20120816

मेरे टाईगर सलमान ही बन सकते थे : कबीर खान


उन्होंने 4 सालों में 50-60 मुल्कों का भ्रमण कर लिया था. इन मुल्कों में उन्होंने जिंदगी की वास्तविकता को करीब से जाना. और यही वजह रही कि वे आम प्रेम कहानियों से हट कर काबुल एक्सप्रेस, न्यूयॉर्क जैसी फिल्में बनाने में कामयाब रहे. उनकी फिल्मों के निर्देशन शैली से ही उनकी अंतरराष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक समझ स्पष्ट तौर पर नजर आती है. वास्तविकता के नजदीक रहते हुए भी वे फिल्मों में rाुमन एंगल देने से नहीं चूकते. चूंकि वे मानते हैं कि फिल्मों से लोग भावनात्मक रूप से जुड़ेंगे. तभी वह फिल्म है. बात हो रही निर्देशक कबीर खान. जो यशराज की अब तक की सबसे महंगी और बहुप्रतिक्षित फिल्म एक था टाइगर के निर्देशक हैं. पेश है अनुप्रिया अनंत से हुई उनकी बातचीत के मुख्य अंश

कबीर खान उन हिंदी फिल्मों के उन निर्देशकों में से एक हैं जिन्होंने कम फिल्में बनाई हैं. लेकिन दर्शक उनकी फिल्मों को अब भी याद करते हैं. कबीर खान उन निर्देशकों में से एक हैं, जिनकी फिल्में देखने के बाद दर्शक थियेटर से निकलते हुए यह चर्चा निश्चित रूप से करते हैं कि यार फिल्म के निर्देशक हैं कौन. यह एक निर्देशक की बड़ी कामयाबी है.
कबीर, एक था टाइगर कैसे आयी जेहन में? कैसे बना इस फिल्म का संयोग और कैसे मिला यशराज का साथ.
आदी( आदित्य चोपड़ा) मेरे पास वन लाइनर स्टोरी लेकर आये थे. न्यूयॉर्क की शूटिंग के दौरान. उन्होंने कहा कि कबीर देखो. मुङो पुख्ता नहीं पता. लेकिन ऐसा कोई रॉ एजेंट था. टाइगर नाम था उसका शायद. वह महत्वपूर्ण व्यक्तित्व थे और मुङो लगता है कि लोगों को उनके बारे में जानना चाहिए. टाइगर एक लीजेंड थे. मुङो ऐसी कहानियों ने हमेशा ही आकर्षित किया है तो बस मैं लग गया इस फिल्म की रिसर्च में. न्यूयॉर्क उस वक्त पूरी हो चुकी थी. जैसे जैसे मैंने और मेरे को राइटर नीलेश मिश्र ने इस पर रिसर्च किया. परतें खुलती गयी. चौंकानेवाली चीजें सामने आने लगीं. हमें लगा हिंदी सिनेमा में अब तक ऐसे विषय पर कहानी नहीं बनी है. मैं वाकई आदित्य की समझ और पारखी सोच की तारीफ करना चाहूंगा. उन्हें राजनीति विषयों में दिलचस्पी नहीं है. लेकिन वह राजनीति समझ अच्छी रखते हैं. मुङो खुशी है कि ऐसे विषय पर फिल्म बनाने के लिए उन्होंने मुझ पर विश्वास किया.
रिसर्च में कितनी और कैसी मेहनत की आप दोनों ( नीलेश मिश्र)ने. परेशानियां क्या क्या आयीं?
चूंकि मैं काफी लंबे अरसे से डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के सिलसिले में और विशेष कर काबुल एक्सप्रेस बनाने के दौरान अफगानिस्तान के कई इलाकों से वाकिफ था. वहां के कई इंटेलीजेंस ब्यूरो से मिल चुका था. और इस फिल्म के लिए मैं चाहता था कि सिर्फ बैकड्रॉप के रूप में खूफिया एंजेंसी जैसी चीजें न दिखाऊं. मैं इसे वास्तविकता के करीब लाना चाहता था. सो, कोशिश की कि रिसर्च के दौरान उस दौर में जाने की कोशिश करूं. जबकि घटनाएं हैं. वहां के कई लोगों से मिले हम. तथ्यों के आधार पर और कुछ अनुमान के आधार पर चूंकि फिल्म फीचर है तो उसमें फिक् शन का टच देकर कहानी गढ़ने की कोशिश की. वैसे यह खास अंदाज मैंने आदी से सीखा है. आदी इस बात में माहिर हैं कि वे रियलिस्टिक अप्रोच देते हुए भी दर्शकों को हमेशा ध्यान में रख कर कहानी का प्लॉट डेवलप करते हैं और एक था टाइगर में वही rाुमन टच बरकरार है. यहां भी प्रेम कहानी है. लेकिन स्टोरीटेलिंग का अंदाज थोड़ा डॉक्यूमेंट्री ऐतिहासिक राजनीतिक अंदाज का है और मैं अगर अपनी फिल्मों में यह सब एंगल न दूं तो मुङो फिल्म खोखली लगने लगती है.जहां तक बात है परेशानियों की तो मुङो ऐसे ही मुल्कों में घूमने में शुरुआती दौर से ही मजा आता रहा है और मैं रिस्क को भी एंजॉय करता हूं.

लेकिन एक था टाइगर, न्यूयॉर्क, काबुल एक्प्रेस जैसी फिल्में यशराज जॉनर की फिल्में नहीं हैं. फिर कैसे एक के बाद एक आपने लगातार ऐसे ही विषयों का चुनाव किया और यशराज बैनर ने आपको चुना?
दरअसल, काबुल एक्सप्रेस जब मैंने लिख कर पूरी की थी. मैं नया नया दिल्ली से आया था मुंबई. फीचर फिल्मों का कोई अनुभव था नहीं न ही किसी को जानता था मैं. मैं कहानियां ले लेकर मिलता रहता था. छोटे बजट की फिल्म थी यह. हर कोई सुनता. लेकिन बनाने के लिए कोई तैयार नहीं. उस वक्त मेरे  एक दोस्त ने बताया कि यशराज ट्रैक से हट कर कुछ करना चाहते हैं. उन तक स्क्रिप्ट पहुंची.मेरे दोस्त ने ही दे दी थी. मुङो यशराज से कॉल आया कि आइए बात करनी है. मिलने आया तो आदित्य ने कहा वह काबुल एक्सप्रेस प्रोडयूस करेंगे. मेरे लिए तो सपने जैसा था. इसी फिल्म से यशराज ने अपनी छवि तोड़ी. और फिर लगातार मुङो मौका दिया कुछ नये एक्पेरिमेंट करने के लिए. न्यूयॉर्क का आइडिया भी आदी का ही था. अब तो यशराज घर जैसा है. मुङो तो इसी ने सबकुछ दिया है.
लोगों की आशाएं फिल्म एक था टाइगर से बहुत ज्यादा बढ़ गयी हैं. यशराज की सबसे महंगी फिल्म है यह. तो किस तरह की जिम्मेदारी रही आप पर. और किन किन लिहाज से यह फिल्म बिल्कुल अलग है.
सबसे पहली बात फिल्म में सलमान खान हैं, जो बॉलीवुड के टाइगर हैं. दूसरा इसके साथ यशराज बैनर है. तीसरी बात यह है कि इसके दृश्य ऐसे ऐसे स्थानों पर शूट किये गये हैं, जहां आज तक बॉलीवुड तो क्या हॉलीवुड फिल्में भी नहीं फिल्मायी गयी होंगी. क्यूबा में किसी फिल्म की पहली बार शूटिंग हुई है. माजर्न, इराको जैसी जगहें हैं जहां कभी शूटिंग के बारे में सोचा नहीं जा सकता था. लोकेशन के अलावा फिल्म की दमदार कहानी. जहां तक बात है जिम्मेदारी की तो यह सच है कि जिम्मेदारी है. लेकिन बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ कलेक् शन की जिम्मेदारी नहीं है. वह इस फिल्म का उद्देश्य भी नहीं है. मैं अपनी हर फिल्म से एक अलग बाउंडरी लाइन तोड़ना चाहता हूं. दस साल बाद भी अपनी फिल्में देखूं तो लगे मैंने कुछ अलग किया है और चीजों को रिडिफाइन किया है. यह स्पष्ट है कि मेरी फिल्मों में चीजों का अंतरराष्ट्रीय नजरिया. स्थिति दिखता रहेगा.
अंतरराष्ट्रीय नजरिये की बात की अभी आपने? क्या वजह है कि आपकी फिल्में भारत की सरहदों के पार के विषय पर ही होती है.
जैसा की मैंने कहा शुरुआती दौर में ही मैं सईद नकवी साहब हैं वह बेहतरीन जानकार थे. उनके साथ मैंने चार सालों में 50-60 मुल्कों का भ्रमण किया है. नजदीक से लोगों की जिंदगी देखी है. उन्होंने मुङो बताया था कि दुनिया में क्या हो रहा है क्या नहीं. इस पर केवल हम बीबीसी व कुछ चुनिंदा चैनलों के माध्यम से ही जान पाते हैं. उन्होंने जैसा दिखा दिया.हम उस पर विश्वास कर लेते हैं. जबकि हकीकत इससे परे होती है.इसलिए हमें आंखों से देखना जरूरी है और विश्व में क्या हो रहा है. इससे हम भारत में रहें कहीं भी प्रभाव पड़ता है. सो, उनकी वजह से मैंने विश्व स्तरीय नजरिये तैयार करना शुरू किया.यही वजह है कि मेरी फिल्मों में वह अप्रोच नजर आता है.

कबीर वाणी 
टाइगर सलमान के बारे में
सलमान को दो साल पहले की मीटिंग याद थी : कबीर
मैं एक बात से स्पष्ट था कि सलमान ही इस फिल्म में टाइगर होंगे. चूंकि वर्तमान में वही एक स्टार हैं जो लाजर्र दैन लाइफ किरदार निभा सकते हैं. हुआ यूं था कि शुरुआती दौर में मैंने अपने एक दोस्त की वजह से काबुल एक्सप्रेस का नैरेशन सलमान को सुनाया था और उन्हें डीवीडी दी थी. जो मैंने रिसर्च के दौरान बनाई थी. बकायदा सलमान ने मेरी डीवीडी देखी थी और पूरा नैरेशन सुना था. उन्होंने कहा था कि अच्छी स्टोरी है. फिर बाद में न्यूयॉर्क के दौरान जब कट्रीना को मैंने अपनी फिल्म में ऑफर किया तो कट्रीना ने सलमान से पूछा. सलमान ने पूछा कि निर्देशक कौन है. कट्रीना ने बताया कबीर खान हैं कोई. सलमान ने कहा आंख बंद करके फिल्म के लिए हां कह दो. कट्रीना ने मुङो न्यूॉर्क में फिल्म शूटिंग के काफी बाद में यह बात बताई. मेरा आत्मविश्वास बढ़ गया इस बात से.मैं जब सलमान से मिला तो उन्होंने पूरी कहानी सुनी और कहा करूंगा काम.ऐसी कहानियां कही जानी चाहिए. उस दिन से लेकर अब तक उन्होंने फिल्म को पूरा सपोर्ट किया. हमने 110 दिनों के शेडयूल में काम पूरा कर लिया. जो लोग यह मानते हैं कि सलमान कैजुअल कलाकार हैं तो मैं गलतफहमी दूर करना चाहूंगा. सलमान को राजनीतिक व सामाजिक समझदारी है. वे सेंसेटिव हैं.अगर ऐसा न होता तो बिइंग rाुन जैसे संस्थान को इस तरह से सफल नहीं बना पाते वह. सलमान कहानी पर बिल्कुल हावी नहीं हुए हैं. उन्होंने टाइगर को कहानी के मुताबिक जिया है.
कट्रीना के बारे में
कट्रीना सबसे मेहनती अभिनेत्री हैं: कबीर
लोगों के जेहन में यह छवि बन गयी है कि कट्रीना केवल ग्लैमरस हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि कट्रीना जितनी मेहनती लड़की कोई नहीं है पूरी इंडस्ट्री में. अगर हम 20 घंटे शूट करना चाहते हैं तो वह 22 घंटे काम करने के लिए तैयार रहती है. जानकर शायद आश्चर्य होगा कि वे स्क्रिप्ट देवनागरी में ही पढ़ती हैं आप. उन्होंने हिंदी इस तरह सुधार ली है अपनी . मेहनत की बदौलत. हम लोग आज कल सॉफ्टवेयर की वजह से रोमन हिंदी में स्क्रिप्ट पढ़ते हैं. मैं कट्रीना को बेहतरीन अभिनेत्रियों में से एक मानता हूं.

कबीर पुराण
अपनी पहली ही फिल्म काबुल एक्सप्रेस से उन्होंने एक संवेदनशील मुद्दे को उठाया और उसे परदे पर बखूबी उतारा. दो जर्नलिस्ट फोटोग्राफर किस तरह अफगानिस्तान की जिंदगी से रूबरू होते हैं और किस कदर वे उन सच्चाईयों को कैमरे में कैद कर पाते हैं. यही थी काबुल एक्सप्रेस की कहानी. हिंदी फिल्मों में अफगानिस्तान जैसे संवेदनशील स्थान पर ऐसी फिल्म बनाना. वास्तविक लोकेशन के साथ किसी जोखिम से कम नहीं था. लेकिन शुरुआती दौर से ही डॉक्यूमेंट्री फिल्मों से जुड़ाव होने की वजह से उन्होंने मुख्यधारा से विपरीत जाकर अपने डॉक्यूमेंटेशन जिंदगी को फीचर का रूप दिया. वे पहली फिल्म से ही स्थापित हो चुके थे. उनकी अगली फिल्म न्यूयॉर्क में उन्होंने 9-11 मसले को उठाया और इसे खूबसूरती से दर्शाया. फिल्म के अंत में दिखाये गये रिसर्च उनकी विश्वसनीयता को दर्शाते हैं. फिर एक लंबे अंतराल के बाद वह एक था टाइगर लेकर आ रहे हैं. तीन साल में उन्होंने इस फिल्म के लिए सबसे अधिक वक्त रिसर्च में दिया. कबीर की शैली की यह खासियत है कि उनकी फिल्में दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है और केवल गीतों के लिए खूबसूरत लोकेशन का इस्तेमाल करनेवाले हिंदी निर्देशकों को दर्शाती है कि किसी अंतरराष्ट्रीय विषय को किस नजरिये से प्रस्तुत किया जा सकता है. एक था टाइगर भी इसी क्रम की अगली कड़ी है.

कैमरा कट अभिनय



बॉलीवुड में फिल्मी खानदान से आये नये चेहरों को सुपरस्टार बनते हमने लगातार देखा है. लेकिन बॉलीवुड में इन दिनों वैसे फिल्मी खानदान के चिराग भी हैं, जिन्होंने अभिनय से पहले निर्देशन से शुरुआत की है. बतौर अस्टिेंट उन्होंने निर्देशन की ट्रेंिनंग ली है और इसके बाद वे अभिनय में आये हैं. बॉलीवुड में ऐसे नये चेहरों की फेहरिस्त लंबी है. अनुप्रिया अनंत की रिपोर्ट

हिंदी फिल्मों में प्राय: अभिनय और निर्देशन का साथ रहा है. कई ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने फिल्में भी बनाई है और अभिनय भी किया है. कई ऐसे भी हैं जो अभिनय के बाद निर्देशन के क्षेत्र में आये. लेकिन इस क्रम में एक प्रचलन यह भी रहा है कि कई स्टार पुत्र पुत्रियों ने पहले निर्देशन से शुरुआत की और फिल्म अभिनय को चुना.
नील मुकेश
नील नीतिन मुकेश नीतिन मुकेश के बेटे हैं. नील ने अभिनय से पहले यशराज बैनर की कई फिल्मों में बतौर अस्टिेंट निर्देशक काम किया है और निर्देशन की बारीकियां सीखी है. फिर वह फिल्मों में आये. नीतिन ने शुरुआती दौर में बाल कलाकार के रूप में भी काम किया है.
रनबीर कपूर
इन दिनों चार्मिग ब्वॉय व सुपरस्टार रॉकस्टार बने रनबीर कपूर ने भी निर्देशन में ही खास पढ़ाई की है. वहअपने दादा राज कपूर की तरह ही भविष्य में निर्देशक बनने का सपना देखते हैं और उन्होंने इसमें बारीकी से काम भी किया है. विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद ही वे फिल्मों में अभिनय के लिए आये. उन्होंने संजय लीला भंसाली को फिल्म ब्लैक के दौरान बतौर अस्टिेंट निर्देशक अस्टिट किया है. इसके बाद वे पारंगत होकर अभिनय में आये.फिल्म सांवरिया में भी उन्होंने संजय को मदद की थी.
सोनम कपूर
सोनम कपूर ने भी अभिनय करने से पहले ब्लैक में संजय लीला भंसाली को बतौर अस्टिेंट निर्देशक अस्टिट किया. रनबीर कपूर के साथ ही. भविष्य में वह भी निर्देशन के क्षेत्र में आना चाहती हैं.
सिद्धार्थ मल्होत्र
सिद्धार्थ मल्होत्र फिल्मी खानदान से नहीं ैहं. लेकिन उन्होंने करन जाैहर को फिल्म माइ नेम इज खान के दौरान अस्टिट किया था. वही करन की नजर सिद्धार्थ पर गयी  और करन ने उन्हें अपनी अगली फिल्म के लिए साइन कर लिया. स्टूडेंट ऑफ द ईयर से सिद्धार्थ लांच हो रहे हैं.
वरुण धवन
वरुण धवन डेविड धवन के बेटे हैं. उन्होंने अपने पिता के साथ साथ करन जोहर को भी अस्टिट किया है. फिल्म माइ नेम इज खान के दौरान. इसी वक्त करन ने इन्हें भी अपनी फिल्म के लिए साइन कर लिया था.
ऋतिक रोशन
सुपरस्टार ऋतिक रोशन ने भी अभिनय से पहले पापा राकेश रोशन के साथ लगभग पांच सालों तक निर्देशन का काम किया है. उन्होंने फिल्म कोयला, करन अजरुन के वक्त अपने पिता को अस्टिट किया था. बाद में वे कहो न प्यार है से लांच हुए.


राजकपूर ने भी अपनी शुरुआत बतौर अस्टिेंट केदार शर्मा के साथ शुरू की थी. बाद में वे अभिनय में आये.
गुरुदत्त ने भी पहले निर्देशन फिर फिल्मों में अभिनय की शुरुआत की.

 संजय लीला भंसाली
निर्देशन से अभिनय में भी निखार आता है.
मेरा मानना है कि अगर एक अभिनेता निर्देशन की समझ रखता है तो उसका किरदार और निखरता है और वह एक निर्देशक की बात को बखूबी समझ पाता है,और उसे हूबहू उतार पाता है. मेरा मानना है कि बारीकी आती है निर्देशन की समझ होने से अभिनय में.

अन्ने घोड़े दा दान में पंजाब



फिल्मों में जब भी पंजाब का संदर्भ आता है. सरसो के लहलहाते खेत, पंजाबी भांगड़ा, शादी व्याह का माहौल और मौज मस्ती के दृश्य ही जेहन में आते हैं. चूंकि पंजाब को लेकर अब तक फिल्मकारों ने कुछ ऐसी ही छवि प्रस्तुत की है. खुद अजय देवगन सन ऑफ सरदार लेकर आ रहे हैं जिनमें एक संवाद भी है कि अगर सरदार न होते तो जोक्स नहीं होते दुनिया में.लेकिन अब तक जो पंजाब दर्शाया जाता रहा है. पंजाब की वास्तविकता बस उतनी ही नहीं है. हाल ही में एक फिल्म रिलीज हुई है अन्ने घोड़े दा दान. फिल्म का  निर्देशन गुरविंदर ने किया है. भारतीय स्वतंत्रता दिवस के मौके पर एक तरफ जहां एक था टाइगर जैसी एंटरटेनिंग फिल्म रिलीज हो रही है. वही दूसरी तरफ अन्ने घोड़े दा दान भी महत्वपूर्ण फिल्म में से एक है. यह फिल्म पंजाब की वास्तविकता, वहां के लोगों के दर्द को समझने के लिए जरूर देखा जाना चाहिए. हम स्वाधीनता दिवस का जश्न मना रहे हैं और हम यह भूल नहीं सकते कि भारत को स्वाधीनता दिलाने में पंजाब का व वहां के लोगों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. लेकिन आज भी यहां के लोग कई परेशानियों से जूझ रहे हैं. लेकिन भारत में सिनेमा के व्यवसायिकरण की वजह से यह विडंबना है कि यह फिल्म पंजाब में ही अब तक रिलीज नहीं हो पायी है. चूंकि इस फिल्म के कॉर्मिशियल वैल्यू बेहद कम हैं. लेकिन ऐसी फिल्मों को प्रोत्साहन मिलना ही चाहिए. तभी फिल्में बन पायेंगी. वैसे एनएफडीसी ने इस साल अपने बैनर तले कई ऐसी फिल्मों को प्रमोट किया है. इस फिल्म की एक खासियत यह भी है कि फिल्म में पंजाब के कलाकारों को व पंजाबी लोक गीत व वहां के स्थानीय लोगों को भी शामिल किया गया है. गुरविंदर की इस फिल्म को भारत में जहां भी रिलीज किया गया है. उन्हें सराहना मिल रही है.

फ़िल्मकार कलाकार तिग्मांशु

सैफ अली खान को लेकर तिग्मांशु धूलिया फिल्म बुलेट राजा का निर्देशन करने जा रहे हैं.फिल्म की कहानी उत्तर प्रदेश के एक माफिया पर आधारित है और यह अंडरवर्ल्ड के इर्द-गिर्द घूमती हुई होगी. तिग्मांशु रानी मुखर्जी को लेकर भी एक बायोपिक कहानी की परिकल्पना कर रहे हैं. हाल ही में तिग्मांशु ने गैंग्स ऑफ वासेपुर में रमाधीर सिंह के रूप में खलनायक की भूमिका निभायी. फिल्म पान सिंह तोमर भी उनका ही सृजन है और साहेब बीवी गैंगस्टर जैसी फिल्म भी उनकी ही फेहरिस्त में शामिल है. तिग्मांशु भी वर्तमान में उन्हीं निर्देशकों में से एक हैं जो लीक से हटकर काम कर रहे हैं और अपनी अगली हर पारी में वे बिल्कुल अपने पहले सृजन से हट कर रच रहे हैं. और हर रूप में वे कामयाब हैं. हिंदी सिनेमा जगत में ऐसे कल्पनाशील व सृजनशील व्यक्तियों की संख्या बहुत कम है जो कई विधाओं में माहिर हों. लेकिन तिग्मांशु उनमें से एक हैं. अगर उन्हें वाकई जैक ऑफ ऑल और मास्टर ऑफ ऑल की उपाधि दी जाये तो गलत न होगा.यह उल्लेखनीय है कि पान सिंह तोमर इस साल की एकमात्र ऐसी फिल्म है जिसके बारे में किसी ने भी नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी है. एक तरफ जहां तिग्मांशु पान सिंह जैसी बायोपिक फिल्म बनाते हैं. वही वे गैंग्स ऑफ वासेपुर में स्थापित कलाकार और मंङो कलाकार की तरह फिल्म में अपनी उपस्थिति दर्शाते हैं. एक कूटनीतज्ञ खलनायक के रूप में गैंग्स का किरदार हमेशा याद रखा जायेगा. उनकी फिल्मों के दृश्यों की खासियत है कि वे वास्तविकता के बिल्कुल करीब होते हुए भी डॉक्यूमेंट्री नहीं लगती.  स्पष्ट है कि आनेवाले समय में तिग्मांशु सबसे मजबूत, कल्पनाशील निर्देशक व लेखक के रूप में स्थापित हो जायेंगे और आनेवाले समय में लगभग सभी सुपरसितारा उनके साथ एक फिल्म जरूर करेंगे. चूंकि तिग्मांशु में कलाकारों को निखारने की भी खूबी है.

उधार की आवाज, आवाज ही पहचान




कई लोगों का मानना है कि फिल्म पत्रकारिता या फिल्म पर गंभीरता से या विषयपरक केवल मुंबई में रह कर ही लिखा जा सकता है. पुख्ता जानकारियां केवल मुंबई में रहनेवाले लोग ही दे सकते हैं. लेकिन वास्तविकता यह है कि ऐसे कई सिने प्रेमी भी हैं जो मुंबई मेन न रहते हुए भी मुंबई की मायानगरी पर विशेष जानकारी रखते हैं. कुछ ऐसी ही शख्सियत है जयपुर में रहनेवाले पवन झा की. पवन झा संगीत की न सिर्फ समझ रखते हैं, बल्कि उनके पास हिंदी सिनेमा के संगीत से जुड़ी दिलचस्प व अद्वितीय जानकारियों का भंडार है. उनका फेसबुक प्रोफाइल दरअसल, संगीत पर लिख रहे लोगों के लिए इनसाइक्लोपिडिया है. इसी क्रम में उन्होंने हाल ही में एक वीडियो अपलोड किया है. यह वीडियो कई मायनों से उल्लेखनीय है. इस वीडियो में पवन झा और उनके सहयोगियों ने कुछ ऐसे गायकों की फेहरिस्त शामिल की है. जिन्होंने गायक होते हुए भी कभी परदे पर दूसरे गायक की आवाज उधार ली हो. और उन गायकों को भी शामिल किया है, जो परदे पर नजर आये. जानकर आश्चर्य हो कि फिल्म भागमभाग, रागिनी व कई फिल्मों में किशोर कुमार को मोहम्मद रफी ने आवाज दी है. अमीरबाई कर्नाटकी ने सुधा मल्होत्र की आवाज ली है. मन्ना डे भी किशोर की आवाज बन चुके हैं.दूसरी तरफ फिल्म आह में मुकेश परदे पर नजर आये हैं तो रफी फिल्म जुगनू में परदे पर नजर आते हैं.तलत महमूद सोने की चिड़िया में. दरअसल, यह वीडियो केवल प्रोफाइल वीडियो नहीं है. बल्कि हिंदी सिने जगत की एक वास्तविकता को भी दर्शाता है और उस दौर की आत्मीयता को भी दर्शाता है कि उस दौर में लोग पटकथा के मुताबिक दूसरे गायकों की आवाज लेने में भी अपने इगो को बीच में नहीं लाते थे और पूरी तरह से सहयोग करते थे. शायद वर्तमान में ऐसे प्रयोग करना या सोचना संगीतकारों के लिए कठिन हो

सितारें भी हैं आम इंसान


अभी कुछ दिनों पहले राजेश खन्ना की अंतिम शवयात्र में विशेष कर उस वक्त भीड़ आपे से बाहर हो गयी, जब अमिताभ बच्चन अपने बेटे अभिषेक के साथ वहां पहुंचे. कई लोगों ने अमिताभ बच्चन को धक्के भी लगाये. इस बात से आक्रोशित होकर अमिताभ ने अपने ब्लॉग पर लिखा कि वे इस बात से बेहद दुखी होते हैं, जब कई बार लोग सेलिब्रिटिज को सिर्फ स्टार मानते हैं और माहौल को न समझते हुए सिर्फ स्टार्स को देखने के लिए आते हैं. उनकी इस तीखी बातों से अमिताभ बच्चन के प्रशंसक बेहद नाराज भी हुए. लेकिन हकीकत दरअसल, यह है कि कई बार हम यह भूल जाते हैं कि स्टार्स भी हैं तो आम आदमी ही न. हमारी तरह उन्हें दुख, खुशी होती होगी.कुछ सालों पहले गोविंदा की बेटी की तबियत बुरी तरह खराब थी. लेकिन हॉस्पिटल में मीडिया के लोग गोविंदा से सवाल किये जा रहे थे उन्हें कैसा लग रहा है? राजेश खन्ना की अंतिम शवयात्र में भी लोग बार बार सिर्फ बाबू मोशाय चिल्ला रहे थे. दरअसल, सितारों का प्रभाव मंडल हम पर इतना हावी रहता है कि जब वह सामने हो तो हम कुछ और समझ नहीं पाते.विविध भारती के सुप्रसिद्ध उदघोषक यूनूस खान ने एक दिन अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखा था कि रेडियो पर हर दिन बोलनेवाला व्यक्ति भी दुखी हो सकता है. इसलिए हमें हमेशा सर्वश्रेष्ठ की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. कुछ दिनों पहले ही अभिनेत्री कट्रीना से मुलाकात हुई. इंटरव्यू शुरू होने से पहले उन्होंने सैंडविच खाने की अनुमति मांगी. ऐसा लग रहा था कि वे कोई पाप कर रही हैं. वे ग्लानि महसूस कर रही थीं कि इंटरव्यू शुरू होने में विलंब हो रहा है. लेकिन उन्हें भूख भी लगी थी. आम व्यक्ति को भी भूख लगे तो उसे और कुछ नहीं सूझता.ऐसे में अगर स्टार्स भी कभी आम व्यक्ति की तरह बर्ताव करे तो उस बात का इस्.ू नहीं बनना चाहिए. चूंकि आखिर स्टार भी तो हैं आम इंसान ही

हास्य प्रधान फिल्म की अभिनेत्री




राजकुमार गुप्ता की फिल्म घनचक्कर की शूटिंग शुरू हो चुकी है.  इमरान हाशमी व विद्या बालन मुख्य किरदार में हैं. राजकुमार हजारीबाग से हैं और इससे पहले उन्होंने आमिर और नो वन किल्ड जेसिका जैसी सामाजिक विषयों व भावनाओं पर फिल्म बनाई है.लेकिन इस बार वह कॉमेडी फिल्म लेकर आ रहे हैं. विद्या बालन ने अब तक जितनी भी फिल्मों में काम किया है वह या तो महिला प्रधान फिल्में रही हैं या गंभीर फिल्में. ऐसे में विद्या के लिए यह पहली बार होगा जब वह पंजाबी हाउसवाइफ के रूप में दर्शकों को हंसायेंगी. राजकुमार  ने अब तक लोगों को आमिर व नो वन से चौंकाया है. इस बार वे अपनी विधा बदल रहे हैं और एक अलग जोनर की फिल्म बना रहे हैं. विद्या को लेकर हास्य फिल्म बनाने की उनकी परिकल्पना वाकई दिलचस्प है. दरअसल, हिंदी फिल्मों के दर्शकों व मेकर्स के साथ वर्तमान में एक परेशानी रही है वह अभिनेत्रियों को ध्यान में रख कर अलग जॉनर की फिल्में सोच ही नहीं पाते. और साथ ही अभिनेत्रियां भी हास्य भूमिका करने से कतराती हैं. जबकि गुजरे जमाने की याद करें तो मधुबाला, नूतन जैसी अभिनेत्रियों ने भी दर्शकों को खूब हंसाया है. याद करें सीता-गीता की हेमा मालिनी को या फिर  जया भादुड़ी और शर्मिला टैगोर के चुपके चुपके को. किस तरह इनकी अदाकारी पर दर्शकों ने खूब आनंद उठाया था. सीता और गीता से ही प्रेरित वर्षो बाद जब चालबाज आयी तो श्रीदेवी ने अपनी दोहरी भूमिका से भी फिल्म में क्या ताजगी ला दी थी. माधुरी दीक्षित ने भी बाद के दौर में अपनी फिल्मों में हास्य का साथ नहीं छोड़ा. कट्रीना की अजब प्रेम में भी कट्रीना ने बेहतरीन हास्य भूमिका की है. लेकिन वर्तमान में दर्शक अभिनेत्रियों को हास्य प्रधान फिल्मों में देखना खास पसंद नहीं करते.जबकि हास्य विधा भी अभिनय को नया निखार देती हैं.