20111014

आऊंगा मुस्कुराते हुए और लौटूंगा लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट लेकर ः जगजीत सिंह



जग जीतनेवाले जगजीत सिंह का जाना...

25 अप्रेल, 2011 को दिल्ली के अशोका होटल में फिल्म गांधी टू हिटलर की म्यूजिक लांच के दौरान उनसे पहली और आखिरी मुलाकात हुई. उन्होंने आखिरी बार इसी फिल्म में अपनी आवाज दी. गीत के बोल थे...हर ओर तबाही का मंजर है... फिल्म का म्यूजिक उन्होंने ही लांच किया. वे बेहद हड़बड़ी में थे. मीडिया या पत्रकारों से बातचीत करने में उन्होंने अधिक रुचि नहीं दिखाई थी. इसके बावजूद कुछ मिनटों के लिए ही सही म्यूजिक लांच के बाद उनसे बातचीत करने का सुनहरा अवसर प्राप्त मिला. मन में यही उत्सुकता थी कि किसी ऐसी फिल्म जिसके निदर्ेशक बिल्कुल नये हैं. उनकी फिल्म में उन्होंने अपनी आवाज दी, कुछ खास वजह? उन्होंने बड़ी सादगी से इस प्रश्न का जवाब दिया. बेटा, देखिए ,संगीत में कुछ भी छोटा या बड़ा या कम ज्यादा नहीं होता. संगीत बस संगीत होता है. संगीत दिल से आती है. सो, दिल को जो भी अच्छा लगा, गाता रहा हूं. इसलिए इस फिल्म के गीत के लिए भी तैयार हुआ. दूसरी खास बात यह भी थी कि फिल्म एक गंभीर मुद्दे को लेकर बनी है. अब इस तरह की फिल्में बननी बंद हो चुकी हैं. और फिल्म के जो गीत के बोल हैं...वह विश्व शांति के उद्देश्य से तैयार किया गया है. इतनी बातें कर उन्होंने कहा कि शायद इतनी वजह काफी है कि किसी गायक के लिए, अपनी आवाज देने के लिए. उन्होंने वर्तमान सिनेमा, संगीत पर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा था कि उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं है. जो बदलाव हो रहे हैं. वह स्वभाविक है. बस दुख इस बात का है कि आत्मा मरती जा रही है. सुननेवालों की भी और सुनानेवालों की भी. बेतरतीब गानें बन रहे हैं और सुननेवाले उस पर आपत्ति भी नहीं जता रहे. फिल्मों में तो धीरे धीरे गजल गायिकी समाप्त ही हो चुकी है. किसी दौर में अच्छा लगता था निदर्ेशक, संगीतकार, गीतकार बैठते थे. यह सोचते थे कि चाहे जो भी हो फिल्म में एक गजल तो रखेंगे ही. अब उनकी जगह आयटम सांग है. अब चाहे जो हो आयटम सांग रखेंगे ही. इस छोटी सी बातचीत को उन्होंने बस यही कहते हुए विराम लगाया और कार में बैठ गये कि मुझे बस एक बात ही याद रखनी है. कलाकार होने के नाते. राज कपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर की. कलाकार की जिंदगी में चाहे कितना भी गम हो, दुख हो. जब परदे पर आना है. लोगों के सामने. तो मुस्कुराते हुए ही आना है. और लौटना है उनके चेहरे पर मुस्कुराहट देख कर. उनकी यही पंक्तियां दरअसल, उनके पूरे जीवन का सार थी. अपनी इसी बात पर वे आज तक कायम रहे. अपनी आवाज से ही उन्होंने जग को जीता. शायद उनके माता-पिता बचपन में ही इस बात से वाकिफ हो चुके होंगे कि उनका पुत्र जगमोहन एक दिन अपनी गायिकी से सिर्फ जग को मोह लेगा, बल्कि वह जग पर जीत भी हासिल करेगा. इसलिए वे जगजीत सिंह थे. यानी जग को जीतनेवाले. उनका जाना, गजल की एक खास दौर की तहजीब का जाना है. आज वह हमारे बीच नहीं, लेकिन इसके बावजूद वे अपनी आवाज के साथ हम सभी की धड़कनों के साथ रहेंगे. जगजीत सिंह पिछले महीने से ही बीमार थे. उन्हें मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती किया गया था, जहां 10 अक्तूबर को ब्रेन हैंबरेंज की वजह से उनका देहांत हो गया. जगजीत सिंह गजल सम्राट बने. चूंकि उन्होंने गजल गायिकी को एक अलग स्वरूप दिया. सबसे जुदा, सबसे उम्दा.

निदा फाजली, गीतकार, लेखक, शायर

जगजीत का जाना एक खास दोस्त की क्षति है. हमने साथ में बहुत काम किया. कई रचनाएं कीं. खास बात यही थी कि मैं उनसे और वह मुझसे सीखने में हमेशा तत्पर रहते थे. वे संगीत में किसी को छोटा या बड़ा नहीं मानते थे. वे संगीत को सर्वोपरि मानते थे. यही वजह थी कि उन्होंने अपने स्टूडियो का नाम भी संगीत ही रखा था. वह ईश्वर द्वारा भेजा गया अनमोल रत्न था, जिसने बेटे की मृत्यु के बाद भी अपनी कला को नहीं छोड़ा. उत्साही, नयी प्रेरणा लेनेवाला. और सरल शब्दों के साथ गजल को प्रस्तुत करनेवाला गायक जगजीत ही हो सकता है. उसे प्रकृति से बेहद लगाव था और प्रायः हम दोनों शांत किसी कमरे में बैठने की बजाय पेड़ पौधों के बीच, प्राकृतिक खूबसूरती के बीच बैठ कर बातें किया करते थे. उनकी एक खास बात यह भी थी कि उनकी कोशिश होती थी कि उनके गाये गीतों में जो भी शब्द हों उनका इस्तेमाल इस कदर हो कि श्रोताओं को बिना किसी डिक्शनरी के सार समझ में आ जाये. आप गौर करेंगे. तो यह होता भी रहा. उन्होंने अपने गीतों द्वारा लोगों को रोमांस करना सिखाया. वे जब कांसर्ट करते थे तो क्या बात होती थी. सभी हंसते थे. मुस्कुराते थे. उनकी गायिकी के साथ साथ. मुझे याद है...एक बार मजाक में उन्होंने जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन की जगह धन...गा दिया था जिसे सुन कर वहां बैठे लोगों ने खूब तालियां बजायी.तो वह एक अच्छा परफॉरमर भी था. उसे पता था कि किस तरह दर्शकों का मनोरंजन करना है. उनके द्वारा गाये गीतों में सरफरोश का गीत मुझे अधिक प्रिय है.

नलिन सिंह, गांधी टू हिटलर के लेखक, को-प्रोडयूसर

गांधी टू हिटलर में एक गीत था जो विश्व शांति के लिए था. इसे पल्लवी जी ने लिखा था. गाने लिखने के बाद जब हम सभी के जेहन में यह बात आयी तो हमने यही सोचा कि जगजीत सिंह जैसे गायक इसे गाने के लिए तैयार होंगे. चूंकि हम पहली बार फीचर फिल्म बना रहे थे. हम न्यूकमर्स थे. और जगजीत ठहरे गजल उस्ताद. लेकिन हमें आश्चर्य हुआ. जब वह तैयार भी हो गये और उन्होंने कहा कि अगर यह गीत विश्व शांति के लिए तैयार किया गया है तो मैं इसके लिए कोई पैसे नहीं लूंगा. तय हुआ. मुंबई के स्टूडियो में हम सभी रिकॉर्डिंग करने पहुंचे. वहां उनका एक अलग ही अंदाज निकल कर सामने आया. हमने सोचा था कि वे काफी गंभीर होंगे. लेकिन वह बहुत मजाकिया अंदाज में नजर आये. गाने की रिकॉर्डिंग के बाद उन्होंने कहा कि अगर सही न हुआ हो तो फिर से कर लेंगे. प्रायः कुतर्े पायजामे में नजर आनेवाले जगजीत सिंह उस दिन जींस टी शर्ट में थे. वाकई गांधी टू हिटलर की टीम खुशनसीब है कि जगजीत सिंह जैसे महान गायक के साथ काम करने का अवसर हमें प्राप्त हुआ. खुशी दोगुनी हो गयी थी, जब उन्होंने खुद दिल्ली आकर फिल्म का म्यूजिक लांच भी किया.

जसवींदर नरुला, गायिका

जगजीत अंकल पंजाब से थे. और मैं भी. शायद यही वजह थी कि वह मुझे देखकर बहुत खुश होते थे.मुझे याद है 9 साल की उम्र में पहली बार मुझे उनके साथ स्टेज पर गाने का मौका मिला था. मैं बहुत नर्वस थी. लेकिन उन्होंने अपना हाथ देकर मुझे बगल में बिठाया. और शालीनता से समझाया बिल्कुल परेशान न हो. समझो कि सामने कोई नहीं है. बस सही तरीके से गाओ. उनका वह आशीर्वाद आज भी मेरे साथ है. चूंकि जीवन में वह मेरा पहला परफॉरमेंस था और मेरे मन से डर उन्होंने तो हटाया.

श्याम बेनेगल, निदर्ेशक

जगजीत सिंह की गायिकी से समाज को यही योगदान मिला, कि वे लोग जो केवल यह सोचते थे कि गजल वही सुन सकते हैं, लिख सकते हैं, गा सकते हैं या समझ सकते हैं. जिनका उर्दू भाषा पर कमांड हो. उनके इस भ्रम को जगजीत ने तोड़ा. बेहद सामान्य अंदाज में प्रस्तुति, सरल भाषा, भाव के साथ उन्होंने गायिकी की. और गजल को आम लोगों तक पहुंचाया. बल्कि गजल को आम दर्शकों और भारत के बाहर भी लोकप्रिय बनाने का श्रेय जगजीत सिंह को ही जाता है.

प्यार की आहट भी है और हिचकिचाहट भी ः कृतिका कामरा


पाकिस्तान के लोकप्रिय धारावाहिक धूप किनारे से प्रेरित होकर सोनी टीवी एक नये धारावाहिक की शुरुआत कर रहा है. कुछ तो लोग कहेंगे नामक इस धारावाहिक में प्रेमी युगल के रूप में नजर आयेंगे कृतिका मोहनिश बहल. कृतिका इस धारावाहिक में खुले मिजाज प्यार पर विश्वास करनेवाली लड़की की भूमिका निभा रही हैं. पेश है अनुप्रिया से हुई उनकी बातचीत के मुख्य अंश

इमेजिन टीवी के लोकप्रिय धारावाहिकों में से एक कितनी मोहब्बत है की कृतिका कामरा अब और मैच्योर हो चुकी हैं.अपने प्रियवर करण कुंद्रा के साथ के बिना अब वे अपनी ऑन स्क्रीन की नयी पारी की शुरुआत कर रही हैं.

कृतिका, कुछ दिनों पहले यह खबर आयी थी कि आप अब करण के साथ ऑन स्क्रीन काम नहीं करना चाहतीं?

हां, चूंकि अब मैं चाहती हूं कि लोग यह न कहे कि हम सिर्फ साथ में ही काम कर सकते हैं. एक कलाकार को खुद में विभिन्नता लाने के लिए इस तरह के निर्णय लेने ही चाहिए.

कुछ तो लोग कहेंगे में काम करने का अवसर कैसे मिलाय

मैंने शो के निर्माता राजन शाही को पहले से जानती तो थी. लेकिन कभी बातचीत नहीं होती थी. एक दिन प्रोडक्शन हाउस से फोन आया कि आपको एक धारावाहिक के लिए लीड किरदार दिया जा रहा है. क्या आप करना चाहेंगी. मैं वहां गयी. मैंने स्क्रिप्ट सुनी और मैंने हां कह दी.

हां, कहने की खास वजह

चूंकि यह बिल्कुल अलग तरह की प्रेम कहानी को बयां करनेवाली कहानी थी. उम्र में बड़े हैं मोहनिश. और मैं छोटी हूं. फिर भी दोनों में प्यार है. प्यार की आहट है और हिचकिचाहट भी है. मैंने ऐसी प्रेम कहानियां पहले भी सुनी थी और पढ़ी थी. देखी नहीं थी. सो, हां कह दी.

लेकिन यह कहानी तो पूरी तरह धारावाहिक धूप किनारे से प्रेरित है.

जी हां, आप बिल्कुल सही कह रही हैं. लेखक कमलेश की कहानी धूप किनारे की कहानी से प्रेरणा मिली. लेकिन जिस वक्त इस धारावाहिक का प्रसारण होता था. उस वक्त मैं बहुत छोटी थी. सो, मैंने अब जाकर इस शो के दौरान धूप किनारे के सारे एपिसोड यू टयूब पर देखे.

क्या शो में संवादों को लेकर कोई परेशानी हुई?चूंकि कहानी पाकिस्तानी कहानी से प्रेरित है तो शब्द कठिन रहे होंगे आपके लिए.

जी बिल्कुल नहीं. धूप किनारे को आज के दौर में ढाल कर लिखने की कोशिश की गयी है. इसकी वजह से कहानी में ताजगी है. इसके अलावा इसे पूरी खूबसूरती से गढ़ा गया है. संवाद बिल्कुल सामान्य हैं. मैं तो शुक्रगुजार हूं कमलेश जी की जिन्होंने सरल लेकिन खास संवाद लिखे हैं.

मोहनिश काफी वरिष्ठ कलाकार रहे हैं. उनके साथ काम करने में कोई परेशानी महसूस नहीं हुई?

बिल्कुल नहीं, मैं और मेरी मां हमेशा से मोहनिश के फैन रहे हैं. मैं उनकी सारी फिल्में देखती थी. चूंकि मुझे उनके किरदार बहुत अच्छे लगते थे. या यूं कह लें आदर्शवादी लगते थे. और मैं हमेशा सोचा करती थी कि मेरे पति ऐसे ही हों. सो, जब उनके साथ स्क्रीन शेयर करने का मौका मिला तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. लेकिन मैंने आज तक उन्हें कभी यह नहीं बताया कि मैं बचपन से उनके किरदारों से प्यार करती थी.

और करण क्या कहते हैं मोहनिश और आपकी जोड़ी को लेकर.

वह हमेशा यही कहते हैं कि मोहनिश जी जैसे कलाकारों के साथ काम करने से हमेशा नया सीखने का मौका मिलता है. सो मैं उनसे ज्यादा से ज्यादा नयी चीजें सीखने की कोशिश करूं.

आज के दौर में कुछ...जैसी प्रेमकहानियां सफल होंगी?

हां, बिल्कुल आप देखेंगे कि दर्शक खुद ऐसी कहानियों से खुद को जोड़ लेंगे. हम सबकी जिंदगी में प्यार तो बस हो ही जाता है. कभी भी किसी से भी. कई लोगों को अपने शिक्षक से ही हो जाता है. तो. मेरे ख्याल से यह प्रेम कहानी प्रासंगिक है.

लेकिन ऐसी कहानियों को समाज में उचित नहीं माना जाता.

जी, इसलिए तो हमने इस शो का नाम ही रखा है कि कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना. लेकिन आपने जब वी मेट देखा होगा न. करीना कहती है न कि प्यार में कुछ भी सही या गलत नहीं होता. प्यार तो बस प्यार होता है.