर्जनभर अच्छे निर्देशक हैं. लेकिन उन्हें ऐसे मौके नहीं मिलते. ऐसे में अगर उन्हें ऐसे मौके मिल रहे हैं या फिर वे ऐसे मौकों को स्वीकार रहे हैं तो यह एक बेहतरीन शुरुआत है. हालांकि कई सालों पहले जब दादा साहेब फाल्के को विदेश में वहां के फिल्मी निर्माताओं ने यही कहा था कि वह यही रह कर फिल्में बनायें तो उन्होंने यही कहा था कि अगर वे वहां रह जायेंगे तो फिर भारत में फिल्म की फैक्ट्री शुरू कैसे होगी. उस वक्त दादा फाल्के अपनी सोच में बिल्कुल सही थे. लेकिन आज जब हिंदी सिनेमा ने 100 साल पूरे कर लिये हैं और कई कीर्तिमान स्थापित कर लिया है तो इस राह में भी अब निर्देशकों को आगे बढ़ना चाहिए. क्यों केवल अंगरेजी व हॉलीवुड फिल्मों की नकल में हिंदी सिने जगत सारा वक्त बर्बाद कर रहा है. जरूरत तो है कि विधु और शेखर की तरह ही उस तरह की सोच की फिल्में बनाने की, जो हॉलीवुड में बनती हैं और वही जाकर बनाई जाये. निश्चित तौर पर इससे हॉलीवुड का बॉलीवुड के प्रति बर्ताव व नजरिया तो बदलेगा ही. साथ ही वे भारत को केवल अपनी फिल्मों के प्रोमोशन व आय के लिए महज बाजार मात्र नहीं समझेंगे. सो, यह बेहद महत्वपूर्ण है कि विधु के इस पहल को सराहना मिले. अगह हिंदी सिने जगत के निर्देशक हॉलीवुड के लिए फिल्में बनाते हैं तो निश्चित तौर पर वे वहां की सिनेमा की संस्कृति, वहां होने वाले प्रयोग, वहां के ट्रेंड, माहौल, कमियां, खूबियां तकनीक से भी अवगत होंगे. फिर उस लिहाज से वे हिंदी फिल्मों में भी नये प्रयोग कर सकते हैं. हिंदी सिनेमा अपनी क्रियेटिविटी में हॉलीवुड से आगे हैं. फिलवक्त उसे जरूरत है तो खुद की तकनीक सुधारने की. और यह तभी संभव है जब हॉलीवुड और बॉलीवुड के बीच फिल्मी संस्कृति का विकास हो.
लोकप्रियता के चेतन
चेतन भगत के सबसे चर्चित उपन्यास 3 मिसटेक्स आॅफ माइ लाइफ पर निर्देशक अभिषेक कपूर ने फिल्म काइ पो छे का निर्देशन किया है. इस फिल्म में राजकुमार यादव और सुशांत सिंह राजपुत मुख्य किरदार निभा रहे हैं.चेतन भगत के ही उपन्यास 2 स्टेटस पर करन जौहर फिल्म का निर्माण कर रहे हैं. और इस फिल्म में आलिया भट्ट मुख्य किरदार निभा रही हैं. चेतन भगत के उपन्यास वन नाइट एट ए कॉल सेंटर पर भी फिल्म का निर्माण किया जा चुका है. सोहेल खान ने हेलो नामक फिल्म का निर्देशन किया था. चेतन भगत वर्तमान में सबसे चर्चित लेखकों में से एक हैं, जिनकी लगभग हर कहानी पर फिल्में बन रही हैं. राजकुमार हिरानी की फिल्म 3 इडियट्स के भी कुछ हिस्से उनके उपन्यास फाइव प्वाइंट समवन से लिये गये हैं.स्पष्ट है कि चेतन भगत की किताबों व कहानियों में ऐसे कई तत्व होते हैं जो निर्देशकों को फिल्में बनाने के लिए प्रेरित करते हैं. चेतन भगत न सिर्फ मेट्रो में बल्कि आम भारतीय युवाओं में भी काफी लोकप्रिय हैं. गर्ल्स हॉस्टल में मैंने जितना लोकप्रिय चेतन को देखा है. शायद ही किसी अन्य लेखक को देखा है. रांची के हॉस्टल में अपने 6 साल के लंबे समय में मैंने जितनी चर्चा चेतन की किताबों को लेकर होते देखा है. अन्य लेखकों को लेकर वह सोच या वह दिलचस्पी नहीं देखी है. बीआइ मेसरा के विद्यार्थियों से लेकर संत जेवियर्स में पढ़नेवाली लड़कियां सबमें चेतन लोकप्रिय हैं. इसकी खास वजह यह रही है कि चेतन ने अपनी किताबों में अपने सपने, अपनी सोच को दर्शाया है. चेतन जानते हैं कि आम लोग उनसे किस तरह जुड़े हैं. सो, उन्होंने वाकई फिल्मी दुनिया गढ़ी है अपनी कहानियों में. आम युवा इसलिए उनसे हमेशा प्रभावित रहे कि उनकी कहानियों में एक साथ सपने, प्यार, युवा जिंदगी की चर्चा होती है और आम युवाओं के लिए यही खास बातें हैं. सबसे खास सपने. जो सपने चेतन की किताबों में नजर आते हैं. वे सपनें ही आम युवाओं को इन कहानियों से जोड़ते हैं. दूसरी बात यह भी है कि चेतन को माउथ पब्लिसिटी का खास फायदा हुआ. ऐसा नहीं था कि निर्देशकों का ध्यान काफी दिनों पहले से उनकी कहानियों पर था. लेकिन अचानक निर्देशकों ने भी देखा कि उनकी लोकप्रियता कितनी है. जबकि चेतन से भी बेहतरीन कहानियां और बेहतरीन लेखक हैं, जिनकी कहानियां कही जानी चाहिए. लेकिन उन्हें वे मौके नहीं मिल पा रहे हैं. चेतन इस लिहाज से भाग्यशाली रहे हैं. लेकिन चेतन की तरह ही अन्य नये लेखकों को भी मौके मिलने चाहिए.
20130118
किसी कैंप का हिस्सा नहीं मैं : अर्जुन रामपाल
अर्जुन मानते हैं कि प्रकाश झा ने उनकी फिल्मी करियर को नयी उड़ान दी. उनकी फिल्में राजनीति, चक्रव्यूह के बाद अब वह फिल्म सत्याग्रह में भी नजर आयेंगे. लेकिन फिलवक्त वह सुधीर मिश्रा की फिल्म इनकार को लेकर काफी उत्साहित हैं, क्योंकि ऐसे विषय को लेकर वह पहली बार किसी फिल्म में काम कर रहे हैं.
अ ॉफिस कार्यालय में महिलाओं के साथ होनेवाले सेक्सुअल हैरेशमेंट को लेकर पहली बार इस विषय पर सुधीर मिश्रा फिल्म बना रहे हैं. अर्जुन फिल्म में राहुल वर्मा के किरदार में हैं. बातचीत अर्जुन से
फिल्म इंकार के लिए क्यों इंकार नहीं किया?
मैंने सुधीर मिश्रा की पहले की कई फिल्में देखी थी. सो इस बात से तो वाकिफ था कि सुधीर जो करेंगे अच्छा ही होगा. कम से कम कंटेट तो जरूर होगा. हर कलाकार चाहता है कि वह अच्छी फिल्में करे. पहले जब सुधीर कहानी लेकर आये थे तो मैंने उसी वक्त हां नहीं कही थी. मैं पूरी तरह से संतुष्ट नहीं था. फिर मैंने सुधीर को कहा कि बैठते हैं इस पर बात करते हैं. फिर हम हफ्तों बैठे. मैंने ही सुधीर को सुझाव दिया कि क्यों न फिल्म का क्लाइमेक्स थोड़ा थ्रील कर दें. दर्शकों को अच्छा लगेगा. सुधीर को मेरा सुझाव पसंद भी आया. जब हम लगातार इस फिल्म की कहानी पर काम कर रहे थे तो मेरी पत् नी भी परेशान हो गयी थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि हम किस तरह के विषय पर काम कर रहे हैं. सुधीर को लेकर भी वह कांफिडेंट नहीं थी. लेकिन अब धीरे धीरे जब कहानी ने शेप लेने लगी तो उसे भी लगा कि कुछ अच्छा अलग हो रहा है और निश्चित तौर पर अब ऐसा लग रहा है कि फिल्म दर्शकों को पसंद आयेगी.दूसरी बात फिल्म का जो विषय है. वाकई रोचक और गंभीर है. संवेदनशील भी है. ऐसी फिल्में इन दिनों कम बन रही हैं. जबकि मुझे लगता है कि ऐसे विषयों पर फिल्में बननी चाहिए. क्योंकि अब हमारे यूथ तैयार हो रहे हैं. दर्शकों में ऐसी कहानियां नॉलेज पहुंचाती है.
इस फिल्म को चुनने से पहले क्या आप इस विषय पर इतनी जानकारी रखते थे या दिलचस्पी लेते थे.
नहीं, मैं ईमानदारी से कहना चाहूंगा कि मुझे बिल्कुल इस बारे में खास जानकारी नहीं थी. मैंने फिल्म के दौरान ही कई केस स्टजी की. कानून पढ़ा. उसके प्रावधान पढ़े कि किस तरह एक कार्यलय में लड़कियां शोषित होती हैं और फिर भी वह आवाज नहीं उठा पातीं, जबकि उनके लिए कानून है. मैं किसी आइटी कंपनी का नाम नहीं लेना चाहूंगा कि लेकिन हकीकत यही है कि लड़कियां आइटी सेक्टर में सबसे अधिक शोषित होती है. ऐसे में लड़कियों को तो यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए, ताकि वह कई चीजों से अवगत हों. उनकी सुरक्षा के लिए यह जरूरी है. इस फिल्म के जरिये ही जान पाया कि आॅफिस परिसर में र्फ्लटिंग करना, वलगर जोक्स भेजना भी सेक्सुअल हैरेशमेंट ही कहलाता है. काफी जानकारी मिली फिल्म से.
तो क्या फिल्म केवल महिला दर्शकों को ध्यान में रख कर बनाई गयी है. कई बार निर्दोष पुरुष भी कानून की वजह से चपेत में आकर फंस जाते हैं.
नहीं इस फिल्म की यही तो खासियत है कि फिल्म में राहुल वर्मा और माया दोनों के पक्ष को दर्शाया गया है. मैं कंपनी का सीइओ हूं और माया वर्कर. फिल्म में दोनों पक्षों को रखा गया है. खासतौर से फिल्म का क्लाइमेक्स लाजवाब है.
ऐसे वक्त में जहां गैंगरेप के मुद्दे से सभी आहत हैं. ऐसे में यह फिल्म आ रही है?
अनफॉरचुनेटिली, हमारी फिल्म की रिलीज का यह वक्त है. जो हुआ गलत हुआ. इंकार शायद थोड़ा एजुकेट कर पाये लोगों को.
इन दिनों आप केंद्रीय भूमिकाओं में नजर आने लगे हैं. पहले की अपेक्षा अब आपके अभिनय भी निखार आया है. आप खुद इस बात से सहमत हैं ?
खुशी इस बात की है कि जरूरत से ज्यादा मिला. इतना सोचा नहीं था. लेकिन प्रकाश झा, सुधीर मिश्रा जैसे निर्देशकों ने वाकई मेरे हुनर को निखारा है. संवारा है. मैं चाहता हूं कि मैं इंडस्ट्री में सभी लोगों के साथ काम करूं. किसी कैंप का हिस्सा न बनूं
लेकिन आप तो शुरू से शाहरुख के कैंप के माने गये हैं. इन दिनों आप दोनों में अनबन है?
थक चुका हूं यह सुन सुन कर. मैं तब भी किसी एक कैंप का नहीं था. अब भी नहीं हूं. इंडस्ट्री छोटी सी है. हम यहां काम करने आये हैं. कैसे किसी एक के साथ ही काम करके हम संतुष्ट रह सकते हैं. मुझे सबके साथ काम करना है. बस यही मोटो है मेरा.
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