निर्देशक शाद अली ने इंडियन नेशनल आर्मी की कैप्टन लक्ष्मी सेहगल पर फीचर फिल्म बनाने की योजना बनाई है. विगत 23 जुलाई को कैप्टन लक्ष्मी का देहांत हुआ था. शाद अली ने इससे पहले झूम बराबर झूम बनाई थी जो बुरी तरह पिट गयी थी. इसके बाद शाद इंडस्ट्री से बिल्कुल गायब से हो गये थे. लेकिन इस बीच उन्होंने अपनी नानी लक्ष्मी सेहगल पर बेहतरीन कहानी लिखी और शोध किया. वे वर्ष 1994 से इस शोध में जुड़े हुए थे. उन्होंने बकायदा कैप्टन लक्ष्मी पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बना रखी है. अपने शोध में उन्होंने कैप्टन से जुड़े लोग, तथ्य, दस्तावेज, तसवीरों व कई चीजों को खोज निकाला है. शाद अली की यह सोच सराहनीय है. दो लिहाज से. एक तो उन्होंने परिवार के एक अहम सदस्य पर डॉक्यूमेंटेशन की बात सोची. इस लिहाज से. दूसरी यह कि हिंदी सिनेमा को वर्तमान में सख्त जरूरत है कि वे ऐसे लीजेंडरी लोगों व स्वतंत्रता सेनानियों पर फिल्मों का निर्माण करें. ताकि आनेवाली पीढ़ी इन्हें जान पाये. लक्ष्मी सेहगल का योगदान हम भूल नहीं सकते. लेकिन उनके बारे में लोगों ने तब जाना जब उनका देहांत हुआ. यह हमारे लिए अफसोस की बात है. ऐसे में अगर फिल्में बनती हैं तो निश्चित तौर पर हम उस व्यक्तित्व के कई पहलुओं से रूबरू हो पायें और यह बेहद जरूरी भी है. कुछ सालों पहले तरुण गांधी की मदद से अमित राय ने फिल्म रोड टू संगम बनाई थी. जिसमें गांधीवादी विचारधारा को लेकर खूबसूरत कहानी कही गयी थी.यह शोधपरक इसलिए बन पाया क्योंकि तरुण गांधी ने इसमें सहयोग किया. तरुण गांधी परिवार से थे. दरअसल, अगर किसी व्यक्तित्व के परिवार के लोग या करीबी लोग फिल्में बनाने में सहयोग करें तो फिल्म तर्कसंगत और तथ्यपूर्ण बन पाती है. सो, यह जरूरी है कि ऐसी फिल्में बनें और परिवार के सदस्यों से मदद मिले.
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20120816
कैप्टन लक्ष्मी की याद में
निर्देशक शाद अली ने इंडियन नेशनल आर्मी की कैप्टन लक्ष्मी सेहगल पर फीचर फिल्म बनाने की योजना बनाई है. विगत 23 जुलाई को कैप्टन लक्ष्मी का देहांत हुआ था. शाद अली ने इससे पहले झूम बराबर झूम बनाई थी जो बुरी तरह पिट गयी थी. इसके बाद शाद इंडस्ट्री से बिल्कुल गायब से हो गये थे. लेकिन इस बीच उन्होंने अपनी नानी लक्ष्मी सेहगल पर बेहतरीन कहानी लिखी और शोध किया. वे वर्ष 1994 से इस शोध में जुड़े हुए थे. उन्होंने बकायदा कैप्टन लक्ष्मी पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बना रखी है. अपने शोध में उन्होंने कैप्टन से जुड़े लोग, तथ्य, दस्तावेज, तसवीरों व कई चीजों को खोज निकाला है. शाद अली की यह सोच सराहनीय है. दो लिहाज से. एक तो उन्होंने परिवार के एक अहम सदस्य पर डॉक्यूमेंटेशन की बात सोची. इस लिहाज से. दूसरी यह कि हिंदी सिनेमा को वर्तमान में सख्त जरूरत है कि वे ऐसे लीजेंडरी लोगों व स्वतंत्रता सेनानियों पर फिल्मों का निर्माण करें. ताकि आनेवाली पीढ़ी इन्हें जान पाये. लक्ष्मी सेहगल का योगदान हम भूल नहीं सकते. लेकिन उनके बारे में लोगों ने तब जाना जब उनका देहांत हुआ. यह हमारे लिए अफसोस की बात है. ऐसे में अगर फिल्में बनती हैं तो निश्चित तौर पर हम उस व्यक्तित्व के कई पहलुओं से रूबरू हो पायें और यह बेहद जरूरी भी है. कुछ सालों पहले तरुण गांधी की मदद से अमित राय ने फिल्म रोड टू संगम बनाई थी. जिसमें गांधीवादी विचारधारा को लेकर खूबसूरत कहानी कही गयी थी.यह शोधपरक इसलिए बन पाया क्योंकि तरुण गांधी ने इसमें सहयोग किया. तरुण गांधी परिवार से थे. दरअसल, अगर किसी व्यक्तित्व के परिवार के लोग या करीबी लोग फिल्में बनाने में सहयोग करें तो फिल्म तर्कसंगत और तथ्यपूर्ण बन पाती है. सो, यह जरूरी है कि ऐसी फिल्में बनें और परिवार के सदस्यों से मदद मिले.
20120807
छोटे परदे पर शंखनाद
आमिर खान ने कुछ महीनों पहले टेलीविजन पर ‘सत्यमेव जयते’ के माध्यम से नया अध्याय शुरू किया था. इसमें उन्होंने सामाजिक विषयों को उठाया और दर्शकों की भावनाओं को झकझोरा. खास बात यह रही कि इस पर बहस हुई. बहस होने का सीधा मतलब है कि शो कामयाब रहा. दरअसल, आमिर ने स्टार प्लस के साथ मिल कर टीवी पर एक बेहतरीन शंखनाद किया. एंटरटेनमेंट, कॉमेडी शो, रियलिटी शो जैसे तमाम एंटरटेनमेंट से हट कर ‘सत्यमेव जयते’ जैसा वैचारिक कार्यक्रम बना. खुशी की बात यह है कि 13 एपिसोड की समाप्ति के बाद भी यह सिलसिला ‘लाखों में एक’ नामक शो से जारी है. स्टार प्लस रविवार यानी फन डे का इस्तेमाल वाकई बेहतरीन तरीके से कर रहा है. सिद्धार्थ बसु के सोच से निकला एक और सार्थक परिणाम नजर आ रहा है ‘लाखों में एक’. सच्ची घटनाओं के नाम पर केवल अब तक टीवी पर क्राइम की चीजें दिखायी जा रही थीं. ऐसे में प्रेरणाशील व प्रगतिशील शो के रूप में ‘लाखों में एक’ दर्शकों के सामने आया है. इस शो की एक खासियत यह भी है कि इसे निर्देशित करनेवाले निर्देशक फिल्मों के निर्देशक हैं. ‘सत्यमेव जयते’ के निर्देशक सत्यजीत भटकल भी फिल्मों के निर्देशक हैं. राहुल ढोलकिया पहले एपिसोड को निर्देशित कर चुके हैं. इनके अलावा मनीष झा जैसे कई विषयपरक निर्देशक टीवी की तरफ रुख कर रहे हैं. स्पष्ट है कि टीवी की तसवीर बदलनेवाली है. ‘लाखों में एक’ का पहला एपिसोड रांची के लिए खास रहा, क्योंकि कहानी रांची पर ही आधारित थी. कहानी गढ.नेवाले नीरज शुक्ला भी वहीं से संबंध रखते हैं. इस लिहाज से भी शो की कामयाबी है कि कम से कम इन धारावाहिकों के ही बहाने पूरा भारत छोटे छोटे शहरों से भी रू-ब-रू हो रहा है. वाकई टीवी धीरे-धीरे लाखों में एक कार्यक्रम ला रहा है.
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20120806
सितारें जमीं पर
मुंबई के ब्रांदा स्थित बैंड स्टैंड पर कुछ महीनों पहले ही हिंदी सिनेमा के कुछ शख्सियत के हाथों के छाप व जो गुजर चुके हैं वैसे लीजेंड के हस्ताक्षर को जमीन पर स्थापित किया गया है. साथ ही राज कपूर साहब व शम्मी कपूर के स्टैचू को भी स्थापित किया गया है. यूटीवी स्टार्स की तरफ से भले ही यह हिंदी सिनेमा की शख्सियतों के सम्मान में एक पहल हो. लेकिन वास्तविकता यह है कि उन्हें वह सम्मान मिल नहीं पा रहा. चूंकि हाथों के छाप के जो पत्थर से बने टाइल्स जमीन पर स्थापित किये गये हैं. उन्हें किसी भी तरह से घेरा नहीं गया है. बैंड स्टैंड आनेवाले सभी लोग बेपरवाह उन लीजेंड के हस्ताक्षरों पर पैर रख कर चलते बनते हैं. उन्हें इस बात का एहसास नहीं कि दरअसल, वह इनका अनादर कर रहे हैं. दरअसल, हकीकत यही है कि भारत में आज भी सिनेमा सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन का माध्यम है. और इससे जुड़ी तमाम चीजों को सम्मान के साथ सहेजने के प्रति न तो गंभीरता है और न ही कद्र. फिल्मों के सितारें लंद फंद देवानंद, बोल बच्चन अमिताभ बच्चन जैसे मजाकिया जुमले तक ही सीमित रह गये हैं. गॉसिप, सुपरसितारों के साथ फोटोग्राफ्स खिंचवाना जानने में ही हमारी रुचि है. सच्चाई यह है कि हम कलाकार को नहीं उसके ग्लैमर को सम्मान देते हैं. क्या हम कभी भारत के राष्ट्रपति के हस्ताक्षरों को यूं जमीन पर अपमान होने के लिए छोड़ेंगे या किसी राजनीति से जुड़े लोगों को. उनकी तो बड़ी विशालकाय मूर्तियां बनती हैं. लेकिन हमारी कोशिश नहीं होती कि हम सिनेमा के धरोहरों को सम्मान दें. राजेश खन्ना की इच्छा थी कि उनका घर आशीर्वाद संग्रहालय बने. यह पहल तो सरकार को करनी चाहिए थी और आनेवाले समय में करना ही चाहिए. हाल में शम्मी कपूर व कई शख्सियतों से जुड़ी चीजों की निलामी हुई है. जबकि उसे संग्रहालय में रखना चाहिए था.
20120802
माता-पिता भी बंधू सखा भी
Orginally published in Prabhat Khabar 2aug2012
ग्लैमर की दुनिया में अक्सर कामयाबी का रास्ता तय करते हुए लोग अपनों को छोड़ते चले जाते हैं. सपनों को अपना बनाते बनाते कब अपने सपनों व कल्पनाओं में खो जाते हैं. हमें इस बात का अनुमान भी नहीं लगा पाते. लेकिन इस भीड़ में भी कुछ ऐसे चेहरे हैं जो अपने परिवार से. विशेष कर अपने माता पिता से बेहद प्यार करते हैं. उनका सम्मान करते हैं. न केवल सम्मान करते हैं. बल्कि वे अपने माता पिता के पूरे व्यवहार से प्रभावित हैं. और वे बिना किसी शर्म के अपने बुजुर्गो से कदमताल करते चल रहे हैं, जिन्होंने उन्हें उस कदम को बढ़ाना सिखाया. इन शख्सियत की जिंदगी में माता पिता की जगह इतनी अहम है कि वे अपने काम में भी किसी न किसी रूप में उन्हें शामिल करते हैं. अपने माता पिता से प्रभावित कुछ ऐसे ही शख्सियतों के बारे में बता रही हैं अनुप्रिया अनंत
हाल ही में सत्यमेव जयते में आमिर खान ने ओल्ड एज होम के मुद्दे को लेकर, मसलन बुजुर्गो से हमारे व्यवहार के मुद्दे को उठाया था. जिसमें 79 वर्ष के एक दंपत्ति की शादी को दिखाया गया है. एक बेहतरीन उदाहरण के तौर पर. तो दूसरी तरफ ऐसे लोगों को भी दर्शाया गया जो अपने माता पिता को एक उम्र के बाद अपने साथ नहीं रखना चाहते. विशेष कर ग्लैमर की दुनिया में सफलता मिलने के बाद बनावटी पन का कुछ इस कदर मुखौटा पहनना पड़ता है कि इसमें सबसे पहले कामयाब व्यक्ति अपने परिवार के बुजुर्गो का ही साथ छोड़ देता है. लेकिन इस मुखौटे में कुछ असली चेहरे ऐसे हैं जो अपनों के साथ चलने में विश्वास रखते हैं
प्रसून जोशी : पिता का विश्वास
प्रसून जोशी से हाल ही में एक बातचीत के दौरान बताया कि वे शुरुआती दौर से ही कई चीजें लिखते थे. ेलेकिन उन्होंने क्रियेटिवीटी को कभी आय का स्रोत बनाने के बारे में नहीं सोचा.यह उनके पिताजी हैं जिन्होंने उन्हें विश्वास जगाया कि वे इसे ही अपना क्षेत्र चुनें. लेकिन इसे ऐसा माध्यम बनायें कि इससे उन्हें आय का भी जरिया मिले. उस दिन के बाद से ही प्रसून जोशी ने इस तरह सोचना शुरू किया. तब के प्रसून और आज के प्रसून जोशी से सभी वाकिफ हैं. प्रसून मशहूर गीतकार हैं और उन्होंने कई विज्ञापनों के लिए लेखन किया है.
राजेश मापुस्कर : पिताजी हैं असली फरारी
राजेश मापुस्कर ने फिल्म फरारी की सवारी का निर्देशन किया है. यह उनकी पहली फिल्म है. फिल्म पिता और बेटे पर आधारित है.राजेश स्वीकारते हैं कि उन्हें समृद्ध बचपन मिला तो सिर्फ पिताजी की बदौलत.चूंकि राजेश का बचपन गांव में बीता.वे समृद्ध हो पाये. उनके पिताजी का व्यवहार बेहद कुशल था. वे बताते हैं कि किस तरह वह जब कार के शोरूम में गये थे. तो वे अपने जूते उतार कर बैठे थे. पूछने पर उन्होंने कहा था कि जब तक वह अपनी नहीं हो जाती. दूसरों की है न.तो उसे गंदा नहीं कर सकता. राजेश बताते हैं कि उनके पिताजी 5 स्टार होटल में भी नहीं बदलते.जैसे हैं.वैसा ही व्यवहार करते हैं. उनके पिताजी की वजह से उनमें ऐसे विचार आये हैं. वे बेहद हंसमुख बनें अपने पिताजी की वजह से ही. फिल्म की स्क्रीनिंग पर राजेश ने अपने पिताजी के साथ साथ अपने गांव के नजदीकी दोस्तों को भी बुलाया था.
संजय लीला भंसाली-बेला : मां के दो अनमोल रत् न
निर्देशक संजय लीला भंसाली अपनी मां का नाम अपने साथ जोड़ते हैं. वे अपनी मां से बेहद करीबी हैं. अपनी फिल्मों से जुड़ी हर बातें , पुरस्कार समारोह में हर जगह वे अपनी मां के साथ नजर आते हैंै. उनकी बहल बेला सहगल भी मां से बेहद करीबी हैं. दोनों भाई बहन मां के बिना कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं करते.
नीलेश मिश्र : माता-पिता से गांव कनेक् शन
गीतकार व लेखक नीलेश मिश्र बॉलीवुड के कई बेहतरीन गीत लिख चुके हैं और आगामी फिल्म एक था टाइगर लेखन भी इन्होंने किया है. ग्लैमर की दुनिया में सक्रिय रहते हुए भी नीलेश अपने गांव से जुड़े हैं और अपने माता पिता से भी. इन्होंने गांव कनेक् शन नामक एक अखबार की शुरुआत की है.नीलेश ने इस अखबार की पहली कॉपी अपनी माताजी से पढ़वायी. नीलेश बताते हैं कि यह उनके पिताजी शिव बालक मिश्र का सपना था कि वह अपने गांव के लिए कुछ करें. उय़के पिताजी कनाडा से अपनी नौकरी छोड़ कर सिर्फ अपने गांव के लिए आये और नीलेश ने अपने पिताजी से प्रभावित होकर ही यह शुरुआत की.
पूर्णेंदु शेखर : पिताजी ही हैं वधू के स्तंभ
पूर्णेंदु शेखर बालिका वधू के जनक हैं. हाल ही में जब बालिका वधू ने 1000 एपिसोड पूरे किये. पूर्णेंदु ने अपने पिताजी जो कि जयपुर में रहते हैं उन्हें सम्मानित किया. खास बात यह है कि पूर्णेंदु अपने लेखन में अपने पिताजी की पूरी सलाह लेते हैं. बालिका वधू के अंत में दिये गये सारे कोटेशन उनके पिताजी श्रीमाली द्वारा ही लिखे जाते हैं. पूर्णेंदु तहे दिल से स्वीकारते हैं कि उनके पिताजी की सोच व परवरिश की वजह ही उनके शरीर में एक लेखक का जन्म हुआ
मेरे क्रिटिक थे पापा :अनुराग बसु
निर्देशक अनुराग बसु दरअसल अपना पूरा नाम अनुराग एस बसु लिखते हैं. उन्होंने एस अपने पिताजी के नाम से लिया है. बकौल अनुराग मेरे पिताजी बेस्ट क्रिटिक थे. वे हमेशा मुङो मेरी कमियों के बारे में बताते थे और खूबियों के बारे में भी. भिलाई में रहते हुए बचपन बीता और पिताजी से मैंने कई चीजें देखीं. उनका ही असर है कि आज मैं जिंदगी में कई बारीक चीजों को भी देख पाता हूं.
महानायक अमिताभ भी अपने पिताजी हरिवंशराय बच्चन से इस कदर प्रभावित रहे कि आज भी वे उनकी कविताओं को दोहराते रहते हैं. जब भी उन्हें मौका मिलता है. वे उनकी रचनाओं का पाठ करते हैं और कहीं भी रहें पिताजी की रचनाएं साथ में रखते हैं.
ग्लैमर की दुनिया में अक्सर कामयाबी का रास्ता तय करते हुए लोग अपनों को छोड़ते चले जाते हैं. सपनों को अपना बनाते बनाते कब अपने सपनों व कल्पनाओं में खो जाते हैं. हमें इस बात का अनुमान भी नहीं लगा पाते. लेकिन इस भीड़ में भी कुछ ऐसे चेहरे हैं जो अपने परिवार से. विशेष कर अपने माता पिता से बेहद प्यार करते हैं. उनका सम्मान करते हैं. न केवल सम्मान करते हैं. बल्कि वे अपने माता पिता के पूरे व्यवहार से प्रभावित हैं. और वे बिना किसी शर्म के अपने बुजुर्गो से कदमताल करते चल रहे हैं, जिन्होंने उन्हें उस कदम को बढ़ाना सिखाया. इन शख्सियत की जिंदगी में माता पिता की जगह इतनी अहम है कि वे अपने काम में भी किसी न किसी रूप में उन्हें शामिल करते हैं. अपने माता पिता से प्रभावित कुछ ऐसे ही शख्सियतों के बारे में बता रही हैं अनुप्रिया अनंत
हाल ही में सत्यमेव जयते में आमिर खान ने ओल्ड एज होम के मुद्दे को लेकर, मसलन बुजुर्गो से हमारे व्यवहार के मुद्दे को उठाया था. जिसमें 79 वर्ष के एक दंपत्ति की शादी को दिखाया गया है. एक बेहतरीन उदाहरण के तौर पर. तो दूसरी तरफ ऐसे लोगों को भी दर्शाया गया जो अपने माता पिता को एक उम्र के बाद अपने साथ नहीं रखना चाहते. विशेष कर ग्लैमर की दुनिया में सफलता मिलने के बाद बनावटी पन का कुछ इस कदर मुखौटा पहनना पड़ता है कि इसमें सबसे पहले कामयाब व्यक्ति अपने परिवार के बुजुर्गो का ही साथ छोड़ देता है. लेकिन इस मुखौटे में कुछ असली चेहरे ऐसे हैं जो अपनों के साथ चलने में विश्वास रखते हैं
प्रसून जोशी : पिता का विश्वास
प्रसून जोशी से हाल ही में एक बातचीत के दौरान बताया कि वे शुरुआती दौर से ही कई चीजें लिखते थे. ेलेकिन उन्होंने क्रियेटिवीटी को कभी आय का स्रोत बनाने के बारे में नहीं सोचा.यह उनके पिताजी हैं जिन्होंने उन्हें विश्वास जगाया कि वे इसे ही अपना क्षेत्र चुनें. लेकिन इसे ऐसा माध्यम बनायें कि इससे उन्हें आय का भी जरिया मिले. उस दिन के बाद से ही प्रसून जोशी ने इस तरह सोचना शुरू किया. तब के प्रसून और आज के प्रसून जोशी से सभी वाकिफ हैं. प्रसून मशहूर गीतकार हैं और उन्होंने कई विज्ञापनों के लिए लेखन किया है.
राजेश मापुस्कर : पिताजी हैं असली फरारी
राजेश मापुस्कर ने फिल्म फरारी की सवारी का निर्देशन किया है. यह उनकी पहली फिल्म है. फिल्म पिता और बेटे पर आधारित है.राजेश स्वीकारते हैं कि उन्हें समृद्ध बचपन मिला तो सिर्फ पिताजी की बदौलत.चूंकि राजेश का बचपन गांव में बीता.वे समृद्ध हो पाये. उनके पिताजी का व्यवहार बेहद कुशल था. वे बताते हैं कि किस तरह वह जब कार के शोरूम में गये थे. तो वे अपने जूते उतार कर बैठे थे. पूछने पर उन्होंने कहा था कि जब तक वह अपनी नहीं हो जाती. दूसरों की है न.तो उसे गंदा नहीं कर सकता. राजेश बताते हैं कि उनके पिताजी 5 स्टार होटल में भी नहीं बदलते.जैसे हैं.वैसा ही व्यवहार करते हैं. उनके पिताजी की वजह से उनमें ऐसे विचार आये हैं. वे बेहद हंसमुख बनें अपने पिताजी की वजह से ही. फिल्म की स्क्रीनिंग पर राजेश ने अपने पिताजी के साथ साथ अपने गांव के नजदीकी दोस्तों को भी बुलाया था.
संजय लीला भंसाली-बेला : मां के दो अनमोल रत् न
निर्देशक संजय लीला भंसाली अपनी मां का नाम अपने साथ जोड़ते हैं. वे अपनी मां से बेहद करीबी हैं. अपनी फिल्मों से जुड़ी हर बातें , पुरस्कार समारोह में हर जगह वे अपनी मां के साथ नजर आते हैंै. उनकी बहल बेला सहगल भी मां से बेहद करीबी हैं. दोनों भाई बहन मां के बिना कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं करते.
नीलेश मिश्र : माता-पिता से गांव कनेक् शन
गीतकार व लेखक नीलेश मिश्र बॉलीवुड के कई बेहतरीन गीत लिख चुके हैं और आगामी फिल्म एक था टाइगर लेखन भी इन्होंने किया है. ग्लैमर की दुनिया में सक्रिय रहते हुए भी नीलेश अपने गांव से जुड़े हैं और अपने माता पिता से भी. इन्होंने गांव कनेक् शन नामक एक अखबार की शुरुआत की है.नीलेश ने इस अखबार की पहली कॉपी अपनी माताजी से पढ़वायी. नीलेश बताते हैं कि यह उनके पिताजी शिव बालक मिश्र का सपना था कि वह अपने गांव के लिए कुछ करें. उय़के पिताजी कनाडा से अपनी नौकरी छोड़ कर सिर्फ अपने गांव के लिए आये और नीलेश ने अपने पिताजी से प्रभावित होकर ही यह शुरुआत की.
पूर्णेंदु शेखर : पिताजी ही हैं वधू के स्तंभ
पूर्णेंदु शेखर बालिका वधू के जनक हैं. हाल ही में जब बालिका वधू ने 1000 एपिसोड पूरे किये. पूर्णेंदु ने अपने पिताजी जो कि जयपुर में रहते हैं उन्हें सम्मानित किया. खास बात यह है कि पूर्णेंदु अपने लेखन में अपने पिताजी की पूरी सलाह लेते हैं. बालिका वधू के अंत में दिये गये सारे कोटेशन उनके पिताजी श्रीमाली द्वारा ही लिखे जाते हैं. पूर्णेंदु तहे दिल से स्वीकारते हैं कि उनके पिताजी की सोच व परवरिश की वजह ही उनके शरीर में एक लेखक का जन्म हुआ
मेरे क्रिटिक थे पापा :अनुराग बसु
निर्देशक अनुराग बसु दरअसल अपना पूरा नाम अनुराग एस बसु लिखते हैं. उन्होंने एस अपने पिताजी के नाम से लिया है. बकौल अनुराग मेरे पिताजी बेस्ट क्रिटिक थे. वे हमेशा मुङो मेरी कमियों के बारे में बताते थे और खूबियों के बारे में भी. भिलाई में रहते हुए बचपन बीता और पिताजी से मैंने कई चीजें देखीं. उनका ही असर है कि आज मैं जिंदगी में कई बारीक चीजों को भी देख पाता हूं.
महानायक अमिताभ भी अपने पिताजी हरिवंशराय बच्चन से इस कदर प्रभावित रहे कि आज भी वे उनकी कविताओं को दोहराते रहते हैं. जब भी उन्हें मौका मिलता है. वे उनकी रचनाओं का पाठ करते हैं और कहीं भी रहें पिताजी की रचनाएं साथ में रखते हैं.
बॉक्स ऑफिस के प्रोफेशनल-पर्सनल रिश्ते
दीवाली का अवसर प्राय: हिंदी फिल्मों के बॉक्स ऑफिस के लिए खास रहा है. चूंकि कई फिल्मी खानदानों ने इस अवसर पर अपने होम प्रोडक् शन की बहुप्रतिक्षित फिल्मों की रिलीज की परंपरा बना रखी है. यशराज प्रोडक् शन और राजश्री प्रोडक् शन वर्षो से इसी परंपरा के अनुसार फिल्में रिलीज करते आ रहे हैं. दिलवाले दुल्हनिया..हम आपके हैं कौन.., मोहब्बते जैसी कई ब्लॉकबस्टर फिल्में दीवाली पर ही रिलीज होती रही हैं. इस वर्ष भी यश चोपड़ा निर्देशित फिल्म जिसमें शाहरुख व कट्रीना प्रमुख भूमिकाओं में हैं इसी वर्ष रिलीज होगी. लेकिन इस वर्ष उन्हें टक्कर देने के लिए अजय देवगन की फिल्म सन ऑफ सरदार भी इसी मौके पर रिलीज हो रही है. फिलवक्त दोनों ही निर्माता चाहते हैं कि उन्हें देशभर में अधिक से अधिक सिनेमाघर मिले. और दोनों में खींचातानी जारी है. माना जा रहा था कि अजय देवगन अपनी फिल्म की तारीख में आगे पीछे करेंगे. लेकिन वह हरगिज तैयार नहीं हैं. दरअसल, वर्तमान में बॉलीवुड में स्टार की हैसियत व उनकी शक्ति का अनुमान पूरी तरह बॉक्स ऑफिस पर ही निर्भर हो चुका है. जिस नायक की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बेहतरीन कमाई कर रही है. आज वही स्टार है. ऐसे में कोई भी किसी से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं. जबकि कई बार अपने दोस्तों की फिल्मों को ध्यान में रखते हुए कलाकार रिलीज की तारीख आगे पीछे करते हैं. सलमान, अजय, संजय ने कई बार ऐसा किया है. खुद श्रीदेवी भी चाहती थीं कि उनकी फिल्म इंग्लिश विंग्लिश की तारीख आगे बढ़ जाये. चूंकि करीना उनकी करीबी रही हैं. जबकि करीना से जब पूछा गया तो उन्होंने बहुत प्रोफेशनली जवाब दिया कि वह चाहती है कि दोनों फिल्में चले. लेकिन हीरोइन ज्यादा चले. स्पष्ट है कि अब बॉक्स ऑफिस पर पर्सनल रिश्ते नहीं प्रोफेशनल रिश्तें हावी होने लगे हैं.
सरनेम के आर पार
महेश भट्ट और सोनी राजदान की बेटी आलिया भट्ट करन जोहर की बहुचर्चित फिल्म स्टूडेंट ऑफ दे ईयर से लांच हो रही हैं. करन जोहर का ध्यान आलिया पर उनके लेखक निरंजन अयैनगर की वजह से गया.आलिया जब पहली बार करन के ऑफिस में आयीं तो वह स्कूल फॉर्म में आयी थीं. ऑडिशन के दौरान. लेकिन करन को पहले लुक में भी वह नहीं भायीं. करन ने बकायदा इस किरदार के लिए 500 से अधिक लड़कियों का ऑडिशन किया था.लेकिन बाद में रफ कट देखने के बाद उन्होंने आलिया का चयन किया. ऐसी आश्चर्यजनक बातें सिर्फ इसी इंडस्ट्री में हो सकती है. जिस महेश भट्ट कैंप द्वारा दर्जनों नयी अभिनेत्रियों को मौके दिये जा रहे हैं. उनकी ही बेटी आलिया 500 आम लोगों के साथ भीड़ में किसी दूसरे प्रोडक् शन हाउस में ऑडिशन दे रही हैं. बोनी कपूर के बेटे अजरून कपूर को भी आसानी से ब्रेक नहीं मिला. उन्होंने भी यशराज बैनर के कई चक्कर काटे और कई ऑडिशन दिये. जबकि बोनी कपूर एक जमाने में सुप्रसिद्ध निर्माता रह चुके हैं. करिश्मा कपूर ने कुछ अरसे पहले दिये एक इंटरव्यू में इस बात का जिक्र किया है कि लोगों को लगता है कि हम कपूर खानदान से हैं तो हमें आसानी से कुछ भी िमल जायेगा. लेकिन हकीकत यह है कि पहली शुरुआत के लिए हर किसी को तैयारी करनी ही पड़ती है. करिश्मा भी अपने प्रोडक् शन आरके स्टूडियो से लांच नहीं हुई थीं. हालांकि कई स्टार पुत्र-पुत्रियां अपने होम प्रोडक् शन से भी लांच होते रहे हैं.ऋतिक रोशन पापा राकेश की ही खोज हैं. लेकिन ऐसे भी कई बेटे बेटियां हैं, जो अपनी राह खुद तय कर रहे हैं. जो सिर्फ सरनेम की वजह से तो इस बात से बदनाम हैं कि उन्हें काम अपनी काबिलियत पर नहीं मिलती. लेकिन हकीकत में गौर करें तो उन्हें भी आमलोगों की तरह ही पापड़ बेलने पड़ते हैं
छोड़ जायेंगे ये जहां तन्हा
सुप्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी का जन्मदिवस 1 अगस्त को मनाया गया. हिंदी सिनेमा में ऐसी अभिनेत्रियों की संख्या कम हैं. जिन्हें उनके चले जाने के बाद भी लोग शिद्दत से याद करते हैं. कायदे से मीना कुमारी पर 1 अगस्त को उनके जन्मदिन के अवसर पर लिखा जाना चाहिए था. लेकिन मैंने आज का दिन इसलिए चुना, क्योंकि मैं मीना कुमारी की वर्तमान में उनके जन्मदिन और उनकी प्रासंगिकता को देख कर इस पर विचार व्यक्त करना चाहती थी. और उम्मीद के अनुसार मुङो मीना कुमारी की प्रासंगिकता और आज भी बरकरार उनकी लोकप्रियता का प्रमाण मिला. मुंबई के सांताक्रूज स्टेशन से बिल्कुल नजदीक में मीना कुमारी के प्रशंसकों ने मीना कुमारी का शानदार तरीके से जन्मदिन मनाया. इस मौके पर मीना कुमारी द्वारा लिखे गये गजल को सुनाया गया. विशेष कर चांद तन्हा है आसमां तन्हा गजल को श्रोताओं ने बेहद पसंद किया. दरअसल, इस गजल में मीना कुमारी की पूरी जिंदगी का हाले बयां सुनाई देता है. एक एक शब्द उनकी जिंदगी की परतें खोलते हैं. हर पंक्ति में उन्होंने तन्हा तन्हा शब्द का इस्तेमाल किया है.ठीक अपनी जिंदगी की तरह. यह सच है कि मीना कुमारी ने कम जिंदगी जी और वाकई सिमटा सिमटा सा उनका मुकाम भी रहा. लेकिन मीना ने अपनी जिंदगी में कई लोगों की मदद की. इनमें अभिनेत्री नरगिस भी हैं. नरगिस जब शूटिंग पर जाती थीं तो वे अपने बच्चों को मीना की देख रेख में ही छोड़ जाती थीं. वहीदा बताती हैं कि किस तरह मीना ने उन्हें अभिनय में गाइड किया. बलराज साहनी ने अपनी आत्मकथा में जिक्र किया है कि एकमात्र मीना कुमारी ही अभिनेत्री थीं, उस दौर में जिन्होंने बलराज से आकर उनके कान में कहा था कि वे बेहतरीन अभिनेता बन सकते हैं. दरअसल, मीना इस दुनिया में दूसरों को खुशियां देने आयी थी. और इस दुनिया से तन्हा जाने के लिए ही.
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