हाल ही में एके हंगल साहब के बेटे विजय हंगल से मुलाकात हुई. मैं विशेषत: विजय हंगल से हंगल साहब के जीवन में नाटक के प्रभाव पर बातचीत करने गयी थी. लेकिन उनसे मिल कर मैंने महसूस किया कि विजय हंगल अपने पिता अवतार कृष्ण हंगल के बेटे कम उनके दोस्त की भूमिंका अधिक निभायी. हंगल साहब के अंतिम दिनों में विजय हंगल साहब ने निश्चछल भाव से सेवा की. सभी जानते हैं कि हंगल साहब ने कभी अपनी संपत्ति नहीं संजोयी. ऐसे दौर में जहां हर बेटा अपने पिता की संपत्ति की लालसा रखता है और इसी विचार से सेवा करता है. विजय हंगल ने कभी कोई लालसा नहीं रखी. इस लिहाज से यह एक अदभुत बेटे का रूप हैं. उस वक्त उनके हमसफर भी बने. उन्होंने 14 अगस्त हंगल साहब को अस्पताल में भर्ती करने के ठीक दो दिनों पहले हंगल साहब से हुई उनकी बातचीत का वाक्या सुनाया. उन्होंने बताया कि एके हंगल ने जीवन पर लोगों का हौंसला बढ़ाया.लोगों ने उनसे सीखा. लोगों को उन्होंने हिम्मत दी. लेकिन आज वे खुद नर्वस थे. हंगल साहब ने विजय हंगल से कहा कि क्या मैं वापस आऊंगा या नहीं. उस वक्त विजय हंगल ने उन्हें हौंसला दिया. लेकिन बाद में उन्होंने अपने पिता के लिए एक कविता अंगरेजी में कविता लिखी..जिसका भावार्थ यही है कि आप कई लोगों के आदर्श हैं. उनके सपने देखें.उनके लिए जीने की कोशिश करें. ऐसा सोचें कि आप जहां यात्र खत्म कर रहे हैं.वहां उनकी शुरुआत है. मरना जीना हमारी हाथों में नहीं. लेकिन फिर भी आप चमकने की कोशिश करें. विजय हंगल यह कविता हंगल साहब को सुना नहीं पाये. दोनों ने ही अपनी संगिनी को खोया. और यही वजह रही कि दोनों एक दूसरे के साथी बने रहे. विजय हंगल ने भी एक बेटे के रूप में सारी जिम्मेदारी पूरी की. बाप-बेटे की यह जोड़ी एक अनोखी मिसाल है.
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20120903
निश्चछल बेटे का समर्पण
हाल ही में एके हंगल साहब के बेटे विजय हंगल से मुलाकात हुई. मैं विशेषत: विजय हंगल से हंगल साहब के जीवन में नाटक के प्रभाव पर बातचीत करने गयी थी. लेकिन उनसे मिल कर मैंने महसूस किया कि विजय हंगल अपने पिता अवतार कृष्ण हंगल के बेटे कम उनके दोस्त की भूमिंका अधिक निभायी. हंगल साहब के अंतिम दिनों में विजय हंगल साहब ने निश्चछल भाव से सेवा की. सभी जानते हैं कि हंगल साहब ने कभी अपनी संपत्ति नहीं संजोयी. ऐसे दौर में जहां हर बेटा अपने पिता की संपत्ति की लालसा रखता है और इसी विचार से सेवा करता है. विजय हंगल ने कभी कोई लालसा नहीं रखी. इस लिहाज से यह एक अदभुत बेटे का रूप हैं. उस वक्त उनके हमसफर भी बने. उन्होंने 14 अगस्त हंगल साहब को अस्पताल में भर्ती करने के ठीक दो दिनों पहले हंगल साहब से हुई उनकी बातचीत का वाक्या सुनाया. उन्होंने बताया कि एके हंगल ने जीवन पर लोगों का हौंसला बढ़ाया.लोगों ने उनसे सीखा. लोगों को उन्होंने हिम्मत दी. लेकिन आज वे खुद नर्वस थे. हंगल साहब ने विजय हंगल से कहा कि क्या मैं वापस आऊंगा या नहीं. उस वक्त विजय हंगल ने उन्हें हौंसला दिया. लेकिन बाद में उन्होंने अपने पिता के लिए एक कविता अंगरेजी में कविता लिखी..जिसका भावार्थ यही है कि आप कई लोगों के आदर्श हैं. उनके सपने देखें.उनके लिए जीने की कोशिश करें. ऐसा सोचें कि आप जहां यात्र खत्म कर रहे हैं.वहां उनकी शुरुआत है. मरना जीना हमारी हाथों में नहीं. लेकिन फिर भी आप चमकने की कोशिश करें. विजय हंगल यह कविता हंगल साहब को सुना नहीं पाये. दोनों ने ही अपनी संगिनी को खोया. और यही वजह रही कि दोनों एक दूसरे के साथी बने रहे. विजय हंगल ने भी एक बेटे के रूप में सारी जिम्मेदारी पूरी की. बाप-बेटे की यह जोड़ी एक अनोखी मिसाल है.
अमिताभ का ज्ञान कुटुंब
7 सितंबर से अमिताभ बच्चन कौन बनेगा करोड़पति के छठे संस्करण के साथ वापसी कर रहे हैं. इस बार शो ने अपना थीम ज्ञान रखा है.पंचलाइन है वह ज्ञान ही है जो आपको आपका हक दिलाता है. अमिताभ बच्चन ने खुद स्वीकारते हैं जीवन में ज्ञान होना इसलिए आवश्यक है. चूंकि कोई भी व्यक्ति कर्म से ज्ञान बढ़ा सकता है और ज्ञान और कर्म से ही वह भाग्य को बदल सकता है. दरअसल, यह हकीकत भी है कि अमिताभ बच्चन ने अपने जीवन में संघर्ष के कई उतार चढ़ाव के मोड़ देखे. लेकिन परिवार से मिली समृद्ध परवरिश. साहित्य की समृद्धि से ही हमेशा उनका ज्ञान बढ़ता रहा.यह बात जगजाहिर है कि अमिताभ हमेशा से अपने पिता हरिवंशराय बच्चन के नजदीक रहे. वे आज भी कहीं भी जाते हैं तो अपने पिता की कोई न कोई रचना अपने साथ ही रखते हैं. यही वजह है कि फिल्मों में दिलचस्पी होने के बावजूद चूंकि उनके पिताजी की यह इच्छा थी. उन्होंने शिक्षा को अहमियत दी. यह उनकी ज्ञनवर्धक सोच का ही नतीजा है कि आज हिंदी सिनेमा जगत में वे उन बुद्धिजीवियों में से माने जाते हैं, जिन्हें वाकई भाषा, संस्कृति का ज्ञान है. वे अंगरेजी भाषा का जितना ज्ञान रखते हैं. हिंदी भाषा में भी उनकी उतनी ही अच्छी पकड़ है. वे उन चुनिंदा कलाकारों में से हैं जो देवनागरी में ही स्क्रिप्ट पढ़ते हैं. सोनी टीवी शो के लांच के दौरान भी वे लगातार हिंदी बोलते ही नजर आ रहे थे और बाकी लोगों को बढ़ावा भी दे रहे हैं. केबीसी को अमिताभ की बदौलत ही वह लोकप्रियता मिली है और अमिताभ ने इसी माध्यम से शुद्ध हिंदी भाषा को बहुत प्रमोट भी किया हो. जो कि फिलवक्त हिंदी सिनेमा में लुत्फ ंहोता नजर आता है. लेकिन केबीसी की वजह से लोगों ने द्वितीय, तृतीय बोलना शुरू कर दिया. एक अभिनेता के रूप में अपने कर्म से भाषा के क्षेत्र में उनका यह योगदान उल्लेखनीय रहेगा.
प्रमोशन के बोल वचन
रनबीर कपूर की आगामी फिल्म बर्फी 14 सितंबर को रिलीज होने जा रही है. हाल ही में फिल्म के प्रमोशन के लिए एक रोचक वीडियो इंटरनेट पर अपलोड किया है. आप खुद यूटीवी के ऑफिशियल साइट्स पर इसे देख सकते हैं. वही दूसरी तरफ अक्षय कुमार की फिल्म ओएमजी के प्रमोशन के लिए एक अलग तरीका अपनाया गया है. मुंबई के कई मल्टीप्लेक्स में एक दक्षिणा देनेवाला बक्सा रखा गया है और उसमें लिखा गया है ..आर यू ब्राइबिंग गॉड अर्थात क्या आप भगवान को खरीदना चाहते हैं.( यहां फिल्म के मेकर्स समझाना चाहते हैं कि भगवान में आस्था रखें लेकिन जो लोग वहां चढ़ावा चढ़ाते हैं. वह न करें). फिल्म मोहल्ला अस्सी को लेकर भी चर्चा है कि सनी देओल फिल्म के प्रमोशन में सबको गंगाजल बांटेंगे. और वे उन उन स्थानों पर जायेंगे जहां से गंगा बहती है और वहां की सफाई करेंगे.स्पष्ट तौर पर यह तसवीर नजर आ रही है कि अब प्रमोशनल इवेंट्स को लेकर भी और सजगता बरती जा रही है. हर दिन नये हथकंडे, औरों से अलग करने की कोशिश व जुगाड़ में प्रमोशन फंडे किये जा रहे हैं. आलम तो यह है कि अब फिल्म के बनने से पहले से ही फिल्म का प्रमोशन शुरू कर दिया जा रहा है. हाल ही में साजिद खान ने अपनी फिल्म हिम्मतवाला का पोस्टर जारी किया. साथ ही फिल्म का मुहूर्त शॉट यूटयूब पर रिलीज किया. इन दिनों लगभग हर फिल्म के परदे के पीछे के दृश्य इंटरनेट पर अपलोड किये जा रहे हैं और दर्शकों में उत्सुकता बढ़ाई जा रही है. इन सारी गतिविधियों से यह तसवीर साफ हो रही है कि मेकर्स उस हर संभव कोशिश में हैं कि वे किसी तरह दर्शक को उकसा कर टिकट खिड़की तक पहुंचा ही दें. लेकिन मेकर्स हर कीमत पर पैसा वसूल करना चाहते हैं. लेकिन यही वक्त है कि दर्शक सजग हों और बिना किसी बहकावे के सही फिल्मों का चयन करें
अपनी जुबां में बयां होती दास्तां
मशहूर गायक मन्ना डे बांग्ला अखबार में एक ब्लॉग लिख रहे हैं. यह पहली बार है जब मन्ना डे किसी अखबार के लिए ब्लॉग लिख रहे हैं. बांग्ला के पाठकों का कहना है कि उन्होंने अपने ब्लॉग के माध्यम से अपने जीवन के कई अनछुए पहलुओं के साथ साथ कई अन्य पहलुओं से भी अवगत कराया है और इसे बेहद पसंद किया जा रहा है. किसी दौर में माधुरी नामक पत्रिका में हिंदी सिनेमा से जुड़ी तमाम हस्तियां फस्र्ट पर्सन में अपने अनुभव लिखा करती थी. इस पत्रिका की यूएसपी ही यही होती थी कि इस पत्रिका में कलाकारों द्वारा खुद से कॉलम लिखे जाते थे. नूरजहां से लेकर राजकपूर लगभग सभी मशहूर हस्तियों ने अपने जीवन के पहलुओं से अवगत कराया है. इसी पत्रिका में धर्मेद्र ने अपने संघर्ष के जीवन की व्याख्या की थी कि किस तरह शुरुआती दौर में निर्माता कहते थे कि फिल्म बनेगी. लेकिन बन नहीं पाती थी और किस तरह उन्हें संघर्ष करना पड़ा. संजीव कुमार ने अपने जीवन के उन पलों का बखान किया है जब वे बेहद अकेले हो गये थे. हेमा मालिनी ने बताया है कि कैसे उनके नानाजी की इच्छा थी कि वे अभिनेत्री बने. राजकपूर साहब ने अपने निर्देशन से जुड़ी अहम बातों को दर्ज किया है. वर्तमान में यह पत्रिका केवल एफटीआइआइ के संग्राहलय में हैं. दरअसल, ये सारे अनुभव हिंदी सिनेमा के महत्वपूर्ण दस्तावेजों में एक हैं. चूंकि सारे कलाकार जब खुद अपनी बात रखते हैं और बीच में कोई दूसरा व्यक्ति सूत्रधार नहीं होता तो निश्चित तौर पर कलाकार की ईमानदार सोच व उनके अनुभव ज्यों के त्यों लोगों तक पहुंचते हैं और वे लोगों के दिलों को ज्यादा छूते हैं. चूंकि उनमें कोई बनावटी पन नहीं होचायही वजह है कि कलाकारों की आत्मकथा आज भी भारत में बेहद लोकप्रिय हैं. अमिताभ, मन्ना डे के अलावा जो भी लीजेंड मौजूद हैं. उन्हें भी अपने अनुभव सांझा करने चाहिए.
कलाकार से आगे हंगल
हंगल साहब ने हिंदी सिनेमा ने एक दशक तक अपना योगदान दिया. लेकिन उन्हें सिर्फ अभिनेता या किसी फिल्म हस्ती के रूप में ही स्मरण नहीं किया जा सकता. उनका ओहदा किसी फिल्मी हस्ती से बढ़ कर था. उन्होंने न सिर्फ स्वतंत्रता संग्राम में एक आंदोलनकारी के रूप में अपना योगदान दिया. बल्कि इप्टा के माध्यम से उन्होंने रंगमंच के माध्यम से भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाया. लेकिन यह अफसोस की बात थी कि जिस हिंदी सिनेमा जगत को उन्होंने अपने महत्वपूर्ण साल दिये. उसी हिंदी सिनेमा की हस्तियों ने उन्हें उनकी मृत्यु के बाद आखिरी सलाम देने तक की जरूरत नहीं समझी. हंगल साहब के नजदीकी साथी व विशेष कर नाटक के कई रंगकर्मी सहयोगी तो वहां मौजूद थे. और वे हंगल साहब का गुणगान राम नाम का नाम याद करने की बजाय. हंगल साहब अमर रहें. हंगल साहब को लाल सलाम कह कर कर रहे है.दरअसल, हंगल साहब जैसी हस्तियां वाकई अमर ही तो होती हैं. लेकिन ग्लैमर की दुनिया की रीत भी अजीब है. यहां किसी की मौत पर आंसू भी यह सोच कर खर्च किये जाते हैं कि जिसके लिए वे आंसू बहाये जा रहे हैं कि वह शख्स लोकप्रिय कितना था. यह सच्चाई है कि हंगल साहब ने 50 की उम्र में सिनेमा में कदम रखा और वे सुपरसितारा हस्ती नहीं रखते थे. लेकिन उन्होंने कई सुप्रसिद्ध कलाकारों के साथ काम किया है. वे वरिष्ठ कलाकार थे. लगभग 8 फिल्मों में वे जया भादुड़ी के पिता रहे. लेकिन बॉलीवुड के किसी वरिष्ठ कलाकारों ने उन्हें आखिरी नमन देने की जुररत नहीं समझी. दरअसल, इस ग्लैमर की दुनिया का असली चेहरा भी ऐसे ही मौके पर नजर आता है. हंगल साहब के बेटे ने बताया है कि उन्होंने कभी कोई मेडीक्लेम नहीं कराया था. यह दर्शाता है कि हंगल साहब ने कभी बजत के दृष्टिकोण से काम नहीं किया. उनके योगदान को भूलाया नहीं जा सकता.
सीता की तरह शांत हो गयी
वह आयी थीं इंडियन आयडल बनने, लेकिन राजन शाही ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें ‘चांद छुपा बादल में’ की चांद बना दिया. इसके बाद लगातार उन्हें अपने हुनर को दिखाने का मौका मिलता रहा है. बात हो रही है बिहार के पटना शहर की नेहा सरगम की. इन दिनों वे जी टीवी के धारावाहिक ‘रामायण’ में सीता का किरदार निभा रही हैं. पेश है अनुप्रिया अनंत से हुई उनकी बातचीत के मुख्य अंश..
नेहा बेहतरीन कलाकार होने के साथ-साथ अच्छी गायिका भी हैं. उनका मानना है कि सीता का किरदार निभाना वाकई बहुत कठिन है. लेकिन फिर भी वह खुश हैं कि उन्हें ऐसा ऐतिहासिक किरदार निभाने का मौका मिला. ‘रामायण’ का प्रसारण जी टीवी के साथ-साथ दूरदर्शन पर भी किया जा रहा है.
दादी का पसंदीदा धारावाहिक
जिस वक्त टेलीविजन पर रामानंद सागर सर की पहली ‘रामायण’ आयी थी, उस वक्त मैंने यह धारावाहिक नहीं देखा था. चूंकि उस वक्त मेरा जन्म ही नहीं हुआ था. बाद के दिनों में जब इस धारावाहिक का पुन: प्रसारण किया गया, तब मैं इसे देखा करती थी. दरअसल, मेरे परिवार में हमेशा रामायण को महत्व दिया जाता रहा है. मेरी दादी पूरे दिन में 250 से भी अधिक बार राम का नाम कागज पर लिखा करती थीं. ‘रामायण’ दादी का पसंदीदा धारावाहिक था. मुझे लगता है कि आज अगर वह जिंदा होतीं, तो वे बेहद खुश होतीं यह देखकर कि उनकी पोती सीता का किरदार निभा रही है.
कैसे मिली भूमिका
मुङो सागर आर्ट्स से जब कॉल आया था, तो मैंने पूछा कि वे मुङो किस किरदार के लिए चुनना चाहते हैं. उन्होंने बताया कि सीता के लिए. उस वक्त मैं बेहद खुश हो गयी थी. कुछ देर के लिए तो मुङो लगा कि मैं सपना देख रही हूं. आखिर कौन से कलाकार हैं जो नहीं चाहेंगे कि उन्हें ‘रामायण’ के पात्र निभाने का मौका मिले. इसके बाद मेरा लुक टेस्ट हुआ. मैं कहना चाहूंगी कि वाकई सीता का किरदार निभाना एक चुनौती है. चूंकि बाकी किरदारों में तो आप अपना भी इनपुट्स दे सकते हैं, लेकिन जब आप कोई ऐतिहासिक किरदार निभाते हैं तो आपकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है.
बन रही हूं सीता जैसी
मैं मानती हूं कि वाकई सीताजी में कई खास बातें रही होंगी. क्योंकि मात्र उनका किरदार निभाने पर मैं अपने व्यवहार में काफी बदलाव महसूस कर रही हूं. पहले जब मैं ड्राइव करती थी, तो कैसे भी गाड़ी चलाती थी और कोई सामने आता था, तो चिल्लाती थी कि आगे से हटो. लेकिन अब मैं थोड़ी शांत हो गयी हूं. मुङो गुस्सा कम आने लगा है. मुङो लगता है कि सीता के किरदार ने मुङो प्रभावित किया है.
हिंदी बोलने में कोई परेशानी नहीं
मैं बिहार से हूं. मेरी हिंदी हमेशा से अच्छी रही है. मैंने क्लासिकल सिंगिंग सीखी है. इस वजह से भी मेरा उच्चारण बिल्कुल ठीक है. मुङो इस धारावाहिक में शुद्ध हिंदी बोलने में कोई भी परेशानी नहीं हुई है.
रियाज भी करती हूं
पहले मुङो रियाज करने का वक्त नहीं मिलता था, लेकिन अब मैं रियाज करती हूं. हालांकि ‘इंडियन आइडल’ ने मुङो टीवी पर आने का पहला मौका दिया, लेकिन इन दिनों मैं ‘इंडियन आइडल’ देख नहीं पाती. मैं कहना चाहूंगी कि टेलीविजन के रियलिटी शो वाकई नये लोगों को मौके देते हैं.
टीम वर्क
सीता का किरदार निभाने के लिए मैं रामायण पढ़ रही हूं. मुझे राम का किरदार निभा रहे गगन मल्लिक का भी पूरा सहयोग मिल रहा है. हम दोनों के लिए ही इन किरदारों को निभाना मुश्किल था, लेकिन पूरी टीम हमारा साथ दे रही है
जादू से जोकर तक
फिल्म ‘कोई मिल गया’ में पहली बार एक अजीबो-गरीब किरदार का आगमन हुआ. वह दिखने में काफी अलग था. उसे भूख तो लगती थी, लेकिन वह भोजन से नहीं, बल्कि धूप से अपनी भूख मिटाता था. इस अजीबो-गरीब किरदार को निर्देशक ने ‘जादू’ का नाम दिया था. जादू एक एलियन था.
एलियन का यह किरदार इतना लोकप्रिय हुआ कि हिंदी फिल्मों में एलियन जैसे चौंकानेवाले किरदारों पर फिल्में बनायी जाने लगीं. इसी की अगली कड़ी है शिरीष कुंदर की जल्द ही रिलीज होने वाली फिल्म ‘जोकर’. फिल्मों में एलियन के ‘जादू’ से ‘जोकर’ के किरदार तक के इस सफर पर अनुप्रिया अनंत की पड़ताल..
मील का पत्थर बनी कोई मिल गया
राकेश रोशन ने पहली बार हिंदी सिनेमा के रुपहले परदे पर एलियन जैसे किसी किरदार को उतारा था. ‘कोई मिल गया’ फिल्म से भारत में साइ-फाइ फिल्में बनने की शुरुआत हुई. हालांकि इससे पहले इस तरह की फिल्में बना करती थीं, लेकिन उनकी क्वालिटी इतनी बेहतर नहीं होती थी. इस फिल्म के बाद ही अचानक फिल्मों में स्पेशल इफेक्ट्स और तरह-तरह की तकनीकों को दर्शाने का ट्रेंड शुरू हो गया. इस फिल्म से ही हिंदी में सुपरहीरो की कहानियां कही जाने लगीं. ‘कोई मिल गया’ की ही सीक्वल थी फिल्म ‘कृष’. जल्द ही इसकी अगली कड़ी भी दर्शकों के सामने होगी.
निर्देशक सत्यजीत रे ने वर्ष 1967 में पहली बार एलियन पर आधारित फिल्म की परिकल्पना की थी. हालांकि उनका यह सपना पूरा नहीं हो पाया. उनकी सोच को 2003 में राकेश रोशन ने अपनी फिल्म ‘कोई मिल गया’ में जादू के किरदार के रूप में प्रस्तुत किया. इसके बाद हिंदी सिनेमा के रुपहले परदे पर एलियंस पर आधारित फिल्म निर्माण का ट्रेंड सा शुरू हो गया.
विचित्र प्रकार की शारीरिक बनावट और विभिन्न प्रकार के करतब दिखाने वाले इन किरदारों ने बाल दर्शकों को बड़ी संख्या में आकर्षित किया. इन एलियंस की फिल्में बच्चों को बेहद पसंद आयीं. इसी के चलतेसिनेमा को बाल दर्शकों का ध्यान आकर्षित करने का जादुई मंत्र मिल गया. बॉलीवुड फिल्मों में एलियन को लोकप्रिय बनाने का श्रेय हॉलीवुड की फिल्मों को जाता है.
एलियन पर आधारित फिल्मों को लेकर दिलचस्पी होने की खास वजह यह रही है कि एलियन न सिर्फ कद काठी में अलग होते हैं, बल्कि उन्हें परदे पर विभिन्न खूबियों के साथ प्रस्तुत किया जाता है. यही वजह है कि इन अजूबों की मजेदार और अजीबो-गरीब हरकतों से दर्शकों का लगाव बढ़ जाता है.
निर्देशक राकेश रोशन की फिल्म ‘कोई मिल गया’ में जब पहली बार एलियन ‘जादू’ के रूप में आया और जिस तरह उसे दर्शाया गया, उसने लोगों के जेहन में एलियन को लेकर शायद एक खाका जरूर गढ़ दिया. फिल्में दर्शकों की नजर में छवियां भी बनाती हैं और इस तरह की चीजों को लोकप्रिय बनाने में फिल्मों ने अहम भूमिका निभायी है.
दुनिया की वैसी तमाम चीजें जिन्हें हमने नहीं देखा, वे जब फिल्मों के माध्यम से हमारे सामने आती हैं तो हम यही मान लेते हैं कि फिल्मों में जो दिखाया जा रहा होगा, तकरीबन सही होगा. यही वजह है कि एलियन पर आधारित फिल्में बनने का सिलसिला आज भी जारी है. दर्शक यह मान चुके हैं कि एलियन का संबंध विज्ञान से है और वह उड़नतस्तरी में घूमनेवाला कोई अजीबो-गरीब प्राणी है.
यही वजह है कि अब तक एलियन को लेकर जितनी भी फिल्मों का निर्माण हुआ, वे सभी साइ-फाइ (साइंस पर आधारित फिक्शन फिल्म) ही थीं. इस बिंदु पर अब तक भारत में ‘कोई मिल गया’ ही दर्शकों में अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रही. इसी कड़ी में अब निर्देशक शिरीष कुंदर अपनी नयी फिल्म ‘जोकर’ में एलियन के साथ दर्शकों से रूबरू हो रहे हैं.
हालांकि, हिंदी सिनेमा में प्राय: एलियन को सकारात्मक भूमिकाओं में दर्शाया जाता रहा है. फिल्म ‘कोई मिल गया’ में राकेश रोशन ने एलियन की भावनात्मक छवि प्रस्तुत की थी, लेकिन फिल्म ‘जोकर’ में शिरीष ने एलियन को हास्य भूमिका में पेश किया है. एलियन पर लगातार फिल्में बनती रही हैं. इसके बावजूद लोग इस विषय से बोर नहीं हुए हैं. इसकी वजह यही है कि एलियन को ध्यान में रख कर कई एक्शन और साइंस फिक्शन की अलग-अलग विचारों की फिल्में बनायी जाती रही हैं.
द एलियन (सत्यजीत रे) पहली सोच
सत्यजीत रे ने पहली बार ‘द एलियन’ नामक इंडियन अमेरिकन साइंस फिक्शन फिल्म बनाने की परिकल्पना की थी. इसमें उनका साथ हॉलीवुड स्टूडियो कोलंबिया पिर्स देने वाला था. फिल्म की पटकथा भी लिखी जा चुकी थी. यह फिल्म बंकुबादुर बंधू के बंगाली साइंस फिक्शन पर आधारित थी. ऐसे ही विषय को लेकर रे ने ‘पातालघर’का निर्माण किया था.
हॉलीवुड के एलियन
हॉलीवुड में अब तक एलियन पर आधारित कई फिल्मों का निर्माण किया जा चुका है. हॉलीवुड में एलियंस को अधिकतर नकारात्मक भूमिका में दिखाया जाता रहा है. वर्ष 1979 में रेडली स्कॉट ने ‘एलियन’ नामक फिल्म बनायी थी. इस फिल्म से उन्हें बहुत लोकप्रियता भी मिली. जेम्स कैमरॉन ने इसी फिल्म का सीक्वल बनाया और इसके बाद ‘एलियन 3’ भी आयी. टॉम क्रूज की फिल्म ‘वॉर ऑफ द वर्ल्ड’ में भी एलियन की भूमिका दर्शायी गयी है.
फिल्म जोकर की कहानी
फिल्म ‘जोकर’ की कहानी एक ऐसे गांव पर आधारित है, जो भारत के नक्शे पर कहीं मौजूद नहीं है. यह गांव अपना अस्तित्व खो चुका है. ऐसे में एक झूठी खबर फैलायी जाती है कि वहां एलियन आते हैं. इसके बाद अचानक ही गांव चर्चा में आ जाता है. फिल्म का मुख्य केंद्र यही है कि हम आज भी जब तक कुछ अजीबो-गरीब और अलग चीजें नहीं दर्शाते, हमारी चर्चा नहीं होती. क्यों गांव को पहचान दिलाने के लिए एलियन के होने की अफवाह फैलायी जाती है, फिल्म इसी विषय पर आधारित है. यहां एलियन को ही जोकर की संज्ञा दी गयी है. फिल्म की पूरी शूटिंग 3डी कैमरे से की गयी है. भारत में ‘जोकर’ पहली फिल्म होगी जिसकी पूरी शूटिंग में 3डी कैमरे का इस्तेमाल किया गया है.
हिंदी-दक्षिण फिल्मों में एलियन
1. ‘कोई मिल गया’ के अलावा ‘जाने कहां से आयी है’ में नायिका को एलियन के रूप
में दिखाया गया था. इस फिल्म में एलियन की खूबसूरत छवि को प्रस्तुत किया गया.
में दिखाया गया था. इस फिल्म में एलियन की खूबसूरत छवि को प्रस्तुत किया गया.
2. फिल्म ‘अलग’ में भी एलियन को दर्शाया गया.
3. दक्षिण फिल्मों में भी एलियन के रोचक विषय का खूब इस्तेमाल किया गया है. विशेषकर तमिल में एलियन को ध्यान में रखते हुए फिल्में बनायी जाती रही हैं. ‘कुड्ड’, ‘कलाई अरासी’, ‘विक्रम’ जैसी फिल्मों के नाम इस फेहरिस्त में शामिल हैं.
4. मलयालम में एलियन को लेकर फिल्म ‘करुथा’ बनी, जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया.
परदे के पीछे का एलियन..
लियन फिल्मों में अलग तरह के लिबास में नजर आते हैं. फिल्मों में कभी भी उनका असली चेहरा सामने नहीं आता. यही वजह है कि सोच में उनकी छवि एक एलियन की तरह जगह बनाने लगती है. एलियन का किरदार निभा रहे कलाकारों को देख कर जेहन में एक सवाल आता है कि आखिर ये किरदार निभाने वाले कलाकार कौन हैं. इसी बात की तफ्तीश में फिल्म ‘जोकर’ के प्रमोशन के दौरान फिल्म में तीन महत्वपूर्ण एलियन के गेटअप में सजे-धजे कलाकारों से बात हुई.
फिल्म के प्रमोशन में भी इस बात का खुलासा नहीं किया गया है कि एलियन के पीछे का चेहरा आखिर किसका है. यही वजह है कि एलियन बनाने वाले व्यक्ति ने भी अपना नाम न प्रकाशित होने की शर्त पर एलियन बनने की पूरी प्रक्रिया के बारे में बताया. परदे पर नजर आने वाले एलियन को तैयार करने वाले वही व्यक्ति होते हैं जो प्राय: मॉल या किसी कार्यक्रम में बड़े-बड़े आकार के टेडी बियर, हाथी और अन्य कई तरह के जानवरों की शक्ल वाले लिबास पहनकर लोगों को लुभाते हैं.
उन्हें फिल्मी निर्माताओं द्वारा एलियन के रंग-रूप और शारीरिक आकार के बारे में बताया जाता है. एलियन के गेटअप में तैयार होने वाले कलाकारों को बाकायदा इसकी ट्रेनिंग दी जाती है. क्योंकि यह एक बेहद धैर्य रखनेवाला काम है. ज्यादातर वे लोग इससे जुड़ते हैं, जो मुखौटे वाला नृत्य करते हैं. छोटे कद के कलाकारों और बच्चों को भी इसके लिए ट्रेनिंग दी जाती है.
हालांकि बड़ी उम्र के लोग भी इस व्यवसाय से जुड़े होते हैं. इस व्यवसाय में काम करने वाले व्यक्ति प्रति महीना लगभग 8 से 9 हजार कमा लेते हैं. फिल्म ‘कोई मिल गया’ में एलियन का किरदार भी एक बच्चे ने ही निभाया था. मुंबई के दादर, वर्ली, मसजिद बंदर के लोग इस काम को ज्यादा करते हैं
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